महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 191वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 6 (विश्वामित्र और वसिष्ठ के वैर का कारण तथा विश्वामित्र का आश्रम आगमन)
श्लोक 1 और 2:
अर्जुन उवाच। किंनिमित्तमभूद्वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः। वसतोराश्रमे दिव्ये शंस नः सर्वमेव तत्।। गन्धर्व उवाच। इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं परिचक्षते। पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत्तन्रिबोध मे।।
- हिन्दी अनुवाद: अर्जुन बोले— "दिव्य आश्रम में निवास करने वाले विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच वैर किस कारण से उत्पन्न हुआ था? वह सब हमें विस्तार से बताइए।" गंधर्व (चित्ररथ) ने कहा— "हे पार्थ! वसिष्ठजी से जुड़ा यह प्राचीन आख्यान सभी लोकों में प्रसिद्ध है, उसे तुम मुझसे भली-भांति सुनो।"
- व्याख्या: अर्जुन के पूछने पर गंधर्व चित्ररथ विश्वामित्र और महर्षि वसिष्ठ के बीच हुए प्राचीन विवाद और संघर्ष की कथा सुनाना शुरू करते हैं।
श्लोक 3, 4, 5 और 6:
कान्यकुब्जे महानासीत्पार्थिवो भरतर्षभ। गाधीति विश्रुतो लोके कुशिकस्यात्मसंभवः।। तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धबलवाहनः। विश्वामित्र इति ख्यतो बभूव रिपुमर्दनः।। स चचार सहामात्यो मृगयां गहने वने। मृगान्विध्यन्वराहांश्च रम्येषु मरुधन्वसु।। व्यायामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः। आजगाम नरश्रेष्ठ वसिष्ठस्याश्रमं प्रति।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे भरतर्षभ! कान्यकुब्ज (कन्नौज) नगर में कुशिक के पुत्र 'गाधि' नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे। उन धर्मात्मा गाधि के पुत्र, समृद्ध सेना और वाहनों वाले, शत्रुओं का मर्दन करने वाले 'विश्वामित्र' नाम के प्रतापी राजा हुए। वे मंत्रियों के साथ घने वनों में मरुदेश के रमणीय स्थानों पर हिरण और वराहों का शिकार करते हुए विचर रहे थे। व्यायाम (परिश्रम) के कारण थक जाने, शिकार की इच्छा रखने और प्यास से पीड़ित होने पर वे नरश्रेष्ठ विश्वामित्र वसिष्ठजी के आश्रम की ओर आ पहुँचे।"
- व्याख्या: कथा की शुरुआत होती है कि कैसे राजा विश्वामित्र शिकार खेलते-खेलते थककर वसिष्ठजी के आश्रम में पहुँचे।
श्लोक 7 से 19 (वसिष्ठजी द्वारा आतिथ्य और 'नन्दिनी' गाय का प्रसंग)
श्लोक 7, 8 और 9:
तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः। विश्वामित्रं नरश्रेष्ठं प्रतिजग्राह पूजया।। पाद्यार्घ्याचमनीचैस्तं स्वागतेन च भारत। तथैव परिजग्राह वन्येन हविषा तदा।। तस्याथ कामधुग्धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः। उक्ता कामान्प्रयच्छेति सा कामान्दुदुहे ततः।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे भारत! विश्वामित्र को आया हुआ देखकर ऋषियों में श्रेष्ठ वसिष्ठजी ने उन नरश्रेष्ठ का भली-भांति पूजन किया। उन्होंने पाद्य, अर्घ्य, आचमन और स्वागत-सत्कार के साथ-साथ वन्य हविष्यान्न से भी उनका सत्कार किया। तत्पश्चात महात्मा वसिष्ठ की 'कामधुक्' (कामधेनु) नामक गाय ने— 'हमारी इच्छा के अनुसार सब कुछ प्रदान करो' ऐसा कहे जाने पर— उनकी सारी कामनाओं को दुह दिया (प्रकट कर दिया)।"
- व्याख्या: वसिष्ठजी ने राजा विश्वामित्र और उनकी पूरी सेना का अपनी अद्भुत कामधेनु गाय (नन्दिनी) की सहायता से भव्य आतिथ्य सत्कार किया।
श्लोक 10, 11, 12, 13 और 14:
`बाष्पाढ्यस्योदनस्यैव राशयः पर्वतोपमाः। निष्ठानानि च सूपांश्च दधिकुल्यास्तथैव च।। कूपांश्च घृतसंपूर्णान्गौड्यान्नानि सहस्रशः। इक्षून्मधूनि लाजांश्च मैरेयांश्च वरासवान्।।' ग्राम्यारण्याश्चौषधीश्च दुदुहे पय एव च। षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम्।। भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च। लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुना।। रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च। तैः कामैः सर्वसंपूर्णैः पूजितश्च महिपतिः।।
- हिन्दी अनुवाद: "उस गाय ने पर्वतों के समान ऊँचे भात के ढेर, विभिन्न प्रकार के पकवान, दालें और दही की नदियाँ दुह दीं। घी से भरे हुए कुएँ, हजारों प्रकार के गुड़ के अन्न, गन्ने, शहद, धान के लावा (लाजा), मैरेय और उत्तम मदिराएँ प्रकट कर दीं। ग्राम्य और अरण्य (जंगली) औषधियाँ तथा अमृत के समान छह रसों वाला उत्तम रसायन दूध के रूप में दुहा। भोजन करने योग्य, पीने योग्य, विविध प्रकार के भक्ष्यों, अमृत के समान लेह्य (चाटने योग्य) तथा चोष्य पदार्थों को अर्जुन! उसने प्रस्तुत कर दिया। बहुमूल्य रत्न और तरह-तरह के वस्त्र भी प्रकट हुए। उन सभी मनचाही वस्तुओं से सत्कार पाकर महिपति विश्वामित्र..."
- व्याख्या: कामधेनु गाय ने सेना और राजा के भोजन के लिए एक पल में राजसी दावत और तमाम सुख-सुविधाएँ प्रकट कर दीं।
श्लोक 15, 16, 17, 18 और 19:
सामात्यः सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा। षडुन्नतां सुपार्श्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम्।। मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम्। सुवालघिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम्।। पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्यताम्। अभिनन्द्य स तां राजा नन्दिनीं गाधिनन्दनः।। अब्रवीच्च भृशं तुष्टः स राजा तमृषिं तदा। अर्बुदेन गवां ब्रह्मन्मम राज्येन वा पुनः।। नन्दिनीं संप्रयच्छस्व भुङ्क्ष्व राज्यं महामुने। वसिष्ठ उवाच। देवतातिथिपित्रर्थं याज्यार्थं च पयस्विनी।। अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनापि तवानघ।
- हिन्दी अनुवाद: "...अपने मंत्रियों और सेना सहित अत्यंत संतुष्ट हुए। उस गाय के छह अंग उठे हुए थे, उसके पार्श्र्व और जंघाएँ सुंदर थीं, वह पाँच चौड़ाई से युक्त थी, उसकी आँखें मेंढक की नेत्र जैसी सुंदर थीं, उसका आकार श्रेष्ठ था, थन पुष्ट थे, वह अनिंदिता थी, पूँछ के बाल सुंदर थे, कान शंख जैसे थे और सींग अत्यंत मनोहर थे। उसके पुष्ट और लंबे सिर तथा ग्रीवा को देखकर राजा विश्वामित्र बहुत विस्मित हुए। गाधिनंदन (विश्वामित्र) ने उस नन्दिनी गाय की प्रशंसा करके और अत्यधिक संतुष्ट होकर उस ऋषि से कहा— 'हे ब्रह्मन्! आप मुझे दस करोड़ (अर्बुद) गायें ले लीजिए या मेरा पूरा राज्य ले लीजिए, और बदले में इस नन्दिनी को मुझे दे दीजिए, तथा आप स्वयं राज्य का भोग कीजिए, हे महामुने!' वसिष्ठजी ने कहा— 'यह पयस्विनी (दूध देने वाली) नन्दिनी देवता, अतिथि, पितरों और यज्ञ-कर्म के लिए है, हे अनघ! इसलिए राज्य देने पर भी यह नन्दिनी तुम्हें देने योग्य नहीं है।'"
- व्याख्या: विश्वामित्र नन्दिनी गाय के अद्भुत गुणों को देखकर उस पर लट्टू हो गए और उसे पाने के लिए अपना पूरा राज्य देने की पेशकश की, जिसे वसिष्ठजी ने यह कहकर ठुकरा दिया कि यह गाय धार्मिक और यज्ञीय कार्यों के लिए है।
श्लोक 20 से 30 (विश्वामित्र द्वारा गाय को बलपूर्वक ले जाना और वसिष्ठजी की प्रतिक्रिया)
श्लोक 20, 21 और 22:
विश्वामित्र उवाच। `रत्नं हि भगवन्नेतद्रत्नहारी च पार्थिवः।' क्षत्रियोऽहं भवान्विप्रस्तपःस्वाध्यायसाधनः।। ब्राह्णेषु कुतो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु। अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम्।। स्वधर्मं न प्रहास्यामि नेष्यामि च बलेन गाम्। वसिष्ठ उवाच। बलस्थश्चासि राजा च बाहुवीर्यश्च क्षत्रियः।। यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय।
- हिन्दी अनुवाद: विश्वामित्र बोले— "हे भगवन्! यह एक रत्न है, और रत्न को ग्रहण करने वाला राजा (पार्थिव) होता है। मैं क्षत्रिय हूँ और आप तपस्या व स्वाध्याय से संपन्न विप्र हैं। शांत और संयमी ब्राह्मणों में वीर्य (बल) कहाँ होता है? इसीलिए जो आप करोड़ों गायें मिलने पर भी मेरी इच्छा की इस गाय को नहीं दे रहे हैं। मैं अपने क्षत्रिय-धर्म को नहीं छोड़ूँगा और इस गाय को बलपूर्वक ले जाऊँगा।" वसिष्ठजी ने कहा— "तुम बलवान हो, राजा हो और बाहुबल वाले क्षत्रिय हो। जैसी तुम्हारी इच्छा हो, तुम तुरंत वैसा ही करो, तनिक भी विचार मत करो।"
- व्याख्या: विश्वामित्र अहंकार में आकर क्षत्रिय बल का हवाला देते हुए गाय को जबरन ले जाने की धमकी देते हैं, और वसिष्ठजी उन्हें अपनी इच्छा अनुसार जो करना हो करने की अनुमति देते हैं।
श्लोक 23, 24, 25 और 26:
गन्धर्व उवाच। एवमुक्तस्तथा पार्थ विश्वामित्रो बलादिव।। हंसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम्। `सा तदा ह्रियमाणा च विश्वामित्रबलैर्बलात्।' कशादण्डप्रणुदिता काल्यमाना इतस्ततः।। हंभायमाना कल्याणी वसिष्ठस्याथ नन्दिनी। आगम्याभिमुखी पार्थ तस्थौ भगवदुन्मुखी।। भृशं च ताड्यमाना वै न जगामाश्रमात्ततः। वसिष्ठ उवाच। शृणोमि ते रवं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः।। ह्रियसे त्वं बलाद्भद्रे विश्वामित्रेण नन्दिनि। किं कर्तव्यं मया तत्र क्षमावान्ब्राह्मणो ह्यहम्।
- हिन्दी अनुवाद: गंधर्व ने कहा— हे पार्थ! ऐसा कहे जाने पर विश्वामित्र ने बलपूर्वक उस हंस और चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण वाली नन्दिनी गाय को वहाँ से हाँक लिया। विश्वामित्र के सैनिकों द्वारा बलपूर्वक ले जाई जाती हुई, कोड़े और डंडों से हाँकी जाती और इधर-उधर भगाई जाती हुई वह कल्याणी नन्दिनी, वसिष्ठजी की वह गाय, हंभाती हुई (रंभाती हुई) वापस लौटकर भगवान वसिष्ठ के सामने आकर खड़ी हो गई। बहुत अधिक ताड़ित (पीटने) जाने पर भी वह वहाँ से आश्रम छोड़कर नहीं गई। वसिष्ठजी ने कहा— "हे भद्रे नन्दिनि! मैं बार-बार तुम्हारी यह रंभाने की आवाज सुन रहा हूँ। तुम विश्वामित्र द्वारा बलपूर्वक ले जाई जा रही हो। इसमें मेरा क्या कर्तव्य है? मैं तो एक क्षमावान ब्राह्मण हूँ।"
- व्याख्या: विश्वामित्र सैनिकों के बल पर गाय को खींचकर ले जाने लगे, किंतु गाय बार-बार रंभाकर वसिष्ठजी के पास लौट आती है। वसिष्ठजी शांत भाव से सब देखते हैं।
श्लोक 27 से 35 (नन्दिनी का क्रोध और सेना का विध्वंस)
श्लोक 27, 28, 29 और 30:
गन्धर्व उवाच। सा भयान्नन्दिनी तेषां बलानां भरतर्षभ। विश्वामित्रभयोद्विग्ना वसिष्ठं समुपागमत्।। गौरुवाच। कशाग्रदण्डाभिहतां क्रोशन्तीं मामनाथवत्। विश्वामित्रबलैर्घोरैर्भगवन् किमुपेक्षसे।। गन्धर्व उवाच। एवं तस्यां तदा पार्थ धर्षितायां महामुनिः। न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतव्रतः।।
- हिन्दी अनुवाद: गंधर्व ने कहा— हे भरतर्षभ! विश्वामित्र के सैनिकों के भय से उद्विग्न हुई वह नन्दिनी डरकर वसिष्ठजी के पास पहुँची और बोली— "कोड़े और डंडे की नोक से पीटी जाती हुई और अनाथ की तरह विलाप करती हुई मुझको विश्वामित्र के इन घोर सैनिकों द्वारा सताया जा रहा है, हे भगवन्! आप उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?" हे पार्थ! उसके इस प्रकार अपमानित किए जाने पर भी महामुनि वसिष्ठ अपने धैर्य से तनिक भी क्षुब्ध नहीं हुए और अपने व्रत पर अडिग रहे।
- व्याख्या: जब नन्दिनी गाय ने वसिष्ठजी से अपनी रक्षा की गुहार लगाई, तब भी वसिष्ठजी ने अपनी ब्राह्मणोचित क्षमा और धैर्य नहीं छोड़ा।
श्लोक 31, 32, 33, 34 और 35:
वसिष्ठ उवाच। क्षत्रियाणां बलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा बलम्। क्षमा मां भजते यस्माद्गम्यतां यदि रोचते।। नन्दिन्युवाच। किं नु त्यक्ताऽस्मि भगवन्यदेवं त्वं प्रभाषसे। अत्यक्ताऽहं त्वया ब्रह्मन्नेतुं शक्या न वै बलात्।। वसिष्ठ उवाच। न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीयतां यदि शक्यते। दृढेन दाम्ना बद्ध्वैष वत्सस्ते hियते बलात्।। गन्धर्व उवाच। स्थीयतामिति Tच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पयस्विनी। ऊर्ध्वाञ्चितशिरोग्रीवा प्रबभौ रौद्रदर्शना।। क्रोधरक्तेक्षणा सा गौर्हंभारवघनस्वना। विश्वामित्रस्य तत्सैन्यं व्यद्रावयत सर्वशः।।
- हिन्दी अनुवाद: वसिष्ठजी ने कहा— "क्षत्रिय का बल उनका तेज होता है, और ब्राह्मणों का बल 'क्षमा' है। चूंकि क्षमा मेरा स्वभाव है, इसलिए यदि तुम्हारी इच्छा हो तो तुम जा सकती हो।" नन्दिनी बोली— "हे भगवन! क्या आपने मेरा त्याग कर दिया है जो आप ऐसा कह रहे हैं? यदि आप मेरा त्याग न करते, तो कोई मुझे बलपूर्वक ले जाने में समर्थ नहीं हो सकता था।" वसिष्ठजी ने कहा— "हे कल्याणि! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता हूँ, यदि रुकना संभव हो तो रुको, क्योंकि ये तुम्हारे बछड़े को मजबूत रस्सी से बाँधकर बलपूर्वक लिए जा रहे हैं।" गंधर्व ने कहा— वसिष्ठजी के ऐसे वचन सुनकर उस दूध देने वाली गाय की सिर और ग्रीवा ऊपर उठ गई और वह अत्यंत रौद्र रूप में प्रकट हुई। क्रोध से लाल नेत्रों वाली और भारी रंभाने की आवाज करने वाली उस गाय ने विश्वामित्र की उस पूरी सेना को चारों तरफ से खदेड़ दिया (भगा दिया)।
- व्याख्या: जब गाय ने समझा कि वसिष्ठजी ने उसे छोड़ने की अनुमति दे दी है, तो उसने स्वयं अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का निर्णय लिया और रौद्र रूप धारण कर लिया।
श्लोक 36 से 47 (नन्दिनी के शरीर से म्लेच्छ सेनाओं की उत्पत्ति और विश्वामित्र की पराजय)
श्लोक 36, 37, 38 और 39:
कशाग्रदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः। क्रोधरक्तेक्षणा क्रोधं भूय एव समाददे।। आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ। अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत्।। असृजत्पह्लवान्पुच्छात्प्रस्रवाद्द्राविडाञ्छकान्। योनिदेशाच्च यवानाञ्शकृतः शबरान्बहून्।। मूत्रतश्चासृजत्कांश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः। पौण्ड्रान्किरातान्यवनान्सिंहलान्बर्बरान्खसान्।।
- हिन्दी अनुवाद: "कोड़े और डंडे से पीटी जाती हुई, इधर-उधर हाँकी जाने वाली, क्रोध से लाल नेत्रों वाली उस गाय ने अपने क्रोध को और अधिक बढ़ा लिया। मध्याह्न के सूर्य के समान वह अपने क्रोध से प्रदीप्त शरीर वाली शोभा देने लगी और अपनी पूँछ से बार-बार अंगारों की भारी वर्षा करने लगी। उसने अपनी पूँछ से पह्लव, मूत्रमार्ग (प्रस्रवण) से द्रविड़ और शक, योनि देश से यवन, और मल (शकृत) से बहुत सारे शबरों को उत्पन्न किया। अपने मूत्र से तथा पार्श्व भागों से उसने कुछ शबरों, पौण्ड्र, किरात, यवन, सिंहल, बर्बर और खस जातियों को उत्पन्न किया।"
- व्याख्या: कामधेनु नन्दिनी के शरीर के अलग-अलग अंगों से विश्वामित्र की सेना का सामना करने के लिए विभिन्न शक्तिशाली म्लेच्छ और लड़ाकू जातियों के सैनिक प्रकट होने लगे।
श्लोक 40, 41, 42, 43 और 44:
चिबुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान्हूणान्सकेरलान्। ससर्ज फेनतः सा गौर्म्लेच्छान्बहुविधानपि।। तैर्विसृष्टैर्महासैन्यैर्नानाम्लेच्छगणैस्तदा। नानावरणसंछन्नैर्नानायुधधरैस्तथा।। अवाकीर्यत संरब्धैर्विश्वामित्रस्य पश्यतः। एकैकश्च Tदा योधः पञ्चभिः सप्तभिर्वृतः।। अस्त्रवर्षेण महता वध्यमानं बलं तदा। प्रभग्नं सर्वतस्त्रस्तं विश्वामित्रस्य पश्यतः।। `तस्य तच्चतुरङ्गं वै बलं परमदुःसहम्। प्रभग्नं सर्वतो घोरं पयस्विन्या विनिर्जितम्।।'
- हिन्दी अनुवाद: "अपने मुख के झाग (फेन) से उस गाय ने चिबुक, पुलिंद, चीन, हूण, केरल और अनेक प्रकार के म्लेच्छों को सृजित किया। नाना प्रकार के वस्त्रों और विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को धारण किए हुए उन विश्वामित्र के देखते-देखते, उस गाय द्वारा सृजित महासैन्यों और म्लेच्छ गणों ने विश्वामित्र की सेना को चारों तरफ से घेर लिया। एक-एक योद्धा पर पाँच-पाँच, सात-सात सैनिक टूट पड़े। बाणों की भारी वर्षा से मारे जाते हुए विश्वामित्र के उस बल को चारों तरफ से भयभीत होकर भागते हुए उन्होंने देखा। विश्वामित्र की उस अत्यंत दुःसह चतुरंगिणी सेना को उस पयस्विनी गाय ने चारों तरफ से बुरी तरह पराजित कर दिया।"
- व्याख्या: नन्दिनी गाय द्वारा उत्पन्न उस विशाल सेना ने विश्वामित्र की पूरी सेना को चारों तरफ से घेरकर तितर-बितर कर दिया और हरा दिया।
श्लोक 45, 46 और 47:
न च प्राणैर्वियुज्यन्ते केचित्तत्रास्य सैनिकाः। विश्वामित्रस्य संक्रुद्धैर्वासिष्ठैर्भरतर्षभ।। सा गौस्तत्सकलं सैन्यं कालयामास दूरतः। विश्वामित्रस्य तत्सैन्यं काल्यमानं त्रियोजनम्।। क्रोशमानं भयोद्विग्नं त्रातारं नाध्यगच्छत। `विश्वामित्रस्ततो दृष्ट्वा क्रोधाविष्टः स रोदसी।।'
- हिन्दी अनुवाद: "हे भरतर्षभ! वसिष्ठजी के पक्ष की उस सेना द्वारा क्रोधित किए जाने पर भी विश्वामित्र के उन सैनिकों के प्राण नहीं लिए गए (उन्हें मारा नहीं गया, केवल भगाया गया)। उस गाय ने विश्वामित्र की उस पूरी सेना को दूर तक खदेड़ दिया। विश्वामित्र की वह सेना तीन योजन (लगभग बारह मील) तक खदेड़ी गई। भय से उद्विग्न होकर चीखते-चिल्लाते हुए सैनिकों को कोई रक्षक नहीं मिल रहा था। तब क्रोधाविष्ट हुए विश्वामित्र ने..."
- व्याख्या: वसिष्ठजी की गाय द्वारा उत्पन्न सेना ने विश्वामित्र की सेना को मार डाला नहीं, बल्कि तीन योजन दूर तक खदेड़कर भगा दिया, जिससे विश्वामित्र अत्यधिक क्रोधित हो गए।
श्लोक 48 से 55 (विश्वामित्र के अस्त्रों का प्रयोग और वसिष्ठजी की ब्रह्मशक्ति से पराजय)
श्लोक 48, 49, 50 और 51:
ववर्ष शरवर्षाणि वसिष्ठे मुनिसत्तमे। घोररूपांश्च नाराचान्क्षुरान्भल्लान्महामुनिः।। विश्वामित्रप्रयुक्तांस्तान्वैणवेन व्यमोचयत्। वसिष्ठस्य तदा दृष्ट्वा कर्मकौशलमाहवे।। विश्वामित्रोऽपि कोपेन भूयः शत्रुनिपातनः। दिव्यास्त्रवर्षं तस्मै स प्राहिणोन्मुनये रुषा।। आग्नेयं वारुणं चैन्द्रं याम्यं वायव्यमेव च। विससर्ज महाभागे वसिष्ठे ब्रह्मणः सुते।।
- हिन्दी अनुवाद: "...मुनिसत्तम वसिष्ठ पर बाणों की वर्षा शुरू कर दी। उस महामुनि विश्वामित्र ने घोर रूप वाले नाराच, क्षुर और भल्लों की वर्षा की। किंतु वसिष्ठजी ने विश्वामित्र द्वारा चलाए गए उन सभी बाणों को अपनी बाँस की छड़ी (वैणव दंड) से ही व्यर्थ (नष्ट) कर दिया। युद्ध में वसिष्ठजी के उस कर्म-कौशल को देखकर, शत्रुओं का नाश करने वाले विश्वामित्र को और अधिक क्रोध आ गया, और उन्होंने क्रोध में भरकर उस मुनि पर दिव्यास्त्रों की वर्षा कर दी। ब्रह्मणपुत्र महाभाग वसिष्ठ पर उन्होंने आग्नेय, वारुण, ऐन्द्र, याम्य और वायव्य आदि अस्त्र छोड़े।"
- व्याख्या: विश्वामित्र ने अपने साधारण बाणों के असफल होने पर वसिष्ठजी पर तमाम भयंकर दिव्यास्त्र (आग्नेय, वरुण, इंद्र आदि) बरसा दिए।
श्लोक 52, 53, 54 और 55:
अस्त्राणि सर्वतो ज्वालां विसृजन्ति प्रपेदिरे। युगान्तसमये घोराः पतङ्गस्येव रश्मयः।। वसिष्ठोऽपि महातेजा ब्रह्मशक्तिप्रयुक्तया। यष्ट्या निवारयामास सर्वाण्यस्त्राणि स स्मयन्।। ततस्ते भस्मसाद्भूताः पतन्ति स्म महीतले। अपोह्य दिव्यान्यस्त्राणि वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत्।। निर्जितोऽसि महाराज दुरात्मन्गाधिनन्दन। यदि तेऽस्ति परं शौर्यं तद्दर्शय मयि स्थिते।।
- हिन्दी अनुवाद: "वे सभी अस्त्र चारों तरफ प्रलयकाल के सूर्य की किरणों के समान भयंकर ज्वालाएँ छोड़ते हुए आगे बढ़े। किंतु महातेजस्वी वसिष्ठजी ने भी अपनी 'ब्रह्मशक्ति' से युक्त उस छड़ी (यष्टि) के द्वारा मुस्कुराते हुए उन सभी दिव्यास्त्रों को रोक लिया। तब वे सभी दिव्यास्त्र भस्म होकर पृथ्वी पर गिरने लगे। उन सभी दिव्य अस्त्रों को शांत (नष्ट) करके वसिष्ठजी ने यह वचन कहा— 'हे महाराज दुरात्मन् गाधिनन्दन! तुम बुरी तरह पराजित हो चुके हो। यदि तुम्हारे पास कोई श्रेष्ठ शौर्य बचा है, तो मेरे सामने खड़े होकर उसे दिखाओ!'"
- व्याख्या: वसिष्ठजी ने अपनी केवल एक योगदण्ड (छड़ी) के ब्रह्मतेज से विश्वामित्र के सारे ब्रह्मांड-संहारक दिव्यास्त्रों को घास की तिनके की तरह भस्म कर दिया।
श्लोक 56 से 61 (विश्वामित्र का क्षत्रिय बल से मोहभंग और तपस्या का मार्ग अपनाना)
श्लोक 56, 57 और 58:
गन्धर्व उवाच। विश्वामित्रस्तथा चोक्तो वसिष्ठेन नराधिपः। नोवाच किंचिद्व्रीडाढ्यो विद्रावितमहाबलः।। दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं ब्रह्मतेजोभवं तदा। विश्वामित्रः क्षत्रभावान्निर्विण्णो वाक्यमब्रवीत्। धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्।। बलाबले विनिश्चित्य तप एव परं बलम्। गन्धर्व उवाच। स राज्यं स्फीतमुत्सृज्य तां c दीप्तां नृपश्रियम्।।
- हिन्दी अनुवाद: गंधर्व ने कहा— हे नराधिप! वसिष्ठजी द्वारा ऐसा कहे जाने पर, जिनकी महाबली सेना भगाई जा चुकी थी, वे लज्जा से आक्रांत विश्वामित्र एक शब्द भी नहीं बोल सके। ब्रह्मतेज से उत्पन्न हुए उस महान आश्चर्य को देखकर क्षत्रिय भाव से निर्विण्ण (उद्विग्न/निराश) हुए विश्वामित्र ने कहा— "धिक्कार है क्षत्रिय के बल को! असली बल तो 'ब्रह्मतेज का बल' ही है! बल और अबल का निश्चय करने के बाद यही स्पष्ट होता है कि 'तप' ही सबसे बड़ा बल है।" गंधर्व ने कहा— इसके बाद वे अपने समृद्ध राज्य और उस देदीप्यमान राजलक्ष्मी को छोड़कर...
- व्याख्या: विश्वामित्र को समझ आ गया कि भौतिक शस्त्रों और क्षत्रिय बल से ब्रह्मतेज बड़ा नहीं है। वे अपना सारा राज्य-पाठ छोड़कर तपस्या के मार्ग पर निकल पड़े।
श्लोक 59, 60 और 61:
भोगांश्च पृष्ठतः कृत्वा तपस्येव मनो दधे। स गत्वा तपसा सिद्धिं लोकान्विष्टभ्य तेजसा।। तताप सर्वान्दीप्तौजा ब्राह्मणत्वमवाप्तवान्। अपिबच्च ततः सोममिन्द्रेण सह कौशिकः।। `एवंवीर्यस्तु राजर्षिर्विप्रर्षिः संबभूव ह'।।
- हिन्दी अनुवाद: "...तथा भोग-विलासों को पीठ पीछे छोड़कर उन्होंने केवल तपस्या में ही अपना मन लगा दिया। तपस्या से सिद्धि प्राप्त करके और अपने तेज से तीनों लोकों को स्तब्ध करके, उन दीप्तौजा (तेजस्वी) कौशिक (विश्वामित्र) ने सब तरफ तप किया और अंततः 'ब्राह्मणत्व' (ब्रह्मर्षि पद) को प्राप्त कर लिया। तत्पश्चात उन कौशिक ने देवराज इंद्र के साथ बैठकर सोमपान किया। इस प्रकार महान वीर वे राजर्षि आगे चलकर 'विप्रर्षि' (ब्रह्मर्षि) बन गए।"
- व्याख्या: कठोर तपस्या के बल पर विश्वामित्र ने राजर्षि से ब्रह्मर्षि की पदवी प्राप्त की। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
