श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि सप्तपञ्चादशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (जतुगृहपर्व) के १५७वें अध्याय के श्लोकों (श्लोक 1 से 33) का क्रमवार संस्कृत श्लोक, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 1

मूल: पाण्डवास्तु रथान्युक्तान्सदश्वैरनिलोपमैः। आरोहमाणा भीष्मस्य पादौ जगृहुरार्तवत्।। (1-157-1) हिंदी अनुवाद: वायु के समान वेगवान उत्तम घोड़ों से जुते हुए रथों पर चढ़ते हुए पांडवों ने अत्यंत आर्त (दुःखी) भाव से पितामह भीष्म के चरणों का स्पर्श किया। व्याख्या: हस्तिनापुर छोड़ते समय पांडवों का मन भारी था और वे अपने वृद्ध गुरुओं एवं कुल के संरक्षकों के प्रति पूरा सम्मान और विरह की व्यथा व्यक्त कर रहे थे।

श्लोक 2

मूल: राजश्च धृतराष्ट्रस्य द्रोणस्य च महात्मनः। अन्येषां चैव वृद्धानां कृपस्य विदुरस्य च।। (1-157-2) हिंदी अनुवाद: राजा धृतराष्ट्र, महात्मा द्रोणाचार्य, अन्य वृद्धजनों, कृपाचार्य और विदुर जी के चरणों में भी उन्होंने इसी प्रकार प्रणाम किया। व्याख्या: पांडव अपने संस्कारों का पालन करते हुए यात्रा पर निकलने से पूर्व कुल के सभी वरिष्ठ और आदरणीय जनों से आशीर्वाद प्राप्त कर रहे थे।

श्लोक 3

मूल: एवं सर्वान्कुरून्वृद्धानभिवाद्य यतव्रताः। समालिङ्ग्य समानान्वै बालैश्चाप्यभिवादिताः।। (1-157-3) हिंदी अनुवाद: व्रत का पालन करने वाले उन पांडवों ने इस प्रकार सभी वृद्ध कुरुजनों का अभिवादन किया, अपने समान उम्र वालों से गले मिले और बालकों द्वारा अभिवादन स्वीकार किया। व्याख्या: यह दृश्य हस्तिनापुर के राजदरबार और संबंधियों के बीच उनके आपसी प्रेम और शिष्टाचार को भली-भांति दर्शाता है।

श्लोक 4

मूल: सर्वा मातॄस्तथाऽऽपृच्छ्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणम्। प्रकृतीरपि सर्वाश्च प्रययुर्वारणावतम्।। (1-157-4) हिंदी अनुवाद: सभी माताओं से विदा माँगकर, उनकी परिक्रमा (प्रदक्षिण) करके तथा नगर की सभी प्रकृतियों (नागरिकों व अधिकारियों) से विदा लेकर वे वारणावत के लिए प्रस्थान कर गए। व्याख्या: सभी औपचारिक विदाई संस्कारों को पूरा करने के बाद पांडव अपनी माता कुंती के साथ वारणावत की यात्रा पर निकल पड़े।

श्लोक 5

मूल: विदुरश्च महाप्राज्ञस्तथाऽन्ये कुरुपुङ्गवाः। पौराश्च पुरुषव्याघ्रानन्वीयुः शोककर्शिताः।। (1-157-5) हिंदी अनुवाद: महाप्राज्ञ विदुर जी, अन्य कुरुश्रेष्ठ तथा नगर के नागरिक भी शोक से आकुल होकर उन पुरुषसिंह (पांडवों) के पीछे-पीछे कुछ दूर तक गए। व्याख्या: पांडवों के प्रति जनता और विदुर जी का अगाध स्नेह इस बात का प्रमाण था कि वे आम लोगों में कितने लोकप्रिय थे।

श्लोक 6

मूल: तत्र केचिद्ब्रुवन्ति स्म ब्राह्मणा निर्भयास्तदा। दीनान्दृष्ट्वा पाण्डुसुतानतीव भृशदुःखिताः।। (1-157-6) हिंदी अनुवाद: उस समय वहाँ कुछ निर्भय ब्राह्मण पांडुसुतों को दीन (दुःखी व विवश) अवस्था में देखकर अत्यधिक दुःखी हुए और आपस में कहने लगे— व्याख्या: जनता और ब्राह्मणों को यह स्पष्ट महसूस हो रहा था कि पांडवों के साथ अन्याय हो रहा है, जिसे वे खुलकर व्यक्त कर रहे थे।

श्लोक 7

मूल: विषमं पश्यते राजा सर्वथा स सुमन्दधीः। कौरव्यो धृतराष्ट्रस्तु न च धर्मं प्रपश्यति।। (1-157-7) हिंदी अनुवाद: यह कौरवराज धृतराष्ट्र अत्यंत मन्दबुद्धि (विवेकहीन) है, जो सब प्रकार से पक्षपातपूर्ण (विषम) दृष्टि रख रहा है और धर्म को बिल्कुल नहीं देख रहा है। व्याख्या: आम जनता और ब्राह्मण धृतराष्ट्र के इस कृत्य की खुलकर आलोचना कर रहे थे कि वे अपने पुत्रमोह में धर्म और न्याय का त्याग कर रहे हैं।

श्लोक 8

मूल: न हि पापमपापात्मा रोचयिष्यति पाण्डवः। भीमो वा बलिनां श्रेष्ठः कौन्तेयो वा धनञ्जयः।। (1-157-8) हिंदी अनुवाद: निष्पाप पांडव (युधिष्ठिर), बलवानों में श्रेष्ठ भीम, अथवा कौन्तेय धनंजय (अर्जुन)—इनमें से कोई भी पापकर्म को कभी रुचि नहीं देगा (वे सदा धर्मात्मा हैं)। व्याख्या: जनता जानती थी कि पांडव स्वभाव से सरल, धर्मनिष्ठ और निष्पाप हैं, फिर भी उनके साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया जा रहा है।

श्लोक 9

मूल: कुत एव महात्मानौ माद्रीपुत्रौ करिष्यतः। तान््राज्यं पितृतः प्राप्तान्धृतराष्ट्रो न मृष्यति।। (1-157-9) हिंदी अनुवाद: और फिर महात्मा माद्रीपुत्र (नकुल-सहदेव) तो ऐसा पाप क्यों ही करेंगे! पिता से प्राप्त हुए उस राज्य को पांडवों को मिले हुए धृतराष्ट्र सहन नहीं कर पा रहा है। व्याख्या: नागरिकों को यह साफ दिख रहा था कि धृतराष्ट्र और दुर्योधन की ईर्ष्या के कारण ही पांडवों को जबरन राज्य से दूर भेजा जा रहा है।

श्लोक 10

मूल: अधर्म्यमिदमत्यन्तं कथं भीष्मोऽनुमन्यते। विवास्यमानानस्थाने नगरे योऽभिमन्यते।। (1-157-10) हिंदी अनुवाद: यह अत्यंत अधर्मयुक्त कार्य है; भीष्म जी इसे कैसे सहन कर रहे हैं, जो इस प्रकार अस्थान (बिना किसी अपराध के) नगर से बाहर निकाले जा रहे पांडवों की उपेक्षा कर रहे हैं? व्याख्या: जनता को इस बात का भी क्षोभ था कि भीष्म और द्रोण जैसे न्यायप्रिय लोग भी इस अन्याय को रोकने में असमर्थ या मौन क्यों हैं।

श्लोक 11

मूल: पितेव हि नृपोऽस्माकमभूच्छान्तनवः पुरा। विचित्रवीर्यो राजर्षिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः।। (1-157-11) हिंदी अनुवाद: पहले शांतनु पुत्र भीष्म, राजर्षि विचित्रवीर्य और कुरुनंदन पांडु—हम सबके लिए पिता के समान ही रहे थे। व्याख्या: नागरिक पूर्ववर्ती राजाओं और पांडु के न्यायपूर्ण शासन को याद करके वर्तमान स्थिति की तुलना कर रहे थे।

श्लोक 12

मूल: स तस्मिन्पुरुषव्याघ्रे देवभावं गते सति। राजपुत्रानिमान्बालान्धृतराष्ट्रो न मृष्यति।। (1-157-12) हिंदी अनुवाद: किंतु उन पुरुषसिंह (पांडु) के देवलोक सिधार जाने पर, धृतराष्ट्र इन बालक राजपुत्रों (पांडवों) की स्थिति को सहन नहीं कर पा रहा है। व्याख्या: पांडु की मृत्यु के बाद उनके अनाथ बच्चों के साथ हो रहे अन्याय से हस्तिनापुर के लोग बेहद आहत थे।

श्लोक 13

मूल: वयमेतदनिच्छन्तः सर्व एव पुरोत्तमात्। गृहान्विहाय गच्छामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः।। (1-157-13) हिंदी अनुवाद: हम सब इस अन्याय को न चाहते हुए भी इस उत्तम नगर (हस्तिनापुर) के अपने घरों को छोड़कर वहीं क्यों न चले जाएं, जहाँ युधिष्ठिर जा रहे हैं! व्याख्या: जनता का पांडवों के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि वे उनके साथ ही नगर छोड़कर जाने का विचार करने लगे थे।

श्लोक 14

मूल: वैशंपायन उवाच—तांस्तथा वादिनः पौरान्दुःकितान्दुःखकर्शितः। उवाच मनसा ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः।। (1-157-14) हिंदी अनुवाद: वैशम्पायन जी ने कहा—इस प्रकार बोलते हुए तथा शोक से दुःखी हुए उन नागरिकों को देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने मन में विचार करके उनसे कहा— व्याख्या: जब नागरिकों ने पांडवों के साथ जाने की इच्छा जताई, तब युधिष्ठिर ने स्थिति की गंभीरता को समझकर उन्हें शांत करने के लिए वचन कहे।

श्लोक 15

मूल: पिता मान्यो गुरुः श्रेष्ठो यदाह पृथिवीपतिः। अशङ्कमानैस्तत्कार्यमस्माभिरिति नो व्रतम्।। (1-157-15) हिंदी अनुवाद: (युधिष्ठिर ने कहा)—हमारे पिता, मान्य और श्रेष्ठ गुरु पृथ्वीपति (धृतराष्ट्र) जो कुछ भी कहते हैं, बिना किसी आशंका (शंका) के उस आज्ञा का पालन करना ही हमारा व्रत (धर्म) है। व्याख्या: युधिष्ठिर अपनी धर्मपरायणता का परिचय देते हुए नागरिकों से कहते हैं कि वे बड़ों की आज्ञा का पालन करने के लिए बाध्य हैं, इसलिए जनता को विरोध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 16

मूल: भवन्तः सुहृदोऽस्माकं यात कृत्वा प्रदक्षिणम्। प्रतिनन्द्य तथाऽऽशीर्भिर्निवर्तध्वं यथागृहम्।। (1-157-16) हिंदी अनुवाद: आप सभी हमारे सुहृद् (शुभचिंतक) हैं। हमारी प्रदक्षिणा करके, हमें आशीर्वाद दीजिए और उस आशीर्वाद से हमारा अभिनंदन करके अपने-अपने घरों को लौट जाइए। व्याख्या: युधिष्ठिर ने नागरिकों को स्नेहपूर्वक समझाया कि वे दुखी न हों और अपने घरों को वापस लौट जाएं ताकि कोई अतिरिक्त राजनीतिक तनाव न बढ़े।

श्लोक 17

मूल: यदा तु कार्यमस्माकं भवद्भिरुपपत्स्यते। तदा करिष्यथास्माकं प्रियाणि च हितानि च।। (1-157-17) हिंदी अनुवाद: और जब कभी भविष्य में हमें आपकी सहायता या कार्य की आवश्यकता होगी, तब आप हमारे प्रिय और हितकारी कार्य निश्चित रूप से करेंगे। व्याख्या: युधिष्ठिर ने नागरिकों को आश्वस्त किया कि समय आने पर उनका सहयोग लिया जाएगा, फिलहाल वे कानून और शांति का पालन करें।

श्लोक 18

मूल: एवमुक्तास्तदा पौराः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। आशीर्भिश्चाभिनन्द्यैताञ्जग्मुर्नगरमेव हि।। (1-157-18) हिंदी अनुवाद: युधिष्ठिर द्वारा ऐसा कहे जाने पर उन नागरिकों ने उनकी प्रदक्षिणा की, आशीर्वाद से उनका अभिनंदन किया और वापस अपने नगर (हस्तिनापुर) की ओर लौट गए। व्याख्या: युधिष्ठिर के समझाने पर प्रजा शांत हुई और भारी मन से आशीर्वाद देकर हस्तिनापुर वापस लौट आई।

श्लोक 19

मूल: पौरेषु विनिवृत्तेषु विदुरः सर्वधर्मवित्। बोधयन्पाण्डवश्रेष्ठमिदंवचनमब्रवीत्।। (1-157-19) हिंदी अनुवाद: नागरिकों के लौट जाने पर, सभी धर्मों के ज्ञाता विदुर जी ने पांडवश्रेष्ठ (युधिष्ठिर) को गुप्त रूप से सचेत करते हुए यह वचन कहा— व्याख्या: विदुर जी ने अवसर पाकर युधिष्ठिर से अकेले में मिलकर लाक्षागृह के षड्यंत्र से बचने के लिए कूटनीतिक और सांकेतिक भाषा में निर्देश दिए।

श्लोक 20

मूल: प्राज्ञः प्राज्ञं प्रलापज्ञः प्रलापज्ञमिदं वचः। यो जानाति परप्रज्ञां नीतिशास्त्रानुसारिणीम्। विज्ञायेह तथा कुर्यादापदं निस्तरेद्यथा।। (1-157-20) हिंदी अनुवाद: बुद्धिमान विदुर ने बुद्धिमान युधिष्ठिर से नीतिशास्त्र के अनुसार कही जाने वाली वह बात कही, जिसे समझकर मनुष्य इस संसार में आने वाली विपत्ति से पार पा सकता है। व्याख्या: यह श्लोक विदुर जी की गहरी कूटनीति और बुद्धिमत्ता को दर्शाता है, जिसके जरिए वे युधिष्ठिर को आने वाले खतरे से सावधान कर रहे थे।

श्लोक 21

मूल: अलोहं निशितं शस्त्रं शरीपरिकर्तनम्। यो वेत्ति न तं घ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विषः।। (1-157-21) हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति लोहे के बिना बने हुए (रासायनिक या अग्नि जैसे) किंतु शरीर को काटने वाले पैने शस्त्र (षड्यंत्र) को पहचान लेता है, और उसके प्रतिघात (बचाव) को जानता है, उसे शत्रु कभी नहीं मार सकते। व्याख्या: विदुर जी यहाँ सांकेतिक रूप से लाक्षागृह (जो लोहे का हथियार नहीं, बल्कि लाख और आग का षड्यंत्र है) की ओर इशारा कर रहे हैं।

श्लोक 22

मूल: कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः। न दहेदिति चात्मानं यो रक्षति स जीवति।। (1-157-22) हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति झाड़ियों (कच्छ) को जलाने वाली, जाड़े का नाश करने वाली तथा बिलों में रहने वाले जीवों को प्रभावित करने वाली भीषण अग्नि (दावानल) से अपने शरीर को जलने से बचा लेता है, वही जीवित रहता है। व्याख्या: यह स्पष्ट रूप से लाक्षागृह की आग से बचने का कूट संकेत था कि पांडवों को उस भवन की आग से स्वयं को कैसे सुरक्षित रखना है।

श्लोक 23

मूल: नाचक्षुर्वेत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिशः। नाधृतिर्भूतिमाप्नोति बुध्यस्वैवं प्रबोधितः।। (1-157-23) हिंदी अनुवाद: नेत्रहीन व्यक्ति न तो रास्ता जानता है और न ही दिशाओं को पा सकता है; धैर्यहीन व्यक्ति कभी ऐश्वर्य (भूति) को प्राप्त नहीं करता। मेरे द्वारा इस प्रकार प्रबोधित किए जाने पर तुम इस बात को अच्छी तरह समझ लो। व्याख्या: विदुर जी युधिष्ठिर को आँखें खुली रखने (पूरी तरह सतर्क रहने) और धैर्य व बुद्धिमत्ता से काम लेने की सलाह दे रहे हैं।

श्लोक 24

मूल: अनाप्तैर्दत्तमादत्ते नरः शस्त्रमलोहजम्। श्वाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात्।। (1-157-24) हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अपनों (विश्वासघातियों) द्वारा दिए गए इस अलोहमय शस्त्र (लाक्षागृह) को जान लेता है, वह 'श्वाविद्' (सेही या भूमि के नीचे सुरङ्ग बनाने वाले जीव) की तरह शरण पाकर हुताशन (अग्नि) से मुक्त हो जाता है। व्याख्या: यहाँ 'श्वाविद्' (जंगली जीव जो जमीन खोदकर बिल बनाता है) का संकेत इस बात की ओर था कि पांडवों को उस जलते हुए घर से निकलने के लिए गुप्त सुरँग का उपयोग करना चाहिए।

श्लोक 25

मूल: चरन्मार्गान्विजानाति नक्षत्रैर्विन्दते दिशः। आत्मना चात्मनः पञ्च पीडयन्नानुपीड्यते।। (1-157-25) हिंदी अनुवाद: निरंतर चलने वाला व्यक्ति रास्तों को जान जाता है, नक्षत्रों के माध्यम से दिशाओं का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, और स्वयं अपने पाँचों (भाइयों व माता सहित) की रक्षा करते हुए किसी प्रकार की पीड़ा में नहीं फँसता। व्याख्या: विपत्ति के समय सतर्कता, भौगोलिक ज्ञान और आपसी समन्वय से ही सुरक्षित निकला जा सकता है—यह विदुर जी का मुख्य संदेश था।

श्लोक 26

मूल: एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो युधिष्ठिरः। विदुरं विदुषां श्रेष्ठं ज्ञातमित्येव पाण्डवः।। (1-157-26) हिंदी अनुवाद: विदुर जी द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर विद्वाद्वानों में श्रेष्ठ पांडुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया—"सब कुछ अच्छी तरह जान लिया है (समझ लिया है)।" व्याख्या: युधिष्ठिर ने विदुर जी के सभी संकेतों को पूरी तरह समझ लिया और उन्हें आश्वस्त किया कि वे पूरी तरह सतर्क हैं।

श्लोक 27

मूल: अनुशिक्ष्यानुगम्यैतान्कृत्वा चैव प्रदक्षिणम्। पाण्डवानभ्यनुज्ञाय विदुरः प्रययौ गृहान्।। (1-157-27) हिंदी अनुवाद: तदनंतर विदुर जी ने उन्हें शिक्षा (संकेत) देकर, उनकी परिक्रमा करके, पांडवों से आज्ञा ली और अपने घर (हस्तिनापुर) की ओर लौट गए। व्याख्या: विदुर जी अपना गुप्त संदेश पांडवों तक पहुँचाकर वापस हस्तिनापुर लौट आए ताकि किसी को उनके मिलने पर शक न हो।

श्लोक 28

मूल: निवृत्ते विदुरे चापि भीष्म पौरजने तथा। अजातशत्रुमासाद्य कुन्ती वचनमब्रवीत।। (1-157-28) हिंदी अनुवाद: विदुर जी, भीष्म जी और नागरिकों के लौट जाने पर, माता कुंती ने अजातशत्रु युधिष्ठिर के पास आकर यह वचन कहा— व्याख्या: जब सभी शुभचिंतक विदा हो गए, तब माता कुंती ने युधिष्ठिर से विदुर जी की बातों के संबंध में चर्चा की।

श्लोक 29, 30

मूल: क्षत्ता यदब्रवीद्वाक्यं जनमध्येऽब्रुवन्निव। त्वया च स तथेत्युक्तो जानीमो न च तद्वयम्।। यदीदं शक्यमस्माभिर्ज्ञातुं नैव च दोषवत्। श्रोतुमिच्छामि तत्सर्वं संवादं तव तस्य च।। (1-157-29 से 30) हिंदी अनुवाद: (कुंती ने कहा)—क्षत्ता (विदुर जी) ने जनसमूह के बीच जिस प्रकार पहेलीनुमा बातें कहीं, और तुमने भी उन्हें "वैसा ही हो" उत्तर दिया, उसे हम लोग समझ नहीं पाए। यदि यह जानने योग्य है और इसमें कोई दोष नहीं है, तो मैं तुम दोनों के उस संवाद को विस्तार से सुनना चाहती हूँ। व्याख्या: कुंती को यह चिंता थी कि विदुर जी ने गुप्त रूप से क्या कहा है, इसलिए उन्होंने युधिष्ठिर से उस पूरी बातचीत का अर्थ जानना चाहा।

श्लोक 31, 32

मूल: युधिष्ठिर उवाच—विषादग्नेश्च बोद्धव्यमिति मां विदुरोऽब्रवीत्। पन्थानो वेदितव्याश्च नक्षत्रैश्च तथा दिशः। `कुड्याश्चविदिताःकार्याःस्याच्छुद्धिरितिचाब्रवीत्।।' जितेन्द्रियश्च वसुधां प्राप्स्यतीति च मेऽब्रवीत्। विज्ञातमिति तत्सर्वं प्रत्युक्तो विदुरो मया।। (1-157-31 से 32) हिंदी अनुवाद: युधिष्ठिर ने कहा—विदुर जी ने मुझसे कहा था कि "विष और अग्नि से हमेशा सचेत रहना चाहिए। रास्तों और दिशाओं का ज्ञान रखना चाहिए, दीवारों (भवन के भीतर के रहस्यों) को अच्छी तरह जान लेना चाहिए, तभी शुद्धि (सुरक्षा) संभव है।" उन्होंने यह भी कहा कि "जितेन्द्रिय मनुष्य ही अंततः पृथ्वी को प्राप्त करता है।" मैंने विदुर जी से कह दिया है कि मैंने उनकी सारी बात अच्छी तरह समझ ली है। व्याख्या: युधिष्ठिर ने माता कुंती को विदुर जी द्वारा दिए गए सभी संकेतों (अग्नि से बचाव, लाक्षागृह की दीवारों की सच्चाई और सुरँग के रास्ते) के बारे में विस्तार से बता दिया, जिससे वे सभी आगामी खतरे के प्रति पूरी तरह तैयार हो गए।

श्लोक 33

मूल: वैशंपायन उवाच—अष्टमेऽहनि रोहिण्यां प्रयाताः फाल्गुनस्य ते। वारणावतमासाद्य ददृशुर्नागरं जनम्।। (1-157-33) हिंदी अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—फाल्गुन मास के रोहिणी नक्षत्र से यात्रा शुरू करने के आठवें दिन उन पांडवों ने वारणावत नगर में पहुँचकर वहाँ के नागरिकों को देखा। व्याख्या: इस प्रकार फाल्गुन मास के दौरान यात्रा करते हुए पांडव सुरक्षित रूप से वारणावत नगर में पहुँच गए, जहाँ उनके स्वागत के लिए पुरोचन और लाक्षागृह का षड्यंत्र पहले से तैयार था।

 ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि

जतुगृहपर्वणि सप्तपञ्चादशदधिकशततमोऽध्यायः।। 157 ।।

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