महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८४

महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८४

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 184वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 5 (महर्षि व्यास का पांडवों के पास आना और उनका सत्कार)

श्लोक 1 और 2:

वैशंपायन उवाच। वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु। आजगामाथ तान्द्रष्टुं व्यासः सत्यवतीसुतः।। तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परन्तपाः। प्रणिपत्याभिवाद्यैनं तस्थुः प्राञ्जलयस्तदा।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— उन महात्मा पाण्डवों के (पाँचाल देश की ओर जाते या मार्ग में) अज्ञात रूप से निवास करते समय, सत्यवतीसुत भगवान व्यास उन सबको देखने के लिए वहाँ आ पहुँचे। उन्हें आया हुआ देखकर परंतप पाण्डवों ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया, उनके चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।
  • व्याख्या: पांडवों की यात्रा या निवास के दौरान उनके दादा महर्षि वेद व्यास स्वयं उनका मार्गदर्शन करने और उन्हें महत्वपूर्ण रहस्य समझाने के लिए पधारे।

श्लोक 3, 4 और 5:

समनुज्ञाप्य तान्सर्वानासीनान्मुनिरब्रवीत्। प्रच्छन्नं पूजितः पार्थैः प्रीतिपूर्वमिदं वचः।। अपि धर्मेण वर्तध्वं शास्त्रेण च परन्तपाः। अपि विप्रेषु पूजा वः पूजार्हेषु न हीयते।। अथ धर्मार्थवद्वाक्यमुक्त्वा स भगवानृषिः। विचित्राश्च कथास्तास्ताः पुनरेवेदमब्रवीत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: पाण्डवों द्वारा भली-भांति पूजा किए जाने और मुनि द्वारा सबको बैठने की आज्ञा दिए जाने पर, व्यासजी ने प्रेमपूर्वक यह वचन कहा— "हे परंतप पाण्डवो! क्या तुम लोग धर्म और शास्त्र के अनुसार आचरण कर रहे हो? क्या पूजनीय ब्राह्मणों के प्रति तुम्हारी श्रद्धा और पूजा में कोई कमी तो नहीं आ रही है?" इसके बाद धर्म और अर्थ से युक्त वे वचन कहकर उन भगवान ऋषि ने कई प्रकार की विचित्र कथाएँ सुनाई और फिर यह बात कही—
  • व्याख्या: व्यासजी पांडवों का कुशलक्षेम पूछते हैं और उनके धार्मिक आचरण की सराहना करने के बाद उन्हें एक बेहद रहस्यमयी और प्राचीन कथा सुनाते हैं, जो आगे चलकर द्रौपदी के साथ उनके विवाह का आधार बनती है।

श्लोक 6 से 10 (तपस्विनी कन्या की कथा और शिवजी का वरदान)

श्लोक 6, 7 और 8:

आसीत्तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः। विलग्नमध्या सुश्रोणी सुभ्रूः सर्वगुणान्विता।। कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत। नाध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती।। तपस्तप्तुमथारेभे पत्यर्थमसुखा ततः। किलोग्रेण सा ततो देवान्तोषयामास शङ्करम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "किसी तपोधन महात्मा ऋषि की एक कन्या थी, जो पतली कमर वाली, सुंदर कटिप्रदेश वाली, सुंदर भौंहों वाली और सभी गुणों से संपन्न थी। किंतु अपने पूर्व जन्म के कर्मों के कारण वह दुर्भाग्यशाली हो गई थी। वह कन्या अत्यंत रूपवती और सती होने पर भी योग्य पति को प्राप्त नहीं कर सकी। तब दुःखी होकर उसने उत्तम पति की प्राप्ति के लिए तपस्या करना आरंभ किया और अपने उग्र तप से भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया।"
  • व्याख्या: व्यासजी एक प्राचीन ऋषि कन्या की कथा सुनाते हैं जो अत्यंत सुंदर होते हुए भी दुर्भाग्यवश विवाहित नहीं हो पाई थी और उसने शिवजी की कठोर तपस्या की थी।

श्लोक 9 और 10:

तस्याः स भगवांस्तुष्टस्तामुवाच यशस्विनीम्। वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीति शङ्करः।। अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम्। पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनःपुनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "भगवान शंकर उसकी तपस्या से संतुष्ट हो गए और उस यशस्विनी कन्या से बोले— 'हे भद्र्रे! मैं वर देने वाला हूँ, तुम अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगो।' तब उस कन्या ने अपने हित की बात बार-बार दोहराते हुए ईश्वर (शिव) से कहा— 'मैं सभी गुणों से युक्त पति चाहती हूँ।' उसने इस बात को बार-बार (पाँच बार) दोहराया।"
  • व्याख्या: कन्या ने भगवान शिव से 'सभी गुणों से युक्त पति' पाने का वर माँगा, और आवेश या आग्रह के कारण उसने अपनी इस इच्छा को पाँच बार दोहराया।

श्लोक 11 से 16 (शिवजी का वरदान और द्रौपदी के रूप में जन्म)

श्लोक 11, 12 और 13:

तामथ प्रत्युवाचेदमीशानो वदतां वरः। पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति भारताः।। एवंक्ता ततः कन्या देवं वरदमब्रवीत्। एकमिच्छाम्यहं देव त्वत्प्रसादात्पतिं प्रभो।। पुनरेवाब्रवीद्देव इदं वचनमुत्तमम्। पञ्चकृत्वस्त्वया ह्युक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तब वक्ता श्रेष्ठ भगवान ईशान (शिव) ने उस कन्या से कहा— 'हे भद्रे! भारत! तुम्हारे पाँच पति होंगे।' ऐसा कहे जाने पर उस कन्या ने वर देने वाले देवता से कहा— 'हे देव! हे प्रभो! आपकी कृपा से मैं एक ही पति चाहती हूँ।' उसने देवता से फिर यह उत्तम वचन कहा— 'आपने ही तो मुझे पाँच बार यह कहा है कि तुम्हें पति प्राप्त हों।'"
  • व्याख्या: भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया कि उसके पाँच पति होंगे। कन्या ने आश्चर्य से कहा कि उसने तो एक ही पति माँगा था, तब शिवजी ने उसे रहस्य समझाया।

श्लोक 14 और 15:

देहमन्य Gतायास्ते यथोक्तं तद्भविष्यति। द्रुपदस्य कुले जज्ञे सा कन्या देवरूपिणी।। निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता। पाञ्चालनगरे तस्मान्निवसध्वं महाबलाः। सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशयः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "(शिवजी ने कहा)— 'दूसरे शरीर (जन्म) को प्राप्त करने पर तुम्हारी यह इच्छा यथोचित रूप से पूरी होगी।' व्यासजी ने कहा— वही देवरूपिणी कन्या अब राजा द्रुपद के कुल में उत्पन्न हुई है। हे महाबलों! वही अनिंदिता पार्षती कृष्णा (द्रौपदी) तुम सबकी पत्नी के रूप में विधाता द्वारा निर्धारित की गई है। इसलिए तुम सब पाँचाल नगर में निवास करो और उस (द्रौपदी) को प्राप्त करके सुख-संतान से युक्त हो जाओगे, इसमें कोई संशय नहीं है।"
  • व्याख्या: व्यासजी पांडवों को समझाते हैं कि वही पूर्व जन्म की तपस्विनी कन्या आज द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के रूप में जन्मी है, और वह तुम पाँचों भाइयों की ही पत्नी बनेगी, इसलिए तुम्हें पांचाल नगर की ओर बिना किसी संकोच के जाना चाहिए।

श्लोक 16:

एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान्स पितामहः। पार्थानामन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: महाभाग और महातपस्वी उन पितामह व्यासजी ने पाण्डवों तथा माता कुन्ती को इस प्रकार उपदेश देकर और उनसे विदा लेकर प्रस्थान किया (वे अपने लोक या आश्रम चले गए)।
  • व्याख्या: व्यासजी पांडवों और कुन्ती का संशय दूर करके और उन्हें द्रौपदी के साथ उनके दिव्य संबंध का रहस्य बताकर वहाँ से अंतर्ध्यान हो जाते हैं। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
         Previous.         index.          Next