श्लोक 1-2
जनमेजय उवाच। पुत्रं ययातेः प्रबूहि पूरुं धर्मभृतां वरम्। आनुपूर्व्येण ये चान्ये पूरोर्वंशविवर्धनाः।। (1-88-1) विस्तरेण पुनर्ब्रूहि दौष्यन्तेर्जनमेजयात्। संबभूव यथा राजा भरतो द्विजसत्तम।। (1-88-2)
हिंदी अनुवाद: जनमेजय ने पूछा— हे द्विजसत्तम! आप ययाति के धर्मपरायण पुत्र पुरु का तथा क्रमानुसार पुरु के वंश को बढ़ाने वाले अन्य राजाओं का विस्तार से वर्णन कीजिए। साथ ही, दुष्यंत पुत्र जनमेजय से राजा भरत की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह प्रसंग भी विस्तार से सुनाइए।
व्याख्या: राजा जनमेजय महाभारत की कथा को आगे बढ़ाते हुए महर्षि से पुरु वंश (पौरव वंश) की पूरी वंशावली और महान चक्रवर्ती राजा भरत के जन्म का विस्तृत इतिहास सुनना चाहते हैं।
श्लोक 3
वैशंपायन उवाच। पूरुर्नृपतिशार्दूलो यथैवास्य पिता नृप। धर्मनित्यः स्थितो राज्ये शक्रतुल्यपराक्रमः।। (1-88-3)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— नृपश्रेष्ठ पुरु अपने पिता ययाति की ही भाँति धर्मपरायण, राज्य में दृढ़ता से स्थित और देवराज इंद्र के समान पराक्रमी थे।
व्याख्या: ययाति के सबसे छोटे और आज्ञाकारी पुत्र पुरु अपने पिता के गुणों को अपनाते हुए एक आदर्श, धर्मी और पराक्रमी सम्राट के रूप में सिंहासन पर आसीन हुए।
श्लोक 4-5
प्रवीरेश्वररौद्राश्वास्त्रयः पुत्रा महारथाः। पूरोः पौष्ट्यामजायन्त प्रवीरो वंशकृत्ततः।। (1-88-4) मनस्युरभवत्तस्माच्छूरसेनीसुतः प्रभुः। पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता राजीवलोचनः।। (1-88-5)
हिंदी अनुवाद: पुरु की पत्नी पौष्टी से प्रवीर, ईश्वर और रौद्राश्व—ये तीन महारथी पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें से प्रवीर ने आगे चलकर वंश को आगे बढ़ाया। प्रवीर से मनस्यु नामक यशस्वी पुत्र हुआ, जो शूरसेन की पुत्री से उत्पन्न हुआ था। वह कमल के समान नेत्रों वाला प्रभु चतुरंत पृथ्वी (समुद्रपर्यंत पूरी पृथ्वी) का पालक हुआ।
व्याख्या: यहाँ पुरु के वंश की शुरुआती पीढ़ियों का विवरण दिया गया है, जहाँ प्रवीर और उनके पुत्र मनस्यु ने पौरव वंश को सुदृढ़ किया।
श्लोक 6-8
शक्तः संहननो वाग्मी सौवीरीतनयास्त्रयः। मनस्योरभवन्पुत्राः शूराः सर्वे महारथाः।। (1-88-6) अन्वग्भानुप्रभृतयो मिश्रकेश्यां मनस्विनः। रौद्राश्वस्य महेष्वासा दशाप्सरसि सूनवः।। (1-88-7) यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो बहुश्रुताः। सर्वे सर्वास्त्रविद्वासः सर्वे धर्मपरायणाः।। (1-88-8)
हिंदी अनुवाद: सौवीरी के गर्भ से मनस्यु के तीन पुत्र हुए— शक्त, संहनन और वाग्मी; ये सभी शूरवीर और महारथी थे। दूसरी ओर, रौद्राश्व के अप्सरा मिश्रकेशी से दस पुत्र हुए, जिनमें अन्वग्भानु आदि प्रमुख थे। वे सभी महान धनुर्धर, यज्ञ करने वाले, शूरवीर, संततिवान, बहुश्रुत (ज्ञाानी), सभी अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता और धर्मपरायण थे।
व्याख्या: पौरव वंश में एक के बाद एक कई पराक्रमी, धार्मिक और वेदों के मर्मज्ञ राजाओं का जन्म हुआ, जिससे इस वंश की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली।
श्लोक 9-11
ऋचेयुरथ कक्षेयुः कृकणेयुश्च वीर्यवान्। स्थण्डिलेयुर्वनेयुश्च जलेयुश्च महायशाः।। (1-88-9) तेजेयुर्बलावान्धीमान्सत्येयुश्चन्द्रविक्रमः। धर्मेयुः सन्नतेयुश्च दशमो देवविक्रमः।। (1-88-10) अनाधृष्टिरभूत्तेषां विद्वान्भुवि तथैकराट्। ऋचेयुरथ विक्रान्तो देवानामिव वासवः।। (1-88-11)
हिंदी अनुवाद: रौद्राश्व और मिश्रकेशी के वे दसों पुत्र क्रमशः ये थे— ऋचेयु, कक्षेयु, वीर्यवान कृकणेयु, स्थण्डिलेयु, वनेयु, महायशस्वी जलेयु, बलवान व बुद्धिमान तेजेयु, चंद्रमा के समान पराक्रमी सत्येयु, धर्मेयु, और दसवें देवतुल्य पराक्रमी सन्नतेयु। इनमें ऋचेयु विद्वान और देवराज इंद्र के समान पृथ्वी के एकमात्र चक्रवर्ती सम्राट बने।
व्याख्या: रौद्राश्व के दसों पुत्रों के नाम और उनके विशेष गुणों का यहाँ उल्लेख किया गया है, जो आगे चलकर वंश विस्तार का आधार बने।
श्लोक 12-14
अनाधृष्टिसुतस्त्वासीद्राजसूयाश्वमेधकृत्। मतिनार इति ख्यातो राजा परमधार्मिकः।। (1-88-12) मतिनारसुता राजंश्चत्वारोऽमितविक्रमाः। तंसुर्महानतिरथो द्रुह्युश्चाप्रतिमद्युतिः।। (1-88-13) तेषां तंसुर्महावीर्यः पौरवं वंशमुद्वहन्। आजहार यशो दीप्तं जिगाय च वसुंधराम्।। (1-88-14)
हिंदी अनुवाद: अनाधृष्टिके पुत्र राजसूय और अश्वमेध यज्ञ करने वाले परम धार्मिक राजा मतिनार हुए। हे राजन्! मतिनार के चार अमित पराक्रमी पुत्र थे— तंसु, महानतिरथ और अप्रतिम कांति वाले द्रुह्यु आदि। उनमें महावीर्यवान तंसु ने पौरव वंश को आगे बढ़ाया, प्रखर यश अर्जित किया और पूरी पृथ्वी को जीता।
व्याख्या: राजा मतिनार इस वंश के अत्यंत प्रतापी सम्राट हुए जिन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किए। उनके पुत्र तंसु ने इस वंश की परंपरा और गौरव को और आगे बढ़ाया।
श्लोक 15-17
ईलिनं तु सुतं तंसुर्जनयामास वीर्यवान्। सोऽपि कृत्स्नामिमां भूमिं विजिग्ये जयतां वरः।। (1-88-15) रथन्तर्यां सुतान्पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः। ईलिनो जनयामास दुष्यन्तप्रभृतीन्नृपान्।। (1-88-16) दुष्यन्तं शूरभीमौ च प्रवसुं वसुमेव च। तेषां श्रेष्ठोऽभवद्राजा दुष्यन्तो दुर्जयो युधि।। (1-88-17)
हिंदी अनुवाद: वीर्यवान तंसु ने ईलिन नामक पुत्र को जन्म दिया। वह भी विजेताओं में श्रेष्ठ था और उसने संपूर्ण पृथ्वी को जीता। ईलिन ने रथन्तरी के गर्भ से पाँच महाभूतों के समान तेजवान पाँच पुत्र उत्पन्न किए— दुष्यन्त, शूर, भीम, प्रवसु और वसु। इन सभी भाइयों में राजा दुष्यन्त युद्ध में अजय और सबसे श्रेष्ठ हुए।
व्याख्या: ईलिन के पुत्रों में महान राजा दुष्यंत का जन्म हुआ, जो आगे चलकर शकुंतला के साथ अपने प्रेम प्रसंग और चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता होने के कारण विश्व प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 18-19
दुष्यन्ताल्लक्षणायां तु जज्ञे वै जनमेजयः। शकुन्तलायां भरतो दौष्यन्तिरभवत्सुतः।। (1-88-18) तस्माद्भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद्यशः।। (1-88-19)
हिंदी अनुवाद: दुष्यन्त की पत्नी लक्षणा से जनमेजय नामक पुत्र हुआ, और विश्वामित्र-मेनका की पुत्री शकुंतला के गर्भ से दुष्यन्त के यहाँ महान पुत्र भरत (दौष्यन्ति) उत्पन्न हुए। उन्हीं राजा भरत से इस महान 'भरत वंश' (महाभारत का मूल वंश) का अत्यंत प्रखर यश चारों ओर फैल गया।
व्याख्या: राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर ही इस देश का नाम 'भारत' पड़ा और पौरव वंश आगे चलकर 'भरत वंश' के रूप में विख्यात हुआ, जिससे आगे चलकर कुरु वंश और पांडव-कौरव प्रकट हुए।
। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि अष्टाशीतितमोऽध्यायः।। 88 ।।
