महाभारत के आदिपर्व के इस अध्याय (245वें अध्याय) में श्रीकृष्ण द्वारा क्रुद्ध यादवों को शांत करने, अर्जुन और सुभद्रा के इंद्रप्रस्थ की ओर सकुशल प्रस्थान करने तथा उनके अपनी नगरी पहुँचने का वर्णन है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 6
वैशंपायन उवाच। उक्तवन्तो यथावीर्यमसकृत्सर्ववृष्णयः। ततोऽब्रवीद्वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंयुतम्।। 1 ।। मयोक्तं न श्रुतं पूर्वं सहितैः सर्वयादवैः। अतिक्रान्तमतिक्रान्तं न निवर्तेत कर्हिचित्। शृणुध्वं सहिताः सर्वे मम वाक्यं सहेतुकम्।। 2 ।। नावमानं कुलस्यास्य गुडाकेशः प्रयुक्तवान्। संमानोऽभ्यधिकस्तेन प्रयुक्तोऽयं न संशयः।। 3 ।। अर्थलुब्धान्न वः पार्थो मन्यते सात्वतान्सदा। स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डवः।। 4 ।। प्रदानमपि कन्यायाः पशुवत्को नु मन्यते। विक्रयं चाप्यपत्यस्य कः कुर्यात्पुरुषो भुवि।। 5 ।। एतान्दोषांस्तु कौन्तेयो दृष्टवानिति मे मतिः। क्षत्रियाणां तु वीर्येण प्रशस्तं हरणं बलात्। अतः प्रसह्य हृतवान्कन्यां धर्मेण पाण्डवः।। 6 ।।
अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—सब वृष्णिवंशियों द्वारा जब अपने-अपने पराक्रम के अनुसार बार-बार क्रोधपूर्ण बातें कही गईं, तब वासुदेव श्रीकृष्ण ने धर्म और अर्थ से युक्त नीतिपूर्ण वचन कहे—"मैंने जो पहले कहा था, उस पर आप सभी यादवों ने ध्यान नहीं दिया। जो बीत गया सो बीत गया, उसे अब बदला नहीं जा सकता। अब आप सब तर्कसंगत बातें सुनें। गुडाकेश (अर्जुन) ने हमारे कुल का कोई अपमान नहीं किया है, बल्कि इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने हमारे कुल को अत्यधिक सम्मान ही दिया है। पांडव अर्जुन सात्वतों (यादवों) को धन का लोभी नहीं मानते और न ही स्वयंवर प्रथा को पूर्णतः दोषमुक्त मानते हैं। कन्या का दान (बिना उसकी सहमति के) पशु की भांति कर देना या अपनी संतान को बेचना भला कौन श्रेष्ठ पुरुष उचित मानेगा? मेरी सम्मति में कौन्तेय अर्जुन ने इन दोषों को देखा। क्षत्रियों के लिए अपने बल और पराक्रम से कन्या का हरण करना शास्त्रसम्मत और प्रशस्त माना गया है; अतः पांडव अर्जुन ने धर्मानुसार ही बलपूर्वक सुभद्रा का हरण किया है।"
व्याख्या: श्रीकृष्ण ने सभी क्रुद्ध यादवों को क्षत्रिय धर्म और नीति का मर्म समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयंवर में कन्या की इच्छा अनिश्चित हो सकती है और दान में कन्या की वस्तु जैसी स्थिति हो जाती है। इसलिए एक वीर क्षत्रिय के लिए पराक्रम से कन्या का हरण करना शास्त्रसम्मत और सम्मानजनक माना गया है। अर्जुन का यह कृत्य यादव कुल के प्रति आदर का प्रतीक है, अपमान का नहीं।
श्लोक 7 - 13
उचितश्चैव संबन्धः सुभद्रा च शयस्विनी। एष चापीदृशः पार्थः प्रसह्य हृतवानतः।। 7 ।। भरतस्यान्वये जातं शान्तनोश्च यशस्विनः। कुन्तिभोजात्माजापुत्रं का बुभूषेत नार्जुनम्।। 8 ।। न तं पश्यामि यः पार्थं विजयेत रणे बलात्। वर्जयित्वा विरूपाक्षं भगनेत्रहरं हरम्।। 9 ।। अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष। स च नाम रथस्तादृङ्मदीयास्ते च वाजिनः।। 10 ।। मम शस्त्रं विशेषेण तूणौ चाक्षयसायकौ। योद्धा पार्थश्च शीघ्रास्त्रः को नु तेन समो भवेत्। तमभिद्रुत्य सान्त्वेन परमेण धनञ्जयम्।। 11 ।। निवर्तयत संहृष्टा ममैषा परमा मतिः। यदि निर्जित्य वः पार्थो बलाद्गच्छेत्स्वकं पुरं।। 12 ।। प्रणश्येद्वो यशः सद्यो न तु सान्त्वे पराजयः। पितृष्वसायाः पुत्रो मे संबन्धं नार्हति द्विषाम्।। 13 ।।
अनुवाद: "यह सम्बंध सर्वथा योग्य है। यशस्विनी सुभद्रा और महारथी पार्थ दोनों ही एक-दूसरे के योग्य हैं। भरतवंश तथा यशस्वी शांतनु के कुल में उत्पन्न और कुंती के पुत्र अर्जुन को कौन कन्या अपना पति नहीं बनाना चाहेगी? साक्षात् भगवान शिव (विरूपाक्ष) को छोड़कर, इंद्र और रुद्रों सहित तीनों लोकों में ऐसा कोई नहीं दिखता जो संग्राम में बलपूर्वक अर्जुन को परास्त कर सके। फिर उस पर मेरा वह दिव्य रथ है, मेरे ही श्रेष्ठ घोड़े हैं, मेरे दिव्यास्त्र हैं, अक्षय बाणों से भरे तूणीर हैं और योद्धा स्वयं शीघ्रता से अस्त्र चलाने वाले अर्जुन हैं! भला उनकी बराबरी कौन कर सकता है? इसलिए मेरी उत्तम सम्मति यही है कि आप सब प्रसन्नचित्त होकर प्रेम और शांतिपूर्ण (सांत्वना) ढंग से धनंजय के पास जाएँ और उन्हें मनाकर वापस लाएँ। यदि अर्जुन आप सबको युद्ध में हराकर बलपूर्वक अपने नगर चले गए, तो तुरंत ही आपका यश नष्ट हो जाएगा; किंतु प्रेम से समझौते में कोई पराजय नहीं है। मेरी बुआ का पुत्र अर्जुन हमसे शत्रुता का सम्बंध रखने योग्य नहीं है।"
व्याख्या: श्रीकृष्ण ने यादवों को अर्जुन के अद्वितीय पराक्रम से अवगत कराया। उन्होंने समझाया कि युद्ध करने पर यादवों की पराजय निश्चित है जिससे उनका यश नष्ट होगा। अतः हठ छोड़कर अर्जुन को प्रेमपूर्वक स्वीकार कर लेना ही सबसे बुद्धिमान निर्णय है।
श्लोक 14 - 20
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा कर्तुं जनाधिप।। उद्योगं कृतवन्तस्ते भेरीं सन्नाद्य यादवाः। अर्जुनस्तु तदा श्रुत्वा भेरीसन्नादनं महत्।। 14 ।। कौन्तेयस्त्वरमाणस्तु सुभद्रामभ्यभाषत। आयान्ति वृष्णयः सर्वे ससुहृज्जनबान्धवाः।। 15 ।। त्वदर्थं योद्धुकामास्ते मदरक्तान्तलोचनाः। प्रमत्तानशुचीन्मूढान्सुरामत्तान्नराधमान्।। 16 ।। वमनं पानशीलांस्तान्करिष्यामि शरोत्तमैः। उताहो वा मदोन्मत्तान्नयिष्यामि यमक्षयम्।। 17 ।। एवमुक्त्वा प्रियां पार्थो न्यवर्तत महाबलः। निवर्तमानं दृष्ट्वैव सुभद्रा त्रस्ततां गता।। 18 ।। एवं मा वद पार्थेति पादयोः पतिता तदा। सुभद्रा तु कलिर्जाता वृष्णीनां निधाय च।। 19 ।। एवं ब्रुवन्तः पौरास्ते ह्यपवादरताः प्रभो। मम शोकं वर्धयन्ति तस्मान्नाशं न चिन्तये। परिवादभयान्मुक्ता त्वत्प्रसादाद्भवाम्यहम्।। 20 ।।
अनुवाद: श्रीकृष्ण के ये तर्कसंगत वचन सुनकर यादवों ने शांतिपूर्ण उद्योग का निश्चय किया और भेरी बजाई। उस विशाल भेरी-नाद को सुनकर कौन्तेय अर्जुन ने शीघ्रता से सुभद्रा से कहा—"अपने सगे-संबंधियों के साथ सभी वृष्णि वंशी आ रहे हैं। तुम्हारे कारण युद्ध करने की इच्छा से क्रोधित लाल आँखों वाले इन मद्यप और मदोन्मत्त लोगों को मैं अपने श्रेष्ठ बाणों से यमलोक पहुँचा दूँगा।" ऐसा कहकर महाबली पार्थ युद्ध के लिए लौटने लगे। उन्हें लौटते देखकर सुभद्रा भयभीत हो गईं। वे अर्जुन के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं—"हे पार्थ! ऐसा मत कहिए। 'सुभद्रा वृष्णियों के विनाश (कलि) का कारण बन गई'—ऐसा कहकर नगरवासी मेरी निंदा कर रहे हैं और मेरा शोक बढ़ा रहे हैं। इसलिए आप उनके विनाश का विचार न करें। आपकी कृपा से ही मैं इस कलंक और निंदा के भय से मुक्त हो सकती हूँ।"
व्याख्या: भेरी की आवाज़ सुनकर अर्जुन युद्ध के लिए प्रस्तुत हुए, किंतु सुभद्रा अपने ही परिजनों के विनाश की आशंका से भयभीत होकर अर्जुन के चरणों में गिर पड़ीं। वे अर्जुन से प्रार्थना करती हैं कि वे उनके परिजनों पर प्रहार न करें ताकि उन पर अपने ही कुल के विनाश का कलंक न लगे।
श्लोक 21 - 26
वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्ततः पार्थः प्रियया भद्रया तदा। गमनाय मतिं चक्रे पार्थः सत्यपराक्रमः।। 21 ।। स्तितपूर्वं तदाऽऽभाष्य परिष्वज्य प्रियां तदा। उत्थाप्य च पुनः पार्थो याहि याहीति चाब्रवीत्।। 22 ।। ततः सुभद्रा त्वरिता रश्मीन्संगृह्य पाणिना। चोदयामास जवनाञ्शीग्रमश्वान्कृतत्वरा।। 23 ।। ततस्तु कृतसन्नाहा वृष्णिवीराः समाहिताः। प्रत्यानयार्थं पार्थस्य जवनैस्तुरगोत्तमैः।। 24 ।। राजमार्गमनुप्राप्ता दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम्। प्रासादपङ्क्तिस्तम्भेषु वेदिकासु ध्वजेषु च।। 25 ।। अर्जुनस्य शरान्दृष्ट्वा विस्मयं परमं गताः। केशवस्य वचस्तथ्यं मन्यमानास्तु यादवाः।। 26 ।।
अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—अपनी प्रियतमा सुभद्रा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सत्यपराक्रमी पार्थ ने आगे बढ़ने (इंद्रप्रस्थ जाने) का ही निश्चय किया। अपनी प्रिये को आलिंगनबद्ध कर, उठाकर उन्होंने कहा—"चलो, शीघ्र आगे बढ़ो।" तब सुभद्रा ने तुरंत हाथों में बागडोर सँभाली और तीव्रगामी घोड़ों को तेजी से आगे बढ़ा दिया। उधर सज-धजकर तैयार हुए वृष्णिवीर अर्जुन को वापस लाने के लिए श्रेष्ठ घोड़ों पर सवार होकर जब राजमार्ग पर पहुँचे, तो उन्होंने अर्जुन के पराक्रम के निशान देखे। राजमहलों के खंभों, वेदियों और ध्वजों पर अर्जुन के बाण बिंधे देखकर वे अत्यंत विस्मित हुए और श्रीकृष्ण के वचनों को पूर्णतः सत्य मानने लगे।
व्याख्या: सुभद्रा के आग्रह पर अर्जुन ने युद्ध टाल दिया और आगे बढ़ गए। जब पीछे से यादव वीर पहुँचे, तो उन्होंने द्वारका के भवनों पर अर्जुन के बाणों का संहारक प्रभाव देखा। इससे उन्हें श्रीकृष्ण की चेतावनी का अहसास हुआ कि अर्जुन से युद्ध करना विनाशकारी ही सिद्ध होगा।
श्लोक 27 - 36
अतीत्य तं रैवतकं श्रुत्वा तु विपृथोर्वचः। अर्जुनेन कृतं श्रुत्वा गन्तुकामास्तु वृष्णयः।। 27 ।। श्रुत्वा दीर्घं गतं पार्थं न्यवर्तन्त महारथाः। पुरोद्यानमतिक्रम्य विशालं च गिरिव्रजम्।। 28 ।। सानुमुज्जयिनीं चैव वनान्युपवनानि च। पुण्येष्वानर्तराष्ट्रेषु वापीपद्मसरांसि च।। 29 ।। प्राप्य धेनुमतीतीर्थमश्वरोधसरः प्रति। प्रेक्षावर्तं ततः शैलमम्बुदं च नगोत्तमम्।। 30 ।। आराच्छृङ्गमथासाद्य तीर्णः करवतीं नदीम्। प्राप्य साल्वेयराष्ट्राणि निषधानप्यतीत्य च।। 31 ।। देवापृथुपुरं पश्यन् सर्वतः सुसमाहितः। तमतीत्य महाबाहुर्देवारण्यमपश्यत।। 32 ।। पूजयामासुरायान्तं देवारण्ये महर्षयः। स वनानि नदीः शैलान् गिरिप्रस्रवणानि च।। 33 ।। अतीत्य च तदा पार्थः सुभद्रासारथिस्तदा। कौरवं विषयं प्राप्य विशोकः समपद्यत।। 34 ।। सोदर्याणां महाबाहुः सिंहाशयमिवाशयम्। दूरादुपवनोपेतं समन्तात्सलिलावृतम्।। 35 ।। भद्रया मुदितो जिष्णुर्ददर्श वृजिनं पुरम्।। 36 ।।
अनुवाद: रैवतक पर्वत को पार करके जब यादवों ने सेनापति विपृथु के वचन सुने और यह जाना कि अर्जुन बहुत दूर निकल चुके हैं, तो वे महारथी वापस लौट गए। उधर अर्जुन सुभद्रा के सारथित्व में नगर के उद्यानों, विशाल पर्वतों, उज्जयिनी के शिखरों, वनों, उपवनों, आनर्त देश के पवित्र बावड़ियों और कमलों से भरे सरोवरों को पार करते हुए आगे बढ़े। वे धेनुमती तीर्थ, अश्वरोध सरोवर, प्रेक्षावर्त पर्वत, अम्बुद पर्वत, आराच्छृंग पर्वत, करवती नदी, साल्वेय जनपद और निषध देश को लांघकर देवापृथुपुर पहुँचे। इसके बाद महाबाहु अर्जुन ने 'देवारण्य' आश्रम देखा, जहाँ महर्षियों ने उनका पूजन-सत्कार किया। विभिन्न वनों, नदियों, पर्वतों और झरनों को पार करते हुए, सुभद्रा द्वारा संचालित रथ में बैठे अर्जुन अंततः कुरु देश (कुरुक्षेत्र/इंद्रप्रस्थ की सीमा) में पहुँचकर चिंतामुक्त हो गए। अपने सिंह समान पराक्रमी भाइयों की नगरी, जो उपवनों और जलाशयों से घिरी हुई थी, उस पापरहित (वृजिन) सुंदर पुरी को देखकर जिष्णु (अर्जुन) सुभद्रा के साथ अत्यंत आनंदित हुए।
व्याख्या: यादवों ने पीछा करना छोड़ दिया और द्वारका लौट गए। इन श्लोकों में अर्जुन और सुभद्रा की द्वारका से इंद्रप्रस्थ तक की भौगोलिक यात्रा का सुंदर वर्णन है। अनेक तीर्थों, पर्वतों, नदियों और आश्रमों को पार करते हुए अंततः दोनों सुरक्षित रूप से कुरु प्रदेश में अपनी राजधानी पहुँच जाते हैं।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सुभद्राहरण पर्व का 245वाँ अध्याय समाप्त हुआ।)
