महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७२

महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७२

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 172वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 6 (ब्राह्मणी का अपने पति को সান্ত्वना देना और कर्तव्य समझाना)

श्लोक 1:

ब्राह्मण्युवाच। न सन्तापस्त्वया कार्यः प्राकृतेनेव कर्हिचित्। न हि सन्तापकालोऽयं वैद्यस्य तव विद्यते।।

  • हिन्दी अनुवाद: ब्राह्मणी बोली— "आपको साधारण मनुष्य की तरह किसी प्रकार का संताप (शोक) नहीं करना चाहिए, क्योंकि हे विद्वान् (वैद्य/शास्त्रज्ञ) पति! यह संताप करने का समय नहीं है।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी अपने पति को धैर्य बँधाती है कि वे विद्वान होकर सामान्य लोगों की तरह घबराएँ नहीं, बल्कि इस संकट का विवेक से सामना करें।

श्लोक 2 और 3:

अवश्यं निधनं सर्वैर्गन्तव्यमिह मानवैः। अवश्यभाविन्यर्थे वै संतापो नेह विद्यते।। भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते। व्यथां जहि सुबुद्ध्या त्वं स्वयं यास्यामि तत्र च।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इस संसार में सभी मनुष्यों को मृत्यु को प्राप्त होना ही है। जो बात अवश्यंभावी (निश्चित) है, उसके लिए यहाँ शोक नहीं किया जाता। पत्नी, पुत्र और पुत्री— इन सबकी कामना अंततः मनुष्य अपने ही सुख (स्वार्थ) के लिए करता है। इसलिए आप अपनी इस मानसिक व्यथा को अपनी बुद्धि से त्याग दीजिए, (राक्षस के पास बलि के रूप में) मैं स्वयं वहाँ जाऊँगी।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी तर्क देती है कि मृत्यु अटल है, और इस आपदा से परिवार को बचाने के लिए वह स्वयं अपने प्राण देने को तैयार है।

श्लोक 4 और 5:

एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम्। प्राणानपि परित्यज्य यद्भर्तुर्हितमाचरेत्।। तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम्। भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोकेऽस्मिंश्च यशस्करम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "अपने प्राणों का भी त्याग करके जो स्त्री अपने पति का हित करती है, संसार में वही नारियों का परम और सनातन कर्तव्य माना गया है। यदि मैं ऐसा करूँगी, तो आपका यह कर्म (या मेरा यह बलिदान) आपको परलोक में अक्षय सुख देने वाला और इस लोक में यश बढ़ाने वाला होगा।"
  • व्याख्या: वह अपने इस बलिदान को एक पत्नी का परम धर्म और सनातन कर्तव्य बताती है जिससे पति का यश फैलेगा।

श्लोक 6:

एष चैव गुरुर्धर्मो यं प्रवक्ष्याम्यहं तव। अर्थश्च तव धर्मश्च भूयानत्र प्रदृश्यते।।

  • हिन्दी अनुवाद: "यह बहुत बड़ा और गुरुतर धर्म है, जिसे मैं आपको बता रही हूँ। इसमें आपका अर्थ (कल्याण) और धर्म दोनों ही महान रूप से सिद्ध होते दिखाई दे रहे हैं।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी अपने निर्णय को सर्वोच्च धर्म और पारिवारिक कल्याण का मार्ग बताती है।

श्लोक 7 से 13 (ब्राह्मणी द्वारा अपने त्याग और बच्चों के भविष्य का तार्किक पक्ष रखना)

श्लोक 7 और 8:

यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वया मयि। कन्या चैका कुमारश्च कृताहमनृणा त्वया।। समर्थः पोषणे चासि सुतयो रक्षणे तथा। न त्वहं सुतयोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जिस प्रयोजन के लिए पत्नी की इच्छा की जाती है, वह अर्थ आपने मुझमें प्राप्त कर लिया है (आपने मुझसे संतान और गृहस्थी का सुख पा लिया है)। आपने मुझे एक कन्या और एक पुत्र देकर मुझ पर से ऋण चुका दिया है (मुझे कृतार्थ किया है)। आप इन दोनों बच्चों का पोषण करने और उनकी रक्षा करने में पूरी तरह समर्थ हैं, किंतु मैं अकेली इन दोनों बच्चों की उस प्रकार रक्षा और पोषण करने में समर्थ नहीं हूँ।"
  • व्याख्या: वह समझाती है कि पति के जीवित रहने पर बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह सकता है, क्योंकि एक पिता बच्चों को पाल-पोस सकता है, लेकिन माता के बिना बच्चे अनाथ हो जाएंगे।

श्लोक 9, 10 और 11:

मम हि त्वद्विहीनायाः सर्वप्राणधनेश्वर। कथं स्यातां सुतौ बालौ भरेयं च कथं त्वहम्।। कथं हि विधवाऽनाथा बालपुत्रा विना त्वया। मिथुनं जीवयिष्यामि स्थिता साधुगते पथि।। अहं कृतावलेपैश्च प्रार्थ्यमानामिमां सुताम्। अयुक्तैस्तव संबन्धे कथं शक्ष्यामि रक्षितुम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे मेरे प्राणों और धन के ईश्वर! आपके बिना मुझ अनाथ, विधवा और छोटे-छोटे बच्चों वाली स्त्री का क्या होगा? मैं इन दोनों बालकों का भरण-पोषण कैसे कर पाऊँगी? साधु मार्ग पर चलती हुई मैं आपके बिना इन दोनों मासूम बच्चों को कैसे जीवित रख पाऊँगी? और अभिमानियों तथा दुष्टों द्वारा बार-बार माँगी जाने वाली इस हमारी पुत्री की मैं अयुक्त और अनुचित संबंधों से कैसे रक्षा कर पाऊँगी?"
  • व्याख्या: वह अपनी असमर्थता जताती है कि उसके मरने के बाद पति बच्चों को संभाल सकते हैं, लेकिन यदि पति की मृत्यु हो गई, तो वह अकेली बच्चों की रक्षा नहीं कर पाएगी।

श्लोक 12 और 13:

उत्सृष्टमामिषं भूमौ प्रार्थयन्ति यथा खगाः। प्रार्थयन्ति जनाः सर्वे पतिहीनां तथा स्त्रियम्।। साऽहं विचाल्यमाना वै प्रार्थ्यमाना दुरात्मभिः। स्थातुं पथि न शक्ष्यामि सज्जनेष्टे द्विजोत्तम।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जैसे धरती पर फेंके हुए मांस के टुकड़े को पक्षी सभी ओर से झपटने लगते हैं, वैसे ही संसार के सभी लोग पतिहीन (विधवा) स्त्री को अपनी ओर खींचने का प्रयास करते हैं। इसलिए हे द्विजोत्तम! दुरात्मनों द्वारा प्रलोभित और विचलित की जाने वाली मैं, आपके बिना सजनों के मार्ग पर स्थिर नहीं रह पाऊँगी।"
  • व्याख्या: समाज की कठोर वास्तविकता का हवाला देते हुए वह कहती है कि पति के बिना अकेली स्त्री का जीवन असुरक्षित हो जाता है।

श्लोक 14 से 20 (स्त्री के जीवन की विवशता और पुत्री की सुरक्षा की चिंता)

श्लोक 14, 15 और 16:

`स्त्रीजन्म गर्हितं नाथ लोके दुष्टजनाकुले। मातापिथ्रोर्वशे कन्या प्रौढा भर्तृवशे तथा।। अभावे चानयोः पुत्रे खतन्त्रा स्त्री विगर्हिता।।' अनाथत्वं स्त्रियो द्वारं दुष्टानां विवृतं हि तत्। वस्त्रखण्डं घृताक्तं हि यथा संकृष्यते श्वभिः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे नाथ! दुष्ट लोगों से भरे इस संसार में स्त्री का जन्म लेना हीन (निंदित) माना गया है। कन्या माता-पिता के वश में रहती है, बड़ी होने पर पति के वश में रहती है, और यदि इन दोनों का अभाव हो, तो पुत्र के अधीन रहनी चाहिए; स्वतंत्र स्त्री की समाज में निंदा होती है। स्त्री का अनाथ होना दुष्टों के लिए एक खुला हुआ द्वार है। जैसे घी में सना हुआ वस्त्र का टुकड़ा कुत्ते खींच लेते हैं, वैसे ही अनाथ स्त्री को दुष्ट लोग नोंच लेते हैं।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी समाज में स्त्री की परतंत्रता और उसकी सुरक्षा के संकट को अत्यंत मार्मिक ढंग से रखती है।

श्लोक 17 और 18:

कथं तव कुलस्यैकमिमं बालमनागसम्। पितृपैतामहे मार्गे नियोक्तुमहमुत्सहे।। कथं शक्ष्यामि बालेऽस्मिन्गुणानाधातुमीप्सितान्। अनाथे सर्वतो लुप्ते यथा त्वं धर्मदर्शिवान्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "आपके इस कुल के एकमात्र निष्पाप बालक को मैं पितृ-पैतृक मार्ग (संस्कारों और अध्ययन) पर कैसे नियोजित कर पाऊँगी? सब ओर से अनाथ और सुविधायीन हो चुके इस बालक में वे वांछित गुण (वेद-अध्ययन व संस्कार) कैसे स्थापित कर पाऊँगी, जैसे कि आप जैसे धर्मदर्शी पिता उसे सिखा सकते हैं?"
  • व्याख्या: वह कहती है कि पिता के बिना पुत्र को उचित संस्कार और शिक्षा देना एक अकेली माता के लिए असंभव है।

श्लोक 19 और 20:

इमामपि च ते बालामनाथां परिभूय माम्। अनर्हाः प्रार्थयिष्यन्ति शूद्रा वेदश्रुतिं यथा।। तां चेदहं न दित्सेयं सद्गुणैरुपबृंहिताम्। प्रमथ्यैनां हरेयुस्ते हविर्ध्वाङ्क्षा इवाध्वरात्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "अनाथ हुई मुझ जैसी माता और इस अनाथ बालिका का अपमान करके अयोग्य लोग भी इसे वैसे ही चाहेंगे जैसे अयोग्य शूद्र वेद की ऋचाओं की कामना करता है। और यदि सद्गुणों से युक्त इस पुत्री को मैं उन्हें न दूँ, तो वे बलपूर्वक इसे वैसे ही छीन लेंगे जैसे यज्ञ का हविष्य कौए यज्ञ-मंडप से झपट कर ले जाते हैं।"
  • व्याख्या: वह अपनी पुत्री के भविष्य की भीषण असुरक्षा का भय व्यक्त करती है कि माता-पिता के बिना उसे कोई भी बलपूर्वक ले जा सकता है।

श्लोक 21 से 25 (माता-पिता के अभाव में बच्चों का विनाश और पत्नी का परम धर्म)

श्लोक 21, 22 और 23:

संप्रेक्षमाणा पुत्रीं ते नानुरूपमिवात्मनः। अनर्हवशमापन्नामिमां चापि सुतां तव।। अवज्ञाता च लोकेषु तथान्मानमजानती। अवलिप्तैरैर्ब्रह्मन्मरिष्यामि न संशयः।। तौ च हीनौ मया बालौ त्वया चैव तथात्मजौ। विनश्येतां न सन्देहो मत्स्याविव जलक्षये।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे ब्राह्मण! आपकी इस योग्य और सुंदर पुत्री को जब मैं अयोग्य व्यक्ति के वश में जाते हुए देखूँगी, तो लोक में अपमानित होकर और अपना आत्मसम्मान खोकर मैं अहंकारियों के बीच निश्चित ही मर जाऊँगी, इसमें कोई संशय नहीं है। और मेरे तथा आपके दोनों बालक जब हम दोनों से ही हीन (अनाथ) हो जाएंगे, तो जल सूख जाने पर मछलियों की तरह वे बिना किसी संदेह के नष्ट हो जाएंगे।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी कहती है कि उसके और पति के जीवित न रहने पर बच्चे तड़प-तड़प कर वैसे ही मर जाएंगे जैसे बिना पानी के मछली मरती है।

श्लोक 24 और 25:

त्रितयं सर्वथाप्येवं विनशिष्यत्यसंशयम्। त्वया विहीनं तस्मात्त्वं मां परित्यक्तुमर्हसि।। व्युष्टिरेषा परा स्त्रीणां पूर्वं भर्तुः परा गतिः। ननु ब्रह्मन्सपुत्राणामिति धर्मविदो विदुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इस प्रकार आप (पति) के बिना यह तीनों (हम दोनों बच्चे और मैं) सर्वथा और बिना किसी संदेह के नष्ट हो जाएंगे। इसलिए यह उचित है कि आप मेरा त्याग कर दें (मुझे राक्षस के पास जाने दें)। धर्म को जानने वाले विद्वान लोग यह मानते हैं कि पुत्रों सहित पति की सेवा करना ही स्त्रियों के लिए इस लोक की परा गति (सौभाग्य और मोक्ष) है।"
  • व्याख्या: वह निष्कर्ष निकालती है कि पति के बचने से पूरा परिवार और वंश बच सकता है, इसलिए उसका (पत्नी का) बलिदान ही एकमात्र सही धर्म है।

श्लोक 26 से 30 (सतीत्व, पतिव्रता धर्म और शास्त्रों के नियम)

श्लोक 26, 27 और 28:

`अनिष्टमिह पुत्राणां विषये परिवर्तितुम्। हरिद्राञ्जनपुष्पादिसौमङ्गल्ययुता सती।। मरणं याति ya भर्तुस्तद्दत्तजलपायिनी। भर्तृपादार्पितमनाः सा याति गिरिजापदम्।। गिराजायाः सखी भूत्वा मोदते नगकन्यया। मितं ददाति हि पिता मितं माता मितं सुतः।।'

  • हिन्दी अनुवाद: "पुत्रों के जीवन में कोई अनिष्ट न हो, इसके लिए हल्दी, अंजन और फूलों आदि के सौमंगल्य से युक्त, पति के चरणों में मन अर्पित करने वाली जो सती स्त्री पति से पहले या पति के लिए मृत्यु को प्राप्त होती है (या पति की आयु की रक्षा करती है), वह पार्वती जी के पद को प्राप्त करती है। पर्वतराज कन्या (पार्वती) की सखी बनकर वह आनंदित होती है। पिता सीमित देता है, माता सीमित देती है, और पुत्र भी सीमित ही देता है..."
  • व्याख्या: ब्राह्मणी पतिव्रता स्त्री के महान पद और उसके पुण्य का वर्णन करती हुई कहती है कि सांसारिक रिश्तों में सब कुछ सीमित मिलता है, किंतु पति का आशीष असीम होता है।

श्लोक 29 और 30:

अमितस्य हि दातारं का पतिं नाभिनन्दति। आश्रमाश्चाग्निसंस्कारा जपहोमव्रतानि च।। स्त्रीणां नैते विधातव्या विना पतिमनिन्दितम्।क्षमा शौचमनाहारमेतावद्विहितं स्त्रियाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "...ऐसी असीम (अमित) वस्तुएँ देने वाले पति की कौन स्त्री वंदना या अभिनंदन नहीं करेगी? अनिंदित (श्रेष्ठ) पति के बिना स्त्रियों के लिए आश्रम, अग्नि-संस्कार, जप, होम और व्रत आदि का विधान नहीं किया गया है। क्षमा, पवित्रता और उपवास (अनाहार)— बस यही स्त्रियों के लिए मुख्य रूप से विहित है।"
  • व्याख्या: वह शास्त्रों के हवाले से बताती है कि स्त्री का सबसे बड़ा धर्म और साधना उसकी पति-भक्ति ही है।

श्लोक 31 से 36 (पति के प्रति समर्पण और आपधर्म के सिद्धांत)

श्लोक 31 और 32:

परित्यक्तः सुतश्चायं दुहितेयं तथा मया। बन्धवाश्च परित्यक्तास्त्वदर्थं जीवितं च मे।। यज्ञैस्तपोभिर्नियमैर्दानैश्च विविधैस्तथा। विशिष्यते स्त्रिया भर्तुर्नित्यं प्रियहिते स्थितिः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "मैंने आपके लिए अपने इस पुत्र, पुत्री, संबंधियों और यहाँ तक कि अपने जीवन का भी मोह त्याग दिया है। यज्ञों, तपस्याओं, नियमों और भाँति-भांति के दानों से भी बढ़कर स्त्री के लिए हमेशा पति के प्रिय और हित में तत्पर रहना ही श्रेष्ठ है।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी अपने पति के प्रति अपने अगाध प्रेम और कर्तव्य-बोध को दोहराती है कि उसके लिए पति की रक्षा ही सर्वोपरि है।

श्लोक 33, 34 और 35:

तदिदं यच्चिकीर्षामि धर्मं परमसंमतम्। इष्टं चैव हितं चैव तव चैव कुलस्य च।। इष्टानि चाप्यपत्यानि द्रव्याणि सुहृदः प्रियाः। आपद्धर्मप्रमोक्षाय भार्या चापि सतां मतम्।। आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए मैं जो यह कार्य करना चाहती हूँ, वह परम संमत धर्म है, जो आपके और आपके कुल दोनों के लिए इष्ट और हितकारी है। सत्पुरुषों का ऐसा मत है कि आपत्ति के धर्म से मुक्त होने के लिए अपनी प्रिय संतानों, धन, प्रिय सुहृदों और यहाँ तक कि पत्नी का भी त्याग किया जा सकता है। आपत्ति के समय धन की रक्षा करनी चाहिए, धन से भी अधिक पत्नी की रक्षा करनी चाहिए, किंतु अपनी आत्मा (पति/प्राण) की रक्षा धन और पत्नी दोनों को लगाकर भी निरंतर करनी चाहिए।"
  • व्याख्या: वह 'आपधर्म' (संकटकालीन धर्म) का हवाला देती है कि शास्त्रों के अनुसार संकट में प्राण रक्षा के लिए परिवार या पत्नी का त्याग भी अनुचित नहीं माना गया है।

श्लोक 36:

दृष्टादृष्टफलार्थं हि भार्या पुत्रो धनं गृहम्। सर्वमेतद्विधातव्यं बुधानामेष निश्चयः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "दृष्ट और अदृष्ट (लौकिक और पारलौकिक) फलों के लिए ही पत्नी, पुत्र, धन और घर होते हैं। इन सबका विधान इसी उद्देश्य से किया जाता है— विद्वानों का ऐसा हीनिश्चय है।"
  • व्याख्या: वह समझाती है कि पारिवारिक संबंध जीवन को सुचारੂ चलाने के लिए हैं, किंतु जब प्राणों पर संकट आ जाए, तो विवेक से निर्णय लेना चाहिए।

श्लोक 37 से 42 (आत्मा की श्रेष्ठता और पत्नी का राक्षस के पास जाने का संकल्प)

श्लोक 37, 38 और 39:

एकतो वा कुलं कृत्स्नमात्मा वा कुलवर्धनः। `उभयोः कोधिको विद्वन्नात्मा चैवाधिकः कुलात्।।' आत्मनो विद्यमानत्वाद्भुवनानि चतुर्दश। विद्यन्ते द्विजशार्दूल आतमा रक्ष्यस्ततस्त्वया।। आत्मन्यविद्यमाने चेदस्य नास्तीह किंचन। एतज्जगदिदं सर्वमात्मना न समं किल।।

  • हिन्दी अनुवाद: "एक तरफ पूरा कुल हो और दूसरी तरफ कुल को बढ़ाने वाला स्वयं आत्मा (पति) हो— हे विद्वान्! इन दोनों में कौन अधिक श्रेष्ठ है? आत्मा ही कुल से बढ़कर है। हे द्विजशार्दूल! अपने ही होने से यह चौदह भुवन विद्यमान हैं, इसलिए सबसे पहले आपको अपनी ही रक्षा करनी चाहिए। यदि आत्मा (आप) ही नहीं रहेगा, तो इस संसार में आपके लिए कुछ भी नहीं है। यह संपूर्ण जगत् भी आत्मा (जीवन) के समान नहीं हो सकता।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी कहती है कि सब कुछ आत्म-केंद्रित है; यदि पति (आत्मा) ही सुरक्षित नहीं बचा, तो बाकी सब व्यर्थ है, इसलिए पति का जीवित रहना सबसे आवश्यक है।

श्लोक 40, 41 और 42:

स कुरुष्व मया कार्यं तारयात्मानमात्मना। अनुजानीही मामार्य सुतौ मे परिपालय।। अवध्याः स्त्रिय इत्याहुर्धर्मज्ञा धर्मनिश्चये। धर्मज्ञान्राक्षसानाहुर्न हन्यात्स च मामपि।। निःसंशयं वधः पुंसां स्त्रीणां संशयितो वधः। अतः मामेव धर्मज्ञ प्रस्थापयितुमर्हसि।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए आप मेरा यह कार्य कीजिए और अपने द्वारा अपनी आत्मा का उद्धार कीजिए। हे आर्य! मुझे अनुमति दीजिए और मेरे इन दोनों बालकों का पालन-पोषण कीजिए। धर्म के ज्ञाता ऐसा कहते हैं कि धर्मनिश्चय में स्त्रियाँ अवध्या (न मारने योग्य) होती हैं। राक्षस भी धर्म को जानने वाले होते हैं, अतः वह मेरा वध भी नहीं करेगा। पुरुषों का वध निस्संदेह होता है, किंतु स्त्रियों का वध संदिग्द्ध (वर्जित) माना जाता है। इसलिए हे धर्मज्ञ! आपको मुझे ही उस स्थान पर प्रस्थान कराना चाहिए।"
  • व्याख्या: वह अपना अंतिम तर्क देती है कि शास्त्र और लोकनियम के अनुसार स्त्रियों का वध नहीं किया जाता, इसलिए यदि वह राक्षस के पास जाएगी, तो संभव है कि राक्षस उसे न मारे, जबकि पुरुष (पति) के जाने पर उसकी मृत्यु निश्चित है।

श्लोक 43 से 47 (ब्राह्मणी का आत्मसमर्पण और पति से अंतिम अनुमति)

श्लोक 43 और 44:

भुक्तं प्रियाण्यवाप्तानि धर्मश्च चरितो मया। `त्वच्छुश्रूषणसंभूता कीर्तिश्चाप्यतुला मम।' त्वत्प्रसूतिः प्रिया प्राप्ता न मां तप्स्यत्यजीवितं।। जातपुत्रा च वृद्धा च प्रियकामा च ते सदा। समीक्ष्यैतदहं सबर्वं व्यवसायं करोम्यतः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "मैंने आपके साथ सभी प्रिय भोग भोगे हैं, धर्म का आचरण किया है, और आपकी सेवा से उत्पन्न मेरी अतुलनीय कीर्ति भी फैली है। आपकी प्रिय संतान (पुत्र-पुत्री) मुझे प्राप्त हो चुकी है, इसलिए अब मृत्यु (अजीवित होने) का मुझे कोई संताप नहीं होगा। मैं पुत्रों को जन्म दे चुकी हूँ, आयु में वृद्ध हो चुकी हूँ, और हमेशा आपकी प्रिय कामना करने वाली रही हूँ— इन सब बातों को भली-भांति समझकर ही मैं यह दृढ़ निश्चय कर रही हूँ।"
  • व्याख्या: ब्राह्मणी पूरी तरह संतुष्ट और शांतचित्त होकर अपने जीवन की सार्थकता का हवाला देती है और विदा माँगती है।

श्लोक 45, 46 और 47:

उत्सृज्यापि Fि मामार्य प्राप्स्यस्यन्यामपि स्त्रियम्। ततः प्रतिष्ठितो धर्मो भविष्यति पुनस्तव।। न चाप्यधर्मः कल्याण बहुपत्नीकता नृणाम्। स्त्रीणामधर्मः सुमहान्भर्तुः पूर्वस्य लङ्घने।। एतत्सर्वं समीक्ष्य त्वमात्मत्यागं च गर्हितम्। आत्मानं तारयाद्याशु कुलं चेमौ च दारकौ।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे आर्य! यदि आप मेरा त्याग भी कर देंगे, तो आपको दूसरी पत्नी भी मिल जाएगी और आपका धर्म पुनः प्रतिष्ठित हो जाएगा। पुरुषों के लिए एक से अधिक पत्नियाँ रखना (बहुपत्नीत्व) कल्याणकारी और अधर्मरहित है, किंतु स्त्रियों के लिए अपने पूर्व पति का उल्लंघन करके जीवित रहना महापाप (अधर्म) है। इन सभी बातों को और गर्हित (निंदित) आत्मत्याग को समझकर, आप शीघ्र ही अपनी रक्षा करें तथा अपने कुल और इन दोनों बालकों को बचा लें।"
  • व्याख्या: वह पति को समझाती है कि उसके जाने के बाद पति दूसरा विवाह करके अपना कुल और धर्म चला सकते हैं, किंतु पति का मरना पूरे परिवार के विनाश का कारण बनेगा।

श्लोक 48 से 50 (ब्राह्मण की प्रतिक्रिया और सांत्वना)

श्लोक 48:

वैशंपायन उवाच। एवंमुक्तस्तया भर्ता तां समालिङ्ग्य भारत। मुमोच बाष्पं शनकैः सभार्यो भृशदुःखितः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भारत! अपनी पत्नी द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस विप्र पति ने उसे गले से लगा लिया और अपनी पत्नी के साथ अत्यधिक दुःखी होकर धीरे-धीरे अपने आँसू बहाने लगे।
  • व्याख्या: पत्नी के ऐसे निष्ठावान और त्यागपूर्ण वचन सुनकर ब्राह्मण का हृदय और अधिक पिघल गया और दोनों फूट-फूट कर रोने लगे।

श्लोक 49 और 50 (क, ख, ग):

`मैवं वद त्वं कल्याणि तिष्ठ चेह सुमध्यमे। न तु भार्यां त्यजेत्प्राज्ञः पुत्रान्वापि कदाचन।। विशेषतः स्त्रियं रक्षेत्पुरुषो बुद्धिमानिह। त्यक्त्वा तु पुरुषो जीवेन्न हातव्यानिमान्सदा। न वेत्ति कामं धर्मं च अर्थं मोक्षं च तत्त्वतः।।'

  • हिन्दी अनुवाद: (ब्राह्मण ने कहा)— "हे कल्याणि सुमध्यमे! तुम ऐसा मत कहो, यहीं रहो। बुद्धिमान पुरुष को कभी भी अपनी पत्नी या पुत्रों का त्याग नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान पुरुष को विशेष रूप से स्त्री की रक्षा करनी चाहिए। पत्नी और पुत्रों को त्यागकर यदि कोई पुरुष जीवित भी रहता है, तो वह वास्तव में काम, धर्म, अर्थ और मोक्ष के तत्त्व को नहीं जानता।"
  • व्याख्या: ब्राह्मण अपनी पत्नी के उस महान त्याग को स्वीकार करने से मना कर देता है और कहता है कि वह अपनी पत्नी या बच्चों को संकट में छोड़कर अपनी जान बचाने का पाप कभी नहीं करेगा।
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