महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 220वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में धृतराष्ट्र द्वारा विदुर से अपने कपट को छिपाने की बात स्वीकार करना और दुर्योधन द्वारा पांडवों के विनाश के लिए तरह-तरह के षड्यंत्रों के सुझाव देना वर्णित है।
श्लोक 1 से 4 (धृतराष्ट्र का अपने कपट को स्वीकार करना)
श्लोक 1, 2, 3 और 4:
वैशंपायन उवाच। दुर्योधनेनैवमुक्तः कर्णेन च विशांपते। पुत्रं च सूतपुत्रं च धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम्।। धृतराष्ट्र उवाच। अहमप्येवमेवैतच्चिकीर्षामि यथा युवाम्। विवेक्तुं नाहमिच्छामि त्वाकारं विदुरं प्रति।। ततस्तेषां गुणानेव कीर्तयामि विशेषतः। नावबुध्येत विदुरो ममाभिप्रायमिङ्गितैः।। यच्च त्वं मन्यसे प्राप्तं तद्ब्रवीहि सुयोधन। राधेय मन्यसे यच्च प्राप्तकालं वदाशु मे।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे विशांपते! दुर्योधन और कर्ण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र (दुर्योधन) और सूतपुत्र (कर्ण) से यह वचन कहा— धृतराष्ट्र बोले— "तुम दोनों जैसा चाहते हो, मैं भी बिल्कुल वैसा ही करना चाहता हूँ। किंतु मैं विदुर के सामने अपने इस मनोभाव (आकार) को प्रकट नहीं होने देना चाहता था। इसी कारण मैं विदुर के सामने पांडवों के गुणों की विशेष रूप से प्रशंसा कर रहा था, ताकि विदुर मेरे इशारों और हाव-भाव से मेरे वास्तविक अभिप्राय को न समझ सके। हे सुयोधन! तुम जो इस समय उचित समझते हो, वह बताओ। और हे राधेय! तुम इस अवसर पर जो योग्य मानते हो, वह मुझे शीघ्र बताओ।"
- व्याख्या: धृतराष्ट्र दुर्योधन और कर्ण के सामने अपना असली रूप उजागर कर देते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि विदुर के सामने पांडवों का गुणगान केवल ढोंग था, और वे भी पांडवों की शक्ति का विनाश करने के ही पक्ष में हैं।
श्लोक 5 से 10 (दुर्योधन द्वारा पांडवों में भेद डालने और प्रलोभन देने के उपाय)
श्लोक 5, 6, 7 और 8:
दुर्योधन उवाच। अद्य तान्कुशलैर्विप्रैः सुगुप्तैराप्तकारिभिः। कुन्तीपुत्रान्भेदयामो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ।। अथवा द्रुपदो राजा महद्भिर्वित्तसंचयैः। पुत्राश्चास्य प्रलोभ्यन्ताममात्याश्चैव सर्वशः।। परित्यजेद्यथा राजा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्। अथ तत्रैव वा तेषां निवासं रोचयन्तु ते।। इहैषां दोषवद्वासं वर्णयन्तु पृथक्पृथक्। ते भिद्यमानास्तत्रैव मनः कुर्वन्तु पाण्डवाः।।
- हिन्दी अनुवाद: दुर्योधन ने कहा— "आज ही हम चतुर, अत्यंत गुप्त और अपने विश्वासपात्र ब्राह्मणों द्वारा कुंतीपुत्रों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन) और माद्रीपुत्रों (नकुल, सहदेव) के बीच भेद (फूट) उत्पन्न करवा दें। अथवा राजा द्रुपद को प्रचुर धन-राशि देकर प्रलोभित करें, और उनके पुत्रों व मंत्रियों को भी सब प्रकार से वश में करें— जिससे राजा द्रुपद कुंतीपुत्र युधिष्ठिर का त्याग कर दें। या फिर वे पांडवों के मन में हस्तिनापुर आने के बजाय वहीं पांचाल में रहने की रुचि पैदा कर दें। हस्तिनापुर में रहने के अनेक दोष बताकर पांडवों के मन में भेद डाल दें ताकि वे हस्तिनापुर न आकर वहीं रुक जाएँ।"
- व्याख्या: दुर्योधन पांडवों की एकता तोड़ने और द्रुपद को धन के बल पर पांडवों से अलग करने या उन्हें हस्तिनापुर आने से रोकने का पहला कूटनीतिक षड्यंत्र रचता है।
श्लोक 9 और 10:
अथवा कुशळाः केचिदुपायनिपुणा नराः। इतरेतरतः पार्थान्भेदयन्त्वनुरागतः।। व्युत्थापयन्तु वा कृष्णां बहुत्वात्सुकरं हि तत्। अथवा पाण्डवांस्तस्यां भेदयन्तु ततश्च ताम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "अथवा कुछ अत्यंत कुशल और उपायों में निपुण मनुष्य पांडवों के बीच आपसी स्नेह में भेद डाल दें। या वे कृष्णा (द्रौपदी) को पांडवों के विरुद्ध भड़का दें— क्योंकि बहुत से (पाँच) पति होने के कारण द्रौपदी को भड़काना बहुत आसान होगा। अथवा पांडवों को द्रौपदी के प्रति और द्रौपदी को पांडवों के प्रति आशंकित व भेदयुक्त कर दें।"
- व्याख्या: दुर्योधन बहुपति विवाह को पांडवों की कमजोरी मानकर द्रौपदी और पांडवों के बीच आपसी अविश्वास उत्पन्न करने का नीच विचार रखता है।
श्लोक 11 से 17 (भीमसेन के गुप्त वध और अन्य कुटिल प्रस्ताव)
श्लोक 11, 12, 13, 14 और 15:
भीमसेनस्य वा राजन्नुपायकुशलैर्नरैः। मृत्युर्विधीयतां छन्नैः स हि तेषां बलाधिकः।। तमाश्रित्य हि कौन्तेयः पुरा चास्मान्न मन्यते। स हि तीक्ष्णश्च शूरश्च तेषां चैव परायणम्।। तस्मिंस्त्वभिहते राजन्हतोत्साहा हतौजसः। यतिष्यन्ते न राज्याय स हि तेषां व्यपाश्रयः।। अजेयो ह्यर्जुनः सङ्ख्ये पृष्ठगोपे वृकोदरे। तमृते फाल्गुनो युद्धे राधेयस्य न पादभाक्।। ते जानानास्तु दौर्बल्यं भीमसेनमृते महत्। अस्मान्बलवतो ज्ञात्वा न यतिष्यन्ति दुर्बलाः।।
- हिन्दी अनुवाद: "अथवा हे राजन्! गुप्त और छद्म उपायों में कुशल पुरुषों द्वारा भीमसेन की हत्या (गुप्त वध) करवा दी जाए, क्योंकि वही पांडवों में सबसे अधिक बलवान है। उसी भीमसेन का आश्रय लेकर कौंतेय (युधिष्ठिर) पहले भी हमें कुछ नहीं समझते थे। वह अत्यंत तीक्ष्ण, शूरवीर और उन सबका मुख्य सहारा है। उस (भीमसेन) के मारे जाने पर पांडव हतोत्साह और हततेज हो जाएँगे, फिर वे राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं करेंगे; क्योंकि वही उनका मुख्य आश्रय है। रणभूमि में पृष्ठभाग में वृकोदर (भीम) के रहते अर्जुन अजेय है, किंतु भीमसेन के बिना अर्जुन युद्ध में हमारे राधेय (कर्ण) के चरण के बराबर (समान) भी नहीं है। भीमसेन के बिना अपनी महान दुर्बलता को जानकर और हमें बलवान समझकर वे दुर्बल पांडव राज्य के लिए प्रयास ही नहीं करेंगे।"
- व्याख्या: दुर्योधन जानता था कि पांडवों की मुख्य सैन्य शक्ति भीमसेन हैं। यदि भीमसेन का गुप्त रूप से वध कर दिया जाए, तो अर्जुन एकाकी पड़ जाएँगे और पांडवों का साहस टूट जाएगा।
श्लोक 16 और 17:
इहागतेषु वा तेषु निदेशवशवर्तिषु। प्रवर्तिष्यामहे राजन्यथाशास्त्रं निबर्हणम्।।
दर्पं वा वदतां तेषां केचिदत्र मनस्विनः। द्रुपदस्यात्मजा राजन्प्रभिद्यन्ते ततः परैः।।
- हिन्दी अनुवाद: "अथवा यदि वे (पांडव) हमारी आज्ञा के वशीभूत होकर यहाँ हस्तिनापुर आ भी जाएँ, तो हे राजन्! हम शास्त्रोक्त नीति के अनुसार (छल से) उनका विनाश कर देंगे।"
- व्याख्या: दुर्योधन का स्पष्ट लक्ष्य किसी भी तरह पांडवों का समूल विनाश करना था।
श्लोक 18 से 22 (सुंदर स्त्रियों का प्रलोभन, कर्ण का मत और अध्याय का समापन)
श्लोक 18, 19, 20, 21 और 22:
अथवा दर्शनीयाभिः प्रमदाभिर्विलोभ्यताम्। एकैकस्तत्र कौन्तेयस्ततः कृष्णा विरज्यताम्।। प्रेष्यतां चैव राधेयस्तेषामागमनाय वै। तैस्तैः प्रकारैः सन्नीय पात्यन्तामाप्तकारिभिः।। एतेषामप्युपायानां यस्ते निर्दोषवान्मतः। तस्य प्रयोगमातिष्ठ पुरा कालोऽतिवर्तते।। यावद्ध्यकृतविश्वासा द्रुपदे पार्थिवर्षभे। तावदेव हि ते शक्या न शक्यास्तु ततः परम्।। एषा मम मतिस्तात निग्रहाय प्रवर्तते। साध्वी वा यदि वाऽसाध्वी किं वा राधेय मन्यसे।।
- हिन्दी अनुवाद: "अथवा अत्यंत सुंदर प्रमदाओं (स्त्रियों) द्वारा एक-एक कौंतेय को लुभाया जाए, जिससे कृष्णा (द्रौपदी) उनके प्रति विरक्त हो जाए। अथवा राधेय (कर्ण) को उन्हें (पांडवों को) यहाँ बुलाने के लिए भेजा जाए और फिर विभिन्न गुप्त तरीकों से अपने वफादार गुप्तचरों द्वारा उनका वध करवा दिया जाए। इन सभी उपायों में से जो उपाय आपको निर्दोष (सबसे सुरक्षित) लगे, उसका प्रयोग शीघ्र कीजिए, इससे पहले कि समय बीत जाए। जब तक पांडवों का उस श्रेष्ठ राजा द्रुपद पर पूरी तरह विश्वास नहीं जम जाता, तभी तक उन्हें नष्ट करना संभव है; उसके बाद उन्हें नष्ट करना असंभव होगा। हे तात! पांडवों के निग्रह (दमन) के लिए मेरी यही बुद्धि (योजनाएँ) प्रस्तुत है। चाहे यह उत्तम हो या अधम, इस विषय में राधेय (कर्ण) आप क्या मानते हैं?"
- व्याख्या: दुर्योधन पांडवों को सुंदर स्त्रियों द्वारा भटकाने, कर्ण के हाथों उन्हें बुलवाकर धोखे से मरवाने, तथा द्रुपद के साथ उनका संबंध प्रगाढ़ होने से पहले ही उन पर प्रहार करने के विभिन्न साम-दाम-दंड-भेद के उपाय रखता है, और अंत में कर्ण से उसकी राय माँगता है।
इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व का यह 220वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
