महाभारत् -०१ आदिपर्व -१९२

महाभारत् -०१ आदिपर्व -१९२

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 192वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 5 (अर्जुन का प्रश्न और राजा कल्माषपाद का प्रसंग)

श्लोक 1, 2, 3 और 4:

अर्जुन उवाच। ऋष्योस्तु यत्कृते वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः। बभूव गन्धर्वपते शंस तत्सर्वमेव मे।। माहात्म्यं च वसिष्ठस्य ब्राह्मण्यं ब्रह्मतेजसः। विश्वामित्रस्य च तथा क्षत्रस्य च महात्मनः।। न शृण्वानस्त्वहं तृप्तिमुपगच्छामि खेचर। आख्याहि गन्धर्वपते शंस तत्सर्वमेव मे।। माहात्म्यं च वसिष्ठस्य विश्वामित्रस्य भाषते।।

  • हिन्दी अनुवाद: अर्जुन बोले— "हे गंधर्वराज! उन दोनों ऋषियों (विश्वामित्र और वसिष्ठ) के बीच जिस कारण से वैर उत्पन्न हुआ था, वह सब मुझे विस्तार से बताइए। वसिष्ठजी का माहात्म्य, ब्रह्मतेज का ब्राह्मणत्व, तथा महात्मा विश्वामित्र और क्षत्रिय-बल का जो माहात्म्य है, उसे सुनते-सुनते हे खेचर! मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। आप मुझे वह सब पूरी तरह सुनाइए।"
  • व्याख्या: अर्जुन गंधर्व चित्ररथ से वसिष्ठ और विश्वामित्र के बीच हुए उस दूसरे प्रसिद्ध प्रसंग (राजा कल्माषपाद के शाप और वसिष्ठ के पुत्रों के नाश की कथा) को विस्तार से सुनने का अनुरोध करते हैं।

श्लोक 5:

गन्धर्व उवाच। इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं पुण्यमुत्तमम्। पार्थ सर्वेषु लोकेषु विश्रुतं तन्निबोध मे।।

  • हिन्दी अनुवाद: गंधर्व ने कहा— "हे पार्थ! वसिष्ठजी से जुड़ा यह पवित्र और उत्तम प्राचीन आख्यान तीनों लोकों में प्रसिद्ध है, तुम इसे मुझसे सुनो।"
  • व्याख्या: गंधर्व अर्जुन की जिज्ञासा शांत करने के लिए राजा कल्माषपाद और शक्ति मुनि के शाप की ऐतिहासिक कथा सुनाना आरंभ करता है।

श्लोक 6 से 15 (राजा कल्माषपाद और वसिष्ठपुत्र शक्ति मुनि का मार्ग को लेकर विवाद)

श्लोक 6, 7 और 8:

कल्माषपाद इत्येवं लोके राजा बभूव ह। इक्ष्वाकुवंशजः पार्थ तेजसाऽसदृशो भुवि।। स कदाचिद्वनं राजा मृगयां निर्ययौ पुरात्। मृगान्विध्यन्वराहांश्च चचार रिपुमर्दनः।। तस्मिन्वने महाघोरे खङ्गांश्च बहुशोऽहनत्। हत्वा च सुचिरं श्रान्तो राजा निववृते ततः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे पार्थ! इस लोक में इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न होने वाले और अपने तेज से पृथ्वी पर अद्वितीय 'कल्माषपाद' नाम के एक राजा हुए थे। वे रिपुमर्दन (शत्रुओं का नाश करने वाले) राजा एक समय नगर से वन में शिकार खेलने के लिए निकले और हिरण तथा वराहों का शिकार करते हुए विहार करने लगे। उस महाघोर वन में उन्होंने बहुत से गैंडों (खङ्ग) का वध किया। इस प्रकार बहुत देर तक शिकार करके और थक जाने के बाद राजा वहाँ से वापस लौटे।"
  • व्याख्या: इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा कल्माषपाद एक बार वन में शिकार खेलने गए और थककर लौट रहे थे।

श्लोक 9, 10, 11 और 12:

अकामयत्तं याज्यार्थे विश्वामित्रः प्रतापवान्। स तु राजा महात्मानं वासिष्ठमृषिसत्तमम्।। तृषार्तश्च क्षुधार्तश्च एकायनगतः पथि। अपश्यदजितः सङ्ख्ये मुनिं प्रतिमुखागतम्।। शक्तिं नाम महाभागं वसिष्ठकुलवर्धनम्। ज्येष्ठं पुत्रं पुत्रशताद्वसिष्ठस्य महात्मनः।। अपगच्छ पथोऽस्माकमित्येवं पार्थिवोऽब्रवीत्। तथा ऋषिरुवाचैनं सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा।।

  • हिन्दी अनुवाद: "प्रतापी विश्वामित्र अपने यज्ञ के लिए उस राजा (कल्माषपाद) को चाहते थे (या उनके मन में कोई यज्ञ का उद्देश्य था)। जब वे राजा भूख और प्यास से पीड़ित होकर एक ही सँकरे रास्ते (एकायन मार्ग) से लौट रहे थे, तब युद्ध में अजेय उन राजा ने सामने से आते हुए मुनि को देखा। वे मुनि महात्मा वसिष्ठ के सौ पुत्रों में सबसे बड़े, वसिष्ठ कुल को बढ़ाने वाले और महाभाग 'शक्ति' (शक्ति मुनि) थे। राजा ने अहंकार में आकर कहा— 'मेरे मार्ग से हट जाओ!' तब उन ऋषि ने शांत भाव से श्लक्ष्ण (कोमल) वाणी में उन्हें समझाया—"
  • व्याख्या: रास्ते में राजा कल्माषपाद की भेंट वसिष्ठजी के सबसे बड़े पुत्र शक्ति मुनि से हुई। सँकरा रास्ता होने के कारण मार्ग देने को लेकर दोनों में विवाद हो गया।

श्लोक 13, 14, 15 और 16:

मम पन्था महाराज धर्म एष सनातनः। वृद्धभीरुनृपस्नातस्त्रीरोगिवरचक्रिणाम्।। पन्था देयो नृपैस्तेषामन्यैस्तैस्तस्य भूपतेः।' राजा सर्वेषा धर्मेषु देयः पन्था द्विजातये।। एवं परस्परं तौ तु पथोऽर्थं वाक्यमूचतुः। अपसर्पापसर्पेति वागुत्तरमकुर्वताम्।। ऋषिस्तु नापचक्राम तस्मिन्धर्मपथे स्थितः। अपि राजा मुनेर्मार्गात्क्रोधान्नापजगाम ह।।'

  • हिन्दी अनुवाद: "मुनि ने कहा— 'हे महाराज! यह मार्ग मेरा है, यह सनातन धर्म है। वृद्ध, कायर, राजा, स्नातक, स्त्री, रोगी, श्रेष्ठ और रथ/वाहन चलाने वालों को— राजाओं द्वारा मार्ग दिया जाना चाहिए, तथा अन्य मामलों में भी राजाओं को सभी धर्मों में द्विजाति (ब्राह्मण) को मार्ग देना चाहिए।' इस प्रकार उन दोनों ने मार्ग के लिए आपस में वचन कहे और 'हट जाओ, हट जाओ' ऐसा उत्तर देने लगे। धर्ममार्ग पर स्थित होने के कारण ऋषि पीछे नहीं हटे, और राजा भी अपने क्रोध के कारण मुनि के मार्ग से पीछे नहीं हटे।"
  • व्याख्या: शास्त्रसम्मत नियम के अनुसार ब्राह्मण (मुनि) को मार्ग देना राजा का कर्तव्य था, किंतु राजा कल्माषपाद ने अहंकारवश मार्ग देने से मना कर दिया और दोनों में बहस छिड़ गई।

श्लोक 17 से 24 (शक्ति मुनि द्वारा राजा को शाप और विश्वामित्र की चाल)

श्लोक 17, 18, 19 और 20:

अमुञ्चन्तं तु पन्थानं तमृषिं नृपसत्तमः। जगाम कशया मोहात्तदा राक्षसन्मुनिम्।। कशाप्रहाराभिहतस्ततः स मुनिसत्तमः। तं शशाप नृपश्रेष्ठं वासिष्ठः क्रोधमूर्च्छितः।। हंसि राक्षसवद्यस्माद्राजापशद तापसम्। तस्मात्त्वमद्यप्रभृति पुरुषादो भविष्यसि।। मनुष्यपिशिते सक्तश्चरिष्यसि महीमिमाम्। गच्छ राजाधमेत्युक्तः शक्तिना वीर्यशक्तिना।।

  • हिन्द राजा: "जब उस नृपश्रेष्ठ (कल्माषपाद) ने उस ऋषि को मार्ग नहीं छोड़ा, तब मोह के वशीभूत होकर उन्होंने उस मुनि को कोड़े (कशा) से मार दिया। कोड़े के प्रहार से आहत हुए वे मुनिसत्तम वासिष्ठ (शक्ति) क्रोध से मूर्च्छित हो गए और उन्होंने उस नृपश्रेष्ठ को शाप दिया— 'हे राजापशद! चूँकि तुमने राक्षस की तरह एक तपस्वी पर प्रहार किया है, इसलिए आज से तुम नर-भक्षी (पुरुषाद) बन जाओगे! मनुष्य के मांस में आसक्त होकर तुम इस पृथ्वी पर विचरोगे। जाओ, हे राजाधर्म!'"
  • व्याख्या: अपमानित होकर शक्ति मुनि ने क्रोध में आकर राजा कल्माषपाद को नर-भक्षी राक्षस बनने का भयानक शाप दे दिया।

श्लोक 21, 22, 23 और 24:

ततो याज्यनिमित्तं तु विश्वामित्रवसिष्ठयोः। वैरमासीत्तदा तं तु विश्वामित्रोऽन्वपद्यत।। तयोर्विवदतोरेवं समीपमुपचक्रमे। ऋषिरुग्रतपाः पार्थ विश्वामित्रः प्रतापवान्।। ततः स बुबुधे पश्चात्तमृषिं नृपसत्तमः। ऋषेः पुत्रं वसिष्ठस्य वसिष्ठमिव तेजसा।। अन्तर्धाय ततोऽत्मानं विश्वामित्रोऽपि भारत। तावुभावतिचक्राम चिकीर्षन्नात्मनः प्रियम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तदनंतर याज्य (यज्ञ कराने) के निमित्त से विश्वामित्र और वसिष्ठ में जो वैर था, विश्वामित्र ने उसी का लाभ उठाया (और राजा को अपनी ओर मिला लिया)। जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, तभी उग्रतपस्वी और प्रतापी ऋषि विश्वामित्र वहाँ आ पहुँचे। तब नृपश्रेष्ठ (कल्माषपाद) को बाद में यह ज्ञान हुआ कि वे वसिष्ठ के पुत्र शक्ति हैं, जो तेज में स्वयं वसिष्ठ के समान ही हैं। हे भारत! विश्वामित्र ने तब अंतर्ध्यान (छिपा) होकर उन दोनों को लाँघ दिया, क्योंकि वे अपना स्वार्थ (प्रिय कार्य) सिद्ध करना चाहते थे।"
  • व्याख्या: विश्वामित्र इस मौके की ताक में थे। उन्होंने राजा और शक्ति मुनि के विवाद का फायदा उठाकर राजा को प्रभावित किया और अपना स्वार्थ सिद्ध करने की सोची।

श्लोक 25 से 36 (राक्षस 'किंकर' का प्रवेश और ब्राह्मण के अतिथि सत्कार का प्रसंग)

श्लोक 25, 26, 27 और 28:

स तु शप्तस्तदा तेन शक्तिना वै नृपोत्तमः। जगाम शरणं शक्तिं प्रसादयितुमर्हयन्।। तस्य भावं विदित्वा स नृपतेः कुरुसत्तम। विश्वामित्रोऽ रक्ष आदिदेश नृपं प्रति।। शापात्तस्य तु विप्रर्षेर्विश्वामित्रस्य चाज्ञया। राक्षसः किङ्करो नाम विवेश नृपतिं तदा।। रक्षसा तं गृहीतं तु विदित्वा मुनिसत्तमः। विश्वामित्रोऽप्यपाक्रामत्तस्माद्देशादरिन्दम।।

  • व्याख्या: शक्ति मुनि द्वारा शाप दिए जाने पर राजा कल्माषपाद क्षमा माँगने के लिए शक्ति मुनि की शरण में गए, किंतु विश्वामित्र ने षड्यंत्र रचकर 'किंकर' नाम के एक राक्षस को राजा के शरीर में प्रवेश करा दिया। जब राक्षस ने राजा को पूरी तरह अपने वश में कर लिया, तब विश्वामित्र वहाँ से चले गए।

श्लोक 29, 30, 31 और 32:

ततः स नृपतिर्विद्वान्रक्षन्नात्मानमात्मना। बलवत्पीड्यमानोऽपि रक्षसान्तर्गतेन ह।। ददर्शाथ द्विजः कश्चिद्राजानं प्रस्थितं वनम्। अयाचत क्षुधापन्नः समांसं भोजनं तदा।। तमुवाचाथ राजर्षिर्द्विजं मित्रसहस्तदा। आस्स्व ब्रह्मंस्त्वमत्रैव मुहूर्तं प्रतिपालयन्।। निवृत्तः प्रतिदास्यामि भोजनं ते यथेप्सितम्। इत्युक्त्वा प्रययौ राजा तस्थौ च द्विजसत्तमः।।

  • व्याख्या: राक्षस द्वारा भीतर से पीड़ित होने पर भी राजा अपनी बुद्धि से स्वयं की रक्षा करते हुए वन में रहे। एक दिन एक भूखा ब्राह्मण उनके पास आया और उसने मांसयुक्त भोजन की याचना की। राजा (जिन्हें मित्रसह भी कहते हैं) ने कहा कि वे थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, वे लौटकर मनचाहा भोजन देंगे।

श्लोक 33, 34, 35 और 36:

ततो राजा परिक्रम्य यथाकामं यथासुखम्। निवृत्तोऽन्तःपुरं पार्थ प्रविवेश महामनाः।। `अन्तर्गतस्तदा राजा श्रुत्वा ब्राह्मणभाषितम्। सोऽन्तःपुरं प्रविश्याथ न सस्मार नराधिपः।।' ततोऽर्धरात्र उत्थाय सूदमानाय्य सत्वरम्। उवाच राजा संस्मृत्य ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुतम्।। गच्छामुष्मिन्वनोद्देशे ब्राह्मणो मां प्रतीक्षते। अन्नार्थी तं त्वमन्नेन समांसेनोपपादय।।

  • व्याख्या: राजा महल में लौट गए, किंतु राक्षस के प्रभाव और मानसिक विक्षेप के कारण वे ब्राह्मण को दिए गए वचन को भूल गए। आधी रात को जब उन्हें अचानक याद आया, तो उन्होंने अपने रसोइये (सूद) को जगाकर आदेश दिया कि वन में प्रतीक्षा कर रहे ब्राह्मण को मांसयुक्त उत्तम भोजन पहुँचाया जाए।

श्लोक 37 से 44 (नरमांस का भोजन और ब्राह्मण का भयंकर शाप)

श्लोक 37, 38, 39 और 40:

गन्धर्व उवाच। एवमुक्तस्ततः सूदः सोऽनासाद्यामिषं क्वचित्। निवेदयामास तदा तस्मै राज्ञे व्यथान्वितः।। राजा तु रक्षसाविष्टः सूदमाह गतव्यथः। अप्येनं नरमांसेन भोजयेति पुनः पुनः।। तथेत्युक्त्वा ततः सूदः संस्थानं वध्यघातिनाम्। गत्वाऽऽजहार त्वरितो नरमांसमपेतभीः।। एतत्संस्कृत्य विधिवदन्नोपहितमाशु वै। तस्मै प्रादाद्ब्राह्मणाय क्षुधिताय तपस्विने।।

  • हिन्दी अनुवाद: गंधर्व ने कहा— राजा के ऐसा कहने पर रसोइये ने कहीं भी (सामान्य) आमिष (मांस) न पाकर व्यथित होकर राजा को सूचित किया। राक्षस से आविष्ट हुए राजा ने निर्भय होकर रसोइये से बार-बार कहा— "अरे, इस ब्राह्मण को नर-मांस (इंसान का मांस) ही भोजन के रूप में खिलाओ!" 'बहुत अच्छा' कहकर वह निडर रसोइया तुरंत अपराधियों को फाँसी देने या वध करने के स्थान (वधस्थान) पर गया और वहाँ से नर-मांस ले आया। उसे विधिपूर्वक संस्कृत (पकाकर) और अन्न के साथ मिलाकर उसने उस भूखे तपस्वी ब्राह्मण को परोस दिया।
  • व्याख्या: राक्षस के प्रभाव में आकर राजा ने अनजाने में नर-मांस का भोजन बनवाकर उस अतिथि ब्राह्मण को परोस दिया।

श्लोक 41, 42, 43 और 44:

स सिद्धचक्षुषा दृष्ट्वा तदन्नं द्विजसत्तमः। अभोज्यमिदमित्याह क्रोधपर्याकुलेक्षणः।। ब्राह्मण उवाच। यस्मादभोज्यमन्नं मे ददाति स नृपाधमः।। सक्तो मानुषमांसेषु यथोक्तः शक्तिना पुरा। उद्वेजनीयो भूतानां चरिष्यति महीमिमाम्।। गन्धर्व उवाच। द्विरनुव्याहृते राज्ञः स शापो बलवानभूत्। रक्षोबलसमाविष्टो विसंज्ञश्चाभवन्नृपः।।

  • हिन्दी अनुवाद: अपनी दिव्य दृष्टि (सिद्धचक्षु) से उस अन्न को देखकर क्रोध से लाल आँखों वाले उस द्विजश्रेष्ठ ने कहा— "यह अभोज्य अन्न है!" ब्राह्मण ने शाप दिया— "चूँकि उस नृपाधम ने मुझे ऐसा अभोज्य (नर-मांस का) अन्न दिया है, इसलिए वह शक्ति मुनि द्वारा पहले कहे गए शाप के अनुसार मनुष्य के मांस में आसक्त होकर भूत-प्रेतों की तरह इस पृथ्वी पर उद्वेग पैदा करता हुआ घूमेगा!" गंधर्व ने कहा— ब्राह्मण द्वारा ऐसा दो बार कहे जाने पर वह शाप और अधिक बलवान हो गया, और राक्षस के बल से पूरी तरह समाविष्ट होकर राजा अचेत (विसंज्ञ) हो गया।
  • व्याख्या: जब ब्राह्मण को पता चला कि उसे नर-मांस परोसा गया है, तो उसने क्रोधित होकर राजा को पुनः घोर राक्षस बनने का शाप दे दिया, जिससे राक्षस का प्रभाव राजा पर पूर्ण रूप से छा गया।

श्लोक 45 से 56 (शक्ति मुनि का वध, विश्वामित्र का कृत्य और वसिष्ठजी के आत्मत्याग के प्रयास)

श्लोक 45, 46, 47 और 48:

ततः स नृपतिश्रेष्ठः रक्षसापहृतेन्द्रियः। उवाच शख्तिं तं दृष्ट्वा न चिरादिव भारत।। यस्मादसदृशः शापः प्रयुक्तोऽयं मयि त्वया। तस्मात्त्वत्तः प्रवर्तिष्ये खादितुं पुरुषानहम्।। एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रयोज्य च। शक्तिं तं भक्षयामास व्याघ्रः पशुमिवेप्सितम्।। शक्तिनं तु मृतं दृष्ट्वा विश्वामित्रः पुनःपुनः। वसिष्ठस्यैव पुत्रेषु तद्रक्षः संदिदेश ह।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत! राक्षस द्वारा जिनकी इंद्रियाँ हर ली गई थीं, उन नृपतिश्रेष्ठ ने कुछ ही समय बाद शक्ति मुनि को सामने देखकर कहा— "चूँकि तुमने मुझ पर ऐसा अनुचित शाप प्रयुक्त किया है, इसलिए आज से मैं सबसे पहले तुमको ही खाऊँगा!" ऐसा कहकर उन्होंने तुरंत शक्ति मुनि के प्राण ले लिए और एक भूखे बाघ द्वारा पशु को खाने की भाँति उन्हें खा लिया। शक्ति को इस प्रकार मृत देखकर विश्वामित्र ने बार-बार उस राक्षस को वसिष्ठजी के बाकी पुत्रों को भी मारने की आज्ञा दे डाली।
  • व्याख्या: राक्षस बने राजा कल्माषपाद (मित्रसह) ने वसिष्ठजी के सबसे बड़े पुत्र शक्ति मुनि को मार कर खा लिया, और विश्वामित्र के इशारे पर राक्षस ने वसिष्ठजी के बाकी सभी पुत्रों को भी एक-एक करके मार डाला।

श्लोक 49, 50, 51, 52 और 53:

स ताञ्शक्त्यवरान्पुत्रान्वसिष्ठस्य महात्मनः। भक्षयामास संक्रुद्धः सिंहः क्षुद्रमृगानिव।। वसिष्ठो घातिताञ्श्रुत्वा विश्वामित्रेण Tान्सुतान्।धारयामास तं शोकं महाद्रिरिव मेदिनीम्।। चक्रे चात्मविनाशाय बुद्धिं स मुनिसत्तमः। न त्वेव कौशिकोच्छेदं मेने मतिमतां वरः।। स मेरुकूटादात्मानं मुमोच भगवानृषिः। गिरेस्तस्य शिलायां तु तूलराशाविवापतत्।। न ममार च पातेन स यदा तेन पाण्डव। तदाग्निमिद्धं भगवान्संविवेश महावने।।

  • हिन्दी अनुवाद: "उस क्रोधित राक्षस (राजा) ने शक्ति से छोटे वसिष्ठजी के उन अन्य सभी पुत्रों को ऐसे खा लिया जैसे सिंह छोटे मृगों को खा जाता है। विश्वामित्र द्वारा अपने सभी पुत्रों की हत्या की बात सुनकर महात्मा वसिष्ठ ने उस महान शोक को ऐसे धारण किया जैसे महान पर्वत पृथ्वी के भार को सहन करता है। बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उन मुनिसत्तम ने अपने आत्मनाश (आत्महत्या) की बुद्धि बना ली, किंतु उन्होंने कौशिक (विश्वामित्र) के कुल का उच्छेदन (विनाश) करने का विचार कभी नहीं किया। वे भगवान ऋषि सुमेरु पर्वत के शिखर से नीचे कूद पड़े, किंतु उस पर्वत की शिला पर गिरने पर भी वे ऐसे गिरे मानो रूई के ढेर पर गिरे हों (उन्हें खरोंच तक नहीं आई)। हे पाण्डव! जब वे उस पतन से भी नहीं मरे, तब महावन में प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर गए।"
  • व्याख्या: अपने सौ पुत्रों के एक साथ मारे जाने पर महर्षि वसिष्ठ को असीम दुःख हुआ। उन्होंने आत्महत्या करने के लिए सुमेरु पर्वत से छलाँग लगाई और अग्नि में प्रवेश किया, किंतु अपने ब्रह्मतेज और तपस्या के कारण वे अग्नि में भी नहीं जले।

श्लोक 54, 55 और 56:

तं तदा सुसमिद्धोऽपि न ददाह हुताशनः। दीप्यमानोऽप्यमित्रघ्न शीतोऽग्निरभवत्ततः।। स समुद्रमभिप्रेक्ष्य शोकाविष्टो महामुनिः। बद्ध्वा कण्ठे शिलां गुर्वीं निपपात तदाम्भसि।। स समुद्रोर्मिवेगेन स्थले न्यस्तो महामुनिः। न ममार यदा विप्रः कथंचित्संशितव्रतः। जगाम स ततः खिन्नः पुनरेवाश्रमं प्रति।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तब प्रज्वलित होने पर भी उस अग्नि ने शत्रुओं का नाश करने वाले उन ऋषि को नहीं जलाया, बल्कि वह अग्नि उनके लिए शीतल हो गई। तब शोकाविष्ट हुए महामुनि ने समुद्र को देखकर अपने कंठ में एक भारी शिला (पत्थर) बाँध ली और समुद्र के जल में कूद पड़े। किंतु समुद्र की लहरों के वेग ने उस महामुनि को वापस स्थल (किनारे) पर फेंक दिया। जब कठोर व्रत वाले वे विप्र किसी भी प्रकार से नहीं मरे, तब वे अत्यंत खिन्न (दुखी) होकर पुनः अपने आश्रम को लौट आए।"
  • व्याख्या: वसिष्ठजी ने पानी में डूबने का भी प्रयास किया, किंतु समुद्र की लहरों ने उन्हें सुरक्षित बाहर फेंक दिया। अंततः वे मृत्यु प्राप्त करने में असमर्थ होकर भारी मन से अपने आश्रम वापस लौट आए। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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