महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 222वें अध्याय में पितामह भीष्म का अत्यंत नीतिपूर्ण, ओजस्वी और धर्मसंगत वक्तव्य वर्णित है।
नीचे इस पूरे अध्याय के श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और उसकी व्याख्या क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत है:
अध्याय 222: पितामह भीष्म का उपदेश और राज्य विभाजन का प्रस्ताव
श्लोक 1 से 3: (पांडवों और धृतराष्ट्रपुत्रों के प्रति भीष्म की समदृष्टि)
- श्लोक 1, 2 और 3:
भीष्म उवाच। न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथंचन। यथैव धृतराष्ट्रो मे तथा पाण्डुरसंशयम्।। गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीसुता मम। यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव।। यथा च मम राज्ञश्च तथा दुर्योधनस्य ते। तथा कुरूणां सर्वेषामन्येषामपि पार्थिव।।
- हिन्दी अनुवाद: पितामह भीष्म ने कहा— "पांडु के पुत्रों के साथ युद्ध करना मुझे किसी भी प्रकार स्वीकार (रुचिकर) नहीं है। इसमें कोई संशय नहीं कि जैसे धृतराष्ट्र मेरे पुत्र समान हैं, वैसे ही पांडु भी थे। गांधारी के पुत्र जिस प्रकार मेरे पोते हैं, उसी प्रकार कुंती के पुत्र भी मेरे ही पोते हैं। हे धृतराष्ट्र! जिस प्रकार उनकी रक्षा करना मेरा धर्म है, उसी प्रकार तुम्हारा भी है। जैसे वे मेरे और तुम्हारे लिए प्रिय हैं, वैसे ही दुर्योधन के लिए तथा समस्त कुरुवंशियों और अन्य राजाओं के लिए भी वे रक्षणीय हैं।"
- व्याख्या: पितामह भीष्म स्पष्ट करते हैं कि कुरुश्रेष्ठ होने के नाते पांडव और कौरव दोनों उनके लिए समान हैं। भीष्म दुर्योधन और धृतराष्ट्र को याद दिलाते हैं कि पांडवों से शत्रुता करना पूरे कुरुवंश के विनाश को निमंत्रण देना है।
श्लोक 4 से 8: (पैतृक अधिकार और आधा राज्य देने का परामर्श)
- श्लोक 4, 5, 6, 7 और 8:
एवं गते विग्रहं तैर्न रोचे सन्धाय वीरैर्दीयतामर्धभूमिः। तेषामपीदं प्रपितामहानां राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम्।। दुर्योधन यथा र्जायं त्वमिदं तात पश्यसि। मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः।। यदि राज्यं न ते प्राप्तः पाण्डवेया यशस्विनः। कुत एव तवापीदं भारतस्यापि कस्यचित्।। अधर्मेण च राज्यं त्वं प्राप्तवान्भरतर्षभ। तेऽपि राज्यमनुप्राप्तः पूर्वमेवेति मे मतिः।। मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीयताम्। एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च।।
- हिन्दी अनुवाद: "ऐसी स्थिति में उन वीर पांडवों से युद्ध मुझे उचित नहीं लगता। उनके साथ संधि करके आधा राज्य उन्हें दे दिया जाए। कुरुश्रेष्ठ पांडवों का भी यह राज्य उनके दादा, परदादा और पिता के समय से ही चला आ रहा है। हे तात दुर्योधन! जिस प्रकार तुम इस राज्य को 'यह मेरा पैतृक राज्य है' ऐसा मानते हो, उसी प्रकार वे पांडव भी इसे अपना पैतृक राज्य मानते हैं। यदि वे यशस्वी पांडव राज्य प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हैं, तो तुम्हारे लिए या भारतवंश के किसी अन्य व्यक्ति के लिए भी यह राज्य कैसे हो सकता है? हे भरतश्रेष्ठ! तुमने तो अधर्म से यह राज्य प्राप्त किया है, जबकि मेरी दृष्टि में पांडव पहले से ही इस राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं। इसलिए प्रेमपूर्वक (मधुरता से) ही उन्हें आधा राज्य दे दिया जाना चाहिए। हे पुरुषसिंह! यही संपूर्ण प्रजा के हित में है।"
- व्याख्या: भीष्म न्याय और धर्म का पक्ष लेते हुए स्पष्ट कहते हैं कि हस्तिनापुर के राज्य पर पांडवों का भी उतना ही अधिकार है जितना कौरवों का। वे दुर्योधन को सलाह देते हैं कि बिना किसी विरोध के पांडवों को उनका न्यायोचित आधा राज्य सौंप दिया जाए।
श्लोक 9 से 12: (यश-कीर्ति की रक्षा का संदेश)
- श्लोक 9, 10, 11 और 12:
अतोऽन्यथा चेत्क्रियते न हितं नो भविष्यति। तवाप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः।। कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं बलम्। नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफळं स्मृतम्।। यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव। तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति।। तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम्। अनुरूपं महाबाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु।।
- हिन्दी अनुवाद: "यदि इसके विपरीत आचरण किया गया तो हमारा कोई हित नहीं होगा, और इसमें कोई संशय नहीं कि सर्वत्र तुम्हारी भारी अपकीर्ति (अपयश) होगी। तुम अपनी कीर्ति की रक्षा में लगो, क्योंकि यश ही मनुष्य का परम बल होता है। जिस मनुष्य का यश नष्ट हो जाता है, उसका जीवन व्यर्थ माना गया है। हे गांधारिनंदन कौरव! जब तक मनुष्य का यश नष्ट नहीं होता, तभी तक वह जीवित रहता है; यश नष्ट होने पर तो जीवित व्यक्ति भी मृत समान हो जाता है। इसलिए हे महाबाहो! अपने पूर्वजों और अपने कुल के अनुरूप कुरुवंश के उचित धर्म का आचरण करो।"
- व्याख्या: पितामह दुर्योधन को चेताते हैं कि छल-कपट और अधर्म से पाई गई सत्ता केवल अपकीर्ति लाती है। सच्चे क्षत्रिय के लिए कीर्ति ही सबसे बड़ा धन है, इसलिए कुरुवंश की परंपरा के अनुसार धर्म का मार्ग चुनना चाहिए।
श्लोक 13 से 19: (पांडवों का पुनर्जन्म और अंतिम निष्कर्ष)
- श्लोक 13, 14, 15, 16, 17, 18 और 19:
दिष्ट्या ध्रियन्ते पार्था हि दिष्ट्या जीवति सा पृथा। दिष्ट्या पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययं गतः।। यदाप्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः। तदाप्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम्।। लोके प्राणभृतां किंचिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम्। न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत्पुरोचनम्। यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति।। तदिदं जीवितं तेषां तव किल्बिषनाशनम्। संमन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम्।। न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन। पित्र्योंशः शक्य आदातुमपि वज्रभृता स्वयं।। ते सर्वेऽवस्थिता धर्मे सर्वे चैवैकचेतसः। अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः।। यदि धर्मस्त्वया कार्यो यदि कार्यं प्रियं च मे। क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेषामर्धं प्रदीयताम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "यह बड़े सौभाग्य की बात है कि पांडव जीवित हैं, माता कुंती जीवित हैं, और वह पापी पुरोचन अपनी कुटिल मनोकामना पूरी न कर सका और मारा गया! हे गांधारिनंदन! जब से यह समाचार सुना था कि कुंती और उनके पुत्र जलकर मर गए हैं, तब से मैं लोक में किसी प्राणी की ओर आँख उठाकर देखने में भी लज्जित अनुभव कर रहा था। कुंती की वैसी दुर्गति सुनकर संसार पुरोचन को उतना दोषी नहीं मानता था, जितना हे पुरुषव्याघ्र! संसार तुम्हें दोषी ठहरा रहा था। इसलिए उन पांडवों का जीवित होना और उनका पुनः दिखाई देना तुम्हारे पापों का नाश करने वाला है। हे कुरुनंदन! उन शूरवीर पांडवों के जीवित रहते स्वयं इंद्र भी उनका पैतृक अंश नहीं छीन सकते। वे सभी धर्म में स्थित हैं, परस्पर एकाग्रचित्त हैं, और धर्मतः राज्य के बराबर के अधिकारी होने पर भी अधर्मपूर्वक निकाल दिए गए थे। इसलिए यदि तुम्हें धर्म का पालन करना है, यदि मेरा प्रिय करना है और राज्य का कल्याण चाहते हो, तो उन पांडवों को आधा राज्य दे दो!"
- व्याख्या: भीष्म जी खुलकर कहते हैं कि लाक्षागृह के षड्यंत्र से दुर्योधन और कौरवों के सिर पर जो महापाप और कलंक लगा था, पांडवों के जीवित रहने से वह धोने का अवसर मिला है। पांडव धर्म पर टिके हैं और अजेय हैं, इसलिए उन्हें आधा राज्य देकर शांति स्थापित करना ही एकमात्र धर्मसंगत मार्ग है।
इसी के साथ 222वाँ अध्याय समाप्त होता है।
