महाभारत् -०१ आदिपर्व -२४६

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२४६

महाभारत के आदिपर्व के इस 246वें अध्याय में अर्जुन और सुभद्रा के इंद्रप्रस्थ आगमन, सुभद्रा और द्रौपदी के प्रथम एवं अत्यंत मधुर मिलन, माता कुंती के आशीर्वाद तथा पांडवों द्वारा अर्जुन के तीर्थयात्रा से लौटने पर किए गए भव्य स्वागत का वर्णन है।

इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 6

वैशंपायन उवाच। क्रोशणात्रे पुरस्यासीद्गोष्ठं पार्थस्य शोभनम्। तत्रापि यात्वा बीभत्सुर्निविष्टो यदुकन्यया।। 1 ।। ततः सुभद्रां सत्कृत्य पार्थो वचनमब्रवीत्। गोपिकानां तु वेषेण गच्छ त्वं वृजिनं पुरम्।। 2 ।। कामव्याहारिणी कृष्णा रोचतां ते वचो मम। दृष्ट्वा तु परुषं ब्रूयात्सह तत्र मयागताम्।। 3 ।। अन्यवेषेण तु गतां दृष्ट्वा सा त्वां प्रियं वदेत्। यत्तु सा प्रथमं ब्रूयान्न तस्यास्ति निवर्तनम्।। 4 ।। तस्मान्मानं च दर्पं च व्यपनीय स्वयं व्रज। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सुभद्रा प्रत्यभाषत।। 5 ।। एवमेतत्करिष्यामि यथा त्वं पार्थ भाषसे। सुभद्रावचनं श्रुत्वा सुप्रीतः पाकशासनिः।। 6 ।।

अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—राजधानी (इंद्रप्रस्थ) से एक कोस की दूरी पर अर्जुन का एक सुंदर गोशाला (गोष्ठ) था। बीभत्सु (अर्जुन) यदुकन्या सुभद्रा के साथ वहाँ पहुँचे और ठहरे। वहाँ सुभद्रा का आदर-सत्कार करके पार्थ ने कहा—"तुम गोपी (गोपिका) के वेश में हमारी निष्पाप नगरी (इंद्रप्रस्थ) में जाओ। मेरी बात मानो, द्रौपदी (कृष्णा) सीधी और स्पष्ट बात कहने वाली हैं। यदि वे तुम्हें मेरे साथ एक राजकन्या के रूप में आते देखेंगी, तो शायद कठोर वचन कह देंगी। किंतु यदि वे तुम्हें साधारण साधारण गोपी के वेश में विनम्रता से आते देखेंगी, तो प्रिय वचन ही बोलेंगी। और उनके मुख से पहली बार जो वचन निकल जाएगा, वे उससे पीछे नहीं हटेंगी। इसलिए तुम अपने मान-अभिमान और अहंकार को त्यागकर स्वयं ही नम्र होकर जाओ।" अर्जुन का यह वचन सुनकर सुभद्रा बोलीं—"हे पार्थ! जैसा आप कह रहे हैं, मैं वैसा ही करूँगी।" सुभद्रा की यह बात सुनकर इंद्रपुत्र अर्जुन अत्यंत प्रसन्न हुए।

व्याख्या: अर्जुन जानते थे कि द्रौपदी का पांडवों के जीवन में सर्वोपरि स्थान है। वे सुभद्रा को सलाह देते हैं कि राजसी वेश और अहंकार त्यागकर एक अत्यंत विनम्र गोपी के रूप में सबसे पहले द्रौपदी और कुंती के पास जाएँ। अर्जुन की यह नीति द्रौपदी और सुभद्रा के बीच किसी भी संभावित ईर्ष्या या कटुता को दूर करने के लिए अत्यंत चतुरतापूर्ण थी।

श्लोक 7 - 12

गोपालान्स समानीय त्वरितो वाक्यमब्रवीत्। तरुम्यः सन्ति यावन्त्यस्ताः सर्वा व्रजयोषितः।। 7 ।। आगच्छन्तु गमिष्यन्त्या भद्रया सह सङ्गताः। इन्द्रप्रस्थं पुरवरं कृष्णां द्रष्टुं यशस्विनीम्।। 8 ।। एतच्छ्रुत्वा तु गोपालैरानीता व्रजयोषितः। ततस्ताभिः परिवृतां व्रजस्त्रीभिः समन्ततः।। 9 ।। सुभद्रां त्वरमाणश्च रक्तकौशेयवासिनीम्। पार्थः प्रस्थापयामास कृत्वा गोपालिकावपुः।। 10 ।। साऽधिकं तेन रूपेण शोभमाना यशस्विनी। गोपालिकामध्यगता प्रययौ वृजिनं पुरम्।। 11 ।। त्वरिता खाण्डवप्रस्थमाससाद विवेश च। भवनं श्रेष्ठमासाद्य वीरपत्नी वराङ्गना।। 12 ।।

अनुवाद: अर्जुन ने तुरंत ग्वालों (गोपालों) को बुलाकर कहा—"यहाँ जितनी भी युवा व्रज की स्त्रियाँ (गोपियाँ) हैं, वे सभी सुभद्रा के साथ यशस्वी द्रौपदी के दर्शन के लिए श्रेष्ठ नगर इंद्रप्रस्थ चलें।" यह सुनकर ग्वालों ने व्रज की स्त्रियों को एकत्र कर लिया। लाल रेशमी वस्त्र पहने और गोपी का वेश धारण किए सुभद्रा को, जो गोपियों से घिरी हुई थीं, पार्थ ने शीघ्रता से प्रस्थान कराया। गोपी के वेश में वह यशस्विनी सुभद्रा और भी अधिक शोभा पा रही थीं। गोपियों के बीच में चलती हुई वे निष्पाप इंद्रप्रस्थ (खांडवप्रस्थ) पहुँचीं और राजभवन के भीतर प्रवेश किया।

व्याख्या: अर्जुन ने सुभद्रा को अकेला भेजने के बजाय गोशाला की अन्य गोपियों के साथ भेजा ताकि वे सचमुच साधारण गोपी-मंडली का हिस्सा लगें। सुभद्रा ने लाल वस्त्र धारण किए और विनम्र वेश में राजभवन में प्रवेश किया।

श्लोक 13 - 17

ववन्दे पृथुताम्राक्षी पृथां भद्रा पितृष्वसाम्। तां कुन्ती चारुसर्वाङ्गीमुपाजिघ्रत मूर्धनि।। 13 ।। प्रीत्या परमया युक्ता आशीर्भिर्युञ्जताऽतुलाम्। ततोऽभिगम्य त्वरिता पूर्णेन्दुसदृशानना।। 14 ।। ववन्दे द्रौपदीं भद्रा प्रेष्याऽहमिति चाब्रवीत्। प्रत्युत्थाय तदा कृष्णा स्वसारं माधवस्य च।। 15 ।। परिष्वज्यावदत्प्रीत्या निःसपत्नोस्तु ते पतिः। वीरसूर्भव भद्रे त्वं भव भर्तृप्रिया तथा।। 16 ।। ओजसा निर्मिता बह्वीरुवाच परमाशिषः। तथैव मुदिता भद्रा तामुवाच तथास्त्विति।। 17 ।।

अनुवाद: सुंदर और विशाल लाल आँखों वाली सुभद्रा ने सबसे पहले अपनी फूफी कुंती (पृथा) के चरण स्पर्श कर वंदना की। सुंदर अंगों वाली कुंती ने अत्यंत प्रेमपूर्वक सुभद्रा के मस्तक को सूँघा (स्नेह प्रकट किया) और उन्हें अतुलनीय आशीर्वाद दिए। इसके बाद पूर्ण चंद्रमा के समान मुख वाली सुभद्रा ने शीघ्रता से जाकर द्रौपदी के चरण छुए और अत्यंत नम्रता से कहा—"मैं आपकी दासी/सेविका हूँ।" श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा को इस प्रकार नम्रता से देखकर द्रौपदी तुरंत अपने स्थान से उठ खड़ी हुईं, उन्हें गले से लगा लिया और प्रेमपूर्वक बोलीं—"तुम्हारा पति निष्कंटक रहे (शत्रुरहित रहे)! हे भद्रे! तुम वीर पुत्र को जन्म देने वाली (वीरसू) बनो और अपने पति की अत्यंत प्रिय बनो!" द्रौपदी ने पूरे ओज और हृदय से अनेक परम आशीर्वाद दिए। प्रसन्न हुई सुभद्रा ने भी सहर्ष कहा—"ऐसा ही हो।"

व्याख्या: यह भारतीय साहित्य के सबसे सुंदर और भावुक दृश्यों में से एक है। सुभद्रा ने द्रौपदी के सामने स्वयं को 'प्रेष्या' (दासी/सेविका) कहकर अपने अहंकार का पूर्ण त्याग किया। सुभद्रा की इस अपार नम्रता और सरलता को देखकर द्रौपदी का हृदय पसीज गया। उन्होंने न केवल सुभद्रा को सहर्ष स्वीकार किया बल्कि उन्हें अपने पति की प्रिय बनने और वीर पुत्र (जो आगे चलकर अभिमन्यु बने) को जन्म देने का आशीर्वाद भी दिया।

श्लोक 18 - 22

ततः सुभद्रां वार्ष्णेयी परिष्वज्य शुभाननाम्। अङ्के निवेश्य मुदिता वसुदेवं प्रशस्य च।। 18 ।। ततः किलकिलाशब्दः क्षणेन समपद्यत। हर्षादानर्तयोधानामासाद्य वृजिनं पुरम्।। 19 ।। देवपुत्रप्रकाशास्ते जाम्बूनदमयध्वजाः। पृष्ठतोऽनुययुः पार्थं पुरुहूतमिवामराः।। 20 ।। गोभिरुष्ट्रैः सदश्वैश्च युक्तानि बहुला जनाः। ददृशुर्यानमुख्यानि दाशार्हपुरवासिनाम्।। 21 ।। ततः पुरवरे यूनां पुंसां वाच उदीरिताः। अर्जुने प्रतियाति स्म अश्रूयन्त समन्ततः।। 22 ।।

अनुवाद: इसके बाद कुंती ने उस सुंदर मुख वाली वृष्णिकन्या सुभद्रा को पुनः गले लगाया, प्रसन्न होकर अपनी गोद में बैठाया और उनके पिता वसुदेव जी की प्रशंसा की। उधर, नगर में आनर्त (द्वारका) के योद्धाओं तथा अतिथियों के पहुँचने पर चारों ओर हर्ष का वातावरण छा गया। देवपुत्रों के समान तेजस्वी तथा सुवर्ण के ध्वजों वाले योद्धा पार्थ अर्जुन के पीछे-पीछे ऐसे चल रहे थे जैसे इंद्र के पीछे देवता चलते हैं। नगरवासियों ने गायों, ऊंटों और श्रेष्ठ घोड़ों से युक्त तथा द्वारकावासियों द्वारा लाए गए वाहनों की पंक्तियों को देखा। अर्जुन के नगर में पुनः प्रवेश करने पर इंद्रप्रस्थ के नवयुवकों और पुरुषों की जय-जयकार की ध्वनियाँ चारों ओर सुनाई देने लगीं।

व्याख्या: सुभद्रा का अंतःपुर में स्वागत होने के बाद, बाहर अर्जुन का इंद्रप्रस्थ में भव्य स्वागत आरंभ हुआ। द्वारका से आए यादव योद्धा और सामग्री नगर में पहुँची और पूरे इंद्रप्रस्थ में उत्सव का माहौल बन गया।

श्लोक 23 - 28

प्रवासादागतं पार्थं दृष्ट्वा स्वमिव बान्धवम्। सोऽभिगम्य नरश्रेष्ठो दाशार्हशतसंवृतः।। 23 ।। पौरैः पुरवरं प्रीत्या परया चाभिनन्दितः। प्राप्य चान्तःपुरद्वारमवरुह्य नरर्षभः।। 24 ।। ववन्दे धौम्यमासाद्य मातरं च धनञ्जयः। स्पृष्ट्वा च चरणौ राज्ञो भीमस्य च धनञ्जयः।। 25 ।। यमाभ्यां वन्दितो हृष्टः सस्वजे तौ ननन्द च। ब्राह्मणप्रमुखान्सर्वान्भ्रातृभिः सह सङ्गतः।। 26 ।। यथार्हं मानयामास पौरजानपदानपि। तत्रस्थान्यनुयातानि तीर्थान्यायतनानि च।। 27 ।। निवेदयामास तदा राज्ञे सर्वं स्वनुष्ठितम्। भ्रातृभ्यश्चैव सर्वेभ्यः कथयामास भारत।। 28 ।।

अनुवाद: एक वर्ष के लंबे प्रवास के बाद वापस आए अर्जुन को अपने प्रिय बंधु के समान देखकर नगरवासियों ने अत्यंत प्रीतिपूर्वक उनका स्वागत किया। सैकड़ों यादवों से घिरे हुए पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन राजभवन के मुख्य द्वार पर पहुँचे और रथ से उतरे। धनंजय अर्जुन ने सबसे पहले पुरोहित धौम्य और माता कुंती के चरणों में प्रणाम किया। फिर राजा युधिष्ठिर और भीमसेन के चरण छुए। जब नकुल और सहदेव (यमज) ने उनके चरण छुए, तो अर्जुन ने उन्हें उठाकर गले लगाया और आनंदित हुए। भाइयों के साथ मिलकर उन्होंने सभी ब्राह्मणों, नागरिकों और देहाती जनों का यथायोग्य सम्मान किया। इसके बाद अर्जुन ने तीर्थयात्रा के दौरान दर्शन किए गए सभी तीर्थों, मंदिरों तथा अपने धार्मिक अनुष्ठानों की पूरी गाथा राजा युधिष्ठिर और अपने सभी भाइयों को कह सुनाई।

व्याख्या: बारह वर्ष के कठिन ब्रह्मचर्य और तीर्थयात्रा के नियम को सफलता से पूरा करने के बाद अर्जुन अपने परिवार से पुनर्मिलन करते हैं। वे ज्येष्ठ भाइयों तथा गुरु-पुरोहित का आशीर्वाद लेते हैं और छोटों को स्नेह देते हैं।

श्लोक 29 - 33

श्रुत्वा सर्वं महाप्राज्ञो धर्मराजो युधिष्ठिरः। पुरस्तादेव तेषां तु पूजयामास चार्जुनम्।। 29 ।। पाण्डवेन यथार्हं तु पूजार्हेण सुपूजितः। न्यविशच्चाभ्यनुज्ञातो राज्ञा तुष्टो यशस्विना।। 30 ।। तामदीनां सुपूजार्हां सुभद्रां प्रीतिवर्धिनीम्। साक्षाच्छ्रियममन्यन्त पार्थाः कृष्णसहोदराम्।। 31 ।। गुरूणां श्वशुराणां च देवराणां तथैव च। सुभद्रा स्वेन वृत्तेन बभूव परमप्रिया।। 32 ।। ततस्ते हृष्टमनसः पाण्डवेया महारथाः। कुन्ती च परमप्रीता कृष्णा च सततं तथा।। 33 ।।

अनुवाद: यह सब सुनकर महाप्राज्ञ धर्मराज युधिष्ठिर ने सबके सामने अर्जुन का विशेष पूजन और सत्कार किया। पूजनीय युधिष्ठिर द्वारा सम्यक् रूप से पूजित होकर, यशस्वी राजा की अनुमति से अर्जुन संतुष्ट होकर अपने भवन में प्रविष्ट हुए। पांडव श्रीकृष्ण की बहन उस दीनताहीन, अत्यंत पूजनीय और प्रीति बढ़ाने वाली सुभद्रा को साक्षात् 'लक्ष्मी' के समान मानने लगे। सुभद्रा अपने श्रेष्ठ आचरण, नम्रता और सेवाभाव से गुरुओं (सास कुंती आदि), श्वशुरों तथा देवरों (भीम, नकुल, सहदेव) की अत्यंत प्रिय बन गईं। इस प्रकार महारथी पांडव, माता कुंती और द्रौपदी (कृष्णा) सभी अत्यंत प्रसन्नचित्त और आनंदित रहने लगे।

व्याख्या: इस अध्याय के अंतिम श्लोकों में सुभद्रा का पांडव परिवार में पूर्ण रूप से घुल-मिल जाने का वर्णन है। अपने सद्व्यवहार और शील से वे कुंती, पांडवों और विशेष रूप से द्रौपदी की चहेती बन गईं। इस सुखद और मंगलमय स्थिति के साथ महाभारत के आदिपर्व का यह सुभद्राहरण (हरणाहरण) पर्व समाप्त होता है।

(इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि हरणाहरणपर्वणि षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः .)

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