महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७३

महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७३

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 173वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 6 (कन्या (पुत्री) का विलाप और अपना बलिदान देने का प्रस्ताव)

श्लोक 1 और 2:

वैशंपायन उवाच।1-173-1x तयोर्दुःखितयोर्वाक्यमतिमात्रं निशम्य तु। ततो दुःखपरीताङ्गी कन्या तावभ्यभाषत।।1-173-1a 1-173-1b किमेवं भृशदुःखार्तौ रोरूयेतामनाथवत्। ममापि श्रूयतां वाक्यं श्रुत्वा च क्रियतां क्षमम्।।1-173-2a 1-173-2b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— उन दोनों (माता-पिता) के अतिशय दुःखी वचनों को सुनकर, दुःख से कातर अंगों वाली उस कन्या (ब्राह्मण की पुत्री) ने उन दोनों से यह कहा— "आप दोनों इस प्रकार अनाथों की भाँति अत्यधिक दुःख से क्यों रो रहे हैं? मेरी भी बात सुनिए और सुनकर जो उचित हो, वह कीजिए।"
  • व्याख्या: जब माता और पिता दोनों ही एक-दूसरे के लिए अपने प्राण देने की जिद्द कर रहे थे, तब उनकी छोटी पुत्री ने आगे आकर विवेकपूर्ण और त्याग की बात कही।

श्लोक 3, 4 और 5:

धर्मतोऽहं परित्याज्या युवयोर्नात्र संशयः। त्यक्तव्यां मां परित्यज्य त्राहि सर्वं मयैकया।।1-173-3a 1-173-3b इत्यर्थमिष्यतेऽपत्यं तारयिष्यति मामिति। अस्मिन्नुपस्थिते काले तरध्वं प्लववन्मया।।1-173-4a 1-173-4b इह वा तारयेद्दुर्गादुत वा प्रेत्य भारत। सर्वथा तारयेत्पुत्रः पुत्र इत्युच्यते बुधैः।।1-173-5a 1-173-5b

  • हिन्दी अनुवाद: "धर्म के अनुसार आप दोनों द्वारा मेरा ही त्याग किया जाना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं है। त्यागने योग्य मुझ अकेली को छोड़कर आप सब अपनी रक्षा कीजिए। संतान की इच्छा इसलिए की जाती है कि वह (माता-पिता को संकट से) तारेगी। आज यह अवसर उपस्थित होने पर आप लोग मुझ जैसी नौका के द्वारा (मुझे बलि देकर) इस संकट से पार उतर जाइए। चाहे इस लोक में हो या परलोक में, संकट के दुर्गम मार्ग से जो तार दे, ज्ञानीजन उसी को 'पुत्र' (या संतान) कहते हैं।"
  • व्याख्या: पुत्री तर्क देती है कि माता-पिता की रक्षा करना संतान का धर्म है, इसलिए उसे राक्षस के पास बलि के रूप में भेजकर वे अपने प्राण बचा सकते हैं।

श्लोक 6:

आकाङ्क्षन्ते च दौहित्रान्मयि नित्यं पितामहाः। तत्स्वयं वै परित्रास्ये रक्षन्ती जीवितं पितुः।।1-173-6a 1-173-6b

  • हिन्दी अनुवाद: "मेरे पितामह (पूर्वज) भी हमेशा मुझसे दौहित्र (नाती) की आकांक्षा रखते हैं (जो अब इस त्याग से संभव नहीं)। किंतु अपने पिता के जीवन की रक्षा करती हुई मैं स्वयं ही इस बलिदान से अपने कुल को बचा लूँगी।"
  • व्याख्या: वह कहती है कि पिता का जीवित रहना पूरे परिवार के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

श्लोक 7 से 12 (भाई और माता-पिता के भविष्य की चिंता तथा पुत्री का समर्पण)

श्लोक 7, 8 और 9:

भ्राता च मम बालोऽयं गते लोकममुं त्वयि। अचिरेणैव Каलेन विनश्येत न संशयः।।1-173-7a 1-173-7b तातेपि हि गते स्वर्गं विनष्टे च ममानुजे। पिण्डः पितॄणां व्युच्छिद्येत्तत्तेषां विप्रियं भवेत्।।1-173-8a 1-173-8b पित्रा त्यक्ता तथा मात्रा भ्रात्रा चाहमसंशयम्। दुःखाद्दुःखतरं प्राप्य म्रियेयमतथोचिताम्।।1-173-9a 1-173-9b

  • हिन्दी अनुवाद: "यदि आपके (पिता के) परलोकवासी हो जाने पर मेरा यह छोटा भाई भी अनाथ हो जाएगा, तो वह थोड़े ही समय में नष्ट हो जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। पिता के स्वर्ग चले जाने और मेरे छोटे भाई के नष्ट हो जाने पर पितरों का पिंडदान भी खंडित हो जाएगा, जो उनके लिए अप्रिय होगा। और यदि पिता, माता और भाई द्वारा (जीवित रहते हुए) मुझे छोड़ दिया गया, तो मैं इस अयोग्य अवस्था में दारुण दुःख पाकर वैसे ही मर जाऊँगी।"
  • व्याख्या: वह समझाती है कि यदि माता-पिता या भाई में से कोई मरा, तो पूरा वंश और पिंडदान बंद हो जाएगा, जबकि उसके अकेले चले जाने से कम से कम घर के पुरुष सदस्य जीवित बच जाएंगे।

श्लोक 10, 11 और 12:

त्वयि त्वरोगे निर्मुक्तो माता भ्राता च शिशुः। सन्तानश्चैव पिण्डश्च प्रतिष्ठास्यत्यसंशयम्।।1-173-10a 1-173-10b आत्मा पुत्रः सखी भार्या कृच्छ्रं तु दुहिता किल। स कृच्छ्रान्मोचयात्मानं मां च धर्मे नियोजया।।1-173-11a 1-173-11b अनाथा कृपणा बाला यत्र क्वचन गामिनी। भविष्यामि त्वया तात विहीना कृपणा सदा।।1-173-12a 1-173-12b

  • हिन्दी अनुवाद: "आपके नीरोग और सुरक्षित रहने पर माता, शिशु भाई और हमारा वंश तथा पिंडदान— सब कुछ सुरक्षित रूप से स्थापित रहेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। शास्त्र कहते हैं कि आत्मा ही पुत्र है, पत्नी सखी है, और पुत्री संकट (कृच्छ्र) रूप है। इसलिए हे तात! आप अपने आपको इस संकट से मुक्त कीजिए और मुझे धर्म के कार्य में नियुक्त कीजिए। आपके बिना तो मैं वैसे भी अनाथ, दीन और जहाँ-तहाँ भटकने वाली एक कृपणा बालिका ही बन जाऊँगी।"
  • व्याख्या: पुत्री अपने पिता से आग्रह करती है कि वे उसे राक्षस की बलि के रूप में भेजने की अनुमति दें ताकि पूरा परिवार बच सके।

श्लोक 13 से 20 (पुत्री की व्याकुलता और माता-पिता के प्रति अंतिम निष्ठा)

श्लोक 13, 14 और 15:

अथवाहं करिष्यामि कुलस्यास्य विमोचनम्। फलसंस्था भविष्यामि कृत्वा कर्म सुदुष्करम्।।1-173-13a 1-173-13b अथवा यास्यसे तत्र त्यक्त्वा मां द्विजसत्तम। पीडिताऽहं भविष्यामि तदवेक्षस्व मामपि।।1-173-14a 1-173-14b तदस्मदर्थं धर्मार्थं प्रसवार्थं च सत्तम। आत्मानं परिरक्षस्व त्यक्तव्यां मां च संत्यज।।1-173-15a 1-173-15b

  • हिन्दी अनुवाद: "अथवा मैं इस कुल का उद्धार करूँगी और इस अति दुष्कर कर्म को करके अपने जीवन को सार्थक बनाऊँगी। हे द्विजसत्तम! यदि आप मुझे छोड़कर स्वयं (बलि के लिए) वहाँ गए, तो मैं भी अत्यधिक पीड़ित होकर प्राण त्याग दूँगी, इस बात का ध्यान रखिएगा। इसलिए हे सत्तम! हमारे कल्याण के लिए, धर्म के लिए और वंश की रक्षा के लिए आप अपनी रक्षा कीजिए और त्यागने योग्य मुझ (पुत्री) का त्याग कर दीजिए।"
  • व्याख्या: वह दृढ़ता से कहती है कि यदि पिता ने खुद जाने का प्रयास किया, तो वह जीवित नहीं बचेगी, इसलिए उसे ही जाने दिया जाए।

श्लोक 16, 17 और 18:

अवश्यकरणीये च मा त्वां कालोत्यगादयम्। किं त्वतः परमं दुःखं यद्वयं स्वर्गते त्वयि।।1-173-16a 1-173-16b याचिका: परादन्नं परिधावेमहि श्ववत्। त्वयि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात्सबान्धवे। अमृतेव सती लोके भविष्यामि सुखान्विता।।1-173-17a 1-173-17b 1-173-17c

  • हिन्दी अनुवाद: "यह कार्य अवश्य करने योग्य है, इसलिए इस पर विचार करने में समय व्यर्थ मत गँवाइए। आपके स्वर्गवासी हो जाने पर इससे बढ़कर और क्या दुःख होगा कि हम सब कुत्तों की तरह घर-घर जाकर पराया अन्न माँगते हुए भटकें? किंतु आपके नीरोग और इस क्लेश से मुक्त रहने पर मैं इस लोक में अमृत के समान सुख और संतोष का अनुभव करूँगी।"
  • व्याख्या: वह कहती है कि पिता के बिना भीख माँगकर जीने से अच्छा है कि वह अपने परिवार की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दे।

श्लोक 19 और 20:

इतः प्रदाने देवाश्च पितरश्चेति नः श्रुतम्। त्वया दत्तेन तोयेन भविष्यति हिताय वै।।1-173-18a 1-173-18b `इत्येतदुभयं तात निशाम्य तव यद्धितम्। तद्व्यवस्य तथाम्बाया हितं स्वस्य सुतस्य च।।1-173-19a 1-173-19b मातापिथ्रोश्च पुत्रास्तु भवितारो गुणान्विताः। न तु पुत्रस्य पितरो पुनर्जातु भविष्यतः।।'1-173-20a 1-173-20b

  • हिन्दी अनुवाद: "हमने सुना है कि इस प्रकार दान देने से देवता और पितर दोनों तृप्त होते हैं, और आपके द्वारा दिए जाने वाले जल से (आगे चलकर) हमारा हित ही होगा। इसलिए हे तात! आप अपना, माता का और अपने इस छोटे पुत्र का जो हित हो, वैसा ही निश्चय कीजिए। माता-पिता के तो गुणवान पुत्र (और पुत्रियाँ) अनेक हो सकते हैं, किंतु पुत्र के लिए माता-पिता कभी दोबारा प्राप्त नहीं हो सकते।"
  • व्याख्या: पुत्री का यह अंतिम तर्क सबसे प्रभावशाली है कि माता-पिता दूसरी संतान पा सकते हैं, किंतु बच्चों को उनके माता-पिता का विकल्प कभी नहीं मिल सकता, इसलिए पिता का जीवित रहना ही सर्वोपरि है।

श्लोक 21 से 26 (सबका रोना, छोटे बालक की मासूमियत और माता कुन्ती का प्रवेश)

श्लोक 21:

वैशंपायन उवाच।1-173-21x एवं बहुविधं तस्या निशम्य परिदेवितम्। पिता माता च सा चैव कन्या प्ररुरुदुस्त्रयः।।1-173-21a 1-173-21b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— उस कन्या के इस प्रकार के अनेक प्रकार के विलाप को सुनकर पिता, माता और वह कन्या— तीनों ही फूट-फूटकर रोने लगे।
  • व्याख्या: पुत्री की ऐसी त्यागपूर्ण और करुण बातें सुनकर पूरा ब्राह्मण परिवार एक-दूसरे को गले लगाकर रोने लगा।

श्लोक 22, 23 और 24:

ततः प्ररुदितान्सर्वान्निशम्याथ सुतस्तदा। उत्फुल्लनयनो बालः कलमव्यक्तमब्रवीत्।।1-173-22a 1-273-22b मा पिता रुद मा मातर्मा स्वसस्त्विति चाब्रवीत्। प्रहसन्निव सर्वांस्तानेकैकमनुसर्पति।।1-173-23a 1-173-23b ततः स तृणमादाय प्रहृष्टः पुनरब्रवीत्। अनेनाहं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम्।।1-173-24a 1-173-24b

  • हिन्दी अनुवाद: तब उन सबको इस प्रकार रोते हुए सुनकर उनका वह छोटा बालक खिलखिलाती हुई आँखों से तोतली और स्पष्ट वाणी में बोला— "हे पिता मत रोओ, हे माता मत रोओ, हे बहन मत रोओ!" वह मानो हँसता हुआ सा उन सबके पास एक-एक करके जाने लगा। इसके बाद उस बालक ने प्रफुल्लित होकर एक तिनका उठाया और फिर से कहा— "इस तिनके से मैं उस नर-भक्षी राक्षस को मार डालूँगा!"
  • व्याख्या: इस अत्यंत करुण और गंभीर माहौल में छोटे बच्चे की मासूम और बाल-सुलभ बात ने सबका ध्यान खींच लिया, जो अपनी नासमझी में तिनके से राक्षस को मारने की बात कह रहा था।

श्लोक 25 और 26:

वैशंपायन उवाच।1-173-25x तथापि तेषां दुःखेन परीतानां निशम्य तत्। बालस्य वाक्यमव्यक्तं हर्षः समभवन्महान्।।1-173-25a 1-173-25b अयं काल इति ज्ञात्वा कुन्ती समुपसृत्य तान्। गतासूनमृतेनेव जीवयन्तीदमब्रवीत्।।1-173-26a 1-273-26b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— दुःख से घिरे हुए उन लोगों ने जब उस बालक के उस अव्यक्त (तोतले) वचन को सुना, तो उनके मन में एक क्षण के लिए महान हर्ष (हँसी/सांत्वना) उत्पन्न हो गया। तब माता कुन्ती ने यह समझकर कि यही उचित समय है, उनके पास जाकर मरे हुए को अमृत से पुनर्जीवित करने के समान यह वचन कहा—
  • व्याख्या: उस शोकाकुल परिवार को संकट से उबारने के लिए माता कुन्ती ने समय की नजाकत को समझते हुए स्वयं आगे आकर उन्हें सांत्वना देने का निर्णय लिया।
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