महाभारत्-०१ आदिपर्व -२१७

महाभारत्-०१ आदिपर्व -२१७

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 217वें अध्याय का सारांश और दार्शनिक/राजनीतिक विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय से स्वयंवर और विवाह की घटनाओं के पश्चात कौरव शिविर में उत्पन्न हलचल तथा भावी नीति पर संवाद का आरंभ होता है।

217वें अध्याय का मुख्य सारांश

1. पांडवों के जीवित होने की सूचना और गुप्तचरों की रिपोर्ट

राजाओं और दुर्योधन के गुप्तचरों द्वारा यह समाचार कौरवों तक पहुँचता है कि स्वयंवर में धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्य वेध करने वाला वीर कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं अर्जुन थे। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि मद्रराज शल्य को मल्लयुद्ध में परास्त करने वाले भीमसेन थे, तथा कुंती और अन्य पांडव लाक्षागृह की भयंकर दुर्घटना से पूरी तरह सुरक्षित निकलकर जीवित हैं।

इस समाचार के सामने आते ही समस्त क्षत्रिय समाज और कौरव शिविर में भारी आश्चर्य फैल जाता है। लोग धृतराष्ट्र और पुरोचन के छल-कपट की निंदा करने लगते हैं और पांडवों के धार्मिक व सदाचारी स्वभाव की प्रशंसा करते हैं।

2. शकुनि की कुटिल नीति और पांडवों पर पुनः आक्रमण का प्रस्ताव

पांडवों के सुरक्षित होने और द्रुपद जैसी शक्तिशाली सत्ता के साथ उनके वैवाहिक संबंध बन जाने से कौरव अत्यंत चिंतित हो उठते हैं। शकुनि (सौबल) दुर्योधन और कर्ण के सामने अपनी नीति रखते हुए कहता है:

  • पांडवों को अभी शक्ति संचित करने का अवसर नहीं देना चाहिए।
  • इससे पहले कि यादव (श्रीकृष्ण और बलराम) तथा अन्य राजा (जैसे शिशुपाल आदि) पांडवों के पक्ष में पूरी तरह संगठित हो जाएँ, पांडवों पर अचानक आक्रमण करके उनका दमन कर देना चाहिए।
  • शकुनि का तर्क था कि यदि शत्रु को प्रारंभ में ही समाप्त न किया गया, तो भविष्य में वे कौरवों के लिए भयंकर संकट बन जाएँगे।

3. भूरीश्रवा (सोमदत्त पुत्र) द्वारा नीतिगत प्रतिवाद और शांति का सुझाव

शकुनि के इस उग्र और अविवेकी विचार का विरोध करते हुए भूरिश्रवा (सोमदत्त के पुत्र) राजनीति और 'षड्गुण' नीति के आधार पर अपनी बात रखते हैं:

  • पांडवों की शक्ति का आकलन: पांडव न केवल शारीरिक दृष्टि से पराक्रमी हैं, बल्कि वे प्रजा के अत्यंत प्रिय हैं। अर्जुन की वाणी, युधिष्ठिर का धर्म और भीम का बल उन्हें सर्वप्रिय बनाता है।
  • द्रुपद का सुदृढ़ दुर्ग: कांपिल्य (पांचाल की राजधानी) अत्यंत सुरक्षित, विशाल प्राचीरों, यंत्रों और सेना से सुसज्जित है। ऐसे शक्तिशाली राजा और उनके समर्थकों पर आक्रमण करना आत्मघाती सिद्ध होगा।
  • श्रीकृष्ण का संरक्षण: पांडवों के पीछे भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की शक्ति खड़ी है, जिन्हें परास्त करना असंभव है।
  • उचित नीति: भूरिश्रवा सलाह देते हैं कि क्रोध में आकर युद्ध करने के बजाय कौरवों को पांडवों के साथ संधि (समझौता) कर लेनी चाहिए और अपने-अपने राज्यों में शांतिपूर्वक लौट जाना चाहिए।

अध्याय का दार्शनिक व राजनीतिक विश्लेषण

  1. साम, दाम, भेद और दंड का संतुलन: इस अध्याय में कूटनीति के दो विपरीत दृष्टिकोण प्रस्तुत किए गए हैं। एक तरफ शकुनि का 'दंड और छल' पर आधारित उग्र दृष्टिकोण है, तो दूसरी तरफ भूरिश्रवा का 'देश-काल, बल और साम-संधि' पर आधारित विवेकपूर्ण राजनीतिक विश्लेषण।
  2. सत्य और धर्म की विजय: लाक्षागृह के षड्यंत्र के बावजूद पांडवों का जीवित बचना और द्रुपद जैसे शक्तिशाली मित्र को प्राप्त करना यह दर्शाता है कि अधर्म कितना भी प्रबल क्यों न हो, धर्मपरायणता और सत्य अंततः अपना मार्ग ढूँढ ही लेते हैं।

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 217वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में स्वयंवर के पश्चात कौरव शिविर में पांडवों के जीवित होने की खबर पहुँचने, शकुनि की आक्रमणकारी नीति और सोमदत्त के पुत्र भूरिश्रवा द्वारा शांत और विवेकपूर्ण राजनीति का उपदेश दिए जाने का वर्णन है।

श्लोक 1 से 6 (पांडवों के पराक्रम और जीवित होने की चर्चा)

श्लोक 1, 2, 3 और 4:

वैशंपायन उवाच। ततो राज्ञां चैरराप्तैः प्रवृत्तिरुपनीयत। पाण्डवैरुपसंपन्ना द्रौपदी पतिभिः शुभा।। येन तद्धनुरादाय लक्ष्यं विद्धं महात्मना। सोऽर्जुनो जयतां श्रेष्ठो महाबाणधनुर्धरः।। यः शल्यं मद्रराजं वै प्रोत्क्षिप्यापातयद्बली। त्रासयामास संक्रुद्धो वृक्षेण पुरुषान्रणे।। न चास्य संभ्रमः कश्चिadआसीत्तत्र महात्मनः। स भीमो भीमसंस्पर्शः शत्रुसेनाङ्गपातनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर राजाओं द्वारा भेजे गए गुप्तचरों (चरों) ने आकर यह समाचार पहुँचाया कि शुभलक्षणा द्रौपदी उन सभी पांडव पतियों को प्राप्त हो चुकी है। (चरों ने बताया)— "जिस महात्मा ने वह धनुष उठाकर लक्ष्य का वेधन किया था, वे जय प्राप्त करने वालों में श्रेष्ठ, महाबाण और धनुर्धर अर्जुन हैं। और जिस बलवान ने मद्रराज शल्य को उठाकर पृथ्वी पर पटक दिया था तथा जो क्रोध में भरकर रणभूमि में वृक्ष उखाड़कर पुरुषों को भयभीत कर रहा था, और युद्ध में जिनका कोई संभ्रम (घबराहट) नहीं देखा गया— वे भीमसेन भयानक स्पर्श वाले और शत्रु सेना के अंगों का पतन करने वाले हैं।"
  • व्याख्या: जब स्वयंवर के बाद गुप्तचरों ने कौरवों को यह पूरी बात बताई कि साधारण वेश में दिखने वाले वे वीर वास्तव में अर्जुन और भीम हैं, तो कौरवों को उनकी वास्तविक शक्ति का पता चला।

श्लोक 5 और 6:

योऽसावत्यक्रमीद्युध्यन्युद्धे दुर्योधनं तथा। स राजा पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यभाग्बुद्धिवर्धनः।। दुर्योधस्यावरजैर्यौ युध्येतां प्रतीपवत्। तौ यमौ वृत्तसंपन्नौ संपन्नबलविक्रमौ।।'

  • हिन्दी अनुवाद: "और जिस राजा (युधिष्ठिर) ने युद्ध में दुर्योधन का अतिक्रमण (सामना) किया था, वे पाण्डवश्रेष्ठ, पुण्यवान् और बुद्धिवर्धन राजा युधिष्ठिर हैं। तथा दुर्योधन के छोटे भाइयों के साथ जो दोनों यमुल (नकुल और सहदेव) विपरीत दिशा में युद्ध कर रहे थे, वे दोनों वृत्तसंपन्न (चारित्रिक दृष्टि से श्रेष्ठ) और बल-विक्रम से संपन्न हैं।"
  • व्याख्या: गुप्तचरों ने पांडवों के पूरे स्वरूप यानी युधिष्ठिर के नेतृत्व और नकुल-सहदेव के पराक्रम का भी विवरण राजाओं तक पहुँचाया।

श्लोक 7 से 12 (कौरवों का विस्मय, धृतराष्ट्र-भीष्म की निंदा और शकुनि का षड्यंत्र)

श्लोक 7, 8, 9, 10 और 11:

ब्रह्मरूपधराञ्श्रुत्वा प्रशान्तान्पाण्डुनन्दनान्। कौन्तेयान्मनुजेन्द्राणां विस्मयः समजायत।। पौरा हि सर्वे राजन्याः समपद्यन्त विस्मिताः।' सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता।। सर्वभूमिपतीनां च राष्ट्राणां च यशस्विनी।' पुनर्जातानिव च तांस्तेऽमन्यन्त नराधिपाः।। धिगकुर्वंस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम्। कर्मणाऽतिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै।। धार्मिकान्व वृत्तसंपन्नान्मातुः प्रियहिते रतान्। यदा तानीदृशान्पार्थानुत्सादयितुमिच्छति।।

  • हिन्दी अनुवाद: ब्राह्मण के रूप को धारण करने वाले, शांत स्वभाव वाले उन पाण्डुनंदन कौंतेयों (पांडवों) के बारे में सुनकर सभी मनुजेन्द्रों (राजाओं) को अत्यंत विस्मय हुआ। (नगर के सभी पौर और राजन्यजन भी विस्मित हो गए)। पहले यह समाचार सुना गया था कि माता कुंती अपने पुत्रों सहित लाक्षागृह में जलकर मर चुकी हैं। उन सभी भूमिपतियों और राष्ट्रों की यशस्विनी कुंती तथा पांडवों को उन नराधिपों ने ऐसा माना मानो वे पुनर्जीवित होकर आ गए हों। तब वे सब लोग पुरोचन द्वारा किए गए उस अति नृशंस (क्रूर) कर्म के लिए भीष्मजी और कौरवराज धृतराष्ट्र को धिक्कारने लगे। (वे कहने लगे कि) जो पांडव धार्मिक, सदाचारी और माता की प्रिय-हित में लगे रहने वाले हैं, ऐसे पांडवों को जो नष्ट करना चाहता है, वह धिक्कार योग्य है।
  • व्याख्या: यह जानकर कि पांडव जीवित हैं, पूरे समाज और राजाओं में धृतराष्ट्र और भीष्म के प्रति आक्रोश फैल गया कि उन्होंने लाक्षागृह का घृणित षड्यंत्र रचा था।

श्लोक 12:

ततः स्वयंवरे वृत्ते धार्तराष्ट्राश्च भारत। मन्त्रयन्ति ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिताः।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत! तदनंतर स्वयंवर की घटना घटित होने पर, कर्ण और सौबल (शकुनि) से दूषित हुए वे सभी धार्तराष्ट्र (कौरव) आपस में मिलकर मंत्रणा (षड्यंत्र) करने लगे।
  • व्याख्या: दुर्योधन, कर्ण और शकुनि पांडवों की सफलता से घबराकर आगे की चाल चलने के लिए गुप्त बैठक करते हैं।

श्लोक 13 से 23 (शकुनि की उग्र और आक्रामक नीति)

श्लोक 13, 14, 15 और 16:

शकुनिरुवाच। कश्चिच्छत्रुः कर्शनीयः पीडनीयस्तथाऽपरः। उत्सादनीयाः कौन्तेयाः सर्वक्षत्रस्य मे मताः।। एवं पराजिताः सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ। अकृत्वा संविदं कांचिन्मनस्तप्स्यत्यसंशयम्।। अयं देशश्च कालश्च पाण्डवाहरणाय नः। न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ।। यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम्। सोऽल्पवीर्यबलो राजा द्रुपदो वै मतो मम।।

  • हिन्दी अनुवाद: शकुनि ने कहा— "कोई शत्रु कृश (कमजोर) करने योग्य होता है, कोई पीड़नीय होता है, किंतु कौंतेय (पांडव) तो संपूर्ण क्षत्रिय कुल के लिए समूल नष्ट (उत्सादनीय) करने योग्य हैं, ऐसा मेरा मत है। इस प्रकार सब प्रकार से पराजित होकर यदि आप लोग बिना कोई समझौता या उपाय किए वापस लौटेंगे, तो आपका मन संशय में तपेगा (असंतोष रहेगा)। पांडवों को पकड़ने (या समाप्त करने) के लिए यही देश और काल सबसे उपयुक्त है। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे, तो संसार में उपहास के पात्र बनेंगे। जिस भूमिपति (राजा द्रुपद) का इन्होंने आश्रय लिया है और जो इनके ससुर बने हैं, वह राजा द्रुपद मेरी दृष्टि में अल्पवीर्य और अल्पबल वाला है।"
  • व्याख्या: शकुनि अपनी कुटिल प्रकृति के अनुसार दुर्योधन को भड़काता है कि पांडवों को अभी कुचल देना चाहिए, अन्यथा वे शक्तिशाली होकर कौरवों का नाश कर देंगे। वह द्रुपद को भी कमजोर आंकता है।

श्लोक 17, 18, 19, 20, 21, 22 और 23:

यावदेतान्न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुङ्गवाः। चैद्यश्च पुरुषव्याघ्रः शिशुपालः प्रतापवान्।। एकीभावं गतो राज्ञा द्रुपदेन महात्मना। दुराधर्षतरा राजन्भविष्यन्ति न संशयः।। यावच्चञ्चलतां सर्वे प्राप्नुवन्ति नराधिपाः। तावदेव व्यवस्यामः पाण्डवानां वधं प्रति।। मुक्ता जतुगृहाद्भीमादाशीविषमुखादिव। पुनस्ते यदि मुच्यन्ते महन्नो भयमागतम्।। तेषामिहोपयातानामेषां तु चिरवासिनाम्। अन्तरे दुष्करं स्थातुं गजयोर्महतोरिव।। हनध्वं प्रगृहीतानि बलानि बलिनां वराः। यावन्नः कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव।। तावत्सर्वाभिसारेण पुरमेतद्विहन्यताम्। एतन्मम मतं चैव प्राप्तकालं नरर्षभ।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जब तक वृष्णिपुंगव (श्रीकृष्ण) तथा पुरुषव्याघ्र प्रतापवान चैद्य शिशुपाल यह नहीं जानते कि पांडव जीवित हैं; और जब तक वे महात्मा राजा द्रुपद के साथ एकीभाव (गठबंधन) करके अत्यंत दुराधर्ष (अजेय) नहीं बन जाते— तब तक हमें विचार करना चाहिए। जब तक अन्य सभी नराधिप चंचलता (अस्थिरता) की स्थिति में हैं, तभी तक हमें पांडवों के वध के लिए निश्चित रूप से प्रयास करना चाहिए। वे लाक्षागृह रूपी विषैले सर्प के मुख से छूट चुके हैं, यदि वे अब फिर बच गए, तो हमारे लिए बहुत बड़ा भय आ जाएगा। यहाँ आए हुए और वहाँ चिरकाल तक निवास करने वाले इन दोनों के बीच रहना वैसे ही कठिन है जैसे दो महाबलवान हाथियों के बीच रहना। हे बलवानों में श्रेष्ठ! अपनी सेनाओं को लेकर इन पर आक्रमण कर दो, इससे पहले कि वे हमारी कुरुसेना पर पक्षियों की तरह टूट पड़ें। अतः संपूर्ण सेना के साथ इस पाञ्चाल पुरी पर आक्रमण करके इसे नष्ट कर दिया जाए। हे नरर्षभ! यही मेरा मत है और यही इस समय प्राप्तकाल (सबसे उचित) है।"
  • व्याख्या: शकुनि सलाह देता है कि इससे पहले कि श्रीकृष्ण या अन्य शक्तिशाली राजा पांडवों की मदद के लिए आ जुटें, संयुक्त सेना के साथ पांचाल पर आक्रमण करके पांडवों को समाप्त कर देना चाहिए।

श्लोक 24 से 45 (सोमदत्त पुत्र भूरिश्रवा का कूटनीतिक और शांतिकारक प्रतिवाद)

श्लोक 24, 25 और 26:

वैशंपायन उवाच। शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य दुर्मतेः। सोमदत्तिरिदं वाक्यं जगाद परमं ततः।। प्रकृतीः सप्त वै ज्ञात्वा आत्मनश्च परस्य च। तथा देशं च कालं च षड्विधान्स नयोद्गुणान्।। स्थानं वृद्धिं क्षयं चैव भूमिं मित्राणि विक्रमम्। प्रसमीक्ष्याभियुञ्जीत परं व्यसनपीडितम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— दुर्मति शकुनि के उस वचन को सुनकर सोमदत्त के पुत्र (भूरिश्रवा) ने तब यह परम उत्तम वचन कहा— "अपनी और पराई सात प्रकृतियों को जानकर, तथा देश और काल को समझकर, राजनीति के छह गुणों (संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय) का विचार करना चाहिए। स्थान, वृद्धि, क्षय, भूमि, मित्र और विक्रम— इन सभी पक्षों को अच्छी तरह परखकर ही शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए, वह भी तब जब वह किसी व्यसन (संकट) से पीड़ित हो।"
  • व्याख्या: शकुनि की उग्र युद्ध-नीति का खंडन करते हुए विवेकवान भूरिश्रवा (सोमदत्ति) राजनीति (राजधर्म और कूटनीति के सिद्धांतों) का पाठ पढ़ाते हैं कि बिना सोचे-समझें शक्तिशाली शत्रु पर आक्रमण करना मूर्खता है।

श्लोक 27, 28, 29 और 30:

ततोऽहं पाण्डवान्मन्ये मित्रकोशसमन्वितान्। बलस्थान्विक्रमस्थांश्च स्वकृतैः प्रकृतिप्रियान्।। वपुषा हि तु भूतानां नेत्राणि हृदयानि च। श्रोत्रं मधुरया वाचा रमयत्यर्जुनो नृणाम्।। न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन भेजिरे। यद्बभूव मनःकान्तं कर्मणा Sचकार तत्।। न ह्ययुक्तं न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम्। भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए मैं पांडवों को ऐसा मानता हूँ जो मित्रों और धन-कोश से संपन्न हैं, बल और पराक्रम में स्थिर हैं, तथा अपने अच्छे कर्मों से प्रजा के प्रिय हैं। अर्जुन अपने शरीर से, नेत्रों से तथा मनुष्यों के हृदयों को अपनी मधुर वाणी से सबके श्रोत्रों को आनंदित करते हैं। प्रजा ने केवल दैव (भाग्य) के कारण नहीं, बल्कि उनके सद्भाव के कारण उन्हें अपनाया है, क्योंकि उन्होंने वही कर्म किए जो सबके मन को प्रिय थे। उस सुंदर बोलने वाले पार्थ (अर्जुन) की वाणी कभी भी अयुक्त, असक्त, असत्य या किसी को अप्रिय लगने वाली नहीं होती।"
  • व्याख्या: भूरिश्रवा बताते हैं कि पांडव (विशेषकर अर्जुन) केवल भाग्य के सहारे नहीं हैं, बल्कि वे जनता के चहेते हैं, उनकी वाणी और उनके कर्म लोक-कल्याणकारी हैं, जिससे वे अजेय बन चुके हैं।

श्लोक 31, 32, 33, 34 और 35:

तानेवंगुणसंपन्नान्संपन्नान्राजलक्षणैः। न तान्पश्यामि ये शक्ताः समुच्छेत्तुं यथा बलात्।। प्रभावशक्तिर्विपुला मन्त्रशक्तिश्च पुष्कला। तथैवोत्साहशक्तिश्च पार्थेष्वप्यधितिष्ठति।। मौलमित्रबलानां च कालज्ञो वै युधिष्टिरः। साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति युधिष्ठिरः।। अमित्रांश्च ततो जेतुनं न रोषेणेति मे मतिः। परिक्रीय धनैः शत्रुं मित्राणि च बलानि च।। मूलं च सुकृतं कृत्वा भुङ्क्ते भूमिं च पाण्डवः। अशक्यान्पाण्डवान्मन्ये देवैरपि सवासवैः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इस प्रकार सभी राजलक्षणों और गुणों से संपन्न उन पांडवों को मैं ऐसा कोई नहीं देखता जो बलपूर्वक नष्ट करने में समर्थ हो। प्रभाव शक्ति, मंत्र शक्ति और उत्साह शक्ति— ये तीनों ही पांडवों में भली-भांति निवास करती हैं। युधिष्ठिर मौल (वंशपरंपरागत) और मित्र बलों के ज्ञानी तथा काल के ज्ञाता हैं। वे साम, दाम, भेद और दंड— इन चारों उपायों के ज्ञाता हैं। मेरी यह मति है कि वे शत्रुओं को क्रोध से नहीं, बल्कि अपनी नीति से जीतते हैं। शत्रुओं, मित्रों और सेनाओं को धन से खरीदकर (अपने अनुकूल करके), तथा अपने पुण्यों की जड़ मजबूत करके वे पाण्डव इस पृथ्वी का उपभोग कर रहे हैं। इसलिए मैं मानता हूँ कि सवासव (इंद्र सहित) देवताओं के लिए भी पांडवों को पराजित करना असंभव है।"
  • व्याख्या: भूरिश्रवा स्पष्ट करते हैं कि युधिष्ठिर की राजनीतिक सूझबूझ और पांडवों की त्रिविध शक्तियों (प्रभाव, मंत्र, उत्साह) के कारण उन्हें देवताओं के लिए भी हराना असंभव है।

श्लोक 36, 37, 38, 39, 40, 41, 42 और 43:

येषामर्थे सदा युक्तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ। श्रेयश्च यदि मन्यद्वं मन्मतं यदि वा मतम्।। संविदं पाण्डवैः सर्वैः कृत्वा याम यथागतम्। गोपुराट्टालकैरुच्चैरुपतल्पशतैरपि।। गुप्तं पुरवरश्रेष्ठमेतदद्भिश्च संवृतम्। तृणधान्येन्धरसैस्तथा यन्त्रायुधौषधैः।। युक्तं बहुकवाटैश्च द्रव्यागारसुवेदिकैः। भीमोच्छ्रितमहाचक्रं बृहदट्टालसंवृतम्।। दृढप्राकारनिर्यूहं शतघ्नीशतसंकुलम्। ऐष्टको दारवो वप्रो मानुषश्चेति यः स्मृतः।। प्राकारकर्तृभिर्वीरैर्नृगर्भस्तत्र पूजितः। तदेतन्नरगर्भेण पाण्डरेण विराजते।। सालेनानेकतालेन सर्वतः संवृतं पुरम्। अनुरक्ताः प्रकृतयो द्रुपदस्य महात्मनः।। दानमानार्जिताः सर्वे बाह्याभ्यन्तरगाश्च ये। प्रतिरुद्धानिमाञ्ज्ञात्वा राजभिर्भीमविक्रमैः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जिनके कार्य के लिए श्रीकृष्ण और संकर्षण (बलराम) दोनों हमेशा तत्पर रहते हैं। इसलिए चाहे आप मेरा मत श्रेष्ठ मानें या अपना मत— हमें पांडवों के साथ संधि (समझौता) करके अपने-अपने घर लौट जाना चाहिए। वह पाञ्चालपुर ऊँचे-ऊँचे गोपुरों, अट्टालिकाओं, सैकड़ों शय्याओं, उत्तम जल, तृण, धान्य, ईंधन, रस, यंत्र, अस्त्र-शस्त्र और औषधियों से पूरी तरह सुरक्षित है। वह अनेक द्वारों, कोठारों, विशाल चक्रों, सुदृढ़ प्राचीरों और सैकड़ों शतघ्नी (युद्ध यंत्रों) से सुसज्जित है। ईंटों, काष्ठों और मिट्टी से बने उस दुर्ग में वीर प्राकार-निर्माताओं द्वारा प्रजा की पूरी रक्षा की व्यवस्था की गई है। महात्मा द्रुपद की प्रजा उन पर अत्यंत अनुरक्ता (प्रेमी) है। दान और मान से जीते गए उनके आंतरिक और बाह्य सभी लोग उनके साथ हैं। भीमविक्रम राजाओं द्वारा सुरक्षित उस नगर को घेरना आसान नहीं है।"
  • व्याख्या: भूरिश्रवा याद दिलाते हैं कि पांडवों के पीछे श्रीकृष्ण-बलराम की शक्ति है और पांचाल की राजधानी कांपिल्य एक अत्यंत दुर्दमनीय और सुरक्षित दुर्ग है, जिस पर अचानक विजय पाना असंभव है।

श्लोक 44 और 45:

उपयास्यन्ति दाशार्हाः समुदग्रोच्छ्रितायुधाः। तस्मात्संन्धिं वयं कृत्वा धार्तराष्ट्रस्य पाण्डवैः।। स्वराष्ट्रमेव गच्छामो यद्याप्तं वचनं मम। एतन्मम मतं सर्वैः क्रियतां यदि रोचते। एतद्धि सुकृतं मन्ये क्षेमं चापि महीभिताम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "वहाँ दाशार्ह (यदुवंशी) अपनी उठी हुई तलवारों और आयुधों के साथ पहुँच जाएंगे। इसलिए, यदि मेरा यह वचन आपको आप्त (सत्य/उचित) प्रतीत हो, तो हम सब धार्तराष्ट्रों (कौरवों) को पांडवों के साथ संधि करके अपने राष्ट्र को लौट जाना चाहिए। यदि यह मेरा मत आप सबको रुचिकर लगे, तो ऐसा ही किया जाए। यही राजाओं के लिए सुकृत (कल्याणकारी) और क्षेमकर (सुरक्षादायक) मार्ग है।"
  • व्याख्या: अंत में भूरिश्रवा सलाह देते हैं कि युद्ध की जिद छोड़कर पांडवों के साथ संधि कर लेना ही कौरवों और समस्त राजाओं के हित में है। इसी के साथ यह अध्याय पूर्ण होता है।

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