महाभारत्-०१ आदिपर्व -२२१

महाभारत्-०१ आदिपर्व -२२१

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 221वें अध्याय का व्याख्यात्मक और नीतिपरक विवरण नीचे प्रस्तुत है।

221वें अध्याय का सारांश और विश्लेषण

1. दुर्योधन की कुटिल योजनाओं का कर्ण द्वारा खंडन

दुर्योधन द्वारा पांडवों को छदम उपायों, फूट, प्रलोभन या विष-प्रयोग से नष्ट करने के प्रस्तावों को सुनकर कर्ण खुलकर असहमति व्यक्त करते हैं। कर्ण का मानना है कि पांडवों को कूटनीति या छल-छद्म से परास्त करना अब असंभव है।

कर्ण निम्नलिखित कारण प्रस्तुत करते हैं:

  • अतीत के निष्फल प्रयास: जब पांडव असहाय, अनाथ और बालक थे, तब भी हस्तिनापुर में रहते हुए दुर्योधन के किसी षड्यंत्र से वे नष्ट नहीं किए जा सके। अब जब वे शक्तिशाली और वयस्क हो चुके हैं, तब उन्हें साम या भेद से हराना संभव नहीं है।
  • पांडवों की अटूट एकता: पांडवों में भेद (फूट) डालना असंभव है, क्योंकि वे पाँचों एक ही पत्नी (द्रौपदी) के प्रति समर्पित हैं और उनका परस्पर भ्रातृ-प्रेम अत्यंत सुदृढ़ है।
  • द्रौपदी की निष्ठा: द्रौपदी को उनके पतियों से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि जब पांडव अज्ञातवास और विपत्ति में थे, तब भी द्रौपदी ने उनका साथ चुना था। अब जब वे समृद्ध और शक्तिशाली हैं, तब उन्हें भड़काना नामुमकिन है।
  • द्रुपद और धृष्टद्युम्न का चरित्र: राजा द्रुपद धर्मनिष्ठ हैं और धन या राज्य के प्रलोभन में आकर पांडवों का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। धृष्टद्युम्न भी पांडवों के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।

2. कर्ण द्वारा प्रत्यक्ष युद्ध का प्रस्ताव (क्षत्रिय धर्म)

छल-कपट के बजाय कर्ण क्षत्रिय धर्म के अनुकूल प्रत्यक्ष युद्ध का मार्ग प्रस्तावित करते हैं। कर्ण कहते हैं कि जब तक पांडव और उनके सहयोगी पांचाल में अपनी जड़ें पूरी तरह मजबूत नहीं कर लेते, तब तक कौरवों को चतुरंगिणी सेना लेकर तुरंत पांचाल पर आक्रमण कर देना चाहिए।

कर्ण की युद्ध-नीति के मुख्य बिंदु:

  • त्वरित निर्णय का महत्व: इससे पहले कि श्रीकृष्ण अपनी विशाल यादव सेना लेकर पांडवों की सहायता के लिए पांचाल पहुँचें, कौरवों को आक्रमण कर देना चाहिए।
  • बाहुबल का गौरव: क्षत्रियों का वास्तविक धर्म वीरता और बाहुबल से विजय प्राप्त करना है। महात्मा भरत और इंद्र दोनों ने पराक्रम से ही अपनी सत्ता स्थापित की थी।
  • अंतिम समाधान: पांडवों को केवल सैन्य बल और पराक्रम से ही दबाया जा सकता है, इसलिए अविलंब युद्ध की तैयारी की जानी चाहिए।

3. धृतराष्ट्र का निर्णय और भीष्म-द्रोण-विदुर से परामर्श की सहमति

कर्ण का ओजस्वी और ओजपूर्ण भाषण सुनकर राजा धृतराष्ट्र उनकी शूरवीरता और निष्ठा की प्रशंसा करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि एक महान अस्त्रवेत्ता के योग्य ही कर्ण ने यह विचार रखा है।

किंतु, धृतराष्ट्र कोई भी अंतिम कदम उठाने से पूर्व कुरुवंश के वरिष्ठ संरक्षकों— पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य और महामति विदुर— से परामर्श करना आवश्यक समझते हैं। इसके बाद धृतराष्ट्र हस्तिनापुर के मुख्य सभासदों और मंत्रियों की बैठक बुलाने का निर्देश देते हैं।

दार्शनिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण

  • रणनीतिक अंतर (दुर्योधन बनाम कर्ण): दुर्योधन जहाँ कूटनीति, विष-प्रयोग और कपट को प्राथमिकता देता है, वहीं कर्ण एक योद्धा की भाँति प्रत्यक्ष युद्ध और क्षत्रिय पराक्रम में विश्वास रखते हैं।
  • विवेक की आवश्यकता: धृतराष्ट्र यद्यपि पांडवों के प्रति ईर्ष्या रखते हैं, फिर भी भीष्म, द्रोण और विदुर जैसे ज्ञानी और अनुभवी वृद्धों की सलाह के बिना कोई सीधा सैन्य अभियान शुरू करने से हिचकिचाते हैं।

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 221वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में कर्ण दुर्योधन की कुटिल और छद्म योजनाओं का खंडन करते हैं तथा पांचाल पर तुरंत सैन्य बल से प्रत्यक्ष आक्रमण करने का पराक्रमी प्रस्ताव रखते हैं।

श्लोक 1 से 10 (कर्ण द्वारा दुर्योधन की छद्म योजनाओं का खंडन)

श्लोक 1, 2, 3 और 4:

कर्ण उवाच। दुर्योधन तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः। न ह्युपायेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुवर्धन।। पूर्वमेव हि ते सूक्ष्मैरुपायैर्यतितास्त्वया। निग्रहीतुं तदा वीर न चैव शकितास्त्वया।। इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव। अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव बाधितुम्।। जातपक्षा विदेशस्था विवृद्धाः सर्वशोऽद्य ते। नोपायसाध्याः कौन्तेया ममैषा मतिरच्युता।।

  • हिन्दी अनुवाद: कर्ण ने कहा— "हे कुरुवर्धन दुर्योधन! तुम्हारी बुद्धि ठीक है— ऐसा मेरा मत नहीं है; क्योंकि पांडव उपायों (छल-कपट) से तुम्हारे वश में करने योग्य नहीं हैं। हे वीर! पहले भी तुमने सूक्ष्म (गुप्त) उपायों द्वारा उन्हें अपने अधीन करने का यत्न किया था, किंतु तब भी तुम उन्हें वश में नहीं कर सके थे। जब वे यहीं तुम्हारे समीप ही थे और उस समय पंखहीन (अजातपक्ष) छोटे बालक थे, तब भी तुम उन्हें बाधित (नष्ट) करने में समर्थ नहीं हो सके। और आज तो वे पंख निकल आने वाले पक्षियों की भाँति (वयस्क होकर) विदेश में निवास करते हुए सब प्रकार से बढ़ चुके हैं, इसलिए वे कौंतेय (पांडव) किसी भी उपाय (छल) से साध्य नहीं हैं— यह मेरी अचल मति है।"
  • व्याख्या: कर्ण दुर्योधन को समझाते हैं कि जब पांडव बच्चे थे और हस्तिनापुर में थे, तब भी लाक्षागृह जैसे षड्यंत्र विफल हो गए थे। अब वे पांचाल में शक्तिशाली और समर्थ हो चुके हैं, अतः उन्हें छल से हराने की सोचना व्यर्थ है।

श्लोक 5, 6, 7 और 8:

न च ते व्यसनैर्योक्तुं शक्या दिष्टकृतेन च। शकिताश्चेप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम्।। परस्परेण भेदश्च नाधातुं तेषु शक्यते। एकस्यां ये रताः पत्न्यां न भिद्यन्ते परस्परम्।। न चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदयितुं परैः। परिद्यूनान्वृतवती किमुताद्य मृजावतः।। ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता। तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदयितुं क्षमा।।

  • हिन्दी अनुवाद: "और न तो वे दैवकृत संकटों से ही गिराए जा सकते हैं, क्योंकि वे अपने पिता-पदादा के पद (राज्य) को पाने की इच्छा रखते हुए समर्थ हो चुके हैं। उनमें आपस में भेद (फूट) डालना भी संभव नहीं है, क्योंकि जो एक ही पत्नी में अनुरक्त हैं, वे परस्पर कभी भिन्न नहीं हो सकते। और न ही कृष्णा (द्रौपदी) को दूसरों द्वारा उन पांडवों से अलग किया जा सकता है; क्योंकि जब वे सर्वस्व हार चुके थे (द्यूत में पराजित और वनवासी थे), तब उसने उनका वरण किया था— फिर आज तो वे स्वच्छ और वैभवशाली हैं, तब वह कैसे अलग हो सकती है? एक ही स्त्री के बहुत से पति होने का जो गुण स्त्रियों को अभीष्ट होता है, उसे कृष्णा ने प्राप्त कर लिया है, अतः वह भी किसी के द्वारा भड़काने योग्य नहीं है।"
  • व्याख्या: कर्ण स्पष्ट करते हैं कि पांडवों में आपसी फूट डालना या द्रौपदी को उनके विरुद्ध भड़काना असंभव है, क्योंकि उनका प्रेम और द्रौपदी की निष्ठा अत्यंत दृढ़ है।

श्लोक 9 और 10:

आर्यव्रतश्च पाञ्चाल्यो न S राजा धनप्रियः। न संत्यक्ष्यति कौन्तेयान्राज्यदानैरपि ध्रुवम्।। तथाऽस्म पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान्। तस्मान्नोपायसाध्यांस्तानहं मन्ये कथंचन।।

  • हिन्दी अनुवाद: "और पाञ्चालराज द्रुपद भी आर्यव्रती और सत्यप्रतिज्ञ हैं, वे धनप्रिय नहीं हैं। वे राज्य के प्रलोभन से भी कभी कौंतेयों का त्याग नहीं करेंगे। तथा उनके गुणवान पुत्र (धृष्टद्युम्न आदि) भी पांडवों के प्रति पूरी तरह अनुरक्त हैं। इसलिए मैं किसी भी प्रकार से यह नहीं मानता कि वे पांडव छल-छद्म के उपायों से वश में किए जा सकते हैं।"
  • व्याख्या: कर्ण राजा द्रुपद और उनके पुत्रों की निष्ठा का भी हवाला देते हैं कि वे धन या प्रलोभन से बिकने वाले नहीं हैं, इसलिए कूटनीति के ये सारे नुस्खे फेल हो जाएंगे।

श्लोक 11 से 21 (कर्ण द्वारा प्रत्यक्ष युद्ध और पराक्रम का प्रस्ताव)

श्लोक 11, 12, 13, 14 और 15:

इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ। यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेया विशांपते।। तावत्प्रहरणीयास्ते तत्तुभ्यं तात रोचताम्। अस्मत्पक्षो महान्यावद्यावत्पाञ्चालको लघुः। तावत्प्रहरणं तेषां क्रियतां मा विचारय।। वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि च कुलानि च। यावन्न तेषां गान्धारे तावद्विक्रम पार्थिव।। यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः। सह पुत्रैर्महावीर्यैस्तावद्विक्रम पार्थिव।। यावन्नायाति वार्ष्णेयः कर्षन्यादववाहिनीम्। राज्यार्थे पाण्डवेयानां पाञ्चाल्यसदनं प्रति।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे पुरुषर्षभ विशांपते! इस समय हमारे लिए यही करने योग्य क्षम (उचित) है कि जब तक वे पाण्डवेय (पांडव) अपनी जड़ें मजबूत (सुदृढ़) नहीं कर पाते, तभी तक उन पर प्रहार किया जाए— हे तात! तुम्हें यही बात अच्छी लगनी चाहिए। जब तक हमारा पक्ष महान (विशाल) है और पांचाल का पक्ष छोटा (सीमित) है, तभी तक उन पर प्रहार कर डालो, इसमें विचार मत करो। हे गांधारनंदन (दुर्योधन)! जब तक उनके पास प्रचुर वाहन, मित्र और कुल (सहायक) एकत्रित नहीं होते, और जब तक राजा द्रुपद अपने महावीर्यवान पुत्रों के साथ युद्ध का उद्यम नहीं करते, और जब तक वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण) यादव सेना को खींचकर पांडवों के राज्य के लिए पांचाल के घर नहीं आ जाते— तभी तक हे पार्थिव! तुम अपना पराक्रम दिखाओ!"
  • व्याख्या: कर्ण सलाह देते हैं कि इससे पहले कि श्रीकृष्ण अपनी यादव सेना के साथ पांडवों की सहायता के लिए पहुँचें और पांचाल की शक्ति और अधिक सुदृढ़ हो, कौरवों को तुरंत पांचाल पर आक्रमण कर देना चाहिए।

श्लोक 16, 17, 18, 19, 20 और 21:

वसूनि विविधान्भोगान्राज्यमेव च केवलम्। नात्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे कथंचन।। विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना। विक्रमेण च लोकांस्त्रीञ्जितवान्पाकशासनः।। विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रियस्य विशांपते। स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ।। ते बलेन वयं राजन्महता चतुरङ्गिणा। प्रमथ्य द्रुपदं शीघ्रमानयामेह पाण्डवान्।। न हि साम्ना न दानेन न भदेन च पाण्डवाः। शक्याः साधयितुं तस्माद्विक्रमेणैव ताञ्जहि।। तानविक्रमेण जित्वेमामखिलां भुङ्क्ष्व मेदिनीम्। अतो नान्यं प्रपश्यामि कार्योपायं जनाधिप।।

  • हिन्दी अनुवाद: "क्योंकि पांडवों के हित के लिए श्रीकृष्ण अपना धन, विविध भोग और संपूर्ण राज्य भी त्यागने में संकोच नहीं करेंगे (वे सब कुछ झोंक देंगे)। महात्मा भरत ने पराक्रम (विक्रम) से ही पृथ्वी प्राप्त की थी, और पाकशासन (इंद्र) ने पराक्रम से ही तीनों लोकों को जीता था। हे विशांपते! क्षत्रिय का पराक्रम ही उसकी प्रशंसा का कारण बनता है, और हे पार्थिवर्षभ! पराक्रम ही शूरवीरों का अपना सनातन धर्म है। इसलिए हे राजन्! हम अपनी विशाल चतुरंगिणी सेना के बल पर पांचालराज द्रुपद को मथकर (पराजित करके) उन पांडवों को शीघ्र ही यहाँ खींच लाएँ। पांडव न तो साम से, न दान से और न ही भेद से वश में करने योग्य हैं, अतः केवल पराक्रम से ही उनका वध करो (उन्हें जीतो)। उन पांडवों को पराक्रम से जीतकर इस संपूर्ण पृथ्वी का उपभोग करो— हे जनाधिप! इसके अलावा मैं कार्य की सिद्धि का दूसरा कोई उपाय नहीं देखता।"
  • व्याख्या: कर्ण अंत में क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराते हुए कहते हैं कि बाहुबल और पराक्रम ही एकमात्र मार्ग है। साम, दाम और भेद पांडवों पर काम नहीं करेंगे, इसलिए चतुरंगिणी सेना से पांचाल पर आक्रमण करके पांडवों को परास्त करना ही बुद्धिमत्ता है।

श्लोक 22 से 25 (धृतराष्ट्र की प्रतिक्रिया और मंत्रिपरिषद की बैठक)

श्लोक 22, 23, 24 और 25:

वैशंपायन उवाच। श्रुत्वा तु राधेयवचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान्। अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमब्रवीत्।। उपपन्नं महाप्राज्ञे कृतास्त्रे सूतनन्दने। त्वयि विक्रमसंपन्नमिदं वचनमीदृशम्।। भूय एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव च। युवां च कुरुतं बुद्धिं भवेद्या नः सुखोदया।। तत आनाय्य तान्सर्वान्मन्त्रिणः सुमहायशाः। धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रयामास वै तदा।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— राधेय (कर्ण) के उस वचन को सुनकर प्रतापवान राजा धृतराष्ट्र ने उनकी प्रशंसा की और तत्पश्चात यह वचन कहा— "महाज्ञानी और अस्त्रविद्या में निपुण सूतनंदन तुममें यह पराक्रमयुक्त वचन अत्यंत शोभा देता है और यह सर्वथा उपयुक्त है। किंतु इस विषय में हम भीष्म, द्रोण, विदुर तथा तुम दोनों (दुर्योधन और कर्ण) मिलकर ऐसी बुद्धि (निर्णय) करें जिससे आगे चलकर हमें सुख प्राप्त हो।" महाराज धृतराष्ट्र ने तब उन सभी महायशस्वी मंत्रियों (भीष्म, द्रोण, विदुर आदि) को बुलवाकर उस विषय में मंत्रणा (विचार-विमर्श) की।
  • व्याख्या: धृतराष्ट्र कर्ण के वीरतापूर्ण विचारों की सराहना तो करते हैं, किंतु तुरंत युद्ध का आदेश देने के स्थान पर कुरुवंश के वरिष्ठ एवं अनुभवी मार्गदर्शक— पितामह भीष्म, गुरु द्रोण और विदुर— को भी इस उच्च स्तरीय परामर्श में सम्मिलित करने का निर्णय लेते हैं। इसी के साथ यह 221वाँ अध्याय पूर्ण होता है।

          Previous.           index.         Next