महाभारत्- ०१ आदिपर्व-२४१

महाभारत्- ०१ आदिपर्व-२४१

 महाभारत के आदिपर्व (सुभद्राहरण पर्व) के इस अध्याय में अर्जुन (यति/संन्यासी के वेश में) और सुभद्रा के प्रेम, उनके परस्पर परिचय तथा उनके विवाह की पृष्ठभूमि का वर्णन है। श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 3

वैशंपायन उवाच। स तथेति प्रतिज्ञाय सहितो यतिना हरिः। कृत्वा तु संविदं तेन प्रहृष्टः केशवोऽभवत्।। 1 ।। पर्वते तौ विहृत्यैव यथेष्टं कृष्णपाण्डवौ। तां पुरीं प्रविवेशाथ गृह्य हस्तेन पाण्डवम्। प्रविश्य च गृहं रम्यं सर्वभोगसमन्वितम्।। 2 ।। पार्थमावेदयामास रुक्मिणीसत्यभामयोः। हृषीकेशवचः श्रुत्वा ते उभे चोचतुर्भृशम्।। 3 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—श्रीकृष्ण ने यति (संन्यासी बने अर्जुन) की बात स्वीकार कर प्रतिज्ञा की और उनके साथ गुप्त योजना बनाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। पर्वत पर अपनी इच्छानुसार विहार करके श्रीकृष्ण पांडव अर्जुन का हाथ पकड़कर द्वारका नगरी में प्रविष्ट हुए। सब प्रकार के उत्तम भोगों से संपन्न सुंदर गृह में प्रवेश कर श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी और सत्यभामा से अर्जुन का परिचय कराया। श्रीकृष्ण के वचन सुनकर वे दोनों बहुत प्रसन्न होकर बोलने लगीं।

व्याख्या: अर्जुन छद्म वेश में यति बनकर द्वारका आए थे। श्रीकृष्ण ने उनके उद्देश्य (सुभद्रा-परिणय) को जानकर गुप्त रूप से उनका साथ देने का निश्चय किया। द्वारका में प्रवेश करने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने अंतःपुर ले गए और अपनी मुख्य रानियों रुक्मिणी तथा सत्यभामा से उनका यति रूप में परिचय कराया।

श्लोक 4 - 7

मनोरथो महानेष हृदि नौ परिवर्तते। कदा द्रक्षाव बीभत्सुं पाण्डवं पुरमागतम्।। 4 ।। इत्येवं हर्षमाणे ते वदन्त्यौ सुभृशं प्रियम्। रुग्मिणीसत्यभामे वै दृष्ट्वा प्रीतोऽभवद्यतिः।। 5 ।। सर्वेषां हर्षमाणानां पार्थो हर्षमुपागमत्। प्राप्तमज्ञातरूपेण चागतं चार्जुनं हरिः।। 6 ।। सत्कृत्य पूज्यमानं तु प्रीत्या चैव ह्यपूजयत्। स तं प्रियातिथिं श्रेष्ठं समीक्ष्य यतिमागतम्।। 7 ।।

अनुवाद: (रुक्मिणी और सत्यभामा ने कहा—) "हमारे हृदय में बहुत दिनों से यह बड़ी अभिलाषा थी कि कब हम पांडव अर्जुन (बीभत्सु) को इस पुरी में आया हुआ देखेंगी।" रुक्मिणी और सत्यभामा को इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक प्रिय वचन बोलते देखकर यति (अर्जुन) अत्यन्त प्रसन्न हुए। सब लोगों को हर्षित देखकर अर्जुन भी आनन्दित हुए। अज्ञात रूप में आए हुए अर्जुन की श्रीकृष्ण ने बड़े प्रेम से पूजा-सत्कार किया। उस श्रेष्ठ एवं प्रिय अतिथिरूप यति को आया देखकर श्रीकृष्ण ने उनका आदर किया।

व्याख्या: रुक्मिणी और सत्यभामा के मन में अर्जुन को देखने की तीव्र इच्छा थी, क्योंकि अर्जुन के पराक्रम और गुणों की गाथा पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध थी। जब यति रूप में अर्जुन सामने थे (यद्यपि वे पूर्णतः पहचान नहीं पाई थीं, परंतु श्रीकृष्ण के संकेत और अतिथिसत्कार के भाव से माहौल अत्यंत आनंदमय हो गया)।

श्लोक 8 - 12

सोदर्यां भगिनीं कृष्णः सुभद्रामिदमब्रवीत्। अयं देशातिथिर्भद्रे संशितव्रतवानृषिः।। 8 ।। प्राप्नोतु सततं पूजां तव कन्यापुरे वसन्। आर्येण च परिज्ञातः पूजनीयो यतिस्त्वया।। 9 ।। रागाद्भरस्व वार्ष्णेयि भक्ष्यैर्भोज्यैर्यतिं सदा। एष यद्यदृषिर्ब्रूयात्कार्यमेव न संशयः।। 10 ।। सखीभिः सहिता भद्रे भवास्य वशवर्तिनी। पुरा हि यतयो भद्रे ये भैक्षार्थमनुव्रताः।। 11 ।। ते बभूवुर्दशार्हाणां कन्यापुरनिवासिनः। तेभ्यो भोज्यानि भक्ष्याणि यथाकालमतन्द्रिताः। कन्यापुरगताः कन्याः प्रयच्छन्ति यशस्विनि।। 12 ।।

अनुवाद: श्रीकृष्ण ने अपनी सगी बहन सुभद्रा से कहा—"कल्याणी! यह हमारे देश में आए अतिथि कठोर व्रतों का पालन करने वाले ऋषि हैं। ये तुम्हारे कन्यापुर (अंतःपुर) में निवास करते हुए निरंतर पूजा-सत्कार प्राप्त करें। पूज्य पुरुषों द्वारा जाने गए यह यति तुम्हारे द्वारा पूजनीय हैं। हे वार्ष्णेयि! तुम प्रेमपूर्वक इन्हें सदा भक्ष्य और भोज्य पदार्थ प्रदान करो। ये ऋषि जो-जो कहें, वह निसंदेह करना चाहिए। अपनी सखियों के साथ इनकी आज्ञा में रहो। प्राचीन काल से ही भिक्षा के लिए आने वाले संन्यासी दशार्हवंशियों के अंतःपुर में निवास करते रहे हैं और कन्याएँ आलस्य छोड़कर समय-समय पर उन्हें भोजन सामग्री देती रही हैं।"

व्याख्या: श्रीकृष्ण ने चतुरतापूर्वक अर्जुन (यति) की सेवा का भार सुभद्रा को सौंप दिया। उन्होंने सुभद्रा से कहा कि यह यति अत्यंत तेजस्वी और कठोर तपस्वी हैं, इसलिए अंतःपुर में रहकर इनकी सेवा-शुश्रूषा करना तुम्हारा धर्म है। श्रीकृष्ण का उद्देश्य अर्जुन और सुभद्रा को एक-दूसरे के निकट लाना था।

श्लोक 13 - 16

वैशंपायन उवाच। सा तथेत्यब्रवीत्कृष्णं करिष्यामि यथाऽऽथ माम्। तोषयिष्यामि वृत्तेन कर्मणा च द्विजर्षभम्।। 13 ।। एवमेतेन रूपेण कंचित्कालं धनञ्जयः। उवास भक्ष्यैर्भोज्यैश्च भद्रया परमार्चितः।। 14 ।। तस्य सर्वगुणोपेतां वासुदेवसहोदरीम्। पश्यतः सततं भद्रां प्रादुरासीन्मनोभवः।। 15 ।। गूहयन्निव चाकारमालोक्य वरवर्णिनीम्। दीर्घमुष्णं विनिश्वस्य पार्थः कामवशं गतः।। 16 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—सुभद्रा ने श्रीकृष्ण से कहा—"जैसा आप कहते हैं, मैं वैसा ही करूँगी। अपने सदाचार और सेवा-कार्य से इन श्रेष्ठ द्विज को संतुष्ट रखूँगी।" इस प्रकार यति रूप में धनंजय (अर्जुन) सुभद्रा द्वारा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों से पूजित होकर कुछ समय तक वहाँ रहे। सर्वगुणसंपन्न श्रीकृष्ण-भगिनी सुभद्रा को निरंतर देखते रहने से अर्जुन के हृदय में कामदेव प्रकट हो गए। उस सुंदरी को देखकर अपने मनोभावों को छिपाते हुए अर्जुन लंबी और गरम साँसें लेते हुए काम के वश में हो गए।

व्याख्या: सुभद्रा ने भ्रातृ-आज्ञा का पालन करते हुए यति बने अर्जुन की पूरी निष्ठा से सेवा की। सुभद्रा के सौंदर्य, शील और गुणों को निरंतर प्रत्यक्ष देखने के कारण अर्जुन उनके प्रति आकर्षित हो गए।

श्लोक 17 - 20

स कृष्णां द्रौपदीं मेने न रूपे भद्रया समाम्। प्राप्तां भूमान्विन्द्रसेनां साक्षाद्वा वरुणात्मजाम्।। 17 ।। अतीतकाले संप्राप्ते सर्वास्तापि सुरस्त्रियः। न समा भद्रया लोके इत्येवं मन्यतेऽर्जुनः।। 18 ।। अतीतसमये काले सोदर्याणां धनञ्जयः। न सस्मार सुभद्रायां कामाङ्कुशनिवारितः।। 19 ।। क्रीडारतिपरां भद्रां सखीगणसमावृताम्। प्रीयते स्मार्जुनः पश्यन्स्वाहामिव विभावसुः।। 20 ।।

अनुवाद: अर्जुन को लगा कि रूप में द्रौपदी भी सुभद्रा के समान नहीं है, और न ही इंद्रसेना या साक्षात् वरुणपुत्री ही उसकी बराबरी कर सकती हैं। अतीत काल में जितनी देवांगनाएँ हुई हैं, वे भी लोक में सुभद्रा के समान नहीं हैं—ऐसा अर्जुन मानते थे। समय बीतने पर सुभद्रा के प्रति कामांकुश से बिंधे हुए अर्जुन को अपने भाइयों की भी याद न रही। सखियों से घिरी हुई क्रीड़ा-मग्न सुभद्रा को देखकर अर्जुन वैसे ही प्रसन्न होते थे जैसे स्वाहा को देखकर अग्निदेव प्रसन्न होते हैं।

व्याख्या: इन श्लोकों में अर्जुन के सुभद्रा के प्रति अगाध प्रेम और सौंदर्य-मुग्धता का काव्यात्मक चित्रण है। सुभद्रा की तुलना अलौकिक देव-स्त्रियों से की गई है।

श्लोक 21 - 25

पाण्डवस्य सुभद्रायाः सकाशे तु यशस्विनः। समुत्पत्तिः प्रभावश्च गदेन कथितः पुरा।। 21 ।। श्रुत्वा चाशनिनिर्घोषं केशवेनापि धीमता। उपमामर्जुनं कृत्वा विस्तरः कथितः पुरा।। 22 ।। क्रुद्धमानप्रलापश्च वृष्णीनामर्जुनं प्रति। पौरुषं चोपमां कृत्वा प्रावर्तत धनुष्मताम्।। 23 ।। अन्योन्यकलहे चापि विवादे चापि वृष्णयः। अर्जुनोपि न मे तुल्यः कुतस्त्वमिति चाब्रुवन्।। 24 ।। जातांश्च पुत्रान्गृह्णन्त आशिषो वृष्णयोऽब्रवन्। अर्जुनस्य समो वीर्ये भव तात धनुर्धरः।। 25 ।।

अनुवाद: यशस्वी अर्जुन की उत्पत्ति और प्रभाव का वर्णन गद (कृष्ण के भाई) ने पहले सुभद्रा के समक्ष किया था। बुद्धिमान केशव ने भी वज्र के समान गर्जना सुनकर अर्जुन की उपमा देते हुए उनके पराक्रम का विस्तार से वर्णन किया था। वृष्णिवंशी धनुर्धरों में जब भी पौरुष की बात आती या मान-अपमान की बात होती, तो अर्जुन को ही आदर्श माना जाता था। वृष्णिवंशी आपस के कलह या विवाद में भी एक-दूसरे से कहते थे—"अर्जुन भी मेरे समान नहीं है, फिर तुम किस गिनती में हो?" और वृष्णिजन अपने नवजात पुत्रों को गोद में लेकर यह आशीर्वाद देते थे—"हे वत्स! तुम पराक्रम और धनुर्विद्या में अर्जुन के समान बनो।"

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व्याख्या: सुभद्रा ने अर्जुन को प्रत्यक्ष देखने से पहले ही उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। द्वारका के यादवों (गद, श्रीकृष्ण आदि) में अर्जुन का पराक्रम एक आदर्श और मिसाल माना जाता था। नवजात बालकों को अर्जुन जैसा बनने का आशीर्वाद दिया जाता था। इस कारण सुभद्रा के मन में अर्जुन के प्रति पूर्व से ही आदर और आकर्षण था।

श्लोक 26 - 31

तस्मात्सुभद्रा चकमे पौरुषाद्भरतर्षभम्। सत्यसन्धस्य रूपेण चातुर्येण च मोहिता।। 26 ।। चारणातिथिसंघानां गदस्य च निशम्य सा। अदृष्टे कृतभावाभूत्सुभद्रा भरतर्षभे।। 27 ।। कीर्तयन्ददृशे यो यः कथंचित्कुरुजाङ्गलम्। तं तमेव तदा भद्रा बीभत्सुं स्म हि पृच्छति।। 28 ।। अभीक्ष्णश्रवणादेवमभीक्ष्णपरिपृच्छनात्। प्रत्यक्ष इव भद्रायाः पाण्डवः प्रत्यपद्यत।। 29 ।। भुजौ भुजगसङ्काशौ ज्याघातेन किणीकृतौ। पार्थोऽयमिति पश्यन्त्या निःशंसयमजायत।। 30 ।। यथारूपं हि शुश्राव सुभद्रा भरतर्षभम्। तथारूपमवेक्ष्यैनं परां प्रीतिमवाप सा।। 31 ।।

अनुवाद: इसलिए सुभद्रा भरतश्रेष्ठ अर्जुन के पौरुष, सत्यसंधता, रूप और चतुरता पर मोहित होकर उन्हें चाहने लगी थीं। चारणों, अतिथियों और गद के मुख से सुनकर सुभद्रा बिना देखे ही अर्जुन पर अनुरक्त हो चुकी थीं। कुरुजांगल देश की प्रशंसा करने वाले जो-जो लोग आते, सुभद्रा उनसे अर्जुन के बारे में ही पूछती रहती थीं। बार-बार सुनने और पूछने के कारण पांडव अर्जुन सुभद्रा के लिए मानो प्रत्यक्ष ही हो गए थे। जब उन्होंने यति रूपधारी अर्जुन की सर्प जैसी शक्तिशाली तथा धनुष की प्रत्यंचा के घर्षण के निशानों (किण) से युक्त भुजाओं को देखा, तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि 'ये पार्थ ही हैं'। जैसा रूप उन्होंने सुना था, वैसा ही प्रत्यक्ष देखकर सुभद्रा को परम प्रसन्नता हुई।

व्याख्या: सुभद्रा का अर्जुन के प्रति अनुराग 'अनुश्रुति' (सुनकर उत्पन्न प्रेम) पर आधारित था। जब यति की सेवा करते हुए सुभद्रा ने उनकी भुजाओं पर धनुष की प्रत्यंचा के घट्टे (निशान) देखे, तो उनका संदेह दूर हो गया कि यह कोई साधारण संन्यासी नहीं बल्कि स्वयं अर्जुन हैं।

श्लोक 32 - 35

सा कदाचिदुपासीनं पप्रच्छ कुरुनन्दनम्। कथं देशाश्च चरिता नानाजनपदाः कथम्।। 32 ।। सरांसि सरितश्चैव वनानि च कथं यते। दिशः काश्च कथं प्राप्ताश्चरता भवता सदा।। 33 ।। स तथोक्तस्तदा भद्रां बहुनर्मामृतं ब्रुवन्। उवाच परमप्रीतस्तथा बहुविधाः कथाः।। 34 ।। निशण्य विविधं तस्य लोके चरितमात्मनः। तथा परिगतो भावः कन्यायाः समपद्यत।। 35 ।।

अनुवाद: एक दिन पास बैठे कुरुनंदन अर्जुन से सुभद्रा ने पूछा—"हे यते! आपने विभिन्न देशों, जनपदों, सरोवरों, नदियों और वनों का भ्रमण कैसे किया? निरंतर भ्रमण करते हुए आप किन-किन दिशाओं में गए?" सुभद्रा के ऐसा पूछने पर अत्यंत प्रसन्न होकर अर्जुन ने अमृतमयी और विनोदपूर्ण वाणी में बहुत सी कथाएँ सुनाईं। लोक में अर्जुन के अपने ही विविध चरित्र-वृत्तांतों को यति के मुख से सुनकर कन्या सुभद्रा का भाव और भी दृढ़ हो गया।

व्याख्या: सुभद्रा यति से उनके तीर्थाटन के अनुभव पूछती हैं। अर्जुन अपनी यात्राओं और पराक्रमों का वर्णन विनोदपूर्ण ढंग से करते हैं, जिससे सुभद्रा का उनके प्रति प्रेम और गहरा हो जाता है।

श्लोक 36 - 41

पर्वसन्धौ तु कस्मिंश्चित्सुभद्रा भरतर्षभम्। रहस्येकान्तमासाद्य हर्षमाणाऽभ्यभाषत।। 36 ।। यतिना रचता देशान्खाण्डवप्रस्थवासिनी। कश्चिद्भगवता दृष्टा पृथाऽस्माकं पितृष्वसा।। 37 ।। भ्रातृभिः प्रीयते सर्वैर्दृष्टः कच्चिद्युधिष्ठिरः। कच्चिद्धर्मपरो भीमो धर्मराजस्य धीमतः।। 38 ।। निवृत्तसमयः कच्चिदपराधाद्धनञ्जयः। नियमे कामभोगानां वर्तमानः प्रिये रतः।। 39 ।। क्व नु पार्थश्चरत्यद्य बहिः स वसतीर्वसन्। सुखोचितो ह्यदुःखार्हो दीर्घबाहुररिन्दमः।। 40 ।। कच्चिच्छ्रुतो वा दृष्टो वा पार्थो भगवताऽर्जुनः। निशम्य वचनं तस्यास्तामुवाच हसन्निव।। 41 ।।

अनुवाद: किसी पर्व के अवसर पर सुभद्रा ने भरतश्रेष्ठ अर्जुन को एकांत में पाकर प्रसन्नतापूर्वक कहा—"हे भगवन्! विभिन्न देशों में भ्रमण करते हुए क्या आपने खांडवप्रस्थ (इंद्रप्रस्थ) में रहने वाली हमारी फूफी कुंती को देखा है? क्या सब भाइयों द्वारा पूजित युधिष्ठिर के दर्शन हुए हैं? क्या बुद्धिमान धर्मराज के धर्मपरायण भाई भीम कुशल से हैं? और नियम के उल्लंघन के कारण तीर्थयात्रा पर निकले हुए धनंजय (अर्जुन) क्या अपने समय की समाप्ति पर कुशलपूर्वक हैं? सुखों के योग्य, दुःख के अयोग्य, लंबी भुजाओं वाले शत्रुदमन अर्जुन आजकल कहाँ निवास कर रहे हैं? क्या आपने उन पार्थ अर्जुन को देखा या सुना है?" सुभद्रा के ये वचन सुनकर अर्जुन मुस्कुराते हुए बोले।

व्याख्या: सुभद्रा एकांत में यति से खांडवप्रस्थ और पांडवों का कुशल-क्षेम पूछती हैं। वे विशेष रूप से अर्जुन के बारे में उत्कंठापूर्वक पूछती हैं कि तीर्थयात्रा पर गए अर्जुन आजकल कहाँ और किस हाल में हैं।

श्लोक 42 - 48

आर्या कुशलिनी कुन्ती सहपुत्रा सहस्नुषा। प्रीयते पश्यती पुत्रान्खाण्डवप्रस्थ आसते।। 42 ।। अनुज्ञातश्च मात्रा च सोदरैश्च धनञ्जयः। द्वारकामावसत्येको यतिलिङ्गेन पाण्डवः।। 43 ।। पश्यन्ती सततं कस्मान्नाभिजानासि माधवि। निशण्य वचनं तस्य वासुदेवसहोदरी।। 44 ।। निश्वासबहुला तस्थौ क्षितिं विलिखती तदा। ततः परमसंहृष्टः सर्वशस्त्रभृतां वरः।। 45 ।। अर्जुनोऽहमिति प्रीतस्तामुवाच धनञ्जयः। यथा तव गतो भावः श्रवणान्मयि भामिनि।। 46 ।। त्वद्गतः सततं भावस्तथा तव गुणैर्मम। प्रशस्तेऽहनि धर्मेण भद्रे स्वयमहं वृतः।। 47 ।। सत्यवानिव सावित्र्या भविष्यामि पतिस्तव।। 48 ।।

अनुवाद: (यति बने अर्जुन ने कहा—) "पूज्या कुंती अपने पुत्रों और वधू के साथ कुशल से हैं और खांडवप्रस्थ में आनंद से रह रही हैं। माता और भाइयों से अनुमत होकर धनंजय अर्जुन संन्यासी (यति) के वेश में अकेले द्वारका में ही निवास कर रहे हैं। हे माधवि! तुम निरंतर देखते हुए भी उन्हें क्यों नहीं पहचान पा रही हो?" यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा लंबी साँसें लेती हुई लज्जावश पृथ्वी को कुरेदने लगीं। तब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ धनंजय अर्जुन ने परम प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक उनसे कहा—"हे भामिनि! मैं ही अर्जुन हूँ। जैसा तुम्हारा भाव मेरे प्रति केवल सुनने से हुआ है, वैसा ही मेरा भाव भी तुम्हारे गुणों के कारण तुम्हारे प्रति निरंतर है। शुभ दिन पर धर्मपूर्वक जैसे सावित्री के पति सत्यवान् हुए थे, वैसे ही मैं तुम्हारा पति बनूँगा।"

व्याख्या: यहाँ अर्जुन अपना वास्तविक परिचय सुभद्रा के सामने प्रकट कर देते हैं। वे बताते हैं कि जिस यति की वे सेवा कर रही हैं, वह कोई और नहीं बल्कि स्वयं अर्जुन ही हैं। सुभद्रा लज्जित हो जाती हैं और अर्जुन उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि वे उनसे विवाह करेंगे।

श्लोक 49 - 55

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा ततः पार्थः प्रविवेश लतागृहम्। ततः सुभद्रा ललिता लज्जाभावसमन्विता।। 49 ।। मुमोह शयने दिव्ये शयाना न तथोचिता। नाकरोद्यतिपूजां सा लज्जाभावमुपेयुषी।। 50 ।। कन्यापुरे तु यद्वृत्तं ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा। शशास रुक्मिणीं कृष्णो भोजनादि तदार्जुने।। 51 ।। तदाप्रभृति तां भद्रां चिन्तयन्वै धनञ्जयः। आस्ते स्म स तदाऽऽरामे कामेन भृशपीडितः।। 52 ।। सुभद्रा चापि न स्वस्था पार्थं प्रति बभूव सा। कृशा विवर्णवदना चिन्ताशोकपरायणा।। 53 ।। निश्वासपरमा भद्रा मानसेन मनस्विनी। न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति केनचित्।। 54 ।। न नक्तं न दिवा शेते बभूवोन्मत्तदर्शना। एवं शोकपरां भद्रां देवी वाक्यमथाब्रवीत्। मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि धृतिमालम्ब्य शोभने।। 55 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—ऐसा कहकर अर्जुन लतागृह में चले गए। उसके बाद लज्जा से युक्त सुकोमल सुभद्रा अपने दिव्य बिछौने पर सोकर मूर्छित-सी हो गईं। अत्यंत लज्जित होने के कारण उन्होंने यति की सेवा-पूजा बंद कर दी। कन्यापुर की यह घटना दिव्य दृष्टि से जानकर श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को अर्जुन के भोजन आदि का प्रबंध करने का आदेश दिया। तब से धनंजय अर्जुन बगीचे (आराम) में सुभद्रा का चिंतन करते हुए काम से अत्यधिक पीड़ित रहने लगे। उधर सुभद्रा भी अर्जुन के प्रति सोचकर अस्वस्थ हो गईं; वे कृशकाय (दुबली), पीली पड़ गईं और चिंता में डूब गईं। लंबी साँसें लेती हुई सुभद्रा का मन किसी शय्या, आसन या भोग में नहीं लगता था। वे रात-दिन सो नहीं पाती थीं। ऐसी शोकग्रस्त सुभद्रा से देवी रुक्मिणी ने कहा—"हे शोभने! धैर्य धारण करो, शोक मत करो।"

व्याख्या: रहस्य उजागर होने के बाद सुभद्रा लज्जावश अर्जुन के सामने जाने से संकोच करने लगीं। दोनों एक-दूसरे के विरह और अनुराग में व्याकुल रहने लगे। अंतर्यामी श्रीकृष्ण सब समझ गए और उन्होंने रुक्मिणी को व्यवस्था सँभालने को कहा।

श्लोक 56 - 64

रुक्मिण्येवं सुभद्रां तां कृष्णस्यानुमते तदा। रहोगत्य तदा श्वश्रूं देवकीं वाक्यमब्रवीत्।। 56 ।। अर्जुनो यतिरूपेण ह्यागतः सुसमाहितः। कन्यापुरमथाविश्य पूजितो भद्रया मुदा।। 57 ।। तं विदित्वा सुभद्रापि लज्जया परिमोहिता। दिवानिशं शयाना सा नाकरोद्भोजनादिकम्।। 58 ।। एवमुक्ता तया देवी भद्रां शोकपरायणाम्। तत्समीपं समागत्य श्लक्ष्णं वाक्यमथाब्रवीत्।। 59 ।। मा शोकं कुरु वार्ष्णेयि धृतिमालम्ब्य शोभने। राज्ञे निवेदयित्वापि वसुदेवाय धीमते।। 60 ।। कृष्णायापि तथा भद्रे प्रहर्षं कारयामि ते। पश्चाज्जानामि ते वार्तां मा शोकं कुरु भामिनि।। 61 ।। एवमुक्त्वा तु सा माता भद्रायाः प्रियकारिणी। निवेदयामास तदा भद्रामानकदुन्दुभेः।। 62 ।। रहस्येकासना तत्र भद्राऽस्वस्थेति चाब्रवीत्। आरामे तु यतिः श्रीमानर्जुनश्चेति नः श्रुतम्।। 63 ।। अक्रूराय च कृष्माय आहुकाय च सात्येकः। निवेद्यतां महाप्राज्ञ श्रोतव्यं यदि बान्धवैः।। 64 ।।

अनुवाद: श्रीकृष्ण की अनुमति से रुक्मिणी एकांत में अपनी सास देवकी के पास गईं और कहा—"अर्जुन यति रूप धारण करके यहाँ आए हैं। कन्यापुर में प्रवेश कर सुभद्रा द्वारा पूजित हुए। जब सुभद्रा को उनका भेद पता चला तो लज्जावश वे दिन-रात पड़ी रहती हैं और भोजन आदि नहीं कर रही हैं।" यह सुनकर देवी देवकी शोकग्रस्त सुभद्रा के पास आईं और मधुर वचन बोलीं—"हे सुभद्रा! धैर्य रखो, चिंता मत करो। मैं बुद्धिमान राजा वसुदेव और श्रीकृष्ण से बात करके तुम्हें प्रसन्न करूँगी।" ऐसा कहकर माता देवकी ने वसुदेव जी (आनकदुंदुभि) को एकांत में जाकर बताया कि सुभद्रा अस्वस्थ है और बगीचे में ठहरे यति वास्तव में अर्जुन हैं। उन्होंने वसुदेव से कहा कि यह बात अक्रूर, कृष्ण, आहुक (उग्रसेन) और सात्यकि आदि बांधवों के समक्ष रखी जाए।

व्याख्या: रुक्मिणी और माता देवकी को स्थिति का पता चलता है। देवकी सुभद्रा को सांत्वना देती हैं और वसुदेव जी से बातचीत करके परिवार के बड़ों की सहमति से अर्जुन और सुभद्रा के विवाह की योजना बनाने का प्रस्ताव रखती हैं।

श्लोक 65 - 72

वैशंपायन उवाच। वसुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा अक्रूराहुकयोस्तथा। निवेदयित्वा कृष्णेन मन्त्रयामास तैस्तदा।। 65 ।। इदं कार्यमिदं कृत्यमिदमेवेति निश्चितः। अक्रूरश्चोग्रसेनश्च सात्यकिश्च गदस्तथा।। 66 ।। पृथुश्रवाश्च कृष्णश्च सहिताः शिनिना मुहुः। रुक्मिणी सत्यभामा च देवकी रोहिणी तथा।। 67 ।। वसुदेवेन सहिताः पुरोहितमते स्थिताः। विवाहं मन्त्रयामासुर्द्वादशेऽहनि भारत।। 68 ।। अज्ञातं रौहिणेयस्य उद्धवस्य च भारत। विवाहं तु सुभद्रायाः कर्तुकामो गदाग्रजः।। 69 ।। महादेवस्य पूजार्थं महोत्सव इति ब्रुवन्। चतुस्त्रिंशदहोरात्रं सुभद्रार्तिप्रशान्तये।। 70 ।। नगरे घोषयास हितार्थं सव्यसाचिनः। इतश्चतुर्थे त्वहनि अन्तर्द्वीपं तु गम्यताम्।। 71 ।। सदारैः सानुयात्रैश्च सपुत्रैः सहबाधवैः। गन्तव्यं सर्ववर्मैश्च गन्तव्यं सर्वयादवैः।। 72 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—वसुदेव जी ने यह सुनकर अक्रूर, उग्रसेन और श्रीकृष्ण के साथ परामर्श किया। अक्रूर, उग्रसेन, सात्यकि, गद, पृथुश्रवा, श्रीकृष्ण, रुक्मिणी, सत्यभामा, देवकी, रोहिणी और वसुदेव ने पुरोहित की सम्मति से बारहवें दिन विवाह का निश्चय किया। परंतु बलराम (रौहिणेय) और उद्धव से यह बात गुप्त रखकर श्रीकृष्ण अर्जुन के हित के लिए सुभद्रा के हरण/विवाह की योजना बनाने लगे। उन्होंने नगर में घोषणा करवाई कि सुभद्रा के कष्ट निवारण और महादेव की पूजा हेतु ३४ दिन का महान उत्सव आयोजित होगा। चौथे दिन पूरे नगरवासी, यादव, अपनी पत्नियों, पुत्रों और सेवकों सहित समुद्र के बीच स्थित महाद्वीप (रैवतक पर्वत/द्वीप) यात्रा पर जाएँ।

व्याख्या: बलराम जी सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे, इसलिए श्रीकृष्ण ने बलराम और उद्धव से गुप्त रखकर एक योजना बनाई। उन्होंने महादेव पूजा के बहाने पूरी द्वारका नगरी के निवासियों और यादवों को द्वीप पर जाने का उत्सव घोषित करवा दिया, ताकि अर्जुन को अवसर मिल सके।

श्लोक 73 - 81

एवमुक्तास्तु ते सर्वे तथा चक्रुश्च सर्वशः। ततः सर्वदशार्हाणामन्तर्द्वीपे च भारत।। 73 ।। चतुस्त्रिंशदहोरात्रं बभूव परमोत्सवः। कृष्णरामाहुकाक्रूरप्रद्युम्नशिनिसत्यकाः।। 74 ।। समुद्रं प्रययुर्हृष्टाः कुकुरान्धकवृष्णयः। युक्तयन्त्रपताकाभिर्वृष्णयो ब्राह्मणैः सह।। 75 ।। समुद्रं प्रययुर्नौभिः सर्वे पुरनिवासिनः। ततस्त्वरितमागत्य दाशार्हगणपूजितम्।। 76 ।। सुभद्रा पुण्डरीकाक्षमब्रवीद्यतिशासनात्। कृत्यवान्द्वादशाहानि स्थाता स भगवानिह।। 77 ।। तिष्ठतस्तस्य कः कुर्यादुपस्थानविधिं सदा। तमुवाच हृषीकेशः कस्त्वदन्यो विशेषतः।। 78 ।। तमृषिं प्रत्युपस्थातुमितो नार्हति माधवि। त्वमेवास्मन्मतेनाद्य महर्षेर्वशवर्तिनी।। 79 ।। कुरु सर्वाणि कार्याणि कीर्तिं धर्ममवेक्ष्य च। तस्य चातिथिमुख्यस्य सर्वेषां च तपस्विनाम्।। 80 ।। संविधानपरा भद्रे भव त्वं वशवर्तिनी।। 81 ।।

अनुवाद: घोषणा के अनुसार सबने वैसा ही किया। ३४ दिनों तक अंतर्द्वीप में यादवों का भारी उत्सव चला। श्रीकृष्ण, बलराम, उग्रसेन, अक्रूर, प्रद्युम्न, सात्यकि आदि सभी यादव और नगरवासी नौकाओं द्वारा समुद्र पार करके द्वीप पर चले गए। तब सुभद्रा ने यति की आज्ञानुसार श्रीकृष्ण (पुंडरीकाक्ष) से पूछा—"वे यति महाराज १२ दिनों तक यहाँ रुकेंगे, उनकी सेवा कौन करेगा?" श्रीकृष्ण ने कहा—"हे माधवि! तुम्हारे अलावा और कौन श्रेष्ठ हो सकता है? तुम हमारी आज्ञा से उनकी सेवा में रहो, धर्म और कीर्ति को ध्यान में रखकर उनकी आज्ञा का पालन करो।"

व्याख्या: द्वारका के लगभग सभी लोग उत्सव के लिए द्वीप पर चले गए। श्रीकृष्ण ने जाने से पूर्व सुभद्रा को पुनः अर्जुन (यति) की सेवा में ही रहने की आज्ञा दी, जिससे अर्जुन और सुभद्रा को अंतःपुर में अकेले रहने का अवसर मिल गया।

श्लोक 82 - 90

वैशंपायन उवाच। एवमादिश्य भिक्षां च भद्रां च मधुसूदनः। ययौ शङ्खप्रणादेन भेरीणां निस्वनेन च।। 82 ।। ततस्तु द्वीपमासाद्य दानधर्मपरायणाः। उग्रसेनमुखाश्चान्ये विजहुः कुकुरान्धकाः।। 83 ।। पटहानां प्रणादैश्च भेरीणां निस्वनेन च। सप्तयोजनविस्तार आयतो दशयोजनम्।। 84 ।। बभूव स महाद्वीपः सपर्वतमहावनः। सेतुपुष्करिणीजालैराक्रीडः सर्वसात्वताम्।। 85 ।। वापीपल्वलसङ्घैश्च काननैश्च मनोरमैः। वासुदेवस्य क्रीडार्थंयोग्यः सर्वप्रहर्षतः।। 86 ।। कुकुरान्धकवृष्णीनां तथा प्रियकरस्तदा। बभूव परमोपेतस्त्रिविष्टप इवापरः।। 87 ।। चतुस्त्रिंशदहोरात्रं दानधर्मपरायणाः। उग्रसेनमुखाः सर्वे विजहुः कुकुरान्धकाः।। 88 ।। विचित्रमाल्याभरणाश्चित्रगन्धानुलेपनाः। विहाराभिगताः सर्वे यादवा हर्षसंयुताः।। 89 ।। सुनृत्तगीतवादित्रै रममाणास्तदाऽभवन्। प्रतियाते दशार्हाणामृषभे शार्ङ्गधन्वनि। सुभध्रोद्वाहनं पार्थः प्राप्तकालममन्यत।। 90 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—भिक्षा और सुभद्रा का प्रबंध करके श्रीकृष्ण शंख और भेरी के नाद के साथ द्वीप की ओर चले गए। वहाँ पहुँचकर उग्रसेन आदि यादव दान-धर्म में लग गए और उत्सव मनाने लगे। वह महाद्वीप ७ योजन चौड़ा और १० योजन लंबा था, जो पर्वत, वन, बावड़ियों, सरोवरों से सुसज्जित दूसरे स्वर्ग (इंद्रलोक) के समान लग रहा था। ३४ दिनों तक यादव नृत्य, संगीत और आभूषणों से सुसज्जित होकर आनंद मनाते रहे। जब श्रीकृष्ण सहित यादवों के श्रेष्ठ नायक द्वीप चले गए, तब अर्जुन ने सुभद्रा के हरण (विवाह) का यह उपयुक्त अवसर समझा।

व्याख्या: पूरा यादव समाज उत्सव में मग्न द्वीप पर चला गया था और नगर लगभग खाली हो गया था। श्रीकृष्ण की योजना सफल हुई और अर्जुन के लिए सुभद्रा को रथ पर बैठाकर ले जाने का उचित समय आ गया। यहीं पर सुभद्राहरण पर्व का यह २४१वाँ अध्याय समाप्त होता है।

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