महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत अर्जुनवनवासपर्व के 235वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है।
इस अध्याय में नागलोक से लौटने के बाद अर्जुन की तीर्थयात्रा, विभिन्न पवित्र नदियों व आश्रमों के दर्शन, कलिंग और महेंद्र पर्वत होते हुए मणिपूर (मणलूर) पहुँचना, राजा चित्रवाहन की सुपुत्री चित्राङ्गदा से भेंट, 'पुत्रिका-धर्म' के नियम के तहत उनसे विवाह और मणिपुर में तीन माह तक निवास का वर्णन है।
श्लोक 1 से 11: (हिमालय की घाटियों, तीर्थों और पूर्व दिशा की यात्रा)
श्लोक 1, 2, 3, 4 और 5:
वैशंपायन उवाच। कथयित्वा च तत्सर्वं ब्राह्मणेभ्यः स भारत। प्रययौ हिमवत्पार्श्वं ततो वज्रधरात्मजः।। अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम्। भृगुतुङ्गे च कौन्तेयः कृतवाञ्शौचमात्मनः।। प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनी च भारत। निवे शांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत्कुरुसत्तमः।। हिरण्यबिन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः। दृष्टवान्पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च।। अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत। प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भारत! वह सब वृत्तांत अपने साथ आए ब्राह्मणों को सुनाकर इंद्रपुत्र अर्जुन वहाँ से हिमालय के पार्श्व भाग (घाटी) की ओर चले। 'अगस्त्यवट' पहुँचकर, वसिष्ठ पर्वत पर तथा 'भृगुतुंग' तीर्थ पर कौंतेय अर्जुन ने अपना शौच-स्नान (पवित्र अनुष्ठान) किया। हे कुरुसत्तम! अर्जुन ने वहाँ ब्राह्मणों को हज़ारों गायें और निवास स्थान (आवास) दान में दिए। पुरुषोत्तम पांडवश्रेष्ठ अर्जुन ने 'हिरण्यबिंदु' तीर्थ में स्नान करके पवित्र देवालयों और आश्रमों के दर्शन किए। तत्पश्चात वे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ब्राह्मणों के साथ हिमालय से उतरकर पूर्व दिशा की ओर यात्रा करने के लिए प्रस्थान कर गए।
- व्याख्या: अर्जुन ने अपनी तीर्थयात्रा के दौरान निरंतर जप, दान और ऋषियों के आश्रमों में सेवा का संकल्प बनाए रखा।
श्लोक 6, 7, 8, 9, 10 और 11:
आनुपूर्व्येण तीर्थानि दृष्टवान्कुरुसत्तमः। नदीं चोत्पलिनीं रम्यामरण्यं नैमिषं प्रति।। नन्दामपरनन्दां च कौशिकीं च यशस्विनीम्। महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत।। एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाश्रमान्। आत्मनः पावनं कुर्वन्ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः।। अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित्। जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च।। दृष्ट्वा च विधिवत्तानि धनं चापि ददौ ततः। कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः। अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत।। स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः। सहायैरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः।।
- हिन्दी अनुवाद: कुरुसत्तम अर्जुन ने क्रम से सभी तीर्थों के दर्शन किए। वे नैमिषारण्य के पास बहने वाली रमणीय 'उत्पलिनी' नदी, नंदा, अपरनंदा, यशस्विनी कौशिकी, महानदी, गया और गंगा जी के दर्शन करने पहुँचे। इस प्रकार सभी तीर्थों और आश्रमों के दर्शन करते हुए, अपनी आत्मा को पवित्र करते हुए उन्होंने ब्राह्मणों को प्रचुर गो-दान दिए। अंग, बंग और कलिंग देशों में जितने भी पवित्र तीर्थ और देवालय थे, उन सबमें वे गए। विधिपूर्वक दर्शन करके उन्होंने वहाँ अपार धन दान दिया। हे भारत! कलिंग देश की सीमा (द्वार) पर अर्जुन के साथ आए हुए ब्राह्मणों ने कौंतेय अर्जुन से विदाई ली और वापस लौट गए। उन ब्राह्मणों से अनुमति पाकर वीर कुंतीपुत्र धनंजय अपने थोड़े से सहायकों के साथ समुद्र (तट) की ओर आगे बढ़े।
- व्याख्या: उत्तर भारत के प्रसिद्ध तीर्थों (नैमिषारण्य, गया, गंगा-तट आदि) से होते हुए अर्जुन पूर्वी भारत (अंग, बंग और कलिंग) पहुँचे, जहाँ से अन्य साथी ब्राह्मणों को विदा कर वे आगे बढ़े।
श्लोक 12 से 18: (महेंद्र पर्वत, दक्षिण तट और मणलूर/मणिपूर में चित्राङ्गदा से भेंट)
श्लोक 12, 13, 14, 15, 16, 17 और 18:
स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च। हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः।। महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम्। गोदावर्यां ततः स्नात्वा तामतीत्य महाबलः।। कावेरीं तां समासाद्य सङ्गमे सागरस्य च। स्नात्वा संपूज्य देवांश्च पितॄंश्च मुनिभिः सह।। समुद्रतीरेण शनैर्मणलूरं जगाम ह।। तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च। अभिगम्य महाबाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम्।। मणलूरेश्वरं राजन्धर्मज्ञं चित्रवाहनम्। तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना।। तां ददर्श पुरे तस्मिन्विचरन्तीं यदृच्छया। दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहनीम्।।
- हिन्दी अनुवाद: वे प्रभु अर्जुन कलिंग देश को पार करके अनेक रमणीय महलों और तीर्थों को देखते हुए आगे बढ़े। तपस्वियों से सुशोभित महेंद्र पर्वत के दर्शन कर, महाबली अर्जुन ने गोदावरी में स्नान किया और उसे पार किया। फिर कावेरी नदी के तट पर समुद्र-संगम के पास स्नान करके मुनियों के साथ देवताओं और पितरों का पूजन किया। तत्पश्चात समुद्र तट के किनारे-किनारे चलते हुए वे 'मणलूर' (मणिपूर) पहुँचे। वहाँ सभी तीर्थों और पवित्र स्थलों के दर्शन करके महाबाहु अर्जुन मणलूर के धर्मज्ञ राजा 'चित्रवाहन' के पास गए। राजा चित्रवाहन की 'चित्राङ्गदा' नाम की एक अत्यंत सुंदर और सुदर्शन सुपुत्री थी। उस नगर में स्वेच्छा से घूमती हुई उस राजकुमारी को अर्जुन ने देखा। उस वरारोहा चित्रवाहन-पुत्री चित्राङ्गदा को देखते ही अर्जुन के मन में उसके प्रति अनुराग (काम/प्रेम) उत्पन्न हो गया।
- व्याख्या: अर्जुन कलिंग और महेंद्र पर्वत से दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट के रास्ते मणिपूर (मणलूर) पहुँचे। वहाँ की राजकुमारी चित्राङ्गदा के सौंदर्य और तेज से अर्जुन प्रभावित हुए।
श्लोक 19 से 28: (चित्रवाहन-अर्जुन संवाद, पुत्रिका-धर्म और विवाह)
श्लोक 19, 20, 21, 22, 23 और 24:
अभिगम्य च राजानमवदत्स्वं प्रयोजनम्। देहि मे खल्विमां राजन्क्षत्रियाय महात्मने।। तच्छ्रुत्वा त्वब्रवीद्राजा कस्य पुत्रोऽसि नाम किम्। उवाच तं पाण्डवोऽहं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः।। तमुवाचाथ राजा स सान्त्वपूर्वमिदं वचः। राजा प्रभञ्जनो नाम कुलेऽस्मिन्संबभूव ह।। अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम्। उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक्।। ईश्वरस्तोषितः पार्थ देवदेव उमापतिः। स तस्मै भगवान्प्रादादेकैकं प्रसवं कुले।। एकैकः प्रसवस्तस्माद्भवत्यस्मिन्कुले सदा। तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे।।
- हिन्दी अनुवाद: अर्जुन ने राजा चित्रवाहन के पास जाकर अपना मंतव्य प्रकट किया— "हे राजन्! आप अपनी इस कन्या का विवाह मुझ महात्मना क्षत्रिय के साथ कर दीजिए।" यह सुनकर राजा ने पूछा— "आप किसके पुत्र हैं और आपका नाम क्या है?" उन्होंने उत्तर दिया— "मैं पांडु का पुत्र, कुंतीपुत्र धनंजय (अर्जुन) हूँ।" तब राजा चित्रवाहन ने अत्यंत सांत्वनापूर्वक उनसे यह वचन कहा— "हे पार्थ! हमारे कुल में पूर्वकाल में 'प्रभंजन' नाम के राजा हुए थे। वे निसंतान थे और पुत्र पाने की इच्छा से उन्होंने कठोर तपस्या की। उनकी उस उग्र तपस्या से देवों के देव पिनाकधारी उमापति महादेव शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि आपके कुल में सदा एक-एक ही संतान उत्पन्न होगी। उसी वरदान के प्रभाव से इस कुल में हमेशा एक ही संतान होती आई है। मेरे पूर्वज सभी राजाओं के पुत्र ही उत्पन्न हुए थे।"
- व्याख्या: राजा चित्रवाहन ने अपने वंश को मिला भगवान शिव का वरदान बताया, जिसके कारण उनके कुल में एक पीढ़ी में केवल एक ही संतान जन्म लेती थी।
श्लोक 25, 26, 27 और 28:
एका च मम कन्येयं कुलस्योत्पादनी भृशम्। पुत्रो ममायमिति मे भावना पुरुषर्षभ।। पुत्रिकाहेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ। तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया।। एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह। एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव।। स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च। मासे त्रयोदशे पार्थः कृत्वा वैवाहिकीं क्रियाम्। उवास नगरे तस्मिन्मासांस्त्रीन्स तया सह।।
- हिन्दी अनुवाद: "किंतु मेरे कुल को आगे बढ़ाने वाली यह केवल एक ही कन्या उत्पन्न हुई है। हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं इसे ही अपना 'पुत्र' मानता हूँ। हे भरतर्षभ! धर्मशास्त्र के 'पुत्रिका-धर्म' (वह विधान जिसमें कन्या का पुत्र नाना के कुल का उत्तराधिकारी बनता है) के अनुसार मैंने इसे रखा है। इसलिए हे भारत! आपके द्वारा इसके गर्भ से जो एक पुत्र उत्पन्न होगा, वही इस कुल का उत्तराधिकारी (शुल्क) बनेगा और यहीं रहेगा। हे पांडव! इसी शर्त (नियम) पर आप मेरी इस कन्या को स्वीकार करें।" अर्जुन ने "ऐसा ही होगा" कहकर यह प्रतिज्ञा स्वीकार की और उस कन्या का पाणिग्रहण (विवाह) किया। तेरहवें महीने में विवाह संस्कार संपन्न करके पार्थ अर्जुन उस नगर में चित्राङ्गदा के साथ तीन महीने तक रहे।
- व्याख्या: धर्मशास्त्र के 'पुत्रिका-विधि' नियम के तहत यदि किसी राजा की केवल पुत्री हो, तो उससे उत्पन्न पुत्र नाना के राज्य का वारिस बनता है। अर्जुन ने इस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर चित्राङ्गदा से विवाह किया (आगे चलकर इन्हीं का पुत्र बभ्रुवाहन हुआ, जिसने मणिपुर का शासन संभाला)। अर्जुन वहाँ 3 महीने रहे।
इसी के साथ श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत अर्जुनवनवासपर्व का 235वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
