महाभारत्-०१ आदिपर्व -२१२

महाभारत्-०१ आदिपर्व -२१२

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत वैवाहिकपर्व के 212वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में महर्षि वेद व्यास राजा द्रुपद का संशय दूर करने के लिए पूर्वकाल की घटनाओं और महर्षि मौद्गल्य तथा नालायनी के आख्यान का वर्णन करते हुए समझाते हैं कि द्रौपदी का पाँच पांडवों की पत्नी होना क्यों दैवीय और धर्मसम्मत है।

श्लोक 1 से 3 (व्यासजी द्वारा राजा द्रुपद का संशय दूर करना)

श्लोक 1, 2 और 3:

व्यास उवाच। मा भूद्राजंस्तव तापो मनस्थः पञ्चानां भार्या दुहिता ममेति। मातुरेषा प्रार्थिता स्यात्तदानीं पञ्चानां भार्या दुहिता ममेति।। याजोपयाजौ धर्मरतौ तपोभ्यां तौ चक्रतुः पञ्चपतित्वमस्याः। तत्पञ्चभिः पाण्डुसुतैरवाप्ता भार्या कृष्णा मोदतां वै कुलं ते।। लोके नान्यो विद्यते त्वद्विशिष्टः सर्वारीणामप्रधृष्योऽसि राजन्। भूयस्त्विदं शृणु मे त्वं विशोको यथाऽऽगतं पञ्चपत्नीत्वमस्याः।।

  • हिन्दी अनुवाद: व्यासजी ने कहा— "हे राजन्! तुम्हारे मन में यह संताप नहीं होना चाहिए कि 'मेरी पुत्री पाँचों की पत्नी कैसे होगी?' माता (कुंती) द्वारा पहले ही उस समय ऐसा प्रार्थना कर ली गई थी कि 'मेरी यह पुत्री पाँचों की भ्राताओं की पत्नी हो।' धर्मपरायण महर्षि याज और उपयाज ने अपनी तपस्या से इस (द्रौपदी) के लिए पाँच पतियों का होना (पूर्व में ही) निश्चित कर दिया था। इस प्रकार पाँचों पाण्डुपुत्रों द्वारा प्राप्त की गई यह कृष्णा (द्रौपदी) तुम्हारी पत्नी बनी है, अतः तुम्हारा कुल आनंदित हो! इस लोक में तुम्हारे समान विशिष्ट दूसरा कोई नहीं है, और हे राजन्! तुम समस्त शत्रुओं द्वारा अप्रधृष्य (अजेय) हो। अब तुम शोकमुक्त होकर मेरी इस बात को दोबारा सुनो कि इसके पाँच पतियों की पत्नी होने का यह क्रम किस प्रकार आया है।"
  • व्याख्या: व्यासजी द्रुपद को समझाते हैं कि यह कोई साधारण या अनिष्ट घटना नहीं है, बल्कि महर्षि याज और उपयाज की तपस्या तथा माता कुंती के वचनों के परिणामस्वरूप दैवयोग से यह निश्चित था। द्रुपद अपने कुल के गौरव और पांडवों की शक्ति को समझकर निश्चिंत हो जाएं।

श्लोक 4 से 10 (नालायनी और महर्षि मौद्गल्य का आख्यान)

श्लोक 4, 5 और 6:

एषा नालायनी पूर्वं मौद्गल्यं स्थविरं पतिम्। आराधयामास तदा कुष्ठिनं तमनिन्दिता।। त्वगस्थिभूतं कटुकं लोलमीर्ष्युं सुकोपनम्। सुगन्धेतरगन्धाढ्यं वलीपलितमूर्धजम्।। स्थविरं विकृताकारं शीर्यमाणनखत्वचम्। उच्छिष्टमुपभुञ्जाना पर्युपास्ते महामुनिम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "पूर्वकाल में यही अनन्दिता (नालायनी) नामक स्त्री थी, जिसने वृद्ध, कुष्ठरोगी, त्वचा और हड्डियों मात्र शेष रह गए, कटुभाषी, चंचल, ईर्ष्यालु, अति कोपी, दुर्गंधयुक्त, झुर्रियों और सफेद बालों वाले, विकृताकार तथा जिनके नाखून और त्वचा झड़ रहे थे, ऐसे वृद्ध पति महर्षि मौद्गल्य की आराधना की थी। वह महामुनि के भोजन का उच्छिष्ट (झूठा भाग) स्वयं खाती हुई उनकी सेवा करती थी।"
  • व्याख्या: व्यासजी पूर्व जन्म का इतिहास सुनाते हैं कि कैसे पूर्वकाल में नालायनी नाम की पवित्र स्त्री ने अपने अत्यंत वृद्ध और कुष्ठरोगी पति महर्षि मौद्गल्य की अत्यंत निष्ठा से सेवा की थी।

श्लोक 7 और 8:

ततः कदाचिदङ्गुष्ठो भुञ्जानस्य व्यशीर्यत। अन्नादुद्धृत्य tच्चान्नमुपभुङ्क्तेऽविशङ्किता।। तेन तस्याः प्रसन्नेन कामव्याहारिणा तदा। वरं वृणीष्वेत्यसकृदुक्ता वव्रे वरं तदा।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तदनंतर भोजन करते समय एक दिन उन मुनि का अँगूठा (भोजन में) गिरकर गल गया। उसने उस अँगूठे को अन्न से बाहर निकालकर बिना किसी संकोच के उस अन्न को स्वयं खा लिया। उससे प्रसन्न होकर और अपनी इच्छा के अनुसार वचन कहने वाले उन मुनि ने उससे बार-बार कहा कि 'तुम वर मांगो!' तब उसने एक वर वरण किया।"
  • व्याख्या: पतिव्रता नालायनी की निष्ठा इतनी अगाध थी कि उसने अपने पति के भोजन में गिरे हुए अंगूठे को भी बिना किसी घृणा के ग्रहण कर लिया। इससे प्रसन्न होकर महर्षि मौद्गल्य ने उसे वर मांगने को कहा।

श्लोक 9 और 10:

मौद्गल्य उवाच। नाहं वृद्धो न कटुको नेर्व्यावान्नैव कोपनः। न च दुर्गन्धवदनो न कृशो न च लोलुपः।। कथं त्वां रमयामीह कथं त्वां वासयाम्यहम्। वद कल्याणि भद्रं ते यथा त्वं मनसेच्छसि।।

  • हिन्दी अनुवाद: मौद्गल्य ने कहा— "मैं न तो वृद्ध हूँ, न कटुभाषी हूँ, न ईर्ष्यालु हूँ, न कोपी हूँ, न दुर्गंधयुक्त मुख वाला हूँ, न कृश हूँ और न ही लोलुप हूँ। अब मैं तुम्हें कैसे रमण कराऊँ और कैसे अपने साथ रखूँ? हे कल्याणि! तुम्हारा कल्याण हो, तुम अपने मन की इच्छा के अनुसार मुझे बताओ।"
  • व्याख्या: महर्षि मौद्गल्य अपनी योगशक्ति से सुंदर युवा रूप धारण करने में समर्थ थे, इसलिए वे नालायनी से पूछते हैं कि वह उनके किस रूप और इच्छा के साथ जीवन बिताना चाहती है।

श्लोक 11 से 19 (महर्षि मौद्गल्य का पाँच रूप धारण करना और क्रीड़ा)

श्लोक 11, 12 और 13:

व्यास उवाच। सा तमक्लिष्टकर्माणं वरदं सर्वकामदम्। भर्तारमनवद्याङ्गी प्रसन्नं प्रत्युवाच ह।। नालायन्युवाच। पञ्चधा प्रविभक्तात्मा भगवांल्लोकविश्रुतः। रमय त्वमचिन्त्यात्मन्पुनश्चैकत्वमागतः।। तां तथेत्यब्रवीद्धीमान्महर्षिर्वै महातपाः। स पञ्चधा तु भूत्वा तां रमयामास सर्वतः।।

  • हिन्दी अनुवाद: व्यासजी ने कहा— अक्लिष्टकर्मा, वरदाता और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले उन प्रसन्न पति को अनवद्याङ्गी (सुंदर अंगों वाली) नालायनी ने उत्तर दिया— "हे लोकविश्रुत, अचिन्त्यात्मन् भगवन्! आप अपने शरीर को पाँच भागों में विभाजित करके (पाँच रूप धारण करके) मुझसे रमण करें और पुनः एकरूप हो जाएँ।" महान तपस्वी और बुद्धिमान महर्षि ने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही किया। वे पाँच रूपों में प्रकट होकर सब प्रकार से उसके साथ रमण करने लगे।
  • व्याख्या: नालायनी की तीव्र इच्छा को पूर्ण करने के लिए महर्षि मौद्गल्य ने अपनी योगशक्ति से पाँच अलग-अलग रूप धारण किए और साथ ही एकरूप होकर भी उसके साथ रहे।

श्लोक 14, 15, 16, 17, 18 और 19:

नालायनीं सुकेशान्तां मौद्गल्यश्चारुहासिनीम्। आश्रमेष्वधिकं चापि पूज्यमानो महर्षिभिः।। स च यथाकामं कामरूपवपुः पुनः। यदा ययौ दिवं चापि तत्र देवर्षिभिः सह।। चचार सोऽमृताहारः सुरलोके चचार ह। पूज्यमानस्तथा शच्या शक्रस्य भवनेष्वपि।। महेन्द्रसेनया सार्धं पर्यधावद्रिरंसया। सूर्यस्य च रथं दिव्यमारुह्य भगवान्प्रभुः।। पर्युपेत्य पुनर्मेरु मेरौ वासमरोचयत्। आकाशगङ्गामाप्लुत्य तया सह तपोधनः।। रश्मिजालेषु चन्द्रस्य उवाच च यथाऽनिलः। गिरिरूपधरो योगी स महर्षिस्तदा पुनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: सुंदर केशों और सुंदर हँसी वाली नालायनी के साथ महर्षि मौद्गल्य महर्षियों द्वारा पूजित होते हुए विभिन्न आश्रमों में विहार करने लगे। इच्छा के अनुसार रूप बदलने वाले वे मौद्गल्य अपनी इच्छा से जब देवर्षियों के साथ स्वर्गलोक गए, तो वे अमृताहार करते हुए सुरलोक में विचरने लगे। शची तथा इंद्र के भवनों में भी वे पूजित हुए। महर्षि इंद्र की सेना के साथ विहार की इच्छा से दौड़े। भगवान प्रभु ने सूर्य के दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु पर्वत के पास जाकर वहाँ निवास करना पसंद किया। तपोधन महर्षि ने आकाशगंगा में स्नान करके उसके साथ विहार किया। चंद्रमा की किरणों के जालों में, वायु के समान स्वतंत्र रूप से विचरते हुए वे योगीयुक्त महर्षि पुनः पर्वत का रूप धारण करके आनंदित हुए।
  • व्याख्या: महर्षि मौद्गल्य ने अपने उस दिव्य शरीर और योगबल से नालायनी के साथ स्वर्ग, सुमेरु पर्वत और आकाशगंगा सहित विभिन्न लोकों में लंबे समय तक आनंदपूर्वक विहार किया।

श्लोक 20 से 28 (पूर्व जन्म के उस प्रसंग का द्रौपदी से संबंध और अध्याय का समापन)

श्लोक 20, 21, 22 और 23:

तत्प्रभावेन सा तस्य मध्ये जज्ञे महानदी। यदा पुष्पाकुलः सालः संजज्ञे भगवानृषिः।। लतात्वमनुसंपेदे तमेवाभ्यनुवेष्टती। पुपोष च वपुर्यस्य तस्य तस्यानुगं पुनः।। सा पुपोष समं भर्त्रा स्कन्धेनापि चचार ह। ततस्तस्य च तस्याश्च तुल्या प्रीतिरवर्धत।। तथा सा भगवांस्तस्याः प्रसादादृषिसत्तमः। विरराम च sa चैव दैवयोगेन भामिनी।।

  • हिन्दी अनुवाद: उनके प्रभाव से वह (नालायनी) एक महान नदी बन गई, और जब भगवान ऋषि फूलों से भरे हुए 'साल' वृक्ष बने, तब वह लता बनकर उन्हीं से लिपट गई। उसने अपने शरीर को उनके शरीर के अनुकूल बना लिया और पति के साथ पुष्ट होती हुई उनके कंधों पर भी विचरती रही। इस प्रकार उन दोनों की परस्पर प्रेम-प्रीति अत्यंत बढ़ गई। तदनंतर उन ऋषिसত্তম भगवान ने उस भामिनी के साथ (दीर्घकाल तक विहार करने के पश्चात) दैवयोग से उस क्रीड़ा से विराम लिया।
  • व्याख्या: योगबल और प्रकृति के विभिन्न रूपों (नदी, वृक्ष, लता आदि) में भी उन्होंने एक-दूसरे के प्रति असीम प्रेम और सामंजस्य का अनुभव किया।

श्लोक 24, 25, 26, 27 और 28:

स च तां तपसा देवीं रमयामास योगतः। एकपत्नी तथा भूत्वा सदैवाग्रे यशस्विनी।। अरुन्धतीव सीतेव बभूवातिपतिव्रता। दमयन्त्याश्च मातुः स विशेषमधिकं ययौ।। एतत्तथ्यं महाराज महाराज मा ते भूद्बुद्धिरन्यथा। सा वै नालायनी जज्ञे दैवयोगेन केनचित्।। राजंस्तवात्मजा कृष्णा वेद्यां तेजस्विनी शुभा। तस्मिंस्तस्या मनः सक्तं न चचाल कदाचन।। तथा प्रणिहितो ह्यात्मा तस्यास्तस्मिन्द्विजोत्तमे।।

  • हिन्दी अनुवाद: उन्होंने अपनी तपस्या और योगबल से उस देवी को (संतुष्ट करते हुए) रमण कराया। वह यशस्विनी स्त्री सदा ही एकपत्नी (पतिव्रता) के रूप में अग्रणी रही। वह अरुंधति और सीता की भाँति अतिशय पतिव्रता हुई, और दमयंती की माता (भीमराज की पत्नी) से भी बढ़कर उसकी ख्याति हुई। हे महाराज! यह बिल्कुल सत्य है, आपके मन में कोई दूसरी बुद्धि नहीं आनी वही नालायनी दैवयोग से किसी कारणवश (इस जन्म में) उत्पन्न हुई है। हे राजन्! यज्ञवेदी से उत्पन्न तुम्हारी यह तेजस्विनी और शुभ पुत्री कृष्णा ही वह है, जिसका मन उसी (दिव्य पति के रूप में पाँचों पांडवों) में आसक्त है और जो कभी विचलित नहीं हुआ। उसकी आत्मा पूरी तरह से उसी द्विजोत्तम (दिव्य विधान) में प्रणिहित (लीन) है।
  • व्याख्या: व्यासजी राजा द्रुपद को अंत में समझाते हैं कि वही पूर्वजन्म की पतिव्रता नालायनी दैवयोग से इस जन्म में द्रौपदी के रूप में प्रकट हुई है, और चूँकि उसने पूर्वजन्म में पाँच रूपों वाले पति की इच्छा की थी, अतः इस जन्म में भी उसका मन पाँचों पांडवों (जो एक ही परम पुरुष के अंश हैं) के प्रति ही पूरी तरह समर्पित है। इस प्रकार यह विवाह पूरी तरह धर्मसम्मत और दैवीय रूप से पूर्व-नियोजित है। इसी के साथ यह अध्याय पूर्ण होता है।
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