महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 199वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। यह चैत्ररथपर्व का अंतिम अध्याय है।
श्लोक 1 से 7 (अर्जुन का पुरोहित के विषय में पूछना, अस्त्र-विद्या का विनिमय और प्रस्थान)
श्लोक 1 और 2:
अर्जुन उवाच। अस्माकमनुरूपो वै Yः स्याद्गन्धर्व वेदवित्। पुरोहितस्तमाचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव।। गन्धर्व उवाच। यवीयान्देवलस्यैष वने भ्राता तपस्यति। धौम्य उत्कोचके तीर्थे तं वृणुध्वं यदीच्छथ।।
- हिन्दी अनुवाद: अर्जुन बोले— "हे गंधर्व! हमारे अनुकूल जो वेदज्ञ हो, ऐसे किसी पुरोहित के विषय में आप हमें बताइए, क्योंकि आपको सब कुछ ज्ञात है।" गंधर्व (चित्ररथ) ने कहा— "देवर्षि देवल के छोटे भाई धौम्यजी उत्कोचक तीर्थ के समीप वन में तपस्या कर रहे हैं। यदि तुम चाहो, तो उन्हीं को अपना पुरोहित वरण करो।"
- व्याख्या: गंधर्व के उपदेश के अनुसार कि राजा को हमेशा योग्य पुरोहित साथ रखना चाहिए, अर्जुन चित्ररथ से उनके अनुकूल किसी ज्ञानी पुरोहित का नाम पूछते हैं, और चित्ररथ उन्हें महर्षि धौम्य का नाम सुझाते हैं।
श्लोक 3, 4, 5, 6 और 7:
वैशंपायन उवाच। ततोऽर्जुनोऽस्त्रमाग्नेयं प्रददौ तद्यथाविधि। गन्धर्वाय `स च प्रीतो वचनं चेदमब्रवी्।। मयि सन्ति हयश्रेष्ठास्तव दास्यामि वै सखे। उपकारकृतं मित्रं प्रतिकारेण योजये।। गृह्णीष्व चाक्षुषीं विद्यामिमां भरतसत्तम। एवंमुक्तोऽर्जुनः' प्रीतो वचनं चेदमब्रवी्।। त्वय्येव तावत्तिष्ठन्तु हया गन्धर्वसत्तम। कार्यकाले ग्रहीष्यामः स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत्।। तेऽन्योन्यमभिसंपूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश्च ह। रम्याद्भागीरथीतीराद्यथाकामं प्रतस्थिरे।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर अर्जुन ने विधिपूर्वक वह आग्नेयास्त्र गंधर्व (चित्ररथ) को प्रदान कर दिया। इससे प्रसन्न होकर गंधर्व ने यह वचन कहा— "हे सखे! मेरे पास श्रेष्ठ घोड़े हैं, मैं वे तुम्हें दूँगा। उपकार करने वाले मित्र को प्रतिकार (उपहार या सेवा) से जोड़ना चाहिए। हे भरतसत्तम! तुम यह 'चाक्षुषी विद्या' भी ग्रहण करो।" ऐसा कहे जाने पर प्रसन्न हुए अर्जुन ने कहा— "हे गंधर्वसत्तम! वे घोड़े अभी आपके पास ही रहें, आवश्यकता पड़ने पर हम उन्हें ग्रहण कर लेंगे। आपका कल्याण हो।" इस प्रकार गंधर्व और पाण्डवों ने एक-दूसरे का सम्मान किया और गंगाजी के उस रमणीय तट से अपनी इच्छा के अनुसार आगे प्रस्थान कर दिया।
- व्याख्या: अर्जुन और गंधर्व चित्ररथ के बीच आग्नेयास्त्र और चाक्षुषी विद्या का आदान-प्रदान होता है, और मित्रतापूर्वक वे विदा लेते हैं।
श्लोक 8 से 16 (महर्षि धौम्य का पुरोहित के रूप में वरण और पांचाल देश की ओर प्रस्थान)
श्लोक 8, 9 और 10:
तत उत्कोचकं तीर्थं गत्वा धौम्याश्रमं तु ते। तं वव्रुः पाण्डवा धौम्यं पौरोहित्याय भारत।। तान्धौम्यः प्रतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः। वन्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह।। ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवाः। ब्राह्मणं तं पुरस्कृत्य पाञ्चालीं च स्वयंवरे।।
- हिन्दी अनुवाद: हे भारत (जनमेजय)! इसके बाद पाण्डवों ने उत्कोचक तीर्थ पर जाकर धौम्यजी के आश्रम में प्रवेश किया और उन्हें अपने पुरोहित पद के लिए वरण किया (प्रार्थना की)। सभी वेदों के ज्ञाता में श्रेष्ठ उन धौम्यजी ने वन्य फल-मूल तथा पौरोहित्य स्वीकार करके उन पाण्डवों को अपना यजमान बना लिया। उस ब्राह्मण को आगे करके और पाञ्चाली (द्रौपदी) के उस स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिए वे पाण्डव लक्ष्मी और राज्य की प्राप्ति की आशा से परिपूर्ण हो गए।
- व्याख्या: पांडव महर्षि धौम्य के आश्रम में पहुँचे और उन्हें अपना कुलगुरु एवं पुरोहित नियुक्त किया। धौम्यजी के साथ होने से उन्हें ऐसा विश्वास हो गया कि अब उन्हें उनका खोया हुआ राज्य और द्रौपदी अवश्य प्राप्त होंगी।
श्लोक 11, 12, 13 और 14:
पुरोहितेन तेनाथ गुरुणा संगतास्तदा। नाथवन्तमिवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः।। स हि वेदार्थतत्त्वज्ञस्तेषां गुरुरुदारधीः। वेदविच्चैव वाग्मी च धौम्यः श्रीमान्द्विजोत्तमः।। तेजसा चैव बुद्ध्या च रूपेण यशसा श्रिया। मन्त्रैश्च विविधैर्धौम्यस्तुल्य आसीद्बृहस्पतेः।। स चापि विप्रस्तान्मेने स्वभावाभ्यधिकान्भुवि। तेन धर्मविदा पार्था योज्या सर्वविदा वृताः।।
- हिन्दी अनुवाद: हे भरतर्षभ! उस पुरोहित और गुरु के साथ मिल जाने पर पाण्डव अपने को स्वामी या रक्षक से युक्त (नाथवान) मानने लगे। वे श्रीमान् द्विजोत्तम धौम्यजी वेद के अर्थ के तत्त्व को जानने वाले, उदार बुद्धि वाले, वेदज्ञ और वक्ता थे। तेज, बुद्धि, रूप, यश, श्री और विभिन्न प्रकार के मंत्रों के प्रभाव से धौम्यजी देवगुरु बृहस्पति के समान थे। वे विप्र भी उन पाण्डवों को इस पृथ्वी पर स्वभाव से ही अतिशय श्रेष्ठ मानते थे, और धर्मज्ञ पाण्डवों ने उन सर्वज्ञ पुरोहित को वरण किया था।
- व्याख्या: महर्षि धौम्य का सान्निध्य पाकर पांडवों को बृहस्पति जैसा मार्गदर्शक मिल गया, जिससे उनका बल और उत्साह कई गुना बढ़ गया।
श्लोक 15 और 16:
मेनिरे सहिता वीराः प्राप्तं राज्यं च पाण्डवाः। बुद्धिवीर्यबलोत्साहैर्युक्ता देवा इवापरे।। कृतस्वस्त्ययनास्तेन ततस्ते मनुजाधिपाः। मेनिरे सहिता गन्तुं पाञ्चाल्यास्तं स्वयंवरम्।।
- हिन्दी अनुवाद: बुद्धि, वीर्य, बल और उत्साह से युक्त वे वीर पाण्डव मानो दूसरे देवताओं के समान यह मानने लगे कि उन्होंने अपना राज्य प्राप्त कर लिया है। उन महर्षि धौम्य द्वारा स्वस्तिवाचन (मंगल-आशीर्वाद) कराए जाने पर वे सभी मनुजाधिप पाण्डव पाञ्चाली के उस स्वयंवर में जाने के लिए प्रस्थान कर गए।
- व्याख्या: पुरोहित धौम्य के मंगल आशीष से पंकित होकर पांडव पांचाल देश में द्रौपदी के स्वयंवर में भाग लेने के लिए पूरी तरह तैयार होकर आगे बढ़ चले। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय और संपूर्ण चैत्ररथपर्व समाप्त होता है।
