महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८३

महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८३

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 183वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 9 (पाण्डवों का द्रौपदी के प्रति आकर्षण और माता कुन्ती का पांचाल देश जाने का प्रस्ताव)

श्लोक 1 और 2:

वैशंपायन उवाच। एतच्छ्रुत्वा ततः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ। मनसा द्रौपदीं जग्मुरनङ्गशरपीडिताः।। ततस्तां रजनीं राजञ्छल्यविद्धा इवाभवन्। सर्वे चास्वस्थमनसो बभूवुस्ते महाबलाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ जनमेजय! उस अतिथि ब्राह्मण के मुख से द्रौपदी के रूप और स्वयंवर की कथा सुनकर वे सभी पाण्डव अनंग (कामदेव) के बाणों से पीड़ित होकर मन ही मन द्रौपदी के पास (उसके स्मरण में) पहुँच गए। हे राजन्! उस महाबली पाण्डवों ने वह रात ऐसे बिताई मानो उनके अंगों में शल्य (काँटा या बाण) चुभे हुए हों; वे सभी उस रात अत्यंत अस्वस्थ मन (व्याकुल और बेचैन) वाले हो रहे थे।
  • व्याख्या: द्रौपदी के अलौकिक सौंदर्य और स्वयंवर के समाचार ने पाण्डवों (विशेषकर अर्जुन) के मन में आकर्षण जगा दिया, जिससे उस रात उनकी दशा काम-वेदना और व्याकुलता के कारण बाण से घायल व्यक्ति जैसी हो गई।

श्लोक 3, 4, 5 और 6:

ततः कुन्ती सुतान्दृष्ट्वा सर्वांस्तद्गतचेतसः। युधिष्ठिरमुवाचेदं वचनं सत्यवादिनी।। चिररात्रोषिताः स्मेह ब्राह्मणस्य निवेशने। रममाणाः पुरे रम्ये लब्धभैक्षा महात्मनः।। यानीह रमणीयानि वनान्युपवनानि च। सर्वाणि तानि दृष्टानि पुनःपुनररिन्दम।। पुनर्दृष्टानि तानीह प्रीणयन्ति न नस्तथा। भैक्षं च न तथा वीर लभ्यते कुरुनन्दन।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर माता कुन्ती ने अपने सभी पुत्रों को उसी बात में तल्लीन (गतचेतस) देखा, तब सत्यवादिनी माता कुन्ती ने युधिष्ठिर से यह वचन कहा— "हे महात्मन्! उस ब्राह्मण के इस निवास-स्थान पर तथा इस सुंदर नगर में भिक्षा प्राप्त करते हुए हम लोगों को बहुत लंबी रात्रि (बहुत दिन) बीत चुके हैं। हे अरिन्दम! यहाँ जितने भी रमणीय वन और उपवन थे, उन सबको हम बार-बार देख चुके हैं। उन स्थानों को बार-बार देखने से अब वे हमें उस प्रकार प्रसन्न नहीं करते, और हे कुरुनंदन वीर! अब उस तरह की भिक्षा भी यहाँ प्राप्त नहीं हो रही है।"
  • व्याख्या: माता कुन्ती ने भाँप लिया कि उनके पुत्र अब उस नगर और परिवेश से ऊब चुके हैं तथा उनके मन में पाँचाल देश जाने की तीव्र इच्छा जाग उठी है, इसलिए उन्होंने स्वयं ही आगे बढ़कर यात्रा का प्रस्ताव रखा।

श्लोक 7, 8 और 9:

ते वयं साधु पञ्चालान्गच्छाम यदि मन्यसे। अपૂર્વदर्शनं वीर रमणीयं भविष्यति।। सुभिक्षाश्चैव पञ्चालाः श्रूयन्ते शत्रुकर्शन। यज्ञसेनश्च राजाऽसौ ब्रह्मण्य इति सुश्रुम।। एकत्र चिरवासश्च क्षमो न च मतो मम। ते तत्र साधु गच्छामो यदि त्वं पुत्र मन्यसे।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए यदि तुम्हारी मति हो, तो हम सब भली-भांति पाँचाल देश चलें। हे वीर! वहाँ का अपूर्व दर्शन हमारे लिए बहुत रमणीय होगा। हे शत्रुकर्शन! हमने ऐसा सुना है कि पाँचाल देश में प्रचुर अन्न-धन है, और वहाँ के राजा यज्ञसेन (द्रुपद) ब्राह्मणों के महान भक्त हैं। एक ही स्थान पर बहुत लंबे समय तक निवास करना भी उचित नहीं है— ऐसा मेरा मत नहीं है (यानी अब रुकना ठीक नहीं)। इसलिए हे पुत्र! यदि तुम उचित समझो, तो हम सब वहाँ चलें।"
  • व्याख्या: कुन्ती युधिष्ठिर के सामने पांचाल देश जाने का प्रस्ताव रखती हैं ताकि वे अज्ञातवास के नियमों का पालन करते हुए नए स्थान पर जा सकें और साथ ही पांचाल की समृद्धि का लाभ उठा सकें।

श्लोक 10 से 12 (युधिष्ठिर की सहमति और पांचाल देश के लिए प्रस्थान)

श्लोक 10:

युधिष्ठिर उवाच। भवत्या यन्मतं कार्यं तदस्माकं परं हितम्। अनुजांस्तु न जानामि गच्छेयुर्नेति वा पुनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर बोले— "माताजी! आपका जो मत है, वही कार्य हमारे लिए परम हितकारी है। किंतु मैं यह नहीं जानता कि मेरे छोटे भाई (भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव) वहाँ चलना चाहते हैं या नहीं।"
  • व्याख्या: युधिष्ठिर माता कुन्ती के निर्णय का पूर्ण समर्थन करते हैं, किंतु मर्यादावश अपने भाइयों से भी उनकी सहमति जानने की बात कहते हैं।

श्लोक 11 और 12:

वैशंपायन उवाच। ततः कुन्ती भीमसेनमर्जुनं यमजौ तथा। उवाच गमनं ते च तथेत्येवाब्रुवंस्तदा।। ततः आमन्त्र्य तं विप्रं कुन्ती राजसुतैः सह। प्रतस्थे नगरीं रम्यां द्रुपदस्य महात्मनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तब कुन्ती ने भीमसेन, अर्जुन तथा दोनों यमराज-तुल्य पुत्रों (नकुल और सहदेव) से वहाँ जाने के विषय में कहा, और उन सबने तुरंत 'बहुत अच्छा, हम चलेंगे' ऐसा उत्तर दिया। तदनंतर माता कुन्ती ने राजपुत्रों (पाण्डवों) के साथ उस मेजबान ब्राह्मण से विदा ली और महात्मा द्रुपद की उस सुंदर नगरी (पाँचाल देश) की ओर प्रस्थान किया।
  • व्याख्या: पाण्डवों ने बिना किसी संकोच के अपनी सहमति दे दी, और सबने मिलकर उस ब्राह्मण से विदा ली तथा पाँचाल देश (द्रूपद की राजधानी कामपिल्य/इलाके) की ओर अपनी यात्रा शुरू कर दी। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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