महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सुभद्राहरणपर्व के 240वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है।
इस अध्याय में द्वारका के उपवन में यति-वेशधारी अर्जुन का ठहरना, बलराम जी सहित यादव वीरों से भेंट, बलराम जी द्वारा अर्जुन को संन्यासी समझकर वर्षाकाल (चातुर्मास) में सुभद्रा के अंतःपुर/कन्यागृह के समीप ठहराने और भोजन-सेवा का दायित्व सुभद्रा को सौंपने का रोचक वृत्तांत वर्णित है।
श्लोक 1 से 9: (द्वारका के उपवन में अर्जुन का निवास और यादवाग्नि का आगमन)
श्लोक 1, 2, 3, 4, 5 और 6:
वैशंपायन उवाच। चैराः संचारिते तस्मिन्ननुज्ञाते युधिष्ठिरे। वासुदेवाभ्यनुज्ञातः कथयित्वेतिकृत्यताम्।। कृष्णस्य मतमास्थाय प्रययौ भरतर्षभः। द्वारकाया उपवने तस्थौ वै कार्यसाधनः।। निवृत्ते ह्युत्सवे तस्मिन्गिरौ रैवतके तदा। वृष्णयोऽप्यगमन्सर्वे पूरीं द्वारवतीमनु।। चिन्तयानस्ततो भद्रामुपविष्टः शिलातले। रमणीये वनोद्देशे बहुपादपसंवृते।। सालतालाश्वकर्णैश्च बकुलैरर्जुनैस्तथा। चम्पकाशोकपुन्नागैः केतकैः पाटलैस्तथा।। कर्णिकारैरशोकैश्च अङ्कोलैरतिमुक्तकैः। एवमादिभिरन्यैश्च संवृते स शिलातले।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— गुप्तचरों के माध्यम से राजा युधिष्ठिर की अनुमति मिलने पर तथा श्रीकृष्ण द्वारा संपूर्ण योजना तय करके स्वीकृति दिए जाने पर भरतश्रेष्ठ अर्जुन श्रीकृष्ण के मतानुसार आगे बढ़े। वे अपना कार्य सिद्ध करने के लिए द्वारका के सुंदर उपवन में आकर ठहर गए। रैवतक पर्वत का वह उत्सव समाप्त होने पर सभी वृष्णि-वंशी यादव अपनी द्वारका पुरी लौट आए। उस समय अर्जुन शाल, ताल, अश्वकर्ण, बकुल, अर्जुन, चंपक, अशोक, पुन्नाग, केतक, पाटल, कर्णिकार, अंकोल और अतिमुक्तक आदि अनेक भाँति-भाँति के वृक्षों से घिरे तथा सघन छाया वाले रमणीय वन प्रदेश में एक शिलातल (चट्टान) पर बैठकर सुभद्रा (भद्रा) का चिंतन करने लगे।
- व्याख्या: युधिष्ठिर की सहमति मिलने के बाद अर्जुन यति के छद्म वेश में द्वारका के बाहरी बगीचे में आकर रुक गए और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
श्लोक 7, 8 और 9:
पुनःपुनश्चिन्तयानः सुभद्रां भद्रभाषिणीम्। यदृच्छया चोपपन्नान्वृष्णिवीरान्ददर्श सः।। बलदेवं च हार्दिक्यं साम्बं सारणमेव च। प्रद्युम्नं च गदं चैव चारुदेष्णं विदूरथम्।। भानुं च हरितं चैव विपृथुं पृथुमेव च। तथान्यांश्च बहून्पश्यन्हृदि शोकमधारयत्।।
- हिन्दी अनुवाद: वे मीठी वाणी बोलने वाली सुभद्रा का बार-बार चिंतन कर रहे थे कि उसी समय स्वेच्छा से घूमते हुए आए अनेक वृष्णि-वीरों को उन्होंने देखा। बलदेव (बलराम), कृतवर्मा (हार्दिक्य), साम्ब, सारण, प्रद्युम्न, गद, चारुदेष्ण, विदूरथ, भानु, हरित, विपृथु, पृथु तथा अन्य कई प्रमुख यादवों को देखकर अर्जुन अपने मन में संकोच और उद्वेग धारण करने लगे।
- व्याख्या: उपवन में टहलते हुए द्वारका के सभी महारथी यादव संन्यासी बने अर्जुन के पास पहुँच गए।
श्लोक 10 से 17: (बलराम जी और यादवों का संन्यासी अर्जुन का सत्कार)
श्लोक 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16 और 17:
ततस्ते सहिताः सर्वे यतिं दृष्ट्वा समुत्सुकाः। वृष्णयो विनयोपेताः परिवार्योपतस्थिरे।। ततोऽर्जुनः प्रीतमनाः स्वागतं व्याजहार सः। आस्यतामास्यतां सर्वै रमणीये शिलातले।। इत्येमुक्ता यतिना प्रीतास्ते यादवर्षभाः। उपोपविविशुः सर्वे ते स्वागतमिति ब्रुवन्।। परितः सन्निविष्टेषु वृष्णिवीरेषु पाण्डवः। आकारं गूहमानस्तु कुशलप्रश्नमब्रवीत्।। सर्वत्र कुशलं चोक्त्वा बलदेवोऽब्रवीदिदम्। प्रसादं कुरु मे विप्र कुतस्त्वं चागतो ह्यसि।। त्वया दृष्टानि पुण्यानि वद त्वं वदतांवर। पर्वतांश्चैव तीर्थानि वनान्यायतनानि च।। वैशंपायन उवाच। तीर्थानां दर्शनं चैव पर्वतानां च भारत। आपगानां वनानां च कथयामास ताः कथाः।। श्रुत्व धर्मकथाः पुण्या वृष्णिवीरा मुदान्विताः। अपूजयंस्तदा भिक्षुं कथान्ते जनमेजय।।
- हिन्दी अनुवाद: तब वे सभी यदुवंशी उस त्रिदंडी यति को देखकर उत्सुक हुए और अत्यंत विनयपूर्वक उन्हें चारों ओर से घेरकर खड़े हो गए। अर्जुन ने प्रसन्न मन से उनका स्वागत करते हुए कहा— "आप सभी इस रमणीय शिलातल पर बैठें।" यति (अर्जुन) के ऐसा कहने पर वे यादव श्रेष्ठ प्रसन्न होकर "स्वागतम्" कहते हुए उनके चारों ओर बैठ गए। वृष्णि-वीरों के बैठ जाने पर पांडव अर्जुन ने अपने वास्तविक रूप-भाव को छिपाते हुए उनसे कुशल-क्षेम पूछी। बलराम जी ने सब जगह कुशल बताकर कहा— "हे श्रेष्ठ विप्र! मुझ पर कृपा करके बताइए, आप कहाँ से पधारे हैं? हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! आपके द्वारा देखे गए पवित्र पर्वतों, तीर्थों, वनों और देव-स्थानों का वर्णन कीजिए।" वैशंपायन जी कहते हैं— हे भारत जनमेजय! तब अर्जुन ने अपनी यात्रा में देखे गए सभी तीर्थों, पर्वतों, नदियों और वनों की पावन कथाएँ सुनाईं। उन पुण्यमयी धर्म-कथाओं को सुनकर वृष्णि-वीर अत्यंत प्रसन्न हुए और कथा के अंत में उस भिक्षु (यति) का पूजन-सत्कार किया।
- व्याख्या: छद्म वेशधारी अर्जुन ने ऐसी विद्वत्तापूर्ण बातें और तीर्थों की कथाएँ सुनाईं कि बलराम जी सहित सभी यादव वीर उन्हें सच्चा और उच्च कोटि का संन्यासी मानकर श्रद्धा से नतमस्तक हो गए।
श्लोक 18 से 25: (बलराम जी द्वारा सुभद्रा के भवन में चातुर्मास का प्रस्ताव)
श्लोक 18, 19, 20, 21, 22, 23, 24 और 25:
ततस्तु यादवाः सर्वे मन्त्रयन्ति स्म भारत। अयं देशातिथिः श्रीमान्यतिलिङ्गधरो द्विजः।। आवासं कमुपाश्रित्य वसेत निरुपद्रवः। इत्येवं प्रब्रुवन्तस्तु रौहिणेयं च यादवाः।। ददृशुः कृष्णमायान्तं सर्वे यादवनन्दनम्। एहि केशव तातेति रौहिणेयो वचोऽब्रवीत्।। यतिलिङ्गधरो विद्वान्देशातिथिरयं द्विजः। वर्षमासनिवासार्थमागतो नः पुरं प्रति। स्थाने यस्मिन्निवसतु तन्मे ब्रूहि जनार्दन।। श्रीकृष्ण उवाच। त्वयि स्थिते महाभाग परवानस्मि धर्मतः। स्वयं तु रुचिरे स्थाने वासयेर्यदुनन्दन।। प्रीतः स तेन वाक्येन परिष्वज्य जनार्दनम्। बलदेवोऽब्रवीद्वाक्यं चिन्तयित्वा महाबलः।। आरामे तु वसेद्धीमांश्चतुरो वर्षमासकान्। कन्यागृहे सुभद्राया भुक्त्वा भोजनमिच्छया।। लतागृहेषु वसतामिति मे धीयते मतिः। लब्धानुज्ञास्त्वया तात मन्यन्ते सर्वयादवाः।।
- हिन्दी अनुवाद: हे भारत! तत्पश्चात सभी यादव आपस में विचार करने लगे कि यह तेजस्वी संन्यासी द्विज हमारे देश के अतिथि हैं, ये किस स्थान का आश्रय लेकर निर्विघ्न निवास करें? जब यादव और बलराम जी यह चर्चा कर रहे थे, तभी उन्होंने यादव-नंदन श्रीकृष्ण को आते देखा। बलराम जी बोले— "हे तात केशव! आओ! यह यति-वेशधारी विद्वान द्विज हमारे नगर में वर्षाकाल के चार महीने (चातुर्मास) बिताने के लिए अतिथि रूप में आए हैं। हे जनार्दन! ये किस स्थान पर ठहरें, यह मुझे बताओ।" श्रीकृष्ण बोले— "हे महाभाग! आपके रहते हुए मैं धर्मतः आपके अधीन हूँ। हे यदुनंदन! आप स्वयं ही किसी सुंदर स्थान में इन्हें ठहराइए।" श्रीकृष्ण के इस नम्र वचन से प्रसन्न होकर महाबली बलराम ने जनार्दन का आलिंगन किया और सोचकर कहा— "मेरी बुद्धि में यह आता है कि यह बुद्धिमान संन्यासी वर्षा के चार महीनों तक उपवन में रहे, सुभद्रा के कन्यागृह (अंतःपुर) से इच्छानुसार भोजन ग्रहण करे और लतागृहों में निवास करे। हे तात! आपकी स्वीकृति मिलने पर सभी यादव भी इसे सहर्ष मानेंगे।"
- व्याख्या: विधि का विधान देखिए! बलराम जी अर्जुन को सच्चा यति मानकर खुद ही उन्हें सुभद्रा के महल के लतागृह (बगीचे) में ठहराने और सुभद्रा के हाथों ही उनके भोजन-सेवा की व्यवस्था करने का निर्णय लेते हैं।
श्लोक 26 से 31: (श्रीकृष्ण की चतुर आपत्ति और बलराम जी का हठ)
श्लोक 26, 27, 28, 29, 30 और 31:
श्रीकृष्ण उवाच। बलवान्दर्शनीयश्च वाग्मी श्रीमान्बहुश्रुतः। कन्यापुरसमीपे तु न युक्तमिति मे मतिः।। गुरुः शास्ता च नेता च शास्त्रज्ञो धर्मवित्तमः। त्वयोक्तं न विरुध्येहं करिष्यामि वचस्तव।। शुभाशुभस्य विज्ञाता नान्योऽस्मि भुवि कश्चन।। बलदेव उवाच। अयं देशातिथिः श्रीमान्सर्वधर्मभृतां वरः। धृतिमान्विनयोपेतः सत्यवादी जितेन्द्रियः।। यतिलिङ्गधरो ह्येष को विजानाति मानसम्। त्वमिमं पुण्डरीकाक्ष नीत्वा कन्यापुरं शुभम्।। निवेदय सुभद्रायै मद्वाक्यपरिचोदितः। भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पानैश्च अन्नैरिष्टैश्च पूजय।।
- हिन्दी अनुवाद: श्रीकृष्ण ने (लीला रचते हुए) कहा— "यह संन्यासी बलवान, अत्यंत सुंदर (दर्शनीय), चतुर वक्ता, तेजस्वी और बहुश्रुत (विद्वान) है। मेरी सम्मति में इसे कन्यापुर (राजकुमारी के महल) के पास ठहराना उचित नहीं है! किंतु आप हमारे गुरु, शासक, नेता, शास्त्रज्ञ और श्रेष्ठ धर्मवेत्ता हैं। मैं आपकी कही बात का विरोध नहीं करूँगा और आपके वचन का पालन करूँगा, क्योंकि आपसे बढ़कर शुभ-अशुभ का जानने वाला इस पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं है।" बलराम जी बोले— "यह तेजस्वी देशातिथि सभी धर्मत्माओं में श्रेष्ठ, धैर्यवान, विनयशील, सत्यवादी और जितेंद्रिय है। यति का वेश धारण करने वाले इसके निष्पाप मन को कौन नहीं जानता? हे पुण्डरीकाक्ष कृष्ण! तुम स्वयं इन्हें उस सुंदर कन्यापुर में ले जाओ और मेरे कथन का हवाला देकर सुभद्रा को सौंप दो। उसे कहो कि वह मनभावन भक्ष्य, भोज्य, पेय और अन्नों से इनकी पूजा-सेवा करे।"
- व्याख्या: श्रीकृष्ण ने बड़ी चतुराई से नाटक किया कि संन्यासी युवा और सुंदर है, इसलिए उसे सुभद्रा के महल के पास रखना ठीक नहीं होगा। श्रीकृष्ण की इस आशंका से बलराम जी का विश्वास और पक्का हो गया और उन्होंने हठपूर्वक श्रीकृष्ण को आदेश दिया कि वे स्वयं यति (अर्जुन) को सुभद्रा के पास ले जाएँ और उसकी सेवा का भार सुभद्रा को सौंपें। श्रीकृष्ण की यही गुप्त योजना थी जो बलराम जी के हाथों पूरी हो गई!
इसी के साथ श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सुभद्राहरणपर्व का 240वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
