श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत जतुगृहपर्व के 163वें अध्याय के इन सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। 

श्लोक 1 से 5 (भीमसेन का वेग और वन में विचरण)

श्लोक 1:

तेन विक्रममाणेन ऊरुवेगसमीरितम्। वनं सवृक्षविटपं व्याघूर्णितमिवाभवत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: उन पराक्रमी भीमसेन के जंघाओं के वेग से प्रेरित होकर वृक्षों और शाखाओं से युक्त वह वन ऐसा घूमता हुआ सा प्रतीत होने लगा, मानो चक्कर खा रहा हो।
  • व्याख्या: यहाँ भीमसेन की अपार शारीरिक शक्ति और गति का वर्णन है। वे लाक्षागृह से निकलकर माता और भाइयों को पीठ पर लादकर इतनी तीव्र गति से चल रहे थे कि उनकी जंघाओं की वायु से पूरा वन डोलने लगा।

श्लोक 2:

जङ्गावातो ववौ चास्य शुचिशुक्रागमे यथा। आवर्जितालतावृक्षं मार्गं चक्रे महाबलः।।

  • हिन्दी अनुवाद: ज्येष्ठ-आषाढ़ (गर्मी के महीनों) के समय चलने वाले आँधी-तूफान की तरह उनकी जंघाओं से वायु बहने लगी। महाबली भीम ने लताओं और वृक्षों को एक ओर हटाते हुए अपने लिए मार्ग बना लिया।
  • व्याख्या: भीमसेन के वेग की तुलना गर्मियों के तीव्र अंधड़ से की गई है। उन्होंने घने जंगल में अवरोध बनने वाली लताओं और पेड़ों को चीरते हुए आगे बढ़ने का मार्ग खुद तैयार किया।

श्लोक 3:

स मृद्गन्पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन्। अवरुज्य ययौ गुल्मान्पथस्तस्य समीपजान्।।

  • हिन्दी अनुवाद: वे रास्ते में मिलने वाले पुष्पयुक्त और फलयुक्त वनस्पतियों को कुचलते तथा पास के झाड़-झंखाड़ों और गुल्मों को तोड़ते हुए आगे निकल गए।
  • व्याख्या: मार्ग की बाधाओं को दूर करने में भीम ने क्षण भर की भी देरी नहीं की। फल-फूल वाले पेड़ और झाड़ियाँ उनके तीव्र मार्गक्रमण में कुचलते चले गए।

श्लोक 4:

स रोषित इव क्रुद्धो वने भञ्जन्महाद्रुमान्। त्रिप्रस्रुतमदः शुष्मी षष्टिवर्षो मतङ्गराट्।।

  • हिन्दी अनुवाद: वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो मतवाले हाथी (मत्तहाथी) हों, जो तीन स्थानों (मस्तक़, गाल और कान के पीछे) से मद बहा रहा हो, साठ वर्ष की आयु का हो, तथा क्रोध में भरकर वन के बड़े-बड़े वृक्षों को तोड़ रहा हो।
  • व्याख्या: यहाँ भीमसेन की तुलना मस्त हाथी से की गई है जो अपने वेग और क्रोध में विशाल पेड़ों को नेस्तनाबूद कर देता है।

श्लोक 5:

गच्छतस्तस्य वेगेन तार्क्ष्यमारुतरंहसः। भीमस्य पाण्डुपुत्राणां मूर्च्छेव समजायत।।

  • हिन्दी अनुवाद: गरुड़ और वायु के समान तीव्र वेग वाले भीमसेन के चलने की गति से पाण्डुपुत्रों (युधिष्ठिर आदि) को ऐसा लगा मानो मूर्च्छा सी आ रही हो।
  • व्याख्या: भीम की तीव्र चाल और झटकों के कारण उनके साथ रथ या पीठ पर चल रहे भाइयों को असहजता और चक्कर आने जैसी स्थिति महसूस होने लगी।

श्लोक 6 से 12 (कुन्ती और पाण्डवों की थकान तथा विश्राम)

श्लोक 6:

असकृच्चापि सतीर्य दूरपारं भुजप्लवैः। पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात्तदा।।

  • हिन्दी अनुवाद: कौरवों (धृतराष्ट्र के पुत्रों) के भय से उन्होंने उस समय बार-बार अपनी भुजाओं के सहारे तैरकर दूर-दूर के किनारों को पार किया और मार्ग में छिपकर यात्रा की।
  • व्याख्या: दुर्योधन और कौरवों के गुप्तचरों से बचने के लिए पांडवों ने गुप्त मार्गों और जलमार्गों का सहारा लिया, जिसे भीम ने अपनी बाहुबल से पार कराया।

श्लोक 7:

कृच्छ्रेण मातरं चैव सुकुमारीं यशस्विनीम्। अवहत्स तु पृष्ठेन रोधःसु विषमेषु च।।

  • हिन्दी अनुवाद: उन्होंने बड़े कष्ट के साथ, ऊँचे-नीचे और विषम तटों पर अपनी यशस्विनी एवं सुकुमारी माता (कुन्ती) को अपनी पीठ पर लादकर ढोया।
  • व्याख्या: कुन्ती जी जो कि महलों की सुख-सुविधाओं की आदी थीं, उन्हें भीम ने अपनी पीठ पर बिठाकर कठिन रास्तों और नदियों के तटों को पार कराया।

श्लोक 8:

अगमच्च वनोद्देशमल्पमूलफलोदकम्। क्रूरपक्षिमृगं घोरं सायाह्ने भरतर्षभ।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! शाम के समय वे ऐसे वन-प्रदेश में पहुँचे जहाँ मूल (कंद-मूल), फल और जल बहुत अल्प मात्रा में थे तथा क्रूर पक्षी और भयानक हिंसक जीव निवास करते थे।
  • व्याख्या: दिन ढलते-ढलते पांडव एक ऐसे निर्जन और वीरान जंगल में जा पहुँचे जहाँ जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ (पानी, फल) दुर्लभ थीं और खतरनाक जीव-जंतुओं का पहरा था।

श्लोक 9:

घोरा समभवत्सन्ध्या दारुणा मृगपक्षिणः। अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननार्तवैः।।

  • हिन्दी अनुवाद: संध्याकाल अत्यंत भयानक हो गया, पशु-पक्षी डरावने स्वर निकालने लगे और बेमौसम की चलने वाली हवाओं से सभी दिशाएँ अंदकारमय व धुँधली हो गईं।
  • व्याख्या: प्रकृति का प्रकोप और संध्या का समय उस अज्ञात वन को और अधिक डरावना बना रहा था।

श्लोक 10:

शीर्णपर्णफलै राजन्बहुगुल्मक्षुपद्रुमैः। भग्नावभुग्नभूयिष्ठैर्नानाद्रुमसमाकुलैः।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! वह वन सूखे पत्तों और फलों से भरा था, जहाँ बहुत सी झाड़ियाँ, छोटे पौधे और टूटे-फूटे तथा झुके हुए नाना प्रकार के वृक्षों का बाहुल्य था।
  • व्याख्या: यह वन पूरी तरह से निर्जन, वीरान और पथरीला था, जहाँ हर तरफ टूटे-फूटे और सूखे पेड़ फैले हुए थे।

श्लोक 11:

ते श्रमेण च कौरव्यास्तृष्णया च प्रपीडिताः। नाशक्नुवंस्तदा गन्तुं निद्रया च प्रवृद्धया।।

  • हिन्दी अनुवाद: वे सभी कौरववंशी (पाण्डव) अत्यधिक श्रम (थकान), तीव्र प्यास और प्रगाढ़ नींद से पीड़ित हो चुके थे, जिससे वे आगे चलने में असमर्थ हो गए।
  • व्याख्या: लगातार लंबी यात्रा, पानी की कमी और रात के समय शरीर की स्वाभाविक थकान ने पांडवों और माता कुन्ती को पूरी तरह से पस्त कर दिया था।

श्लोक 12 (क, ख, ग):

न्यविशन्ति हि ते सर्वे निरास्वादे महावने। `रात्र्यामेव गतास्तूर्णं चतुर्विंशतियोजनम्।' ततस्तृषा परिक्लन्ता कुन्ती वचनमब्रवीत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: वे सभी उस स्वादहीन (निर्जल व वीरान) महावन में रुक गए। (उन्होंने रात ही रात में तेजी से चौबीस योजन की दूरी तय कर ली थी)। तब प्यास से अत्यंत व्याकुल होकर कुन्ती ने यह वचन कहा—
  • व्याख्या: पांडवों ने लाक्षागृह से भागकर एक रात में लगभग चौबीस योजन (एक योजन = लगभग 8-9 मील) की लंबी दूरी तय कर ली थी, जिससे वे अतिशय थक गए थे।

श्लोक 13 से 17 (माता कुन्ती की व्यथा और विलाप)

श्लोक 13:

माता सती पाण्डवानां पञ्चानां मध्यतः स्थिता। तृष्णया हि परीताऽहमनाथेव महावने।।

  • हिन्दी अनुवाद: पाँचों पाण्डवों के बीच में बैठी हुई सती माता कुन्ती ने कहा— "मैं इस महावन में प्यास से ऐसी पीड़ित हूँ मानो कोई अनाथ स्त्री हो।"
  • व्याख्या: महारानी कुन्ती अपनी शारीरिक असमर्थता और प्यास के कारण स्वयं को असहाय महसूस कर रही हैं और पाँचों पुत्रों के बीच होने पर भी अनाथ जैसा अनुभव कर रही हैं।

श्लोक 14:

`इतः परं तु शक्ताहं गन्तुं च न पदात्पदम्। शयिष्ये वृक्षमूलेऽत्र धार्तराष्ट्रा हरन्तु माम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "अब इसके आगे मैं एक पैर भी चलने में समर्थ नहीं हूँ। मैं इसी वृक्षमूल (पेड़ की जड़ के पास) पर सो जाऊँगी, चाहे धार्तराष्ट्र (दुर्योधन के लोग) मुझे आकर उठा ले जाएँ।"
  • व्याख्या: कुन्ती की यह चरम निराशा की स्थिति है, जहाँ वे कह रही हैं कि अब वे एक कदम भी नहीं चल सकतीं, भले ही उनके शत्रु उन्हें पकड़ लें।

श्लोक 15:

शृणु भीम वचो मह्यं तव बाहुबलात्पुरः। स्थातुं न शक्ताः कौरव्याः किं बिभेषि पृथासुत।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे भीम! मेरी बात सुनो। तुम्हारे बाहुबल के कारण ही कौरव हमारे सामने खड़े होने में समर्थ नहीं हैं। हे पृथापुत्र! तुम किससे डर रहे हो?"
  • व्याख्या: कुन्ती भीम को उनके असीम पराक्रम की याद दिलाती हैं और ढांढस बंधाती हैं कि जब तक वे जीवित हैं, शत्रुओं से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 16:

अन्यो रथो न मेऽस्तीह भीमसेनादृते भुवि। धार्तराष्ट्राद्वृथा भीरुर्न मां स्वप्तुमिहेच्छसि।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे भीमसेन! इस पृथ्वी पर तुम्हारे सिवा मेरा दूसरा कोई रथ (सहारा) नहीं है। हे भीरु! व्यर्थ ही तुम मुझे यहाँ सोने से रोकना नहीं चाहते हो (अर्थात मुझे सोने दो)।"
  • व्याख्या: कुन्ती भीम को अपना एकमात्र सुरक्षा कवच मानती हैं और कहती हैं कि उनकी शारीरिक स्थिति अब और चलने की अनुमति नहीं देती, इसलिए उन्हें यहीं विश्राम करने दिया जाए।

श्लोक 17:

भीमपृष्ठस्थिता चेत्थं दूयमानेन चेतसा। निश्यध्वनि रुदन्ती सा निद्रावश्मुपागता।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— भीम की पीठ पर इस प्रकार स्थित रहकर, दुःखी मन से और रात के समय मार्ग में विलाप करती हुई वे (कुन्ती) नींद के वश में हो गईं (सो गईं)।
  • व्याख्या: अंततः बोलते-बोलते और विलाप करते-करते माता कुन्ती अत्यधिक थकान के कारण गहरी नींद में सो गईं।

श्लोक 18 से 22 (भीम का जल की खोज में निकलना)

श्लोक 18:

तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्य मातृस्नेहात्प्रजल्पितम्। कारुण्येन मनस्तप्तं गमनायोपचक्रमे।।

  • हिन्दी अनुवाद: माता का वह विलाप और स्नेहमयी वचन सुनकर भीमसेन का मन करुणा से संतप्त हो उठा और वे आगे जाने (जल की खोज करने) के लिए उद्यत हुए।
  • व्याख्या: माता की दयनीय स्थिति देखकर भीम का हृदय करुणा और पीड़ा से भर गया, और उन्होंने तुरंत पानी की तलाश में जाने का निर्णय लिया।

श्लोक 19:

ततो भीमो वनं घोरं प्रविश्य विजनं महत्। न्यग्रोधं विपुलच्छायं रमणीयं ददर्श ह।।

  • हिन्दी अनुवाद: तब भीम ने उस भयानक और निर्जन विशाल वन में प्रवेश करके एक अत्यंत सुंदर और विस्तृत छाया वाले वटवृक्ष (न्यग्रोध) को देखा।
  • व्याख्या: जल और छाया की तलाश करते हुए भीम को एक बड़ा वटवृक्ष दिखाई दिया, जहाँ पांडवों को विश्राम कराया जा सकता था।

श्लोक 20:

तत्र निक्षिप्य तान्सर्वानुवाच भरतर्षभः। पानीयं मृगयामीह तावद्विश्रम्यतामिह।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! उन सभी को वहाँ ले जाकर लिटाते हुए भरतवंशियों में श्रेष्ठ भीम ने कहा— "मैं यहाँ पानी की खोज करता हूँ, तब तक आप लोग यहीं विश्राम करें।"
  • व्याख्या: भीम ने माता और भाइयों को उस वटवृक्ष की छाँव में सुलाया और स्वयं पानी की तलाश में निकल पड़े।

श्लोक 21:

एते रुवन्ति मधुरं सारसा जलचारिणः। ध्रुवमत्र जलस्थानं महच्चेति मतिर्मम।।

  • हिन्दी अनुवाद: "ये जल में विचरने वाले सारस पक्षी कितनी मधुर आवाज़ कर रहे हैं। मेरी बुद्धि कहती है कि यहाँ निश्चित ही कोई बहुत बड़ा जलस्रोत (तालाब या झील) है।"
  • व्याख्या: पक्षियों की चहचहाहट और सारसों की आवाज़ से भीम ने अनुमान लगाया कि आसपास अवश्य ही कोई जल का स्थान है।

श्लोक 22:

अनुज्ञातः स गच्छेति भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत। जगाम तत्र यत्र स्म सारसा जलचारिणः।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत (जनमेजय)! ज्येष्ठ भ्राता (युधिष्ठिर) द्वारा 'जाओ' ऐसा अनुज्ञा (आज्ञा) दिए जाने पर, वे उस दिशा में गए जहाँ जल में विचरने वाले सारस बोल रहे थे।
  • व्याख्या: भीम ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर की अनुमति लेकर पानी की दिशा में कदम बढ़ाए। (नोट: यद्यपि युधिष्ठिर सो रहे थे, यहाँ उनकी अनुमति या पूर्व सहमति का तात्पर्य उनकी स्वीकृति से है)।

श्लोक 23 से 29 (भीम द्वारा जल लाना और पांडवों की दशा देखकर विलाप)

श्लोक 23:

`अपश्यत्पद्मिनीखण्डमण्डितं स सरोवरम्।' स तत्र पीत्वा पानीयं स्नात्वा च भरतर्षभ।।

  • हिन्दी अनुवाद: उन्होंने कमलों के समूहों से सुशोभित एक सुंदर सरोवर देखा। हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! वहाँ उन्होंने जल पिया और स्नान किया।
  • व्याख्या: भीम को एक सुंदर कमल-पुष्पों से भरा सरोवर मिल गया, जहाँ उन्होंने अपनी प्यास बुझाई और स्नान करके तरोताजा महसूस किया।

श्लोक 24:

तेषामर्थे च जग्राह भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलः। उत्तरीयेण पानीयमानयामास भारत।।

  • हिन्दी अनुवाद: भाइयों के प्रति अत्यंत स्नेह रखने वाले भीम ने उन सभी भाइयों तथा माता के लिए जल लिया। हे भारत! उन्होंने अपने उत्तरीय (अंग वस्त्र/चादर) के द्वारा पानी लाना प्रारंभ किया।
  • व्याख्या: भीम अपने भाइयों और माता के प्रति कितने समर्पित थे, यह इस बात से झलकता है कि उन्होंने अपने वस्त्रों का उपयोग करके उनके लिए पानी इकट्ठा किया।

श्लोक 25 (क, ख, ग):

`पङ्कजानामनेकैश्च पत्रैर्बध्वा पृथक्पृथक्।' गव्यूतिमात्रादागत्य त्वरितो मातरं प्रति। शोकदुःखपरीतात्मा निशश्वासोरगो यथा।।

  • हिन्दी अनुवाद: (कमल के अनेक पत्तों से अलग-अलग बाँधकर) एक गव्यूति (दो कोस) की दूरी से दौड़कर अपनी माता के पास आए। उस समय शोक और दुःख से उनका मन भर आया था और वे सांप की तरह लंबी साँसें छोड़ रहे थे।
  • व्याख्या: भीम ने कमल के पत्तों में पानी बांधकर पोटलियाँ बनाईं और तीव्र गति से दो कोस की दूरी तय करके वापस लौटे, लेकिन परिवार की दुर्दशा देखकर उनका दिल बैठ गया।

श्लोक 26:

स सुप्तां मातरं `भ्रातॄन्निद्राविद्रावितौजसः। महारौद्रे वने घोरे वृक्षमूले सुशीतले।।

  • हिन्दी अनुवाद: उन्होंने उस अत्यंत भयानक, रौद्र और वीरान वन में, सुशीतल वटवृक्ष की जड़ के पास माता और भाइयों को सोया हुआ पाया, जिनकी कांति (ऊजस) नींद के कारण मन्द पड़ चुकी थी।
  • व्याख्या: पांडव और माता कुन्ती उस ठंडी छाँव में इस तरह सोए हुए थे मानो उनकी सारी ऊर्जा और शक्ति नींद ने क्षीण कर दी हो।

श्लोक 27:

विक्षिप्तकरपादांश्च दीर्घोच्छ्वासान्महाबलान्नू। ऊर्ध्ववक्त्रान्महाकायान्पञ्चेन्द्रानिव भूपते।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भूपते! उनके हाथ-पैर इधर-उधर बिखरे हुए थे, वे लंबी-लंबी साँसें ले रहे थे। वे महाबली, विशाल शरीर वाले, ऊपर की ओर मुँह किए हुए ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो पाँचों इंद्र देवता ही हों।
  • व्याख्या: पांडवों के विशाल और सुडौल शरीर की तुलना देवराज इंद्र से की गई है, जो इस समय थके होने के कारण भूमि पर अचेत से सोए हुए थे।

श्लोक 28:

अज्ञातवृक्षनित्यस्थप्रेतराक्षससाध्वसान्। दृष्ट्वा वै भृशशोकार्तो बिललापानिलात्मजः।।

  • हिन्दी अनुवाद: अनजान वृक्षों और प्रेत-राक्षसों के भय से युक्त उस स्थान पर उन्हें देखकर वायुपुत्र भीम अत्यधिक शोक से संतप्त हो उठे और विलाप करने लगे।
  • व्याख्या: उस डरावनी जगह पर अपने पूरे परिवार को इस तरह असहाय अवस्था में लेटा देख भीम का धैर्य टूट गया और वे शोक में डूब गए।

श्लोक 29:

भृशं शोकपरीत्मा विललाप वृकोदरः।।

  • हिन्दी अनुवाद: शोक से पूरी तरह आच्छादित हुए वृकोदर (भीम) जोर-जोर से विलाप करने लगे।
  • व्याख्या: भीम का यह विलाप उनके भीतर उमड़ रहे असीम प्रेम, क्रोध और असहायता का मिश्रण था।

श्लोक 30 से 39 (भीम का विलाप - भाइयों और माता की दशा पर दुःख)

श्लोक 30:

अतः कष्टतरं किं नु द्रष्टव्यं हि भविष्यति। यत्पश्यामि महीसुप्तान्भ्रातॄनद्य सुमन्दभाक्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "मुझ अभागे को इससे बढ़कर कष्टदायक और क्या देखना पड़ेगा कि आज मैं अपने भाइयों को पृथ्वी पर सोया हुआ देख रहा हूँ?"
  • व्याख्या: जो राजकुमार महलों में कोमल शैया पर सोते थे, उनका इस प्रकार नग्न भूमि पर सोना भीम के लिए असहनीय था।

श्लोक 31:

शयनेषु परार्ध्येषु ये पुरा वारणावते। नाधिजग्मुस्तदा निद्रां तेऽद्य सुप्ता महीतले।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जो लोग पहले वारणावत में अति उत्तम और बहुमूल्य शैयाओं पर भी आसानी से नींद नहीं प्राप्त कर पाते थे, वे आज इस पृथ्वी तल पर सो रहे हैं।"
  • व्याख्या: विलासिता और महलों के आराम के दिन याद करके भीम की पीड़ा और बढ़ जाती है।

श्लोक 32 और 33:

स्वसारं वसुदेवस्य शत्रुसङ्घावमर्दिनः। कुन्तिराजसुतां कुन्तीं सर्वलक्षणपूजिताम्।। स्नुषां विचित्रवीर्यस्य भार्यां पाण्डोर्महात्मनः। तथैव चास्मज्जननीं पुण्डरीकोदरप्रभाम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: जो वसुदेवजी की बहन हैं, शत्रुओं के संघ का मर्दन करने वाली हैं, कुन्तिराज की पुत्री हैं, सभी उत्तम लक्षणों से पूजिता हैं, विचित्रवीर्य की बहू हैं, महात्मा पाण्डु की पत्नी हैं और कमल के भीतर की भान्ति कांति वाली हमारी माता हैं...

श्लोक 34:

सुकुमारतरामेनां महार्हशयनोचिताम्। शयानां पश्यताऽद्येह पृथिव्यामतथोचिताम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "...जो अत्यंत सुकुमारी हैं और बहुमूल्य शैयाओं की अधिकारी हैं, उन्हें आज इस पृथ्वी पर इस प्रकार अयोग्य अवस्था में लेटे हुए देखिए।"
  • व्याख्या: माता कुन्ती के कुल, शील और उनकी सुकुमारता का स्मरण कर भीम का हृदय चीत्कार कर उठता है कि उन्हें जमीन पर सोना पड़ रहा है।

श्लोक 35:

धर्मादिन्द्राच्च वाताच्च सुपुवे या सुतानिमान्। सेयं भूमौ परिश्रान्ता शेषे प्रासादशायिनी।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जिन्होंने धर्म, इंद्र और वायु (पवन देव) से ऐसे पुत्रों को जन्म दिया, वही महलों में सोने वाली माता कुन्ती आज इस भूमि पर परिश्रान्त (थकी हुई) होकर सो रही हैं।"
  • व्याख्या: धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन और खुद भीम-नकुल-सहदेव की जन्मदात्री माता कुन्ती की यह दुर्दशा भीम को अंदर तक झकझोर रही है।

श्लोक 36:

किं नु दुःखतरं शक्यं मया द्रष्टुमतः परम्। योऽहमद्य नरव्याघ्रान्सुप्तान्पश्यामि भूतले।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसके बाद और इससे बढ़कर दुःखद मैं क्या देख सकता हूँ, जो आज इन नरव्याघ्रों (श्रेष्ठ भाइयों) को इस भूतल पर सोया हुआ देख रहा हूँ?"
  • व्याख्या: पांडवों जैसे शूरवीरों की यह स्थिति भीम के लिए दुनिया का सबसे बड़ा दुःख बन गई थी।

श्लोक 37:

त्रिषु लोकेषु यो राज्यं धर्मनित्योऽर्हते नृपः। सो।़यं भूमौ परिश्रान्तः शेते प्राकृतवत्कथम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जो धर्म के मार्ग पर चलने वाले राजा तीनों लोकों में राज्य के अधिकारी हैं, वे युधिष्ठिर आज थके हुए एक साधारण मनुष्य की तरह इस भूमि पर कैसे सो रहे हैं?"
  • व्याख्या: युधिष्ठिर जैसे धर्मराज की ऐसी दशा देखकर भीम की न्यायप्रियता और आत्मीयता जाग उठती है।

श्लोक 38:

अयं नीलाम्बुदश्यामो नरेष्वप्रतिमोऽर्जुनः। शेते प्राकृतवद्भूमौ ततो दुःखतरं नु किम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "यह नीले बादल के समान श्याम वर्ण वाले तथा मनुष्यों में अप्रतिम (अतुलनीय) योद्धा अर्जुन भी भूमि पर एक साधारण व्यक्ति की तरह सो रहा है, इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या होगी?"
  • व्याख्या: महाबली अर्जुन का इस तरह जमीन पर सोना भीम के लिए असह्य था।

श्लोक 39:

अश्विनाविव देवानां याविमौ रूपसंपदा। तौ प्राकृतवदद्येमौ प्रसुप्तौ धरणीतले।।

  • हिन्दी अनुवाद: "देवताओं में अश्विनीकुमारों के समान जो रूप और संपदा से युक्त हैं, वे दोनों (नकुल और सहदेव) भी आज इस धरती पर साधारण मनुष्यों की भाँति प्रसुप्त (सोए हुए) हैं।"
  • व्याख्या: सबसे छोटे और सुंदर रूप वाले माद्रीपुत्र नकुल और सहदेव की अवस्था पर भी भीम उतने ही दुःखी हैं।

श्लोक 40 से 46 (परिवार और संबंधियों के महत्त्व पर भीम के विचार)

श्लोक 40:

ज्ञातयो यस्य नै स्युर्विषमाः कुलपांसनाः। स जीवेत सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जिस मनुष्य के स्वजन (रिश्तेदार) विषैले और कुल को कलंकित करने वाले न हों, वह इस संसार में वैसे ही सुखपूर्वक जीवित रहता है जैसे गाँव के बीचों-बीच अकेला उगा हुआ वृक्ष।"
  • व्याख्या: भीम यहाँ अपने दुष्ट चचेरे भाइयों (कौरवों) को कोसते हुए कह रहे हैं कि बुरे रिश्तेदारों से तो अनाथ होना या अकेले रहना बेहतर है।

श्लोक 41:

एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत्पर्णफलान्वितः। चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरध्वनीनैश्च पूजितः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "गाँव में जो एकमात्र वृक्ष पत्तों और फलों से युक्त होता है, वह अनाथ (जिसका कोई कुल या अन्य पेड़ न हो) होने पर भी चौराहे का पवित्र वृक्ष बनकर राहगीरों द्वारा पूजा जाता है।"
  • व्याख्या: अकेले वृक्ष का उदाहरण देकर भीम समझाते हैं कि यदि परिवार में शत्रु रूपी अपने लोग न हों, तो अकेला व्यक्ति भी सम्मानित जीवन जी सकता है।

श्लोक 42:

येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः। ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "परंतु जिनके बहुत से शूरवीर और धर्म के मार्ग पर चलने वाले संबंधी (ज्ञातति) होते हैं, वे इस संसार में सुखपूर्वक जीते हैं और निरोगी रहते हैं।"
  • व्याख्या: एक आदर्श और सुसंगठित परिवार के सुख का वर्णन यहाँ किया गया है।

श्लोक 43:

बलवन्तः समृद्धार्था मित्रबान्धवनन्दनाः। जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव।।

  • हिन्दी अनुवाद: "बलवान, धन-संपत्ति से समृद्ध तथा मित्रों और बंधुओं को आनंद देने वाले लोग जंगल के वृक्षों की भाँति एक-दूसरे का आश्रय लेकर जीते हैं।"
  • व्याख्या: जिस प्रकार जंगल के पेड़ एक-दूसरे का साथ पाकर आंधी-तूफान में टिके रहते हैं, उसी प्रकार अच्छे परिवारिक संबंध मनुष्य को बल देते हैं।

श्लोक 44 और 45:

वयं तु धृतराष्ट्रेण दुष्पुत्रेण दुरात्मना। `राज्यलुब्धेन मूर्खेण दुर्मन्त्रिसहितेन वै।। दुष्टेनाधर्मशीलेन स्वार्थनिष्ठैकबुद्धिना।' विवासिता न दग्धाश्च क्षत्तुर्बुद्धिपराक्रमात्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "किंतु हम लोगों को तो उस दुष्ट, लोभी, मूर्ख, बुरे मंत्रियों से घिरे हुए, अधर्मी और केवल स्वार्थ साधने वाले धृतराष्ट्र के पापी पुत्र (दुर्योधन) ने घर से निकाल दिया। विदुरजी की बुद्धि और पराक्रम के कारण ही हम आग में जलने से बच गए।"
  • व्याख्या: भीम दुर्योधन और धृतराष्ट्र के कुकृत्यों को याद करते हुए उनके लोभ और दुर्भावना का पर्दाफाश करते हैं।

श्लोक 46:

तस्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः। कां दिशं प्रतिपत्स्यामः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए हम आग से तो मुक्त होकर इस वृक्ष के आश्रय में आ गए हैं, किंतु इस अनुत्तम (अत्यंत भीषण) क्लेश को प्राप्त होकर अब हम किस दिशा की ओर जाएँ?"
  • व्याख्या: लाक्षागृह से तो जान बच गई, परंतु अब आगे की राह क्या होगी और इस विपत्ति का सामना कैसे होगा, यह प्रश्न भीम के सामने है।

श्लोक 47 से 54 (भीम का संकल्प और पहरेदारी)

श्लोक 47:

सकामो भव दुर्बुद्धे धार्तराष्ट्राल्पदर्शन। नूनं देवाः प्रसन्नास्ते नानुज्ञां मे युधिष्ठिरः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे अल्पबुद्धि दुर्योधन! तू अपनी इच्छा में सफल (सकाम) हो ले। निश्चय ही तुम्हारे देवता प्रसन्न हैं (जो हम पर यह विपत्ति आई है), क्योंकि युधिष्ठिर मुझे आज्ञा नहीं देते..."
  • व्याख्या: भीम क्रोध में आकर सोच रहे हैं कि यदि युधिष्ठिर उन्हें रोकते न, तो वे अभी जाकर कौरवों का नाश कर देते।

श्लोक 48 और 49:

प्रयच्छति वधे तुभ्यं तेन जीवसि दुर्मते। नन्वद्य ससुतामात्यं सकर्णानुजसौबलम्।। गत्वा क्रोधसमाविष्टः प्रेषयिष्ये यमक्षयम्। किं नु शक्यं मया कर्तुं यत्तेन क्रुध्यते नृपः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "...कि मैं तुम्हारा वध कर सकूँ, इसी कारण हे दुर्मति! तू अभी तक जीवित है। अन्यथा मैं आज ही क्रोध में भरकर तेरे पुत्रों, मंत्रियों, कर्ण, अपने भाइयों (दुर्योधन के भाई) और सौबल (शकुनि) सहित तुझे यमराज के घर पहुँचा देता। परंतु राजा (युधिष्ठिर) क्रोध नहीं करना चाहते, इसलिए मैं क्या कर सकता हूँ?"
  • व्याख्या: भीम की वीरता और उनका आंतरिक द्वंद्व यहाँ स्पष्ट झलकता है कि वे बड़े भाई युधिष्ठिर के अनुशासन के कारण अपने भयंकर क्रोध को दबाए हुए हैं।

श्लोक 50 और 51:

धर्मात्मा पाण्डवश्रेष्ठः पापाचार युधिष्ठिरः। एवमुक्त्वा महाबाहुः क्रोधसन्दीप्तमानसः।। करं करेण निष्पिष्य निःश्वसन्दीनमानसः। पुनर्दीनमना भूत्वा शान्तार्चिरिव पावकः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "पाण्डवों में श्रेष्ठ और धर्मात्मा युधिष्ठिर पापी आचरण करने वालों के प्रति भी..." ऐसा कहकर, क्रोध से प्रदीप्त मन वाले महाबाहु भीम ने अपने हाथों को आपस में पीसा (मसाला), लंबी-लंबी साँसें लीं, और फिर शांत अग्नि की तरह दीन मन वाले बन गए।
  • व्याख्या: भीम का गुस्सा उफ़्फान पर था, लेकिन बड़े भाई के धर्म और स्वभाव का स्मरण कर उनका क्रोध शांत अग्नि की भाँति ठंडा पड़ गया।

श्लोक 52:

भ्रातॄन्महीतले सुप्तानवैक्षत वृकोदरः। विश्वस्तानिव संविष्टान्पृथग्जनसमानिव।।

  • हिन्दी अनुवाद: वृकोदर भीम ने पृथ्वी पर सोए हुए अपने भाइयों को देखा, जो साधारण मनुष्यों की भाँति निश्चिंत होकर सो रहे थे।
  • व्याख्या: क्रोध शांत होने पर भीम का स्नेह फिर से जाग उठा और उन्होंने अपने भाइयों की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया।

श्लोक 53:

नातिदूरेण नगरं वनादस्माद्धि लक्षये। जाग्रर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहंस्वयम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "मैं इस वन से बहुत अधिक दूरी पर कोई नगर नहीं देख रहा हूँ (यानी आसपास नगर हो सकता है)। जब इन्हें जागना चाहिए तब ये सो रहे हैं, अतः अब मैं स्वयं ही जागूंगा (पहरा दूँगा)।"
  • व्याख्या: भीम ने निर्णय लिया कि जब तक उनके भाई और माता गहरी नींद में हैं, वे खुद पूरी रात जागकर उनकी पहरेदारी करेंगे।

श्लोक 54:

प्राश्यन्तीमे जलं पश्चात्प्रतिबुद्धा जितक्लमाः। इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वयं तदा।।

  • हिन्दी अनुवाद: "ये लोग थकान दूर होने पर जब जागेंगे, तब इस जल को पिएँगे।" ऐसा निश्चय करके भीमसेन ने उस समय स्वयं ही जागने का व्रत धारण किया (पहरा देने लगे)।
  • व्याख्या: इस प्रकार भीम ने अपनी व्यक्तिगत थकान को ताक पर रखकर अपने परिवार की सुरक्षा के लिए रात भर जागने का दृढ़ निश्चय किया।

(इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः समाप्तः)

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