महाभारत् -०१ आदिपर्व -२११

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२११

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत वैवाहिकपर्व के 211वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में महर्षि वेद व्यास का आगमन, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, युधिष्ठिर और कुंती द्वारा अपने-अपने तर्क रखना, तथा व्यासजी द्वारा द्रौपदी के बहुपति विवाह को धर्मसम्मत सिद्ध करने का प्रसंग वर्णित है।

श्लोक 1 से 5 (महर्षि व्यास का आगमन और द्रुपद का प्रश्न)

श्लोक 1, 2, 3, 4 और 5:

वैशंपायन उवाच। ततस्ते पाण्डवाः सर्वे पाञ्चाल्यश्च महायशाः। प्रत्युथाय महात्मानं कृष्णं सर्वेऽभ्यवादयन्।। प्रतिनन्द्य स तां पूजां पृष्ट्वा कुशलमन्ततः। आसने काञ्चने शुद्धे निषसाद महामनाः।। अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनामिततेजसा। आसनेषु महार्हेषु निषेदुर्द्विपदां वराः।। ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः। पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यर्थं विशांपते।। कथमेका बहूनां स्यान्न च स्याद्धर्मसंकरः। एतन्मे भगवान्सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर महायशस्वी उन सभी पाण्डवों और पाञ्चालराज (द्रुपद) ने उठकर महात्मन कृष्ण (द्वैपायन व्यास) को प्रणाम किया। उस महामना ने उस पूजा को स्वीकार करके तथा सबका कुशल-क्षेम पूछकर शुद्ध स्वर्ण के आसन पर स्थान ग्रहण किया। अमिततेजस्वी कृष्ण (व्यासजी) द्वारा आज्ञा दिए जाने पर द्विपदों में श्रेष्ठ वे सभी वीर महार्ह (कीमती) आसनों पर बैठ गए। तदनंतर एक मुहूर्त के पश्चात पार्षत (द्रुपद) ने मधुर वाणी का उच्चारण करके उन महात्मा (व्यासजी) से द्रौपदी के विषय में पूछा— "हे विशांपते! एक ही स्त्री बहुत से पुरुषों की पत्नी कैसे हो सकती है और इससे धर्मसंकर (धर्म की संकरता या हनन) क्यों नहीं होगा? भगवान् आप मुझे यह सब यथातथ्य अच्छी तरह समझाकर कहें।"
  • व्याख्या: महर्षि व्यास के अचानक आ जाने से द्रुपद को अपनी इस दुविधा (एक स्त्री के पाँच पति होने के नियम) को सुलझाने का अवसर मिल जाता है। वे व्यासजी से आदरपूर्वक पूछते हैं कि यह कैसे संभव है कि एक पत्नी अनेक पतियों की हो और इससे धर्म का लोप न हो।

श्लोक 6 से 12 (व्यासजी का प्रश्न और द्रुपद तथा धृष्टद्युम्न की आपत्तियाँ)

श्लोक 6, 7, 8 और 9:

व्यास उवाच। अस्मिन्धर्मे विप्रलब्धे लोकवेदविरोधके। यस्य यस्य मतं यद्यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत्।। द्रुपद उवाच। अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः। न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम।। न चाप्याचरितः पूर्वैरयं धर्मो महात्मभिः। न चाप्यधर्मो विद्वद्भिश्चरितव्यः कथंचन।। ततोऽहं न करोम्येनं व्यवसायं क्रियां प्रति। धर्मः सदैव संदिग्धः प्रतिभाति हि मे त्वयम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: व्यासजी ने कहा— "लोक और वेद के विरुद्ध प्रतीत होने वाले इस विषय में आप सबका जो-जो मत हो, मैं वह सब सुनना चाहता हूँ।" द्रुपद ने कहा— "हे द्विजसत्तम! यह मेरी दृष्टि में लोक और वेद दोनों के विरुद्ध अधर्म है, क्योंकि एक पत्नी बहुत से पतियों की हो— ऐसा कहीं नहीं होता। महापुरुषों द्वारा पूर्वकाल में ऐसा आचरण भी नहीं किया गया है, और विद्वानों को कभी भी अधर्म का आचरण नहीं करना चाहिए। इसीलिए मैं इस विवाह की क्रिया के प्रति निश्चय नहीं कर पा रहा हूँ, क्योंकि यह धर्म मुझे सदैव से संदिग्ध प्रतीत हो रहा है।"
  • व्याख्या: व्यासजी के पूछने पर राजा द्रुपद स्पष्ट रूप से अपनी आपत्ति दर्ज कराते हैं कि उनके अनुसार यह लोक-व्यवहार और वेदों के विरुद्ध है, अतः वे इसे अधर्म मान रहे हैं।

श्लोक 10, 11 और 12:

धृष्टद्युम्न उवाच। यवीयसः कथं भार्यां ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ। ब्रह्मन्समभिवर्तेत सद्वृत्तः संस्तपोधन।। न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद्गतिं विद्मः कथंचन। अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो न शक्यते।। कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मंस्ततोऽयं न व्यवस्यते। पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन।।

  • Hirndi अनुवाद: धृष्टद्युम्न ने कहा— "हे द्विजर्षभ! हे ब्रह्मन्! हे तपोधन! सद्वृत्ति वाला जेठा भाई अपने छोटे भाई की पत्नी के साथ किस प्रकार संबंध रख सकता है? धर्म के सूक्ष्म होने के कारण हम उसकी गति को किसी प्रकार नहीं समझ पा रहे हैं, और 'यह अधर्म है या धर्म'— ऐसा निश्चय हम जैसे लोग करने में असमर्थ हैं। इसीलिए हे ब्रह्मन्! हम यह निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि कृष्णा पाँचों की महिषी (पत्नी) बने।"
  • व्याख्या: धृष्टद्युम्न भी अपनी दुविधा प्रकट करते हैं कि ज्येष्ठ भाई द्वारा छोटे भाई की पत्नी को स्वीकार करना नैतिकता और शिष्टाचार के विरुद्ध प्रतीत होता है, और वे इस सूक्ष्म धर्म को समझ नहीं पा रहे हैं।

श्लोक 13 से 18 (युधिष्ठिर और कुंती के तर्क)

श्लोक 13, 14, 15, 16 और 17:

युधिष्ठिर उवाच। न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः। वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथंचन।। श्रुते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी। ऋषीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वरा।। तथैव मुनिजा वार्क्षी तपोभिर्भावितात्मनः। संगताभूद्दश भ्रातॄनकेन्म्नः प्रचेतसः।। गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम। गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः।। सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद्भुज्यतामिति। तस्मादेतदहं मन्ये परं धर्मं द्विजोत्तम।।

  • हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर ने कहा— "मेरी वाणी कभी असत्य नहीं बोलती और न ही मेरी बुद्धि अधर्म में प्रवृत्त होती है। मेरा मन इस बात में पूरी तरह लगा है कि यह किसी भी प्रकार से अधर्म नहीं है। पुराणों में भी यह सुना जाता है कि धर्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ सात ऋषियों की पत्नी 'जटिला नाम की गौतमी' हुई थीं। इसी प्रकार प्रचेतस के दस पुत्रों (भाइयों) के साथ तपोभावितात्मा मुनिकन्या 'वार्क्षी' का भी विवाह हुआ था। धर्मज्ञसत्तम! गुरु का वचन हमेशा धर्मयुक्त होता है, और सभी गुरुओं में माता परम गुरु होती है। और माता ने ही यह वचन कहा था कि 'भिक्षा की तरह इसे आपस में मिलकर भोग करो।' इसलिए हे द्विजोत्तम! मैं इसी को परम धर्म मानता हूँ।"
  • व्याख्या: युधिष्ठिर अपने तर्कों के समर्थन में पौराणिक उदाहरण (जटिला और वार्क्षी का प्रसंग) देते हैं जहाँ एक स्त्री के कई पति होने का उल्लेख मिलता है, और साथ ही माता कुंती के आदेश को सर्वोच्च गुरु का आदेश मानकर इसे धर्मसंगत बताते हैं।

श्लोक 18:

कुन्त्युवाच। एतमेतद्यथा प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः। भुज्यतां भ्रातृभिः सार्धमित्यर्जुनमचोदयम्। अनृतान्मे भयं तीव्रं मुच्येऽहमनृतात्कथम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: कुंती ने कहा— "धर्मचारी युधिष्ठिर ने जैसा कहा है, यह बिल्कुल वैसा ही है। मैंने ही अर्जुन से कहा था कि 'सब भाइयों के साथ मिलकर इसका उपभोग करो।' मुझे असत्य (वचन टूटने) का तीव्र भय है, मैं इस असत्य के पाप से कैसे मुक्त होऊँगी?"
  • व्याख्या: माता कुंती भी आगे आकर स्पष्ट करती हैं कि यह स्थिति उनके द्वारा अनजाने में दिए गए आदेश के कारण उत्पन्न हुई है, और वे वचन की सत्यता बनाए रखने के लिए इस विवाह को उचित मानती हैं।

श्लोक 19 से 24 (व्यासजी का समाधान और एकांत में ले जाकर सत्य बताना)

श्लोक 19 और 20:

व्यास उवाच। अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैव सनातनः। ननु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम्।। यथाऽयं विहितो धर्मो यतश्चायं सनातनः। यथा च प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो न संशयः।।

  • Hirndi अनुवाद: व्यासजी ने कहा— "हे भद्रे! तुम असत्य (के पाप) से मुक्त हो जाओगी और यह सनातन धर्म ही है। हे पाँचाल (द्रुपद)! तुम स्वयं सुनो, मैं तुम सबको विस्तार से बताता हूँ कि किस प्रकार यह धर्म विहित है और क्यों यह सनातन है। कौंतेय (युधिष्ठिर) ने जो कुछ कहा है, वह शत-प्रतिशत धर्म है, इसमें कोई संशय नहीं है।"
  • व्याख्या: महर्षि व्यास कुंती को आश्वस्त करते हैं कि वे चिंता न करें, उनका वचन और यह विवाह पूरी तरह सनातन धर्म के अनुकूल है। इसके बाद वे द्रुपद और पांडवों को एकांत में इस रहस्य को समझाने के लिए ले जाते हैं।

श्लोक 21, 22, 23 और 24:

वैशंपायन उवाच। तत उत्थाय भगवान्व्यासो द्वैपायनः प्रभुः। करे गृहीत्वा राजानं राजवेश्म समाविशत्।। पाण्डवाश्चापि कुन्ती च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः। विविसुरस्तेऽपि तत्रैव प्रतीक्षन्ते स्म तावुभौ।। ततो द्वैपायनस्त्समै नरेन्द्राय महात्मने। आचख्यौ तद्यथा धर्मो बहूनामेकपत्निता।। `यथा च ते ददुश्चैव राजपुत्र्याः पुरा वरम्। धर्माद्यास्तपसा तुष्टाः पञ्चपत्नीत्वमीश्वराः।।'

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर प्रभु भगवान द्वैपायन व्यास उठे और राजा (द्रुपद) का हाथ पकड़कर राजमहल के भीतर चले गए। पाण्डव, कुंती और पार्षत धृष्टद्युम्न भी वहीं प्रवेश कर गए और उन दोनों (व्यासजी और द्रुपद) की प्रतीक्षा करने लगे। तदनंतर द्वैपायन व्यास ने उन महामना नरेन्द्र (द्रुपद) को वह रहस्य एकांत में समझाया कि किस प्रकार कई पतियों की एक पत्नी होना धर्मसम्मत है— (तथा यह भी बताया कि किस प्रकार पूर्वकाल में तपस्या से संतुष्ट हुए ईश्वर [शिव आदि] ने उन राजपुत्री को पाँच पतियों का वरदान दिया था)।
  • व्याख्या: महर्षि व्यास ने राजा द्रुपद को एकांत में ले जाकर इस अनोखे विवाह के पीछे का दिव्य रहस्य और पिछले जन्मों का वरदान विस्तार से समझाया, जिससे द्रुपद का सारा संशय हमेशा के लिए समाप्त हो गया।
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