महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 195वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 6 (ब्राह्मणी का क्षत्रियों से कहना और और्ब ऋषि की शरण में जाने का उपदेश)
श्लोक 1, 2 और 3:
ब्राह्मण्युवाच। नाहं गृह्णामि वस्ताता दृष्टीर्नास्मि रुषान्विता। अयं तु भार्गवो नूनमूरुजः कुपितोऽद्य वः।। तेन चक्षूंषि वस्ताता व्यक्तं कोपान्महात्मना। स्मरता निहतान्बन्धूनादत्तानि न संशयः।। गर्भानपि यदा यूयं भृगूणां घ्नत पुत्रकाः। तदायमूरुणा गर्भो मया वर्षशतं धृतः।।
- हिन्दी अनुवाद: उस ब्राह्मणी ने कहा— "हे तात! मैं तुम्हारी दृष्टियों (आँखों की रोशनी) को नहीं ले रही हूँ और न ही मैं क्रोध से युक्त हूँ। किंतु यह भार्गव वंशी उरुज (और्ब) आज तुम पर कुपित हुआ है। हे तात! अपने मारे गए बन्धुओं का स्मरण करते हुए उसी महात्मा के कोप से तुम्हारी आँखें ले ली गई हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। हे पुत्रको! जब तुम लोग भृगुवंशियों के गर्भों को भी मार रहे थे, तब मैंने इस गर्भ को अपनी जाँघ (ऊरु) में सौ वर्षों तक धारण किए रखा था।"
- व्याख्या: ब्राह्मणी क्षत्रियों को समझाती है कि वह खुद क्रोधित नहीं है, बल्कि उसके जाँघ से उत्पन्न हुए महातेजस्वी भार्गव बालक (और्ब) के क्रोध के कारण उनकी आँखें चली गई हैं, क्योंकि क्षत्रियों ने भृगुवंशियों का निर्मम संहार किया था।
श्लोक 4, 5 और 6:
षडङ्गश्चाखिलो वेद इमं गर्भस्थमेव ह। विवेश भृगुवंशस्य भूयः प्रियचिकीर्षया।। सोऽयं पितृवधाद्व्यक्तं क्रोधाद्वो हन्तुमिच्छति। तेजसा तस्य दिव्येन चक्षूंषि मुषितानि वः।। तमेव यूयं याचध्वमौर्वं मम सुतोत्तमम्। अयं वः प्रणिपातेन तुष्टो दृष्टीः प्रदास्यति।।
- हिन्दी अनुवाद: "छह अंगों सहित संपूर्ण वेद गर्भ में रहते हुए ही भृगुवंश का पुनः प्रिय करने की इच्छा से इसी में प्रवेश कर गए थे। अपने पिता के वध के कारण यह स्पष्ट रूप से तुम्हारे क्रोध का नाश और तुम्हें दंडित करना चाहता है, और इसी के दिव्य तेज से तुम्हारी आँखें चुरा ली गई हैं (छीन ली गई हैं)। इसलिए तुम सब मेरे उस सुतोत्तम पुत्र 'और्ब' की ही शरण में जाओ और उसी से प्रार्थना करो। यह तुम्हारे प्रणाम करने पर संतुष्ट होकर तुम्हारी दृष्टियाँ तुम्हें वापस दे देगा।"
- व्याख्या: ब्राह्मणी बताती है कि गर्भ में ही वेदों का अध्ययन करने वाला वह बालक और कोई नहीं बल्कि महर्षि और्ब है, और यदि वे अपनी आँखें वापस चाहते हैं, तो उन्हें और्ब ऋषि से ही क्षमा याचना करनी होगी।
श्लोक 7 से 12 (और्ब ऋषि द्वारा दृष्टि लौटाना और उनके मन में संपूर्ण लोक के विनाश का विचार)
श्लोक 7, 8 और 9:
वसिष्ठ उवाच। एवमुक्तास्ततः सर्वे राजानस्ते तमूरुजम्। ऊचुः प्रसीदेति तदा प्रसादं च चकार सः।। अनेनैव च विख्यातो नाम्ना लोकेषु सत्तमः। स और्व इति विप्रर्षिरूरुं भित्त्वा व्यजायत।। चक्षूंषि प्रतिलभ्याथ प्रतिजग्मुस्ततो नृपाः। भार्गवस्तु मुनिर्मेने सर्वलोकपराभवम्।।
- हिन्दी अनुवाद: वसिष्ठजी ने कहा— उन ब्राह्मणी द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे सभी राजा उस उरुज (और्ब) के पास गए और 'प्रसन्न होइए' ऐसा कहकर प्रार्थना की, तब उन्होंने उन पर प्रसाद (कृपा) किया। अपनी जाँघ को चीरकर उत्पन्न होने के कारण ही वे सत्तम विप्रर्षि संसार में 'और्ब' इस प्रसिद्ध नाम से विख्यात हुए। अपनी आँखें (दृष्टि) वापस प्राप्त करके वे सभी राजा वहाँ से अपने घर लौट गए। किंतु भृगुवंशी मुनि और्ब ने संपूर्ण संसार के पराभव (विनाश) का विचार किया।
- व्याख्या: और्ब ऋषि ने क्षत्रियों की प्रार्थना स्वीकार करके उनकी दृष्टि तो लौटा दी, किंतु उनके मन में अपने कुल के वध का प्रतिशोध लेने के लिए पूरी सृष्टि को ही नष्ट करने का विचार आ गया।
श्लोक 10, 11 और 12:
स चक्रे तात लोकानां विनाशाय मतिं तदा। सर्वेषामेव कार्त्स्न्येन मनः प्रवणमात्मनः।। इच्छन्नपचितिं कर्तुं भृगूणां भृगुनन्दनः। सर्वलोकविनाशाय तपसा सहतैधितः।। तापयामास ताँल्लोकान्सदेवासुरमानुषान्। तपसोग्रेण महता नन्दयिष्यन्पितामहान्।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे तात! भृगुनंदन और्ब ने उस समय सम्पूर्ण लोकों के विनाश के लिए अपनी बुद्धि बना ली और उनका मन पूरी तरह इसी कार्य में प्रवृत्त हो गया। भृगुवंशियों के प्रति हुए अन्याय का बदला (अपचिति) लेने की इच्छा से उस भृगुनंदन ने अपनी तपस्या के बल को और अधिक बढ़ा लिया। अपने पितरों को प्रसन्न करने की इच्छा से उन्होंने अपनी उग्र और महान तपस्या के बल पर देवता, असुर और मनुष्य सहित सभी लोकों को तपाना (दग्ध करना) शुरू कर दिया।"
- व्याख्या: और्ब ऋषि ने अपनी प्रचंड तपस्या की अग्नि से तीनों लोकों (देव, दानव, मनुष्य) को जलाना और नष्ट करना प्रारंभ कर दिया।
श्लोक 13 से 22 (पितरों का प्रकट होना और और्ब ऋषि को समझाना)
श्लोक 13, 14, 15 और 16:
ततस्तं पितरस्तात विज्ञाय कुलनन्दनम्। पितृलोकादुपागम्य सर्व ऊचुरिदं वचः।। और्व दृष्टः प्रभावस्ते तपसोग्रस्य पुत्रक। प्रसादं कुरु लोकानां नियच्छ क्रोधमात्मनः।। नानीशैर्हि तदा तात भृगुभिर्भावितात्मभिः। वधो ह्युपेक्षितः सर्वैः क्षत्रियाणां विहिंसताम्।। आयुषा विप्रकृष्टेन यदा नः खेद आविशत। तदाऽस्माभिर्वधस्तात क्षत्रियैरीप्सितः स्वयम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे तात! तब उनके पितरों ने अपने उस कुलनंदन को जानकर, पितृलोक से नीचे आकर उन सबको यह वचन कहा— 'हे पुत्रक और्ब! तुम्हारी इस उग्र तपस्या का प्रभाव हमने देख लिया है। अब तुम लोकों पर कृपा करो और अपने इस क्रोध को नियंत्रित करो। हे तात! उस समय हिंसा करने वाले क्षत्रियों द्वारा जो हमारा वध किया गया था, वह भावितात्मा भृगुवंशियों द्वारा अपनी अनिच्छा (असामर्थ्य) के कारण उपेक्षित नहीं छोड़ा गया था। जब दीर्घायु (लंबी आयु) के कारण हम भृगुवंशी थक गए और हमें खेद होने लगा, तब हे तात! हमीं लोगों ने स्वयं क्षत्रियों द्वारा अपना वध करवाया था (अर्थात हम स्वयं मृत्यु चाहते थे)।'"
- व्याख्या: जब और्ब ऋषि के क्रोध से पूरी सृष्टि जलने लगी, तब उनके अपने पूर्वज (पितर) पितृलोक से प्रकट हुए और उन्हें समझाया कि क्षत्रियों द्वारा भृगुवंशियों का वध कोई लाचारी नहीं थी, बल्कि वे लंबी आयु से ऊबकर खुद मृत्यु चाहते थे।
श्लोक 17, 18, 19 और 20:
निखातं यच्च वै वित्तं केनचिद्गृगुवेश्मनि। वैरायैव तदा न्यस्तं क्षत्रियान्कोपयिष्णुभिः।। किं हि वित्तेन नः कार्यं स्वर्गेप्सूनां द्विजोत्तम। यदस्माकं धनाध्यक्षः प्रभूतं धनमाहरत्।। यदा तु मृत्युरादातुं न नः शक्नोति सर्वशः। तदाऽस्माभिरयं उपायस्तात संमतः संमतः।। आत्महा च पुमांस्तात न लोकाँल्लभते शुभान्। ततोऽस्माभिः समीक्ष्यैवं नात्मनात्मा निपातितः।।
- व्याख्या: पितरों ने आगे बताया कि भृगुवंशियों ने जो धन जमीन में छिपाया था, वह भी जानबूझकर क्षत्रियों को क्रोधित करने और उन्हें अपने वध का अवसर देने के लिए ही रखा गया था। स्वर्ग की इच्छा रखने वाले भृगुवंशियों को धन से क्या काम था, क्योंकि कुबेर (धनाध्यक्ष) उनके पास पहले से प्रचुर धन रखते थे। किंतु जब मृत्यु स्वाभाविक रूप से उन्हें नहीं आ रही थी, तब उन्होंने क्षत्रियों को उकसाकर यह उपाय निकाला ताकि वे बिना पापकर्म (आत्महत्या) किए शरीर त्याग सकें, क्योंकि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति कभी शुभ लोक प्राप्त नहीं करता।
श्लोक 21 और 22:
न चैतन्नः प्रियं तात यदिदं कर्तुमिच्छसि। नियच्छेदं मनः पापात्सर्वलोकपराभवात्।। मा वधीः क्षत्रियांस्तात न लोकान्सप्त पुत्रक। दूषयन्तं तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि।।
- व्याख्या: "हे तात! तुम जो यह संपूर्ण संसार का विनाश करना चाहते हो, यह हमारे लिए भी प्रिय नहीं है। इसलिए अपने मन को इस पाप से और संपूर्ण लोक के पराभव (विनाश) के विचार से रोको। हे तात! तुम क्षत्रियों का वध मत करो और इन सातों लोकों को दूषित मत करो। अपने इस उठे हुए क्रोध को ही मार डालो (शांत करो)!" इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
