महाभारत के आदिपर्व (जतुगृहपर्व) के १५६वें अध्याय के श्लोकों (श्लोक 1 से 22) का क्रमवार संस्कृत श्लोक, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1
मूल: धृतराष्ट्रप्रयुक्तेषु पाण्डुपुत्रेषु भारत। दुर्योधनः परं हर्षमगच्छत्स दुरात्मवान्।। (1-156-1)
हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी जनमेजय! धृतराष्ट्र द्वारा पांडुपुत्रों को वारणावत भेज दिए जाने पर वह दुरात्मा दुर्योधन अत्यधिक हर्षित (प्रसन्न) हुआ।
व्याख्या: पांडवों के रास्ते से हटने और हस्तिनापुर से दूर जाने पर दुर्योधन की ईर्ष्या और महत्त्वाकांक्षा को तात्कालिक संतोष मिला, जिससे वह बहुत खुश हुआ।
श्लोक 2
मूल: `ततः सुबलपुत्रश्च कर्णदुर्योधनावपि। दहने सह पुत्रायाः कुन्त्या मतिमकुर्वत। मन्त्रयित्वा स तैः सार्धं दुरात्मा धृतराष्ट्रजः।।' (1-156-2)
हिंदी अनुवाद: तदनंतर सुबलपुत्र शकुनि, कर्ण और दुर्योधन—इन तीनों ने तथा धृतराष्ट्र के पुत्र दुरात्मा दुर्योधन ने उन सबके साथ मिलकर माता कुंती सहित पांडवों को जलाने की पक्की बुद्धि (योजना) बनाई।
व्याख्या: दुर्योधन, कर्ण और शकुनि ने मिलकर पूरी योजना तैयार की कि अब पांडवों को केवल वारणावत भेजना ही नहीं है, बल्कि उन्हें वहीं लाक्षागृह में जिंदा जला देना है।
श्लोक 3
मूल: स पुरोचनमेकान्तमानीय भरतर्षभ। गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ सचिवं वाक्यमब्रवीत्।। (1-156-3)
हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ! तब दुर्योधन ने अपने सचिव (मंत्री/विश्वासपात्र) पुरोचन को एकांत में बुलाया, उसका दाहिना हाथ अपने हाथ में लेकर उससे यह बात कही—
व्याख्या: दुर्योधन ने अपने सबसे बड़े और भरोसेमंद षड्यंत्रकारी एजेंट पुरोचन को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदारी सौंपने के लिए अत्यंत गोपनीय तरीके से बुलाया।
श्लोक 4
मूल: ममेयं वसुसंपूर्णा पुरोचन वसुन्धरा। यथैव भविता तात तथा त्वं द्रष्टुमर्हसि।। (1-156-4)
हिंदी अनुवाद: हे तात पुरोचन! यह संपूर्ण रत्नों से परिपूर्ण पृथ्वी जिस प्रकार भविष्य में केवल मेरी (अकेले मेरी) होने वाली है, वैसा ही तुम्हें भी देखना चाहिए (समझना चाहिए)।
व्याख्या: दुर्योधन सत्ता के लोभ में चूर होकर पुरोचन को यह लालच और विश्वास दिलाता है कि इस पूरी धरती का अकेला मालिक वही बनने जा रहा है।
श्लोक 5
मूल: न हि मे कश्चिदन्योऽस्ति विश्वासिकतरस्त्वया। सहायो येन सन्धाय मन्त्रयेयं यथा त्वया।। (1-156-5)
हिंदी अनुवाद: तुमसे अधिक विश्वास के योग्य मेरा अन्य कोई ऐसा सहायक नहीं है, जिसके साथ मैं इस प्रकार खुलकर गुप्त मंत्रणा कर सकूँ।
व्याख्या: दुर्योधन पुरोचन को अपना सबसे खास और वफादार आदमी बताकर उसके कंधे पर अपने इस जघन्य कृत्य की पूरी जिम्मेदारी डालता है।
श्लोक 6
मूल: संरक्ष तात मन्त्रं च सपत्नांश्च ममोद्धर। निपुणेनाभ्युपायेन यद्ब्रवीमि तथा कुरु।। (1-156-6)
हिंदी अनुवाद: हे तात! इस मंत्र (गोपनीय योजना) की रक्षा करो और मेरे शत्रुओं (पांडवों) को हमेशा के लिए रास्ते से हटा दो। मैं जैसा कहता हूँ, तुम किसी चतुर उपाय से ठीक वैसा ही करो।
व्याख्या: दुर्योधन पुरोचन को सख्त निर्देश देता है कि योजना किसी भी हाल में लीक नहीं होनी चाहिए और पांडवों के सफाए का काम पूरी चालाकी से होना चाहिए।
श्लोक 7
मूल: पाण्डवा धृतराष्ट्रेण प्रेषिता वारणावतम्। उत्सवे विहरिष्यन्ति धृतराष्ट्रस्य शासनात्।। (1-156-7)
हिंदी अनुवाद: धृतराष्ट्र की आज्ञा से पांडव वारणावत भेज दिए गए हैं, जहाँ वे उत्सव में आनंद मनाने वाले हैं।
व्याख्या: दुर्योधन पुरोचन को पृष्ठभूमि समझाता है कि पांडव हस्तिनापुर से वारणावत के लिए निकल चुके हैं और उत्सव के नाम पर वहाँ निवास करेंगे।
श्लोक 8
मूल: स त्वं रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना। वारणावतमद्यैव यथा यासि तया कुरु।। (1-156-8)
हिंदी अनुवाद: इसलिए तुम गधों (रासभ) द्वारा जोते जाने वाले तेज गति वाले रथ पर सवार होकर आज ही वारणावत पहुँच जाओ, ऐसा प्रबंध करो।
व्याख्या: गधों से जुड़े रथ अपनी तीव्र गति और विशिष्टता के लिए जाने जाते थे, जिससे पुरोचन कम समय में तेजी से वारणावत पहुँचकर निर्माण कार्य शुरू कर सके।
श्लोक 9
मूल: तत्र गत्वा चतुःशालं गृहं परमसंवृतम्। नगरोपान्तमाश्रित्य कारयेथा महाधनम्।। (1-156-9)
हिंदी अनुवाद: वहाँ जाकर नगर के बिल्कुल कोने (सीमा) पर एक अत्यंत गुप्त, चार शालों (कमरों/हिस्सों) वाला और बहुमूल्य तथा विशाल भवन का निर्माण करवाओ।
व्याख्या: पांडवों के रहने के लिए एक ऐसा भव्य और एकांत घर बनवाने का आदेश दिया जाता है जो दिखने में आलीशान हो, लेकिन षड्यंत्र के अनुकूल हो।
श्लोक 10
मूल: शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित्। आग्नेयान्युत सन्तीह तानि तत्र प्रदापय।। (1-156-10)
हिंदी अनुवाद: सन (शण), राल (सर्जरस) और अन्य जितने भी अग्नि को प्रज्वलित करने वाले ज्वलनशील पदार्थ यहाँ मौजूद हैं, उन सबको वहाँ मँगवाकर उपयोग में लाओ।
व्याख्या: भवन निर्माण में सामान्य लकड़ियों के साथ-साथ अत्यंत तीव्र गति से आग पकड़ने वाले रासायनिक व प्राकृतिक पदार्थों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग करने को कहा जाता है।
श्लोक 11
मूल: `बल्वजेन च संमिश्रं मधूच्छिष्टेन चैव हि।' सर्पिस्तैलवसाभिश्च लाक्षया चाप्यनल्पया। मृत्तिकां मिश्रयित्वा त्वं लेपं कुड्येषु दापय।। (1-156-11)
हिंदी अनुवाद: मूंज (बल्वज), मोम (मधूच्छिष्ट), घी, तेल, चर्बी (वसा) और प्रचुर मात्रा में लाख (लाक्षा)—इन सबको मिट्टी में अच्छी तरह मिलाकर दीवारों (कुड्यों) पर उसका लेप करवा दो।
व्याख्या: यह लाक्षागृह (लाख का घर) बनाने की मुख्य तकनीकी निर्देश है। लाख, घी, तेल और मोम जैसी चीजें आग के संपर्क में आते ही एक ही पल में भीषण विस्फोट के साथ सुलग उठती हैं।
श्लोक 12
मूल: शणं तैलं घृतं चैव जतु दारूणि चैव हि। तस्मिन्वेश्मनि सर्वाणि निक्षिपेथाः समन्ततः।। (1-156-12)
हिंदी अनुवाद: सन, तेल, घी, लाख और सूखी लकड़ियाँ—इन सबको उस भवन के चारों ओर सब प्रकार से अंदर भर दो (छिपाकर रखवा दो)।
व्याख्या: भवन के कोने-कोने और दीवारों के भीतर ज्वलनशील सामग्रियों का ऐसा जाल बिछाया जाना था कि एक बार आग लगने पर कोई भी जीवित न बच सके।
श्लोक 13
मूल: `लाक्षाशममधूच्छिष्टवेष्टितानि मृदापि च। लेपयित्वा गुरूण्याशु दारुयन्त्राणि दापय।।' (1-156-13)
हिंदी अनुवाद: लाख, सन और मोम से लपेटकर तथा ऊपर से मिट्टी का लेप करवाकर भारी लकड़ी के यंत्रों (स्तंभों व ढाँचों) को स्थापित करवाओ।
व्याख्या: निर्माण कार्य इस प्रकार से हो कि बाहर से वह बिल्कुल सामान्य मिट्टी और लकड़ी का पक्का घर लगे, किंतु अंदर से वह विस्फोटक सामग्रियों का बारूदखाना हो।
श्लोक 14
मूल: यथा च तन्न पश्येरन्परीक्षन्तोऽपि पाण्डवाः। आग्नेयमिति तत्कार्यमपि चान्येऽपि मानवाः।। (1-156-14)
हिंदी अनुवाद: और ऐसा प्रबंध करना कि यदि पांडव या अन्य कोई भी मनुष्य उसकी भली-भांति परीक्षा (जाँच) भी करे, तो भी वे यह न जान सकें कि यह घर आग से जलने वाला (लाक्षागृह) है।
व्याख्या: गोपनीयता और छद्म का यह स्तर अत्यंत उच्च रखा गया ताकि पांडव जब वारणावत पहुँचें तो उन्हें उस भवन की असलियत का बिल्कुल भी आभास न हो।
श्लोक 15
मूल: वेश्मन्येवं कृते तत्र कृत्वा तान्परमार्चितान्। वासयेथाः पाण्डवेयान्कुन्तीं च ससुहृज्जनाम्।। (1-156-15)
हिंदी अनुवाद: उस भवन को इस प्रकार तैयार करके, पांडवों और माता कुंती तथा उनके सुहृदों का वहाँ पहुँचने पर अति उत्तम प्रकार से सत्कार करके उन्हें उसमें ठहराना।
व्याख्या: पुरोचन को यह आदेश दिया गया कि वह पांडवों के पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत करे ताकि उनका सारा संदेह दूर हो जाए और वे निश्चिंत होकर उस घर में रहने लगें।
श्लोक 16
मूल: आसनानि च दिव्यानि यानानि शयनानि च। निघातव्यानि पाण्डूनां यथा तुष्येच्च मे पिता।। (1-156-16)
हिंदी अनुवाद: पांडवों के उपयोग के लिए दिव्य आसन, वाहन और शय्याएँ (पलंग आदि) ऐसी लगवाई जानी चाहिए, जिससे मेरे पिता (धृतराष्ट्र) भी संतुष्ट हों (यानी किसी को यह न लगे कि उनके साथ कोई दुर्व्यवहार हो रहा है)।
व्याख्या: षड्यंत्र को पूरी तरह पर्दाफाश होने से बचाने के लिए यह आवश्यक था कि पांडवों को किसी भी राजसी सुविधा की कमी महसूस न हो, ताकि वे पूरी तरह आश्वस्त हो जाएं।
श्लोक 17
मूल: यथा च तन्न जानन्ति नगरे वारणावते। `यथा रमेरन्विस्रब्धा नगरे वारणावते।' तथा सर्वं विधातव्यं यावत्कालस्य पर्ययः।। (1-156-17)
हिंदी अनुवाद: और वारणावत नगर के लोग भी यह न जान सकें—तथा पांडव वारणावत नगर में पूरी तरह निश्शङ्क होकर आनंद मनाएं—जब तक कि वह (निश्चित) समय पूरा न हो जाए, तब तक सब कुछ इसी प्रकार व्यवस्थित करना।
व्याख्या: जब तक आग लगाने का सही समय न आ जाए, तब तक सब कुछ सामान्य बनाए रखना और पांडवों को पूरी तरह विश्वास में रखना ही पुरोचन का मुख्य कार्य था।
श्लोक 18
मूल: ज्ञात्वा च तान्सुविश्वस्ताञ्शयानानकुतोभयान्। अग्निस्त्वया ततो देयो द्वारतस्तस्य वेश्मनः।। (1-156-18)
हिंदी अनुवाद: जब तुम यह जान लोगे कि वे सब पूरी तरह आश्वस्त होकर बिना किसी भय के सोए हुए हैं, तब उस भवन के मुख्य द्वार पर तुम्हारे द्वारा अग्नि प्रज्वलित कर दी जानी चाहिए।
व्याख्या: जब पांडव गहरी नींद में हों और किसी भी खतरे के प्रति निश्चिंत हो जाएं, तब लाक्षागृह के प्रवेश द्वार पर आग लगाकर उसे चारों तरफ से भड़का देना था।
श्लोक 19
मूल: दग्धानेवं स्वके गेहे दाहिताः पाण्डवा इति। न गर्हयेयुरस्मान्वै पाण्डवार्थाय कर्हिचित्।। (1-156-19)
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार "अपने ही घर में आग लगने से पांडव जलकर मर गए हैं"—यह स्थिति बनने पर कोई भी कभी भी पांडवों की मृत्यु के लिए हम पर लांछन (दोषारोपण) नहीं लगा सकेगा।
व्याख्या: दुर्योधन का यह कुटिल उद्देश्य था कि इस दुर्घटना को एक सामान्य अग्निकांड साबित किया जाए ताकि किसी को हस्तिनापुर के षड्यंत्र पर शक करने का मौका ही न मिले।
श्लोक 20
मूल: स तथेति प्रतिज्ञाय कौरवाय पुरोचनः। प्रायाद्रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना।। (1-256-20) (1-156-20)
हिंदी अनुवाद: कौरव (दुर्योधन) को "बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूंगा" यह वचन देकर पुरोचन गधों द्वारा जोते जाने वाले तीव्र गति वाले रथ पर सवार होकर तुरंत प्रस्थान कर गया।
व्याख्या: दुर्योधन के सभी आदेशों को सहर्ष स्वीकार करके पुरोचन बिना समय गंवाए वारणावत की ओर निकल पड़ा ताकि समय पर षड्यंत्र को अमलीजामा पहनाया जा सके।
श्लोक 21
मूल: स गत्वा त्वरितं राजन्दुर्योधनमते स्थितः। यथोक्तं राजपुत्रेण सर्वं चक्रे पुरोचनः।। (1-156-21)
हिंदी अनुवाद: हे राजन्! वहाँ तुरंत पहुँचकर दुर्योधन के मत के अनुसार स्थित हुए पुरोचन ने राजकुमार (दुर्योधन) द्वारा कही गई सारी बातें ठीक वैसे ही कर डालीं।
व्याख्या: पुरोचन ने वारणावत पहुँचकर बिना किसी चूक के दुर्योधन के बताए गए निर्देशों के अनुसार लाक्षागृह के निर्माण और उसमें विस्फोटक सामग्रियां भरने का पूरा षड्यंत्र पूरा कर लिया।
श्लोक 22
मूल: `तेषां तु पाण्डवेयानां गृहं रौद्रमकल्पयत्।।' (1-156-22)
हिंदी अनुवाद: उसने उन पाण्डुपुत्रों के रहने के लिए उस भयानक (रौद्र) लाक्षागृह का निर्माण करवा दिया।
व्याख्या: इस प्रकार पुरोचन ने पांडवों के विनाश के लिए एक खतरनाक और अभेद्य अग्नि-भवन तैयार कर दिया, जिसके भीतर भयानक षड्यंत्र छिपा हुआ था।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।। 156 ।।
