महाभारत्-०१ आदिपर्व -२३१

महाभारत्-०१ आदिपर्व -२३१

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 231वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में सुंद और उपसुंद के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं और ऋषियों द्वारा ब्रह्माजी की शरण में जाना, ब्रह्माजी के आदेश पर विश्वकर्मा द्वारा परम सुंदरी तिलोत्तमा का सृजन करना, तथा तिलोत्तमा की मोहिनी सुंदरता से देवराज इंद्र और महादेव शिव तक के विचलित होने का अत्यंत रोचक वर्णन किया गया है।

श्लोक 1 से 9 (देवर्षियों और देवताओं का पितामह ब्रह्माजी की शरण में जाना)

श्लोक 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 और 9:

ततो देवर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः। जग्मुस्तदा परमार्तिं दृष्ट्वा तत्कदनं महत्।। तेऽभिजग्मुर्जितक्रोधा जितात्मानो जितेन्द्रियाः। पितामहस्य भवनं जगतः कृपया तदा।। ततो ददृशुरासीनं सह देवैः पितामहम्।सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव समन्तात्परिवारितम्।। तत्र देवो महादेवस्तत्राग्निर्वायुना सह। चन्द्रादित्यौ च शक्रश्च पारमेष्ठ्यास्तथर्षयः।। वैखानसा वालखिल्या वानप्रस्था मरीचिपाः। अजाश्चैवाविमूढाश्च तेजोगर्भास्तपस्विनः।। ऋषयः सर्व एवैते पितामहमुपागमन्। ततोऽभिगम्य ते दीनाः सर्व एव महर्षयः।। सुन्दोपसुन्दयौः कर्म सर्वमेव शशंसिरे। यथा हृतं यथा चैव कृतं येन क्रमेण च।। न्यवेदयंस्ततः सर्वमखिलेन पितामहे। ततो देवगणाः सर्वे ते चैव परमर्षयः। तमेवार्थं पुरस्कृत्य पितामहमचोदयन्।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदन्तर, सुंद और उपसुंद द्वारा किए गए उस भारी नरसंहार को देखकर सभी देवर्षि, सिद्ध और परमर्षि अत्यंत आर्त (दुःखी) हो गए। क्रोध को जीतने वाले, जितात्मा और जितेन्द्रिया वे सभी महर्षि जगत पर दया करके पितामह ब्रह्माजी के भवन में गए। वहाँ उन्होंने देखा कि पितामह ब्रह्माजी देवताओं, सिद्धों और ब्रह्मर्षियों से चारों ओर से घिरे हुए बैठे हैं। वहाँ देवों के देव महादेव (शिव), अग्नि, वायु, चंद्रमा, सूर्य, शक्र (इन्द्र) तथा अन्य पारमेष्ठ्य ऋषि उपस्थित थे। वैखानस, वालखिल्य, वानप्रस्थ, मरीचिप, अज, अविमूढ और तेज से परिपूर्ण अन्य सभी तपस्वी ऋषि— ये सब के सब पितामह के पास आए। तब उन सभी महर्षियों ने दीन भाव से पास जाकर सुंद और उपसुंद के द्वारा किए गए समस्त कुकर्मों का पूरा विवरण दिया कि किस प्रकार उन्होंने सब कुछ छीन लिया है और किस क्रम से अत्याचार किए हैं। उन सभी ने पितामह के सामने विस्तार से अपनी व्यथा निवेदन की। तब समस्त देवगणों और परमर्षियों ने उसी उद्देश्य को सामने रखकर पितामह ब्रह्माजी से उन दैत्यों के वध के लिए आग्रह (प्रेरित) किया।
  • व्याख्या: पृथ्वी पर सुंद और उपसुंद के अत्याचारों से जब त्राहि-त्राहि मच गई, तब भगवान शिव, इंद्र, अग्नि और तमाम ऋषि-मुनि ब्रह्माजी के पास पहुँचे और दैत्यों के आतंक की कहानी सुनाकर उनसे मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।

श्लोक 10 से 21 (ब्रह्माजी द्वारा विश्वकर्मा को तिलोत्तमा के सृजन का आदेश और उसका रूप)

श्लोक 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19 और 20:

ततः पितामहः श्रुत्वा सर्वेषां तद्वचस्तदा। मुहूर्तमिव संचिन्त्य कर्तव्यस्य च निश्चयम्।। तयोर्वधं समुद्दिश्य विश्वकर्माणमाह्वयत्। दृष्ट्वा च विश्वकर्माणं व्यादिदेश पितामहः।। सृज्यतां प्रार्थनीयैका प्रमदेति महातपाः। पितामहं नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च। निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तयित्वा पुनःपुनः।। त्रिषु लोकेषु यत्किंचिद्भूतं स्थावरजङ्गमम्। समानयद्दर्शनीयं तत्तदत्र स विश्ववित्।। कोटिशश्चैव रत्नानि तस्या गात्रे न्यवेशत्। तां रत्नसङ्घातमयीमसृजद्देवरूपिणीम्।। सा प्रयत्नेन महता निर्मिता विश्वकर्मणा। त्रिषु लोकेषु नारीणां रूपेणाप्रतिमाभवत्।। न तस्याः सूक्ष्ममप्यस्ति यद्गात्रे रूपसंपदा। नियुक्ता यत्र वा दृष्टिर्न सज्जति निरीक्षताम्।। सा विग्रहवतीव श्रीः कामरूपा वपुष्मती। पितामहमुपातिष्ठत्किं करोमीति चाब्रवीत्।। प्रीतो भूत्वा स दृष्ट्वैव प्रीत्या चास्यै वरं ददौ। कान्तत्वं सर्वभूतानां साश्रियानुत्तमं वपुः।। सा तेन वरदानेन कर्तुश्च क्रियया तदा। जहार सर्वभूतानां चक्षूंषि च मनांसि च।। तिलंतिलं समानीय रत्नानां यद्विनिर्मिता। तिलोत्तमेति तत्तस्या नाम चक्रे पितामहः।।

  • हिन्दी अनुवाद: तब पितामह ने उन सबका वह वचन सुनकर एक मुहूर्त तक विचार किया और कर्तव्य का निश्चय किया। उन दोनों (सुंद-उपसुंद) के वध के उद्देश्य से उन्होंने विश्वकर्मा को बुलाया। विश्वकर्मा को देखकर पितामह ने आदेश दिया— "हे महातपा! एक ऐसी अद्वितीय और प्रार्थनीय (मोहिनी) स्त्री का सृजन करो।" पितामह को नमस्कार कर और उनकी आज्ञा का अभिनंदन कर विश्वकर्मा ने बार-बार विचार करके एक दिव्य स्त्री का निर्माण किया। उस विश्ववित् (विश्वकर्मा) ने तीनों लोकों में जितने भी स्थावर और जंगम (चर-अचर) सुंदर पदार्थ थे, उन सबको एकत्रित किया। उसने उसके शरीर में करोड़ों रत्न लगाए और रत्नों के समूह से बनी हुई उस देवरूपिणी स्त्री को रचा। विश्वकर्मा द्वारा बड़े प्रयत्न से रची गई वह स्त्री तीनों लोकों में नारियों में रूप के मामले में अप्रतिम (अतुलनीय) हो गई। उसके शरीर में ऐसा कोई भी सूक्ष्म अंग नहीं था, जहाँ देखने वालों की दृष्टि अटक न जाए (यानी उसका हर अंग परियों जैसा सुंदर था)। वह कामरूपिणी, शरीरधारी साक्षात् भौतिक लक्ष्मी जैसी प्रतीत होती हुई पितामह के पास उपस्थित हुई और बोली— "मैं क्या करूँ?" उसे देखते ही प्रसन्न होकर पितामह ने उसे यह वर दिया— "तुम समस्त प्राणियों को अत्यंत प्रिय लगोगी और तुम्हारा यह उत्तम शरीर शोभा से युक्त होगा।" उस वरदान और निर्माता की रचना के प्रभाव से उसने सभी प्राणियों की आँखें और मन मोह लिए (चुरा लिए)। विश्वकर्मा ने संसार के हर एक सुंदर पदार्थ के 'तिल-तिल' (छोटे-छोटे कणों) को चुनकर उसे बनाया था, इसलिए पितामह ने उसका नाम 'तिलोत्तमा' रखा।
  • व्याख्या: ब्रह्माजी समझ गए कि सुंद और उपसुंद को केवल उनके आपसी मोह (एक ही स्त्री के प्रति खिंचाव) से ही लड़ाकर मारा जा सकता है। इसलिए उन्होंने शिल्पी विश्वकर्मा को ब्रह्मांड के हर सुंदर अंश और रत्नों से एक ऐसी परम सुंदरी स्त्री रचने को कहा, जिसके रूप पर देवता और दानव दोनों पागल हो जाएं। उसका नाम 'तिलोत्तमा' रखा गया।

श्लोक 21:

ब्रह्माणं सा नमस्कृत्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत्। किं कार्यं मयि भूतेश येनास्म्यद्येह निर्मिता।।

  • हिन्दी अनुवाद: दिव्य सुंदरी तिलोत्तमा ने ब्रह्माजी को नमस्कार करके हाथ जोड़कर (प्राञ्जलि होकर) यह वचन कहा— "हे भूतेश (ब्रह्मांड के स्वामी)! मुझ में ऐसा कौन-सा कार्य है, जिसके लिए आज आपने मेरा यहाँ सृजन किया है?"
  • व्याख्या: जब विश्वकर्मा द्वारा रची गई परम सुंदरी तिलोत्तमा साक्षात् प्रकट होकर पितामह ब्रह्माजी के सामने उपस्थित होती है, तब वह अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा के साथ पूछती है कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है और उसे कौन-सी विशेष जिम्मेदारी (टास्क) पूरी करनी है। यह श्लोक तिलोत्तमा के सृजन के तुरंत बाद उसकी आज्ञाकारिता और अपने कर्तव्य के प्रति जिज्ञासा को दर्शाता है।

श्लोक 22 से 23 (ब्रह्माजी द्वारा तिलोत्तमा को कार्यभार सौंपना)

श्लोक 22 और 23:

पितामह उवाच।
गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे।
प्रार्थनीयेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम्।।-22
त्वत्कृते दर्शादेव रूपसंपत्कृतेन वै।
विरोधः स्याद्यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु। 23

ब्रह्माजी बोले— "हे तिलोत्तमे! तुम सुंद और उपसुंद नामक दोनों असुरों के पास जाओ और अपने इस प्रार्थनीय (मनमोहक) रूप से उन्हें प्रलोभित करो। हे भद्रे! तुम ऐसा करो जिससे तुम्हारे उस दर्शनीय रूप-सौंपद के कारण उन दोनों भाइयों के बीच आपस में विरोध (लड़ाई) उत्पन्न हो जाए।"

  • व्याख्या: ब्रह्माजी तिलोत्तमा को दैत्यों के पास जाकर उनके बीच फूट और ईर्ष्या का बीज बोने का कूटनीतिक कार्य सौंपते हैं।

श्लोक 24 से 34 (तिलोत्तमा की प्रदक्षिणा और शिव-इंद्र समेत देवताओं का विचलित होना)

श्लोक 24, 25, 26, 27, 28, 29, 30, 31, 32, 33 और 34:

नारद उवाच। सा तथेति प्रतिज्ञाय नमस्कृत्य पितामहम्। चकार मण्डलं तत्र विबुधानां प्रदक्षिणम्।। प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः।देवाश्चैवोत्तरेणासन्सर्वतस्त्वृषयोऽभवन्।। कुर्वन्त्यां तु तदा तत्र मण्डलं तत्प्रदक्षिणम्। इन्द्रः स्थाणुश्च भगवान्धैर्येण तु परिच्युतौ।। द्रष्टुकामस्य चात्यर्थं गतायां पार्श्वतस्तथा। अन्यदञ्चितपद्माक्षं दक्षिणं निःसृतं मुखम्।। पृष्ठतः परिवर्तन्त्यां पश्चिमं निःसृतं मुखम्। गतायां चोत्तरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम्।। महेन्द्रस्यापि नेत्राणां पृष्ठतः पार्श्वतोग्रतः। रक्तान्तानां विशालानां सहस्रं सर्वतोऽभवत्।। एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत्पुरा। तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः।। तथा देवनिकायानां महर्षीणां च सर्वशः। मुखानि चाभ्यवर्तन्त येन याति तिलोत्तमा।। तस्या गात्रे निपतिता दृष्टिस्तेषां महात्मनाम्। सर्वेषामेव भूयिष्ठमृते देवं पितामहम्।। गच्छन्त्यां तु तया सर्वे देवाश्च परमर्षयः। कृतमित्येव तत्कार्यं मेनिरे रूपसंपदा।। तिलोत्तमायां तस्यां तु गतायां लोकभावनः। कृतं कार्यमिति श्रीमानब्रवीच्च पितामहः। सर्वान्विसर्जयामास देवानृषिगणांश्च तान्।।

  • हिन्दी अनुवाद: नारद जी ने कहा— "तिलोत्तमा ने 'बहुत अच्छा' कहकर प्रतिज्ञा की, पितामह को नमस्कार किया और वहाँ उपस्थित सभी देवताओं की परिक्रमा (प्रदक्षिणा) की। उस समय भगवान (ब्रह्माजी) पूरब की ओर मुख करके बैठे थे, दक्षिण में महेश्वर (शिव) थे, उत्तर में देवता थे और चारों तरफ ऋषिगण थे। जब वह उन सबकी परिक्रमा कर रही थी, तब इंद्र और भगवान स्थाणु (शिव) अपने धैर्य से च्युत हो गए (यानी वे भी उस पर मोहित हो गए)। जब तिलोत्तमा देखने की इच्छा से अत्यधिक पास होकर साइड से गुजरी, तो भगवान शिव का एक और दक्षिण दिशा की ओर सुंदर कमल के समान नेत्रों वाला मुख निकल आया (इस प्रकार शिवजी चतुर्मुख बन गए)। जब वह पीछे से घूमकर निकली, तो उनका पश्चिम दिशा की ओर मुख निकल आया। और जब वह उत्तर दिशा की ओर गई, तो उत्तर दिशा की ओर भी उनका मुख निकल आया! इसी प्रकार महाइन्द्र (इंद्र) के भी पीछे, बगल में और आगे चारों तरफ लाल किनारों वाले विशाल नेत्रों के सहस्रों (हजारों) नेत्र प्रकट हो गए! इस प्रकार प्राचीनकाल में महादेव स्थाणु चार मुख वाले (चतुर्मुख) हो गए और बलसूदन इंद्र सहस्रनेत्र (हजार आँखों वाले) हो गए। तथा अन्य सभी देव-निकायों और महर्षियों के मुख भी उसी दिशा में मुड़ गए जिधर-जिधर तिलोत्तमा जा रही थी! पितामह ब्रह्माजी को छोड़कर बाकी उन सभी महात्मना देवताओं और ऋषियों की दृष्टि उसके शरीर पर ही टिकी रह गई। उसके जाते समय सभी देवताओं और परमर्षियों ने उसके रूप-सौंदर्य को देखकर यह मान लिया कि हमारा यह कार्य (दैत्यों का नाश) सफल हो गया! उस तिलोत्तमा के चले जाने पर लोकभावन श्रीमान पितामह ब्रह्माजी ने कहा— 'कार्य सिद्ध हो गया!' और उन्होंने उन सभी देवताओं तथा ऋषिगणों को विदा कर दिया।"
  • व्याख्या: तिलोत्तमा के अलोकिक सौंदर्य का प्रभाव ऐसा था कि देवराज इंद्र और स्वयं देवाधिदेव महादेव शिव भी उसे देखने के लिए विचलित हो गए। शिवजी के चार मुख (चतुर्मुख) और इंद्र के शरीर पर हजार आँखें इसी घटना के कारण प्रकट हुईं, क्योंकि वे चारों तरफ से उस सुंदरी के सौंदर्य को देखना चाहते थे। यह देखकर सभी आश्वस्त हो गए कि ऐसी मोहिनी को देखकर सुंद और उपसुंद का आपस में लड़ना निश्चित है।

इसी के साथ 231वाँ अध्याय पूर्ण होता है।

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