महाभारत् -०१ आदिपर्व -२००

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२००

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत स्वयंवरपर्व के 200वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 7 (पांडवों का पांचाल प्रस्थान, वेदव्यास से भेंट और कुम्हार के घर निवास)

श्लोक 1, 2 और 3:

वैशंपायन उवाच। ततस्ते नरशार्दूला भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः। तं ब्राह्मणं पुरस्कृत्य पाञ्चाल्याश्च स्वयंवरम्। प्रययुर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम्।। ततस्ते तं महात्मानं शुद्धात्मानमकल्मषम्। ददृशुः पाण्डवा वीराः पथि द्वैपायनं तदा।। तस्मै यथावत्सत्कारं कृत्वा तेन च सत्कृताः। कथानते चाभ्यनुज्ञाताः प्रययुर्द्रुपदक्षयम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर नरश्रेष्ठ पाँचों पाण्डव भाइयों ने अपने उन ब्राह्मण पुरोहित (धौम्य) को आगे करके पाञ्चाली के स्वयंवर, द्रौपदी के दर्शन और उस देश के उस महान उत्सव के लिए प्रस्थान किया। मार्ग में उन वीर पाण्डवों ने महात्मा, शुद्ध आत्मा वाले और निष्पाप द्वैपायन (वेद व्यास) ऋषि के दर्शन किए। पाण्डवों ने उनका यथोचित सत्कार किया और व्यासजी द्वारा सत्कृत तथा अनुज्ञा प्राप्त करके वे द्रुपद के नगर (राजधानी) की ओर आगे बढ़ चले।
  • व्याख्या: पुरोहित धौम्य को साथ लेकर पांडव पांचाल देश के लिए चले। रास्ते में उन्हें महर्षि वेद व्यास मिले, जिनका आशीर्वाद और अनुमति लेकर वे आगे बढ़े।

श्लोक 4, 5, 6 और 7:

पश्यन्तो रमणीयानि वनानि च सरांसि च। तत्रतत्र वसन्तश्च शनैर्जग्मुर्महराथाः।। स्वाध्यायवन्तः शुचयो मधुराः प्रियवादिनः। आनुपूर्व्येण संप्राप्ताः पाञ्चालान्पाण्डुनन्दनाः।। ते तु दृष्ट्वा पुरं Tच्च स्कन्धावारं च पाण्डवाः। कुम्भकारस्य शालायां निवासं चक्रिरे तदा।। तत्र भैक्षं समाजह्रुर्ब्राह्मणीं वृत्तिमाश्रिताः। तान्संप्राप्तांस्तथा वीराञ्जज्ञिरे न नराः क्वचित्।।

  • हिन्दी अनुवाद: सुंदर वनों और सरोवरों को देखते हुए तथा जगह-जगह निवास करते हुए वे महारथी पाण्डव धीरे-धीरे आगे बढ़े। स्वाध्यायशील, पवित्र, मधुर और प्रिय बोलने वाले पाण्डुनंदन क्रमानुसार पाँचाल देश पहुँच गए। उस नगर और वहाँ के विशाल सैन्य शिविर (स्कन्धावार) को देखकर पाण्डवों ने उस समय एक कुम्हार की शाला (घर) में अपना निवास बनाया। ब्राह्मणों की वृत्ति (भिक्षा मांगकर जीवन जीने के नियम) का आश्रय लेते हुए वे वहीं से भिक्षा लाकर जीविका चलाने लगे। इस प्रकार वहाँ पहुँचे हुए उन वीरों को किसी भी नगरवासी ने नहीं पहचाना (वे अज्ञातवास के रूप में रहे)।
  • व्याख्या: पांडव पांचाल की राजधानी (काम्पिल्य) पहुँचकर अपनी पहचान छिपाने के लिए एक कुम्हार के घर ठहरे और ब्राह्मणों की तरह भिक्षा मांगकर समय बिताने लगे।

श्लोक 8 से 17 (राजा द्रुपद का उद्देश्य, धनुष और लक्ष्य का निर्माण)

श्लोक 8, 9, 10 और 11:

यज्ञसेनस्तु पाञ्चालो भीष्मद्रोमकृतागसम्। ज्ञात्वाऽऽत्मानं तदारेभे त्राणायात्मक्रियां क्षमां।। अवाप्य धृष्टद्युम्नं हि न स द्रोणमचिन्तयत्। स तु वैरप्रसङ्गाच्च भीष्माद्भयमचिन्तयत्।। कन्यादानात्तु शरणं सोऽमन्यत महीपतिः।' यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने।। दास्यामि कृष्णामिति वै न चैनं विवृणोति सः। जामातृबलसंयोगं मेने हि बलवत्तरम्।।'

  • हिन्दी अनुवाद: पाँचाल नरेश यज्ञसेन (द्रुपद) यह अच्छी तरह जानते थे कि उन्होंने भीष्म और द्रोणाचार्य के साथ अपराध किया है (वैर मोल लिया है)। इसलिए वे अपनी रक्षा के लिए उचित उपाय करने लगे थे। धृष्टद्युम्न को प्राप्त कर लेने पर भी वे द्रोण के प्रति चिंतामुक्त नहीं थे, और वैर के प्रसंग के कारण उन्हें भीष्म से भी भय बना रहता था। इसलिए उस महीपति ने कन्यादान (अर्जुन के साथ विवाह) को ही अपनी रक्षा का सबसे बड़ा शरण स्थल माना। यज्ञसेन की हार्दिक इच्छा यही थी कि अर्जुन (किरीटी) को कृष्णा (द्रौपदी) दूँ, किंतु वे इस बात को खुलकर प्रकट नहीं कर रहे थे, क्योंकि वे जामाता (दामाद) के रूप में अर्जुन के बल का सहयोग पाना सबसे शक्तिशाली साधन मानते थे।
  • व्याख्या: द्रुपद द्रोण और भीष्म से अपने बैर के कारण हमेशा चिंतित रहते थे। वे दिल से चाहते थे कि उनकी पुत्री द्रौपदी का विवाह अर्जुन से हो ताकि उन्हें पांडवों जैसा शक्तिशाली दामाद और सैन्य बल मिल सके।

श्लोक 12, 13, 14, 15 और 16:

सोऽन्वेषमाणः कौन्तेयान्पाञ्चालो जनमेजय। दृढं धनुरथानम्यं कारयामास भारत।। वैयाघ्रपद्यस्योग्रं वै सृञ्जयस्य महीपतिः। तद्धनुः किन्धुरं नाम देवदत्तमुपानयत्।। आयसी तस्य च ज्याऽऽसीत्प्रतिबद्धा महाबला। न तु ज्यां प्रसहेदन्यस्तद्धनुःप्रवरं महत्।। शङ्करेण वरं दत्तं प्रीतेन च महात्मना। तन्निष्फलं स्यान्न तु मे इति प्रामाण्यमागतः।। मया कर्तव्यमधुना दुष्करं लक्ष्यवेधनम्। इति निश्चित्य मनसा कारितं लक्ष्यमुत्तमम्।।'

  • हिन्दी अनुवाद: हे जनमेजय! कौंतेय (पांडवों) की खोज करते हुए पाँचाल नरेश द्रुपद ने एक अत्यंत दृढ़ और कठिनता से झुकाने योग्य धनुष का निर्माण करवाया। उन्होंने सृञ्जयवंशी (वैयाघ्रपद्य) का 'किन्धुर' नामक वह महान धनुष मँगाया, जो देवदत्त के समान था। उसकी प्रत्यंचा (ज्या) लोहे की महाबली डोरी से बँधी हुई थी, और उस श्रेष्ठ महान धनुष की प्रत्यंचा को कोई दूसरा साधारण मनुष्य खींचने में समर्थ नहीं हो सकता था। महात्मा भगवान शंकर द्वारा प्रीतिपूर्वक दिए गए वरदान के अनुसार वह व्यर्थ नहीं हो सकता था— इस बात को मानकर राजा ने सोचा कि "अब मुझे एक दुष्कर लक्ष्य-वेधन का कार्य करवाना चाहिए।" ऐसा मन मेंनिश्चय करके उन्होंने एक उत्तम लक्ष्य का निर्माण करवाया।
  • व्याख्या: द्रुपद ने एक ऐसा अत्यंत भारी और कड़ा धनुष तथा लोहे की प्रत्यंचा बनवाई, जिसे केवल अर्जुन (या कोई अत्यंत शक्तिशाली योद्धा ही) खींच सके, ताकि स्वयंवर के माध्यम से योग्यवर (विशेषकर अर्जुन) की परीक्षा ली जा सके।

श्लोक 17 और 18:

यन्त्रं वैहायसं चापि कारयामास कृत्रिमम्। तेन यन्त्रेण सहितं राजँल्लक्ष्यं च काञ्चनम्।। द्रुपद उवाच। इदं सज्यं धनुः कृत्वा सज्जैरेभिश्च सायकैः। अतीत्य लक्ष्य यो वेद्धा स लब्धा मत्सुतामिति।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! उन्होंने आकाश में घूमने वाला एक कृत्रिम यंत्र और उस यंत्र के साथ एक स्वर्णमय लक्ष्य भी बनवाया। राजा द्रुपद ने घोषणा की— "जो मनुष्य इस धनुष को प्रत्यंचा सहित करके और इन बाणों को सज्जित कर आकाश में घूमते हुए उस यंत्र के छिद्र से होते हुए लक्ष्य का वेधन करेगा, वही मेरी इस पुत्री को प्राप्त करेगा।"
  • व्याख्या: द्रुपद ने मत्स्य-यंत्र (आकाश में घूमते हुए यंत्र के ऊपर मछली या लक्ष्य) जैसी कठिन शर्त रखी— जो इस अत्यंत कठिन धनुष को चढ़ाकर परछाईं या यंत्र के छिद्र से ऊपर लक्ष्य को भेदेगा, द्रौपदी उसी को मिलेगी।

श्लोक 19 से 36 (स्वयंवर का आयोजन, राजाओं और ब्राह्मणों का एकत्र होना)

श्लोक 19, 20, 21, 22 और 23:

वैशंपायन उवाच। इति स द्रुपदो राजा स्वयंवरमघोषयत्। तच्छ्रुत्वा पार्थिवाः सर्वे समीयुस्तत्र भारत।। ऋषयश्च महात्मानः स्वयंवरदिदृक्षवः। दुर्योधनपुरोगाश्च सकर्णाः कुरवो नृप।। यादवा वासुदेवेन सार्धमन्धकवृष्णयः।' ततोऽर्चिता राजगुणा द्रुपदेन महात्मना।। उपोपविष्टा मञ्चेषु द्रष्टुकामाः स्वयंवरम्। ब्राह्मणाश्च महाभागा देशेभ्यः समुपागमन्।।' ब्राह्मणैरेव सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन्। त्रयस्त्रिंशत्सुराः सर्वे विमानैर्व्योम्न्यवस्थिताः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— राजा द्रुपद ने इस प्रकार स्वयंवर की घोषणा कर दी। हे भारत! उसे सुनकर सभी पृथ्वी के राजा वहाँ एकत्र हो गए। महात्मा ऋषिगण भी उस स्वयंवर को देखने की इच्छा से वहाँ आ पहुँचे। दुर्योधन आदि कुरुवंशी राजकुमार, कर्ण सहित कुरु लोग, तथा वासुदेव कृष्ण के साथ यदुवंशी, अंधक और वृष्णि वंशी वीर भी वहाँ पधारे। महात्मा द्रुपद द्वारा यथोचित सत्कार किए जाने पर वे सभी राजा स्वयंवर देखने की इच्छा से मञ्चों पर जा बैठे। विभिन्न देशों से महालक्षी ब्राह्मण भी वहाँ आए थे। उन्हीं ब्राह्मणों के साथ पाण्डव भी जाकर बैठ गए। (उधर आकाश में) तैंतीस प्रकार के देवता भी अपने विमानों में बैठकर इस अद्भुत स्वयंवर को देखने के लिए आकाश में स्थित हो गए।
  • व्याख्या: द्रुपद की घोषणा पर दुर्योधन, कर्ण, भगवान श्रीकृष्ण, यादवगण, बड़े-बड़े राजा और ऋषि-मुनि पांचाल की रंगभूमि में एकत्र हो गए। पांडव भी ब्राह्मणों के बीच साधारण वेश में जाकर बैठ गए।

श्लोक 24, 25, 26, 27, 28, 29, 30 और 31:

ततः पौरजनाः सर्वे सागरोद्धूतनिःस्वनाः। शिंशुमारशिरः प्राप्य न्यविशंस्ते स्म पार्थिवाः।। प्रागुत्तरेण नगराद्भूमिभागे समे शुभे। समाजवाटः शुशुभे भवनैः सर्वतो वृतः।। प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डितः। वितानेन विचित्रेण सर्वतः समलङ्कृतः।। तूर्यौघशतसङ्कीर्णः परार्ध्यागुरुधूपितः। चन्दनोदकसिक्तश्च माल्यदामोपशोभितः।। कैलासशिखरप्रख्यैर्नभस्तलविलेखिभिः। सर्वतः संवृतः शुभ्रैः प्रासादैः सुकृतोच्छ्रयै।। सुवर्णजालसंवीतैर्मणिकुट्टिमभूषणैः। सुखारोहणसोपानैर्महासनपरिच्छदैः।। स्रग्दामसमवच्छन्नैरगुरूत्तमवासितैः।।

  • हिन्दी अनुवाद: समुद्र के समान गंभीर ध्वनि करने वाले नगर के सभी लोग और राजा लोग वहाँ एकत्र हो गए। नगर के उत्तर-पूर्व दिशा में एक समतल और शुभ भूमि पर स्वयंवर की वह रंगभूमि (समाजवाट) चारों तरफ से भवनों से घिरी हुई बहुत सुंदर लग रही थी। वह प्राकार (चारदीवारी) और परिखा (खाई) से युक्त थी, द्वार और तोरण मंडपों से सुसज्जित थी, तथा भाँति-भाँति की विचित्र चंदवाओं (वितानों) से अलंकृत थी। सैकड़ों प्रकार के वाद्यों की ध्वनि से गूँजती हुई वह भूमि सर्वोत्तम अगरु के धूप से सुगंधित, चंदन के जल से सिंचित और फूलों की मालाओं से शोभित थी। कैलाश पर्वत के शिखरों के समान सफेद और आकाश को छूने वाले ऊँचे-ऊँचे सुंदर प्रसाद (भवन) उसके चारों तरफ बने हुए थे। वे स्वर्ण के जालों से ढँके हुए, मणियों के फर्श से भूषित, आसानी से चढ़ने योग्य सीढ़ियों और महासिंहासनों से सुसज्जित थे। वे भवन फूलों की मालाओं से ढँके हुए और सर्वोत्तम अगरु की सुगंध से महक रहे थे।
  • व्याख्या: पांचाल नगर के बाहर उत्तर-पूर्व दिशा में एक अत्यंत भव्य, विशाल और सभी सुख-सुविधाओं से युक्त रंगभूमि और स्वयंवर मंडप का निर्माण किया गया था, जहाँ देश-विदेश के राजा और दर्शक बैठे थे।

श्लोक 32, 33, 34, 35 और 36:

तत्र नानाप्रकारेषु विमानेषु स्वलङ्कृताः। स्पर्धमानास्तदाऽन्योन्यं निषेदुः सर्वपार्थिवाः।। तत्रोपविष्टान्ददृशुर्महासत्वान्पृथग्जनाः। राजसिंहान्महाभागान्कृष्णागुरुविभूषितान्।। महाप्रसादान्ब्राह्मण्यान्स्वराष्ट्रपरिरक्षिणः। प्रियान्सर्वस्य लोकस्य सुकृतैः कर्मभिः शुभैः।। मञ्चेषु च परार्द्ध्येषु पौरजानपदा जनाः। कृष्णादर्शनसिद्ध्यर्थं सर्वतः समुपाविशन्।। ब्राह्मणैरेव सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन्। ऋद्धिं पञ्चालराजस्य पश्यन्तस्तामनुत्तमाम।।

  • हिन्दी अनुवाद: वहाँ अनेक प्रकार के सुंदर और अलंकृत आसनों (विमानों) पर आपस में स्पर्धा करते हुए सभी पृथ्वी के राजा बैठ गए। साधारण जन वहाँ बैठे हुए महाबली, राजसिंहों जैसे तेजस्वी, महाभाग तथा कृष्णागरु से विभूषित उन सभी राजाओं को देख रहे थे। वे राजा बड़े महलों के स्वामी, ब्राह्मणों के हितैषी, अपने राष्ट्र की रक्षा करने वाले और अपने शुभ कर्मों से संपूर्ण लोक के प्रिय थे। पौर और जनपद के लोग कृष्णा (द्रौपदी) के दर्शन की सिद्धि के लिए सर्वोत्तम मञ्चों पर चारों तरफ बैठ गए। और ब्राह्मणों के ही साथ पाण्डव भी पाँचालराज की उस अनुत्तम ऋद्धि (वैभव) को देखते हुए वहीं बैठ गए।
  • व्याख्या: सभी राजा और राजकुमार अपनी-अपनी श्रेष्ठता दिखाते हुए मञ्चों पर बैठे, जबकि पांडव चुपचाप साधारण ब्राह्मणों के साथ बैठकर इस भव्य आयोजन को देख रहे थे।

श्लोक 37 से 47 (सोलहवें दिन स्वयंवर का आरंभ और द्रौपदी का श्रृंगार)

श्लोक 37, 38, 39 और 40:

ततः समाजो ववृधे स राजन्दिवसान्बहून्। रत्नप्रदानबहुलः शोभितो नटनर्तकैः।। वर्तमाने समाजे तु रमणीयेऽह्नि षोडशे। `मैत्रे मुहूर्ते तस्याश्च राजदाराः पुराविदः। पुत्रवत्यः सुवसनाः प्रतिकर्मोपचक्र무ः।।' वैडूर्यमयपीठे तु निविष्टां द्रौपदीं तदा। सतूर्यं स्नापयाञ्चक्रुः स्वर्णकुम्भस्थितैर्जलैः।। तां निवृत्ताभिषेकां च दुकूलद्वयधारिणीम्। निन्युर्मणिस्तम्भवतीं वेदिं वै सुपरिष्कृताम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! रत्नदान से परिपूर्ण तथा नटों और नर्तकों से शोभित वह समाज (उत्सव) कई दिनों तक बढ़ता रहा। इस प्रकार जब वह उत्सव चल रहा था, तब सोलहवें दिन के रमणीय अवसर पर— मैत्र मुहूर्त में, इतिहास और परंपरा को जानने वाली, पुत्रवती और सुंदर वस्त्रों से युक्त राजधानियों की स्त्रियों (राजकुमारियों) ने द्रौपदी का श्रृंगार करना आरंभ किया। उस समय वैडूर्य मणि के बने आसन पर बैठी हुई द्रौपदी को उन्होंने वाद्यों की ध्वनि के साथ स्वर्ण के घड़ों में रखे जल से स्नान कराया। स्नान के पश्चात दो उत्तम दुकूल (रेशमी वस्त्र) धारण किए हुई उस राजकुमारी को वे मणियों के खंभों वाली अत्यंत सुंदर सजाई गई वेदी की ओर ले गईं।
  • व्याख्या: स्वयंवर के सोलहवें दिन द्रौपदी का भव्य श्रृंगार करने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें स्वर्ण कलशों के जल से स्नान कराकर रेशमी वस्त्र पहनाए गए और वेदी पर लाया गया।

श्लोक 41, 42, 43, 44, 45, 46 और 47:

निवेश्य प्राङ्मुखीं हृष्टां विस्मिताक्ष्यः प्रसाधिकाः। केनालङ्करणेनेमामित्यन्योन्यं व्यलोकयन्।। धूपोष्मणा च केशानामार्द्रभावं व्यपोहयन्। बबन्धुरस्या धम्मिल्लं माल्यैः सुरभिगन्धिभिः।। दूर्वामधूकरचितं माल्यं तस्या ददुः करे। चक्रुश्च कृष्णागरुणा पत्रसङ्गं कुचद्वये।। रेजे सा चक्रवाकाङ्का स्वर्णदीर्घा सरिद्वरा। अलकैः कुटिलैस्तस्या मुखं विकसितं बभौ।। आसक्तभृङ्गं कुसुमं शशिम्बिम्बं जिगाय तत्। कालाञ्जनं नयनयोराचारार्थं समादधुः।। भूषणं रत्नखचितैरलंचक्रुर्यथोचितम्। माता च तस्याः पृषती हरितालमनश्शिलाम्।। अङ्गुलीभ्यामुपादाय तिलकं विदधे मुखे। अलङ्कृतां वधूं दृष्ट्वा योषितो मुदमाययुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: पूर्व मुख करके बैठी हुई उस हर्षित द्रौपदी को देखकर प्रसाधिकाएँ (श्रृंगार करने वाली स्त्रियाँ) विस्मित नेत्रों से आपस में देखने लगीं कि "इसे किस आभूषण से सजाएँ?" धूप की गर्मी से उसके केशों के आर्द्र (गीले) पन को दूर करके उन्होंने सुगंधित फूलों की मालाओं से उसका जोड़ा (धम्मिल्ल) सँवारा। उसके हाथ में दूर्वा और पुष्पों से रचित एक माला दी। उनके दोनों स्तनों पर कृष्णागरु से पत्ररचना (विशेष लेप/चित्रकारी) की गई। उस समय चक्रवाक पक्षियों से युक्त स्वर्णमयी लंबी नदी के समान वह अत्यंत शोभित हो रही थी। उसके घुंघराले बालों से उसका खिला हुआ मुख और भी सुंदर लग रहा था। भौंरों से घिरे हुए उस पुष्प (की शोभा) ने चंद्रमा के बिम्ब को भी जीत लिया था। उसकी आँखों में काजल लगाया गया, और रत्नजड़ित आभूषणों से यथोचित उसका श्रृंगार किया गया। उसकी माता पृषती ने हरिताल और मनःशिला को अपनी उंगलियों से लेकर उसके मुख पर तिलक लगाया। उस अलंकृत वधू को देखकर सभी स्त्रियाँ अत्यंत प्रसन्न हुईं।
  • व्याख्या: राजसी रीति-रिवाज से द्रौपदी का अत्यंत मनमोहक श्रृंगार किया गया, जिससे उनका रूप अलौकिक लग रहा था।

श्लोक 48 से 57 (द्रौपदी का रंगभूमि में प्रवेश और स्वयंवर की घोषणा)

श्लोक 48, 49, 50, 51, 52 और 53:

माता न मुमुदे तस्याः पतिः कीदृग्भविष्यति। सौविदल्लाः समागम्य द्रुपदस्याज्ञया ततः।। एनामारोपयामासुः करिणीं कुचभूषिताम्। ततोऽवाद्यन्त वाद्यानि मङ्गलानि दिवि स्पृशन्।। विलासिनीजनाश्चापि प्रवरं करिणीशतम्। माङ्गल्यगीतं गायन्त्यः पार्स्वयोरुभयोर्ययुः।। जनापसरणे व्यग्राः प्रतिहार्यः पुरा ययुः। कोलाहलो महानासीत्तस्मिन्पुरवरे तदा।। धृष्टद्युम्नो ययावग्रे हयमारुह्य भारत। द्रुपदो रङ्गदेशे तु बलेन महता युतः।। तस्थौ व्यूह्य महानीकं पालितं दृढधन्विभिः।'

  • हिन्दी अनुवाद: किंतु उनकी माता (पृषती) इस बात को लेकर पूरी तरह प्रसन्न नहीं थीं कि "न जाने इनका पति कैसा होगा!" तब द्रुपद की आज्ञा से सौविदल्ल (द्वारपाल/कर्मचारी) वहाँ आए और उन्होंने उस आभूषणों से भूषित द्रौपदी को एक हथिनी (करिणी) पर आरूढ़ कराया। तब आकाश को स्पर्श करने वाले मंगल वाद्य बजने लगे। विलासिनी स्त्रियाँ और सैकड़ों श्रेष्ठ हथिनियाँ मंगल गीत गाती हुई उनके दोनों ओर चलने लगीं। जनता को हटाने में व्यस्त प्रतिहारी (दरबारी) लोग आगे-आगे चल रहे थे। उस समय उस उत्तम नगर में महान कोलाहल हो रहा था। हे भारत! धृष्टद्युम्न आगे-आगे घोड़े पर सवार होकर चले, और राजा द्रुपद अपनी भारी सेना के साथ रंगभूमि में पहुँचे। उन्होंने दृढधनुर्धरों द्वारा रक्षित अपनी विशाल सेना को व्यूह बनाकर खड़ा किया।
  • व्याख्या: यद्यपि द्रौपदी की माता को थोड़ी चिंता थी कि उनकी पुत्री का वर कौन बनेगा, तथापि राजकीय वैभव और मंगल ध्वनि के साथ द्रौपदी को हाथी पर बिठाकर रंगभूमि की ओर लाया गया, जहाँ धृष्टद्युम्न और द्रुपद ने पूरी सुरक्षा व्यवस्था संभाल रखी थी।

श्लोक 54, 55, 56 और 57:

आप्लुताङ्गीं सुवसनां सर्वाभरणभूषिताम्।। मालां च समुपादाय काञ्चनीं समलङ्कृताम्। आगतां ददृशुः सर्वे रङ्गभूमिमलङ्कृताम्।।' अवतीर्णा ततो रङ्गं द्रौपदी भरतर्षभ। तस्थौ प्रमुदितान्सर्वान्नृपतीन्रङ्गमण्डले। प्रेक्षन्ती व्रीडितापाङ्गी द्रष्टृणां सुमनोहरा।।' पुरोहितः सोमकानां मन्त्रविद्ब्राह्मणः शुचिः। परिस्तीर्य जुहावाग्निमाज्येन विधिवत्तदा।। संतर्पयित्वा ज्वलनं ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च। वारयामास सर्वाणि वादित्राणि समन्ततः।।

  • हिन्दी अनुवाद: स्नान किए हुए शरीर वाली, सुंदर वस्त्रों और समस्त आभूषणों से भूषित तथा हाथ में सुवर्ण की अलंकृत माला लिए हुए उस कन्या को सबने रंगभूमि में आते हुए देखा। हे भरतर्षभ! तब द्रौपदी रंगभूमि में उतरीं और लज्जा से झुकी हुई पलकों तथा अपने सौंदर्य से दर्शकों का मन मोहती हुई उस रंगमंडल में सभी प्रमुदित राजाओं को देखने लगीं। सोमवंशियों के पुरोहित, मंत्रज्ञ और पवित्र ब्राह्मण (धौम्यजी) ने वेदी के चारों ओर कुशा बिछाकर विधिपूर्वक अग्नि में घी की आहुति दी। अग्नि को तृप्त करके और ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर उन्होंने चारों तरफ बज रहे सभी वाद्यों को शांत (बंद) करवा दिया।
  • व्याख्या: हाथ में स्वर्णमाला लिए द्रौपदी रंगभूमि में पहुँचीं। तब पुरोहित ने मंगल यज्ञ और अग्नि-पूजन संपन्न कराया तथा रंगभूमि में पूर्ण शांति स्थापित करने के लिए वाद्यों को बंद करवाया।

श्लोक 58 से 62 (धृष्टद्युम्न द्वारा लक्ष्य और शर्त की घोषणा तथा अध्याय का समापन)

श्लोक 58, 59, 60, 61 और 62:

निःशब्दे तु कृते तस्मिन्धृष्टद्युम्नो विशांपते। कृष्णामादाय विधिवन्मेघदुन्दुभिनिःस्वनः।। रङ्गमध्यं गतस्तत्र मेघगम्भीरया गिरा। वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदत्तमम्।। इदं धनुर्लक्ष्यमिमे च बाणाः शृण्वन्तु मे भूपतयः समेताः। छिद्रयेण यन्त्रस्य मसर्पयध्वं शरैः शितैर्व्योमचरैर्दशार्धैः।। एतन्महत्कर्म करोति यो वै कुलेन रूपेण बलेन युक्तः। तस्याद्य भार्या भगिनी ममेयं कृष्णा भवित्री न मृषा ब्रवीमि।। तानेवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रः पश्चादिदं तां भगिनीमुवाच। नाम्ना च गोत्रेण च कर्मणा च संकीर्तयन्भूमिपतीन्समेतान्।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे विशांपते! जब रंगभूमि में पूरी तरह शांति हो गई, तब मेघ के समान दुन्दुभि की सी गंभीर आवाज वाले धृष्टद्युम्न ने विधिपूर्वक कृष्णा (द्रौपदी) को साथ लिया और वे रंगमध्य में गए। वहाँ उन्होंने मेघ के समान गंभीर वाणी में यह उत्तम, कोमल और अर्थपूर्ण वचन ऊँचे स्वर में कहा— "हे एकत्र हुए भूपतियों! यह धनुष है, यह लक्ष्य है और ये बाण हैं। आप सब इसे सुनिए— आकाश में विचरने वाले इन पाँच तीखे बाणों से यंत्र के छिद्र को पार करते हुए इस लक्ष्य का वेधन करना है। जो कोई भी कुल, रूप और बल से युक्त होकर यह महान कार्य करेगा, आज मेरी यह बहन कृष्णा उसी की पत्नी बनेगी, मैं यह सत्य कह रहा हूँ, झूठ नहीं बोल रहा हूँ।" ऐसा कहकर द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने इसके बाद रंगभूमि में एकत्र हुए सभी भूमिपतियों के नाम, गोत्र और कर्मों का संकीर्तन करते हुए अपनी उस बहन (द्रौपदी) से उनका परिचय कराना शुरू किया।
  • व्याख्या: जब रंगभूमि शांत हुई, तब द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने खड़े होकर सभी राजाओं को स्वयंवर की कठोर शर्त (धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर यंत्र के छिद्र से पांच तीखे बाणों द्वारा लक्ष्य वेधना) सुनाई और घोषणा की कि जो यह पराक्रम दिखाएगा, द्रौपदी उसी की वधू बनेगी। इसके बाद वे राजाओं का परिचय देने लगे। इसी के साथ स्वयंवरपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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