महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत वैवाहिकपर्व के 213वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में महर्षि वेद व्यास राजा द्रुपद को यह विस्तार से समझाते हैं कि किस प्रकार नालायनी ने पूर्व जन्म में भगवान शिव (रुद्र) की कठिन तपस्या करके पाँच पतियों का वरदान प्राप्त किया था और वही नालायनी इस जन्म में द्रौपदी के रूप में उत्पन्न हुई है।
श्लोक 1 से 6 (द्रुपद का प्रश्न और व्यासजी द्वारा नालायनी का पूर्ववृत्त बताना)
श्लोक 1, 2 और 3:
द्रुपद उवाच। ब्रूहि तत्कारणं येन ब्रह्मन्नालायनी शुभा। जाता ममाध्वरे कृष्णा सर्ववेदविदां वर।। व्यास उवाच। शृणु राजन्यथा ह्यस्या दत्तो रुद्रेण वै वरः। यदर्थं चैव संभूता तव गेहे यशस्विनी।। हन्त त कथयिष्यामि कृष्मायाः पौर्वदेहिकम्। इन्द्रसेनेति विख्याता पुरा नालायनी शुभा।।
- हिन्दी अनुवाद: द्रुपद बोले— "हे सर्ववेदविदां वर (वेदों के ज्ञाता में श्रेष्ठ) ब्रह्मन्! आप वह कारण बताइए, जिससे वह शुभ नालायनी मेरी यज्ञवेदी में कृष्णा (द्रौपदी) के रूप में उत्पन्न हुई है।" व्यासजी ने कहा— "हे राजन्! सुनो, भगवान रुद्र द्वारा इसे किस प्रकार वर दिया गया था और क्यों यह यशस्विनी तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई है, वह सब मैं कहता हूँ। कृष्णा के पूर्वजन्म का इतिहास सुनो— पूर्वकाल में यह शुभ नालायनी 'इन्द्रसेना' के नाम से विख्यात थी।"
- व्याख्या: द्रुपद के यह पूछने पर कि द्रौपदी की उत्पत्ति का वास्तविक दैवीय कारण क्या है, व्यासजी उनके पूर्वजन्म (इन्द्रसेना/नालायनी) की पूरी कथा सुनाना आरंभ करते हैं।
श्लोक 4, 5 और 6:
मौद्गल्यस्य पतिमासाद्य चचार विगतज्वरा। मौद्गल्यस्य महर्षेश्च रममाणस्य वै तया।। संवत्सरगणा राजन्व्यतीयुः क्षणवत्तदा। ततः कदाचिद्धर्मात्मा तृप्तः कामैर्व्यरज्यत।। अन्विच्छन्परमं धर्मं ब्रह्मयोगपरोऽभवत्। उत्ससर्ज स तां विप्रः सा तदा चापतद्भुवि। मौद्गल्यो राजशार्दूल तपोभिर्भावितः सदा।।
- हिन्दी अनुवाद: "उसने महर्षि मौद्गल्य को पति के रूप में प्राप्त करके बिना किसी संताप (विगतज्वर) के आचरण किया। हे राजन्! उस महर्षि मौद्गल्य के साथ रमण करते हुए उसके कई वर्ष क्षण मात्र की भाँति बीत गए। तदनंतर एक दिन वे धर्मात्मा मुनि भोगों से तृप्त होकर विरक्त हो गए। परम धर्म की इच्छा करते हुए वे ब्रह्मयोग परायण हो गए। हे राजशार्दूल! उन तपोभियों से हमेशा भावित विप्र मौद्गल्य ने जब उसका त्याग कर दिया, तब वह पृथ्वी पर गिर पड़ी (दुखी होकर विलाप करने लगी)।"
- व्याख्या: नालायनी ने मौद्गल्य ऋषि के साथ लंबे समय तक आनंदपूर्वक जीवन बिताया, किंतु एक दिन मुनि भोगों से विरक्त होकर योगसाधना में लीन हो गए और उन्होंने पत्नी का त्याग कर दिया। इससे नालायनी अत्यंत दुखी हुई।
श्लोक 7 से 15 (नालायनी का विलाप, मौद्गल्य का शाप और भगवान शिव की तपस्या)
श्लोक 7, 8, 9 और 10:
नालायन्युवाच। प्रसीद भगवन्मह्यं न मामुत्स्रष्टुमर्हसि। अवितृप्तास्मि ब्रह्मर्षे कामानां कामसेवनात्।। मौद्गल्य उवाच। यस्मात्त्वं मामनिःशङ्का ह्यवक्तव्यं भाषसे। आचरन्ती तपोविघ्नं तस्माच्छृणु वचो मम।। भविष्यसि नृलोके त्वं राजपुत्री यशस्वि। पाञ्चालराजस्य सुता द्रुपदस्य महात्मनः।। भवितारस्तत्र तव पतयः पञ्च विप्लुताः। तैः सार्धं मधुराकारैश्चिरं रतिमवाप्स्यसि।।
- हिन्दी अनुवाद: नालायनी बोली— "हे भगवन्! मुझ पर प्रसन्न होइए, आप मुझे छोड़ने के योग्य नहीं हैं। हे ब्रह्मर्षे! मैं कामनाओं के सेवन से अभी काम-तृप्त नहीं हुई हूँ।" मौद्गल्य ने कहा— "चूँकि तुम बिना किसी संकोच के मुझे तपोविघ्न पहुँचाती हुई ऐसी अवक्तव्य (अनुचित) बातें कह रही हो, इसलिए मेरा यह वचन सुनो— हे यशस्विनी! तुम नृलोक (मनुष्य लोक) में महात्मा पाञ्चालराज द्रुपद की यशस्विनी राजपुत्री होओगी। वहाँ तुम्हारे पाँच प्रख्यात पति होंगे, और उन मधुर आकृति वाले पतियों के साथ तुम दीर्घकाल तक रमण का सुख प्राप्त करोगी।"
- व्याख्या: जब नालायनी ने अपनी तृप्ति न होने की बात कहकर मुनि की साधना में विघ्न डाला, तो ऋषि मौद्गल्य ने उसे क्रोधित होकर शाप (या भावी वरदान रूपी शाप) दिया कि वह अगले जन्म में पांचालराज द्रुपद की पुत्री बनेगी और उसके पाँच पति होंगे।
श्लोक 11, 12, 13, 14 और 15:
वैशंपायन उवाच। सैवं शप्ता तु विमना वनं प्रागाद्यशस्विनी। भोगैरतृप्ता देवेशं तपसाऽऽराधयत्तदा।। निराशीर्मारुताहारा निराहारा तथैव च। अनुवर्तमाना त्वादित्यं तथा पञ्चतपाभवत्।। तीव्रेण तपसा तस्यास्तुष्टः पशुपतिः स्वयम्। वचं प्रादात्तदा रुद्रः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः।। भविष्यति परं जन्म भविष्यति वराङ्गना। भविष्यन्ति परं भद्रे पतयः पञ्च विश्रुताः।। महेन्द्रवपुषः सर्वे महेन्द्रसमविक्रमाः। तत्रस्था च महत्कर्म सुराणां त्वं करिष्यसि।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— इस प्रकार उनके द्वारा शापित होकर विमनस हुई वह यशस्विनी वन में चली गई। भोगों से अतृप्त उस स्त्री ने तब देवेश्वर (शिव) की तपस्या के द्वारा आराधना की। वह केवल वायु का आहार करती हुई (निराशीर्वायुहारा) अथवा बिल्कुल निराहार रहकर, सूर्य की ओर देखती हुई 'पञ्चतपा' (चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्य रखकर) तपस्या करने लगी। उसकी उस तीव्र तपस्या से सर्वलोकेश्वर प्रभु पशुपति स्वयं संतुष्ट हो गए और तब रुद्र ने उसे यह वरदान दिया— "हे भद्रे! तुम्हारा अगला जन्म होगा, तुम श्रेष्ठ सुंदर स्त्री बनोगी, और तुम्हारे पाँच प्रख्यात पति होंगे। वे सभी इंद्र के समान शरीर वाले और इंद्र के समान पराक्रमी होंगे। वहाँ रहकर तुम देवताओं का कोई महान कार्य करोगी।"
- व्याख्या: शाप के बाद नालायनी ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की। शिव जी प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे वरदान दिया कि वह अगले जन्म में सुंदर राजपुत्री बनेगी और उसे इंद्र के समान पराक्रमी पाँच पति प्राप्त होंगे।
श्लोक 16 से 29 (शिव और नालायनी का संवाद तथा गंधर्व/गंगा की ओर प्रस्थान)
श्लोक 16, 17, 18, 19, 20, 21 और 22:
स्त्र्युवाच। एकः खलु मया भर्ता वृतः पञ्च त्विमे कथम्। एका भवति नैकस्या बहवस्तद्ब्रवीहि मे।। महेश्वर उवाच। पञ्चकृत्वस्त्वया चोक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः। पञ्चते पतयो भद्रे भविष्यन्ति सुखावहाः।। स्त्र्युवाच। धर्म एकः पतिः स्त्रीणां पूर्वमे प्रकल्पितः। बहुपत्नीकता पुंसो धर्मश्च बहुभिः कृतः।। स्त्रीधर्मः पूर्वमेवायं निर्मितो मुनिभिः सदा। सहधर्मचरी भर्तुरेका एकस्य चोच्यते।। एको हि भर्ता नारीणां कौमार इति लौकिकः। आपत्सु च नियोगेन भर्तुर्नार्याः परः स्मृतः।। गच्छेत न तृतीयं तु तस्या निष्कृतिरुच्यते। चतुर्थे पतिता नारी पञ्चमे वर्धकी भवेत्।। एवं गते धर्मपथे न वृणे बहुपुंस्कताम्। अलोकाचरितात्त्समात्कथं मुच्येय सङ्करात्।।
- हिन्दी अनुवाद: स्त्री (नालायनी) ने कहा— "मैंने तो निश्चय ही एक ही पति का वरण किया था, फिर ये पाँच कैसे होंगे? एक स्त्री के बहुत से पति कभी नहीं होते, आप मुझे यह समझाइए।" महेश्वर ने कहा— "तुमने अपनी बात में पाँच बार 'पतिं देहि' (मुझे पति दो) ऐसा कहा था, इसलिए हे भद्रे! तुम्हारे ये पाँच सुखदायक पति होंगे।" स्त्री ने कहा— "स्त्रियों के लिए पूर्वकाल से ही एक ही पति का धर्म कल्पित किया गया है, जबकि पुरुष के लिए बहुपत्नीक होना विधान किया गया है। मुनियों द्वारा हमेशा से यही स्त्री-धर्म निर्मित किया गया है कि पत्नी अपने एक ही पति की सहधर्मिणी कहलाती है। लोक में कुंवारी अवस्था का एक ही पति नारियों के लिए विहित है, और आपदों में नियोग के द्वारा भी पति के सिवाय दूसरा कोई नहीं माना जाता। (नियोग से भी) वह तीसरे पति के पास नहीं जा सकती, चौथे से उसकी निष्कृति (पतित होना) कही गई है, और पाँचवें पति के होने पर नारी पूर्णतः पतित (वर्धकी/पापयुक्त) हो जाती है। ऐसी स्थिति में, इस धर्मपथ में मैं बहुपुंस्कता (अनेक पतियों का होना) नहीं चाहती। लोक-अविरुद्ध इस मार्ग से मैं इस संकर (धर्म-संकरता) से कैसे मुक्त होऊँगी?"
- व्याख्या: नालायनी शिव जी के सामने अपनी असमंजस और लोक-मर्यादा रखती है कि एक स्त्री के पाँच पति होना लोक-वेद के विरुद्ध और अधर्म है, क्योंकि शास्त्र एक ही पति का विधान करते हैं। वह पूछती है कि इस संकर दोष से वह कैसे बचेगी।
श्लोक 23, 24, 25, 26, 27, 28 और 29:
महेश्वर उवाच। अनावृताः पुरा नार्यो ह्यासञ्शुध्यन्ति चार्तवे। सकृदुक्तं त्वया नैतन्नाधर्मस्ते भविष्यति।। स्त्र्युवाच। यदि मे पतयः पञ्च रतिमिच्छामि तैर्मिथः। कौमारं च भवेत्सर्वैः संगमे संगमे च मे।। पतिशुश्रूषया चैव सिद्धिः प्राप्ता मया पुरा। भोगेच्छा च मया प्राप्ता स च भोगश्च मे भवेत्।। रुद्र उवाच। रतिश्च भद्रे सिद्धिश्च न भजेते परस्परम्। भोगानाप्स्यसि सिद्धिं च योगेन च महत्त्वताम्।। अन्यदेहान्तरे चैव रूपभाग्यगुणान्विता। पञ्चभिः प्राप्य कौमारं महाभागा भविष्यसि।। गच्छ गङ्गाजलस्था च नरं पश्यसि यं शुभे। तमानय ममाभ्याशं सुरराजं शुचिस्मिते।। इत्युक्ता विश्वरूपेण रुद्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्। जगाम गङ्गामुद्दिश्य पुण्यां त्रिपथगां नदीम्।।
- हिन्दी अनुवाद: महेश्वर ने कहा— "पूर्वकाल में नारियाँ स्वतंत्र थीं (अनावृताः), वे ऋतुकाल में शुद्ध हो जाती थीं। तुमने जो बात एक बार कह दी है, वह असत्य नहीं होगी, तुम्हें इसमें कोई अधर्म नहीं होगा।" स्त्री ने बोली— "यदि मेरे पाँच पति होंगे, तो मैं चाहती हूँ कि उन सबके साथ मेरा रमण हो, और प्रत्येक के साथ संगम होने पर मेरा कौमार्य (कन्यात्व) पुनः नया हो जाए। मैंने पहले पति की सेवा से सिद्धि प्राप्त की थी, और मेरी भोगेच्छा भी है, अतः वह भोग भी मुझे प्राप्त हो।" रुद्र ने कहा— "हे भद्रे! रति (भोग) और सिद्धि— ये दोनों परस्पर विरोधी नहीं हैं। तुम भोग भी प्राप्त करोगी, सिद्धि भी प्राप्त करोगी और योग के द्वारा महिमा भी प्राप्त करोगी। दूसरे देहान्तर (जन्म) में तुम रूप, भाग्य और गुणों से युक्ता तथा महाभागा होकर पाँचों पतियों के साथ कौमार्य को प्राप्त करोगी। जाओ, गंगा के जल के पास जाकर जिस किसी भी पुरुष को तुम देखो, हे शुभे! हे शुचिस्मिते! उस सुरराज (इन्द्र) को मेरे पास ले आओ।" विश्वरूप भगवान रुद्र के ऐसा कहने पर उन्होंने रुद्र की परिक्रमा की और पवित्र त्रिपथगा नदी गंगा की ओर प्रस्थान किया।
- व्याख्या: भगवान शिव उसे आश्वस्त करते हैं कि उसके द्वारा पाँच बार पति मांगने के कारण वही उसका विधान बन गया है, और उसे यह वरदान मिलता है कि हर बार पति बदलने या संगम के बाद भी उसका कौमार्य सुरक्षित रहेगा। साथ ही, शिव जी उसे गंगा के पास जाकर इंद्र को लाने का निर्देश देते हैं। इसी के साथ यह अध्याय पूर्ण होता है।
