महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 232वें अध्याय (विदुरागमनराज्यलाभपर्व का अंतिम अध्याय) के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है।
इस अध्याय में तिलोत्तमा के कारण सुंद और उपसुंद का आपस में लड़कर विनाश होना, देवर्षि नारद द्वारा पांडवों को दी गई सीख और पांडवों द्वारा द्रौपदी से संबंधित नियम (समय-मर्यादा) तय करने का वर्णन है।
श्लोक 1 से 8 (असुरों का निश्चिंत जीवन और विंध्याचल में विहार)
श्लोक 1, 2, 3, 4 और 5:
नारद उवाच। जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ। कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ बभूवतुः।। देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम्। आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतौ।। यदा न प्रतिषेद्धारस्तयोः सन्तीह केचन। निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजह्रातेऽमराविव।। स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः। पानैश्च विविधैर्हद्यैः परां प्रीतिमवापतुः।। अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च। यथेप्सितेषु देशेषु विजह्रातेऽमराविव।।
- हिन्दी अनुवाद: नारद जी ने कहा— संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर, निष्कंटक होकर तथा निष्फिक्र होकर उन दोनों दैत्यों ने तीनों लोकों को अपने अधीन कर लिया और स्वयं को कृतकृत्य माना। देवताओं, गंधर्वों, यक्षों, नागों, राजाओं और राक्षसों के सभी श्रेष्ठ रत्नों को छीनकर वे दोनों परम संतुष्ट हुए। जब संसार में उनका कोई विरोध करने वाला न रहा, तब वे उद्योगहीन (निश्चिंत) होकर देवताओं की भाँति क्रीड़ा-विहार करने लगे। सुंदर स्त्रियों, मालाओं, सुगंधों, प्रचुर खाद्य-पेय पदार्थों और भाँति-भाँति के सुस्वादु मदिरा-पानों से वे परम आनंद को प्राप्त हुए। वे अंतःपुरों, वनों, उद्यानों और पर्वतों पर स्वेच्छा से विहार करने लगे।
- व्याख्या: संपूर्ण विश्व पर अधिपत्य जमाने के बाद सुंद और उपसुंद अपनी शक्ति के घमंड में चूर होकर विलासिता और भोग-विलास में डूब गए।
श्लोक 6, 7 और 8:
ततः कदाचिद्विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले। पुष्पिताग्रेषु सालेषु विहारमभिजग्मतुः।। दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ। वरासनेषु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निषीदतुः।। ततो वादित्रनृत्ताभ्यामुपातिष्ठन्त तौ स्त्रियः। गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे।।
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर एक बार वे दोनों विंध्याचल पर्वत की समतल शिला पर, जहाँ शाल के वृक्ष खिले हुए थे, विहार करने गए। वहाँ सभी दिव्य भोग-सामग्रियाँ लाई गईं और वे दोनों अत्यंत प्रसन्न होकर स्त्रियों के साथ श्रेष्ठ आसनों पर बैठ गए। तब स्त्रियाँ नृत्य, वाद्य और स्तुतियुक्त मधुर गीतों से उनकी सेवा करने लगीं।
- व्याख्या: विंध्याचल के सुरम्य वातावरण में दोनों भाई अपनी रानियों और कामुक सुंदरी नर्तकियों के साथ मदिरापान और मनोरंजन में मग्न थे।
श्लोक 9 से 15 (तिलोत्तमा का आगमन और दैत्यों का काम-मोहित होना)
श्लोक 9, 10, 11 और 12:
ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती। वेषं सा क्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा।। नदीतीरेषु जातान्सा कर्णिकारान्प्रचिन्वती। शनैर्जगाम तं देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ।। तौ तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ। दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ संबभूवतुः।। तावुत्थायासनं हित्वा जग्मतुर्यत्र सा स्थिता। उभौ च कामसंमत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम्।।
- हिन्दी अनुवाद: उसी समय तिलोत्तमा केवल एक लाल वस्त्र धारण किए हुए, उस वन में नदी के किनारे खिले कनेर (कर्णिकार) के फूलों को चुनती हुई धीरे-धीरे उसी स्थान की ओर बढ़ी जहाँ वे दोनों महासुर बैठे थे। वे दोनों मदिरा के नशे में लाल आँखों वाले थे। उस परमरूपवती सुंदरी को देखते ही दोनों का चित्त कामवासना से व्याकुल हो उठा। वे दोनों अपने आसनों को छोड़कर तुरंत उठे और जहाँ तिलोत्तमा खड़ी थी, वहाँ पहुँच गए। काम के वशीभूत होकर दोनों ही उसे पाने की इच्छा करने लगे।
- व्याख्या: ब्रह्माजी की योजनानुसार तिलोत्तमा ने अपनी अलौकिक सुंदरता और लाल वस्त्र के पारदर्शी आकर्षण से दोनों दैत्य भाइयों को पहली ही नज़र में कामांध कर दिया।
श्लोक 13, 14 और 15:
दक्षिणे तां करे सुभ्रूं सुन्दो जग्राह पाणिना। उपसुन्दोपि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम्।। वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च। धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च।। सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ। मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः।।
- हिन्दी अनुवाद: सुंद ने उस सुंदरी तिलोत्तमा का दायाँ हाथ पकड़ लिया और उपसुंद ने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया। वरदान के घमंड, अपने बाहुबल के मद, धन-रत्नों के अभिमान तथा मदिरा के नशे से अंधे हुए वे दोनों एक-दूसरे पर भृकुटी तानकर (क्रोध में आकर) काम और मदिरा के वेश में एक-दूसरे से कहने लगे।
- व्याख्या: अटूट प्रेम का दावा करने वाले दोनों भाइयों का विवेक कामवासना, अहंकार और मदिरा के नशे में पूरी तरह नष्ट हो गया और वे एक ही स्त्री पर अधिकार जमाने के लिए आमने-सामने आ गए।
श्लोक 16 से 20 (सुंद और उपसुंद का आपसी युद्ध और विनाश)
श्लोक 16, 17, 18, 19 और 20:
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत। मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत।। नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत्। तस्या रूपेण संमत्तौ विगतस्नेहसौहृदौ।। तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृह्णीतामुभौ तदा। प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ।। अहंपूर्वमहंपूर्वमियत्यन्योन्यं निजघ्नतुः। तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले।। रुधिरेणावसिक्ताङ्गौ द्वाविवार्कौ नभश्च्युतौ। ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा।।
- हिन्दी अनुवाद: सुंद ने कहा— "यह मेरी पत्नी है और तुम्हारी भाभी (गुरु) है!" उपसुंद ने कहा— "नहीं, यह मेरी पत्नी है और तुम्हारी पुत्रवधू है!" "यह तुम्हारी नहीं, मेरी है!" ऐसा कहते हुए दोनों में प्रचंड क्रोध भर आया। उस तिलोत्तमा के रूप से मत्त होकर उनका सारा भ्रातृ-स्नेह और सौहार्द समाप्त हो गया। उस स्त्री के कारण दोनों ने तुरंत अपनी भयानक गदाएँ उठा लीं। काममोहित होकर वे दोनों "मैं पहले मारूँगा, मैं पहले मारूँगा" कहते हुए एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। उन भीषण गदाओं के प्रहार से वे दोनों भयंकर दैत्य रक्त से लथपथ होकर आकाश से टूटे दो सूर्यों की भाँति धरती पर गिर पड़े और मर गए! यह देखकर वहाँ उपस्थित सभी स्त्रियाँ और दैत्यगण भयभीत होकर भाग खड़े हुए।
- व्याख्या: जिस वरदान के कारण उन्हें कोई देव या असुर नहीं मार सकता था, उसी वरदान का लाभ उठाकर तिलोत्तमा के कारण उत्पन्न ईर्ष्या ने उन दोनों भाइयों को एक-दूसरे का हत्यारा बना दिया। इस प्रकार एक स्त्री के प्रति कामांधता ने अजेय दैत्यों का समूल विनाश कर दिया।
श्लोक 21 से 27 (ब्रह्माजी द्वारा तिलोत्तमा को वरदान और नारद जी की पांडवों को सीख)
श्लोक 21, 22, 23, 24 और 25:
पातालमगमत्सर्वो विषादभयकम्पितः। ततः पितामहस्तत्र सहदेवैर्महर्षिभिः।। आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम्। वरेण च्छन्दयामास भगवान्प्रपितामहः।। वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः। आदित्यचरिताँल्लोकान्द्विचरिष्यसि भामिनि।। तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन। एवं तस्यै वरं दत्वा सर्वलोकपितामहः।। इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः।
- हिन्दी अनुवाद: शेष बचा दैत्यगण भय से काँपता हुआ पाताल लोक भाग गया। इसके बाद शुद्ध आत्मा वाले प्रपितामह ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियों के साथ वहाँ आए। उन्होंने तिलोत्तमा का पूजन किया और प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया— "हे भामिनि! तुम सूर्य जहाँ-जहाँ विचरण करते हैं, उन सभी लोकों में स्वेच्छा से घूमोगी। तुम्हारे तेज के कारण कोई भी तुम्हें बुरी दृष्टि से नहीं देख सकेगा।" सर्वलोक पितामह ब्रह्माजी उसे यह वरदान देकर और इंद्र को पुनः तीनों लोकों का राज्य सौंपकर ब्रह्मलोक लौट गए।
- व्याख्या: तिलोत्तमा के सफल कार्य से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे दिव्य स्वतंत्रता और संरक्षण का वर दिया तथा इंद्र को उनका खोया हुआ स्वर्ग वापस दिला दिया।
श्लोक 26 और 27:
एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ। तिलोत्तमा अर्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः।। तस्माद्ब्रवीमि वः स्नेहात्सर्वाभरतसत्तमाः। यथा वो नात्र भेदः स्यात्सर्वेषां द्रौपदीकृते। तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत्प्रियमिच्छथ।।
- हिन्दी अनुवाद: (नारद जी ने पांडवों से कहा—) "हे कुरुश्रेष्ठो! इस प्रकार वे दोनों सुंद और उपसुंद, जो सदैव एक साथ रहते थे और जिनका प्रत्येक कार्य में एक ही निश्चय होता था, तिलोत्तमा के कारण क्रुद्ध होकर एक-दूसरे को मार बैठे! इसलिए मैं स्नेहवश आप सबसे कहता हूँ कि द्रौपदी के कारण आप भाइयों के बीच कभी कोई भेद (फूट) न पड़े, ऐसा नियम बना लीजिए— यदि आप मेरा प्रिय चाहते हैं, तो इसमें आपका कल्याण होगा।"
- व्याख्या: नारद जी कथा के उद्देश्य का समापन करते हुए पांडवों को सावधान करते हैं कि एक ही स्त्री (द्रौपदी) का पति होने के नाते उनमें कभी ईर्ष्या या मनमुटाव न आए, इसके लिए नियम तय करना परम आवश्यक है।
श्लोक 28 से 33 (पांडवों द्वारा द्रौपदी से संबंधित नियम/समय-मर्यादा की स्थापना और पर्व समापन)
श्लोक 28, 29 और 30:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा। समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागताः। समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः।। `एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद्वर्षमकल्मषा' द्रौपद्या नः सहासीनानन्योन्यं योऽभिदर्शयेत्। स नो द्वादश मासानि ब्रह्मचारी वने वसेत्।। कृते तु समये तस्मिन्पाण्डवैर्धर्मचारिभिः। नारदोऽप्यगमत्प्रीत इष्टं देशं महामुनिः।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे राजन्! महर्षि नारद के ऐसा कहने पर उन महात्मा पांडवों ने उस अमित तेजस्वी देवर्षि नारद के सामने ही आपस में एक समय (नियम/अनुबंध) निर्धारित किया— "निष्पापा कृष्णा (द्रौपदी) एक-एक वर्ष तक एक-एक भाई के घर में निवास करेगी। यदि द्रौपदी के साथ एकांत में बैठे हुए किसी भाई को दूसरा भाई देख ले, तो देखने वाले भाई को बारह (12) महीने तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वन में निवास करना पड़ेगा।" धर्मचारी पांडवों द्वारा यह नियम तय किए जाने पर महामुनि नारद प्रसन्न होकर अपने अभीष्ट स्थान को चले गए।
- व्याख्या: पांडवों ने सर्वसम्मति से नियम बनाया कि द्रौपदी एक समय में एक ही भाई के साथ एक वर्ष रहेगी। यदि कोई भाई एकांत भंग करेगा, तो उसे 1 वर्ष के लिए कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए देश-निकाला (वनवास) भुगतना होगा।
श्लोक 31, 32 और 33:
एवं तैः समयः पूर्वं कृतो नारदचोदितैः। न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत।। अभ्यनन्दन्त ते सर्वे तदान्योन्यं च पाण्डवाः। एतद्विस्तरशः सर्वमाख्यातं ते नराधिप। काले च तस्मिन्संपन्ने यथावज्जनमेजय।।
- हिन्दी अनुवाद: हे भारत! इस प्रकार नारद जी की प्रेरणा से पांडवों ने पहले यह नियम बनाया और इसके बाद वे सभी कभी आपस में भेद (फूट) को प्राप्त नहीं हुए। वे सभी पांडव परस्पर एक-दूसरे के प्रति प्रसन्न रहते थे। हे नराधिप जनमेजय! उस समय घटित यह सारा इतिहास मैंने तुम्हें विस्तार से ज्यों-का-त्यों सुना दिया है।
- व्याख्या: इस नियम के कारण पांडवों में द्रौपदी को लेकर कभी कोई मनमुटाव नहीं हुआ और उनका भ्रातृ-प्रेम अखंड रहा।
इसी के साथ श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 'विदुरागमनराज्यलाभपर्व' (232वाँ अध्याय) पूर्ण रूप से समाप्त हुआ।
