महाभारत्-०१ आदिपर्व -२१६

महाभारत्-०१ आदिपर्व -२१६

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत वैवाहिकपर्व के अंतिम यानी 216वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इसी अध्याय के साथ वैवाहिकपर्व की पूर्णता होती है।

श्लोक 1 से 3 (द्रुपद का निर्भय होना और कुंती-द्रौपदी की भेंट)

श्लोक 1, 2 और 3:

वैशंपायन उवाच। पाण्डवैः सह संयोगं गतस्य द्रुपदस्य ह। न बभूव भयं किंचिद्देवेभ्योऽपि कथंचन।। कुन्तीमासाद्य ता नार्यो द्रुपदस्य महात्मनः। नाम संकीर्तयन्त्योऽस्या जग्मुः पादौ स्वमूर्धभिः।। कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गला। कृताभिवादना श्वश्र्वास्तस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— पाण्डवों के साथ संबंध (संबन्ध) जुड़ जाने के पश्चात राजा द्रुपद को देवताओं से भी किसी प्रकार का कोई भय नहीं रहा। महात्मा द्रुपद की वे सभी नारियाँ (रानियाँ) माता कुंती के पास आईं और अपने-अपने नाम का संकीर्तन करते हुए उन्होंने अपने मस्तक से कुंती के चरणों का स्पर्श किया (वंदना की)। और क्षौम (रेशमी) वस्त्र धारण किए हुए, कंकण और मंगल कार्य संपन्न करने वाली कृष्णा (द्रौपदी) ने अपनी सास (कुंती) को अभिवादन करके हाथ जोड़कर विनीत भाव से प्रणामावस्थ में खड़ी रहीं।
  • व्याख्या: पांडवों जैसी अजेय और दिव्य शक्तियों से युक्त वीरों से संबंध जुड़ जाने के कारण द्रुपद अब सब प्रकार से निर्भय हो गए। राजमहल की रानियों ने कुंती का आदरपूर्वक अभिनंदन किया, और नवविवाहिता द्रौपदी ने अपनी सास कुंती के चरणों में नतमस्तक होकर आशीर्वाद प्राप्त किया।

श्लोक 4 से 12 (माता कुंती द्वारा द्रौपदी को आशीर्वाद)

श्लोक 4, 5, 6 और 7:

रूपलक्षणसंपन्नां शीलाचारसमन्विताम्। द्रौपदीमवदत्प्रेम्णा पृथाशीर्वचनं स्नुषाम्।। यथेन्द्राणी हरिहये स्वाहा चैव विभावसौ। रोहिणी च यथा सोमे दमयन्ती यथा नले।। यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती। यथा नारायणे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु।। जीवसूर्वीरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता। सुभगा भोगसंपन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता।।

  • हिन्दी अनुवाद: रूप और लक्षणों से संपन्न तथा शील और आचार से सुयुक्त अपनी उस बहू द्रौपदी को पृथा (कुंती) ने प्रेमपूर्वक आशीर्वाद के ये वचन कहे— "जिस प्रकार हरिहय (इन्द्र) के साथ इंद्राणी, अग्नि के साथ स्वाहा, चंद्रमा के साथ रोहिणी, नल के साथ दमयन्ती, कुबेर के साथ भद्रा, वशिष्ठ के साथ अरुंधति, और नारायण के साथ लक्ष्मी निवास करती हैं, उसी प्रकार तुम अपने पतियों के लिए हो जाओ! हे भद्रे! तुम वीर पुत्रों को जन्म देने वाली (वीरसूर्), जीवित पुत्रों वाली (जीवसूर्), बहुत से सुखों से समन्विता, सौभाग्यशालिनी, भोग-संपदा से युक्त, यज्ञपत्नी और परम पतिव्रता बनो।"
  • व्याख्या: माता कुंती ने अपनी पुत्रवधू द्रौपदी को महान सतियों और देवियों (इंद्राणी, लक्ष्मी, अरुंधति आदि) का उदाहरण देते हुए यशस्वी, पतिव्रता, और वीर पुत्रों को जन्म देने वाली होने का आत्मीय आशीर्वाद दिया।

श्लोक 8, 9, 10, 11 और 12:

अतिथीनागतान्साधून्वृद्दान्बालांस्तथा गुरून्। पूजयन्त्या यथान्यायं शश्वद्गच्छन्तु ते समाः।। कुरुजाङ्गलमुख्येषु राष्ट्रेषु नगरेषु C। अनु त्वमभिषिच्यस्व नृपतिं धर्मवत्सला।। पतिभिर्निर्जितामुर्वीं विक्रमेण महाबलैः। कुरु ब्राह्मणसातसर्वामश्वमेधे महाक्रतौ।। पृथिव्यां यानि रत्नानि गुणवन्ति गुणान्विते। तान्यप्नुहि त्वं कल्याणि सुखिनी शरदां शतं।। यथा च त्वाऽभिनन्दामि वध्वद्य क्षौमसंवृताम्। तथा भूयोऽभिनन्दिष्ये जातपुत्रां गुणान्वितां।।

  • हिन्दी अनुवाद: "आगत अतिथियों, साधुओं, वृद्धों, बालकों और गुरुजनों का यथान्यायं पूजन करती हुई तुम्हारी वर्षमालाएँ (आयु) निरंतर आगे बढ़ती रहें। हे धर्मवत्सला! तुम कुरुजांगल आदि मुख्य राष्ट्रों और नगरों में नृपति (युधिष्ठिर आदि) के साथ अभिषेक को प्राप्त होओ। महाबली पतियों द्वारा अपने पराक्रम से जीती गई इस संपूर्ण पृथ्वी को महाक्रतु अश्वमेघ यज्ञ में ब्राह्मणों को दान कर दो (ब्राह्मणसात करो)। हे गुणान्विते कल्याणि! पृथ्वी पर जितने भी गुणवान रत्न हैं, उन सबको तुम प्राप्त करो और सौ वर्षों तक सुखिनी रहो। जिस प्रकार आज रेशमी वस्त्र पहने हुई इस वधू का मैं अभिनंदन कर रही हूँ, उसी प्रकार गुणवान पुत्रों को जन्म देने के पश्चात मैं पुनः तुम्हारा अभिनंदन करूँगी।"
  • व्याख्या: कुंती ने द्रौपदी को अतिथि-सत्कार, धर्मपरायणता, और भविष्य में राज्याभिषेक तथा अश्वमेघ यज्ञ संपन्न करने वाली महारानी बनने का दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया।

श्लोक 13 से 19 (भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पांडवों को भव्य उपहार भेजना)

श्लोक 13, 14, 15 और 16:

वैशंपायन उवाच। ततस्तु कृतदारेभ्यः पाण्डुभ्यः प्राहिणोद्धरिः। वैदूर्यमणिचित्राणि हैमान्याभरणानि च।। वासांसि च महार्हाणि नानादेश्यानि माधवः। कम्बलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च।। शयशयनासनयानानि विविधानि महान्ति च। वैदूर्यवज्रचित्राणि शतशो भाजनानि च।। रूपयौवनदाक्षिण्यैरुपेताश्च स्वलङ्कृताः। प्रेष्याः संप्रददौ कृष्णो नानादेश्याः स्वलङ्कृताः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर विवाह संपन्न हो जाने पर (कृतदार) पाण्डवों के पास हरि (माधव/श्रीकृष्ण) ने विविध उपहार भिजवाए। उन्होंने वैदूर्य मणियों से चित्रित सुवर्ण के आभूषण, नाना देशों के बहुमूल्य वस्त्र, स्पर्श में सुखद और शुभ कंबल, मृगचर्म व अन्य रत्न भिजवाए। तथा अनेक प्रकार की बड़ी-बड़ी शय्याएँ, आसन, वाहन, और वैदूर्य तथा वज्र (हीरे) से जड़े हुए सैकड़ों पात्र भेजे। इसके अतिरिक्त रूप, यौवन और दाक्षिण्य (कुशलता) से युक्त तथा नाना देशों की सुंदर आभूषणों से अलंकृत की हुई दासियाँ भी श्रीकृष्ण ने भेंट कीं।
  • व्याख्या: जब भगवान श्रीकृष्ण को पांडवों के विवाह का समाचार मिला, तो उन्होंने द्वारका से पांडवों के लिए अनमोल मणियाँ, वस्त्र, आभूषण, सुसज्जित रथ, शय्याएँ और सेवा के लिए दासियाँ प्रचुर मात्रा में उपहारस्वरूप भेजीं।

श्लोक 17, 18 और 19:

गजान्विनीतान्भद्रांश्च सदश्वांश्च स्वलङ्कृतान्। रथांश्च दान्तान्सौवर्णैः शुभ्रैः पट्टैरलङ्कृतान्।। कोटिशश्च सुवर्णं च तेषामकृतकं तथा। वीथीकृतममेयात्मा प्राहिणोन्मधुसूदनः।। तत्सर्वं प्रतिजग्राह धर्मराजो युधिष्ठिरः। मुदा परमया युक्तो गोविन्दप्रियकाम्यया।।

  • हिन्दी अनुवाद: अमयात्मा मधुसूदन (श्रीकृष्ण) ने भद्र नस्ल के विनीत (प्रशिक्षित) हाथी, सुंदर घोड़ों से युक्त तथा स्वर्ण और श्वेत पट्टों से अलंकृत व प्रशिक्षित रथ भेजे। उन्होंने करोड़ों की संख्या में परिष्कृत (अकृतक) तथा वीथीकृत (बाजारों में प्रचलित रूप में गढ़े हुए) स्वर्ण भी भिजवाया। गोविन्द (श्रीकृष्ण) की उस प्रेम-भावना का आदर करते हुए धर्मराज युधिष्ठिर ने उस समस्त उपहार को परम प्रसन्नता के साथ ग्रहण किया।
  • व्याख्या: श्रीकृष्ण ने हाथियों, घोड़ों, स्वर्ण और धन-दौलत का अथाह भंडार पांडवों के विवाह पर भेजा, जिसे युधिष्ठिर ने प्रेमपूर्वक स्वीकार किया। इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 'वैवाहिकपर्व' का यह अंतिम अध्याय तथा संपूर्ण वैवाहिकपर्व पूर्ण होता है।
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