महाभारत् -०१ आदिपर्व -१९६

महाभारत् -०१ आदिपर्व -१९६

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 196वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 16 (और्ब ऋषि का अपने क्रोध और प्रतिज्ञा का औचित्य बताना)

श्लोक 1, 2, 3 और 4:

और्व उवाच। उक्तवानस्मि यां क्रोधात्प्रतिज्ञां पितरस्तदा। सर्वलोकविनाशाय न सा मे वितथा भवेत्।। वृथारोषप्रतिज्ञो वै नाहं जीवितुमुत्सहे। अनिस्तीर्णो हि मां रोषो दहेदग्निरिवारणिम्।। यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति। नालं स मनुजः सम्यक् त्रिवर्गं परिरक्षितुम्।। अशिष्टानां नियन्ता हि शिष्टानां परिरक्षिता। स्थाने रोषः प्रयुक्तः स्यान्नृपैः सर्वजिगीषुभिः।।

  • हिन्दी अनुवाद: और्ब ऋषि ने कहा— "हे पितरो! मैंने क्रोध में आकर संपूर्ण लोक के विनाश के लिए जो प्रतिज्ञा की है, वह मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं होनी चाहिए। व्यर्थ ही रोष (क्रोध) और प्रतिज्ञा करने वाला मैं जीवित रहना नहीं चाहता, क्योंकि शांत न किया गया यह क्रोध मुझे उसी प्रकार जला देगा जैसे अग्नि अरणि (लकड़ी) को जला देती है। जो मनुष्य कारण से उत्पन्न हुए क्रोध को (अन्याय होने पर भी) यों ही क्षमा कर देता है, वह मनुष्य धर्म, अर्थ और काम (त्रिवर्ग) की भली-भांति रक्षा करने में समर्थ नहीं होता। अशिष्टों (दुष्टों) का दमन करने वाला और शिष्टों की रक्षा करने वाला राजाओं द्वारा सब कुछ जीतने की इच्छा रखने वाले पुरुषों के लिए उचित स्थान पर ही रोष (क्रोध) प्रयुक्त किया जाना चाहिए।"
  • व्याख्या: और्ब ऋषि अपने पितरों से तर्क देते हैं कि अन्याय और कुल के संहार को देखकर उनके मन में जो प्रलयकारी क्रोध उत्पन्न हुआ है, यदि वे उसे बिना पूरा किए छोड़ दें, तो वह प्रतिज्ञा झूठी हो जाएगी और वह क्रोध स्वयं उन्हें ही भस्म कर देगा।

श्लोक 5, 6, 7 और 8:

अश्रौषमहमूरुस्थो गर्भशय्यागतस्तदा। आरावं मातृवर्गस्य भृगूणां क्षत्रियैर्वधे।। सामरैर्हि यदा लोके भृगूणां क्षत्रियाधमैः। आगर्भोत्सादनं क्षान्तं तदा मां मन्युराविशत्।। प्रकीर्णकेशाः किल मे मातरः पितरस्तथा। भयात्सर्वेषु लोकेषु नाधिजग्मुः परायणम्।। तान्भृगूणां यदा दारान्कश्चिन्नाभ्युपपद्यत। माता तदा दधारेयमूरुणैकेन मां शुभा।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जब मैं गर्भ की शय्या पर अपनी माता की जाँघ (ऊरु) के भीतर स्थित था, तभी मैंने क्षत्रियों द्वारा भृगुवंशियों के वध के समय उनकी माताओं के आर्त-क्रंदन (चीख-पुकार) को सुना था। देवताओं सहित इस लोक में जब उन क्षत्रियाधमों द्वारा गर्भस्थ बालकों तक का उच्छेदन (संहार) किया जा रहा था और उसे सहन कर लिया गया था, तब मेरे मन में यह तीव्र क्रोध (मन्यु) प्रवेश कर गया था। सुना जाता है कि मेरे वे माता-पिता और अन्य भृगुवंशी भय के कारण अपने बिखरे हुए बालों के साथ सभी लोकों में कहीं भी शरण नहीं पा सके थे। जब भृगुवंशियों की उन डरी-सहमी पत्नियों की रक्षा करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया, तब मेरी उस शुभ माता ने अपने एक ही ऊरु (जाँघ) में मुझे धारण करके मेरी रक्षा की थी।"
  • व्याख्या: और्ब ऋषि अपने जन्म से पहले के उस भीषण नरसंहार को याद करते हैं जब क्षत्रियों ने गर्भवती भृगु पत्नियों तक को नहीं छोड़ा था, और उसी अन्याय के कारण उनके मन में यह रोष भड़का है।

श्लोक 9, 10, 11 और 12:

प्रतिषेद्धा हि पापस्य यदा लोकेषु विद्यते। तदा सर्वेषु लोकेषु पापकृन्नोपपद्यते।। यदा तु प्रतिषेद्धारं पापो न लभते क्वचित्। तिष्ठन्ति बहवो लोकास्तदा पापेषु कर्मसु।। जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान्न नियच्छति। ईशः सन्सोऽपि तेनैव कर्मणा संप्रयुज्यते।। राजभिश्चेश्वरैश्चैव यदि वै पितरो मम। शक्तैर्न शकितास्त्रातुमिष्टं मत्वेह जीवितम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जब संसार में पाप का प्रतिषेध (रोकने वाला) विद्यमान होता है, तब सभी लोकों में पापकर्म करने वाले उत्पन्न नहीं होते। किंतु जब पापी व्यक्ति को रोकने वाला कहीं कोई नहीं मिलता, तब बहुत से लोग पापकर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं। और जो व्यक्ति पाप को अच्छी तरह जानते हुए तथा शक्तिशाली होने पर भी उसे नहीं रोकता (नियंत्रित नहीं करता), वह समर्थ होने पर भी उसी पापकर्म का भागी बन जाता है। हे पितरो! यदि राजाओं और ईश्वर रूपी आप लोग स्वयं समर्थ होने पर भी अपनी इच्छा से जीवित रहने के लिए उन क्षत्रियों से अपनी रक्षा नहीं कर सके..."
  • व्याख्या: और्ब ऋषि नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए कहते हैं कि पापी को न रोकना भी पाप है, और चूंकि उनके अपने पूर्वज शक्तिशाली होने पर भी उस अत्याचार को चुपचाप सह गए, इसलिए अब वे स्वयं इस न्याय और प्रतिशोध के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे।

श्लोक 13, 14, 15 और 16:

अत Eषामहं क्रुद्धो लोकानामीश्वरो ह्यहम्। भवतां च वचो नालमहं समभिवर्तितुम्।। ममापि चेद्भवेदेवमीश्वरस्य सतो महत्। उपपेक्षमाणस्य पुनर्लोकानां किल्बिषाद्भयम्।। यश्चायं मन्युजो मेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति। दहेदेष च मामेव निगृहीतः स्वतेजसा।। भवतां च विजानामि सर्वलोकहितेप्सुताम्। तस्माद्विधद्ध्वं यच्छ्रेयो लोकानां मम चेश्वराः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "...इसी कारण मैं उन पर क्रोधित हूँ, और चूँकि मैं लोकों का ईश्वर (तेजस्वी) हूँ, इसलिए आप लोगों के इस वचन को भी मैं यों ही नहीं टाल सकता (या आपकी बात का उल्लंघन करना मेरे लिए संभव नहीं है)। यदि मुझ जैसे समर्थ ईश्वर के होते हुए भी मैं लोकों के पापों और उपेक्षा के भय को इस प्रकार जाने दूँ, तो मेरा वह क्रोधरूपी अग्नि जो संपूर्ण लोकों को भस्म करना चाहता है, अपने ही तेज से रोके जाने पर अंततः मुझको ही जला डालेगा। किंतु मैं आप लोगों की इस भावना को अच्छी तरह जानता हूँ कि आप सभी संपूर्ण लोक का हित चाहते हैं। इसलिए हे मेरे स्वामियों (पितरों)! आप ही ऐसा कोई उपाय विधिवत विधान कीजिए, जिससे संसार का भी कल्याण हो और मेरी प्रतिज्ञा व क्रोध का भी निर्वाह हो सके।"
  • व्याख्या: और्ब ऋषि अपने पितरों का सम्मान रखते हुए अपना क्रोध शांत करने का कोई ऐसा विकल्प या मार्ग्य माँगते हैं जिससे उनकी प्रतिज्ञा भी खंडित न हो और सृष्टि का विनाश भी टल जाए।

श्लोक 17 से 23 (पितरों का समाधान, समुद्र में क्रोधाग्नि का त्याग और अध्याय का समापन)

श्लोक 17, 18, 19 और 20:

पितर ऊचुः। य एष मन्युजस्तेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति। अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः।। आपोमयाः सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगत्। तस्मादप्सु विमुञ्चेमं क्रोधाग्निं द्विजसत्तम।। अयं तिष्ठतु ते विप्र यदीच्छसि महोदधौ। मन्युजोऽग्निर्दहन्नापो लोका ह्यापोमयाः स्मृताः।। एवं प्रतिज्ञा सत्येयं तवानघ भविष्यति। न चैवं सामरा लोका गमिष्यन्ति पराभवम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: पितरों ने कहा— "हे द्विजसत्तम! तुम्हारे इस क्रोध से उत्पन्न जो अग्नि संपूर्ण लोकों को जलाना चाहती है, हे भद्र! तुम उसे जल (अप्सु) में छोड़ दो, क्योंकि सभी लोक जल में ही प्रतिष्ठित हैं। सभी रस जलमय हैं और यह संपूर्ण जगत भी जलमय ही है, इसलिए हे विप्र! इस क्रोधाग्नि को तुम जल में ही विमुक्त कर दो। हे विप्र! यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो क्रोध से उत्पन्न यह अग्नि महान समुद्र (महोदधि) में ही स्थित रहे, जो जल को जलाते हुए उस क्रोधाग्नि के रूप में वहाँ रहे, क्योंकि लोक भी जलमय ही कहे गए हैं। ऐसा करने से हे अनघ! तुम्हारी यह प्रतिज्ञा भी सत्य हो जाएगी, और देवता सहित ये लोक भी पराभव (विनाश) को प्राप्त नहीं होंगे।"
  • व्याख्या: पितरों ने और्ब ऋषि को उपाय सुझाया कि वे अपनी उस क्रोधाग्नि को समुद्र के जल में छोड़ दें, जिससे समुद्र का पानी जलता रहे और उनकी प्रतिज्ञा भी पूरी हो जाए तथा सृष्टि का विनाश भी टल जाए।

श्लोक 21, 22 और 23:

वसिष्ठ उवाच। ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालये। उत्ससर्ज स चैवाप उपयुङ्क्ते महोदधौ।। महद्धयशिरो भूत्वा यत्तेदविदो विदुः। तमग्निमुद्हिरद्वक्त्रात्पिबत्यापो महोदधौ।। तस्मात्त्वमपि भद्रं ते न लोकान्हन्तुमर्हति। पराशरं पराँल्लोकाञ्जानञ्ज्ञानवतां वर।।

  • हिन्दी अनुवाद: वसिष्ठजी ने कहा— हे तात (अर्जुन)! तब और्ब ऋषि ने अपने उस क्रोध से उत्पन्न अग्नि को वरुण के आलय (समुद्र) में छोड़ दिया, और वह अग्नि महान समुद्र में स्थित होकर जल का उपभोग करने लगी (समुद्र के जल को जलाने लगी)। वेदों के ज्ञाता जिसे जानते हैं, वह महान 'हयशिर' (बड़वानल/घोड़े के मुख वाली अग्नि) बनकर वह अग्नि समुद्र के जल को पीती हुई अपने मुख से उस क्रोधाग्नि को बाहर निकलती है। इसलिए हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ अर्जुन! तुम्हारा भी कल्याण हो, तुम्हें भी उन पराशर तथा अन्य लोकों को जानते हुए इस प्रकार संसार का विनाश नहीं करना चाहिए (यानी जिस प्रकार और्ब ने अपना क्रोध शांत किया, वही मार्ग उचित है)।
  • व्याख्या: वसिष्ठजी ने अर्जुन को समझाया कि कैसे और्ब ऋषि ने अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में 'बड़वानल' (समुद्री अग्नि) के रूप में विलीन कर दिया था। इसी पौराणिक प्रसंग के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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