महाभारत के आदिपर्व (मयदर्शन पर्व / खाण्डवदाह पर्व के अंतिम भाग) के इस 254वें अध्याय में देवराज इंद्र के प्रस्थान, आकाशवाणी द्वारा कृष्ण-अर्जुन का वास्तविक परिचय प्रकट होने, खाण्डव वन के अंतिम भस्म होने तथा दानव शिल्पी 'मय' को अर्जुन द्वारा अभयदान मिलने का अत्यंत महत्वपूर्ण वर्णन है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 5
वैशंपायन उवाच। तथा शैलनिपातेन भीषिताः खाण्डवालयाः। दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकसः।। 1 ।। द्विपाः प्रभिन्नाः शार्दूलाः सिंहाः केसरिणस्तथा। मृगाश्च महिषाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा।। 2 ।। समुद्विग्ना विससृपुस्तथान्या भूतजातयः। तं दावं समुदैक्षन्त कृष्णौ चाभ्युद्यतायुधौ।। 3 ।। उत्पातनादशब्देन त्रासिता इव चाभवन्। ते वनं प्रसमीक्ष्याथ दह्यमानमनेकधा।। 4 ।। कृष्णमभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम्।। 5 ।।
हिन्दी अनुवाद:
वैशम्पायन जी कहते हैं—इस प्रकार (इंद्र द्वारा गिराए गए) पर्वत-शिखर के गिरने से खाण्डव वन के निवासी दानव, राक्षस, नाग, लकड़बग्घे, भालू, वनवासी जीव, मदमत्त हाथी, चीते, सिंह, मृग, भैंसे, सैकड़ों पक्षी तथा अन्य प्राणी अत्यंत भयभीत होकर चारों ओर भागने लगे। वे जलते हुए वन को तथा शस्त्र उठाए हुए दोनों कृष्णों (श्रीकृष्ण और अर्जुन) को देखने लगे। उत्पातकारी भयंकर गर्जना से वे मानो त्रस्त हो गए थे। उस वन को अनेक प्रकार से जलता हुआ और श्रीकृष्ण को अस्त्र उठाए हुए देखकर वे घोर चीत्कार करने लगे।
व्याख्या:
जब इंद्र का पर्वत-शिखर गिरकर चकनाचूर हो गया और वन चारों ओर से प्रज्वलित हो गया, तो वन के प्राणी भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। परंतु बाहर निकलने पर उन्हें शस्त्र उठाए अर्जुन और सुदर्शन चक्र लिए श्रीकृष्ण खड़े दिखाई दिए।
श्लोक 6 - 12
तेन नादेन रौद्रेण नादेन च विभावसोः। ररास गगनं कृत्स्नमुत्पातजलदैरिव।। 6 ।। ततः कृष्णो महाबाहुः स्वतेजोभास्वरं महत्। चक्रं व्यसृजदत्युग्रं तेषां नाशाय केशवः।। 7 ।। तेनार्ता जातयः क्षुद्राः सदानवनिशाचराः। निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात्।। 8 ।। तत्रादृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः। वसारुधिरसंपृक्ताः सन्ध्यायामिव तोयदाः।। 9 ।। पिशाचान्पक्षिणो नागान्पशूंश्चैव सहस्रशः। निघ्नंश्चरति वार्ष्णेयः कालवत्तत्र भारत।। 10 ।। क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः। छित्त्वानेकानि सत्वानि पाणिमेति पुनः पुनः।। 11 ।। तथा तु निघ्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान्। बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा।। 12 ।।
हिन्दी अनुवाद:
जीवों की उस रौद्र चीत्कार और अग्निदेव (विभावसु) की विकराल गर्जना से पूरा आकाश प्रलयकारी मेघों के समान गूँज उठा। तब महाबाहु केशव श्रीकृष्ण ने अपने तेज से देदीप्यमान, अत्यंत उग्र चक्र (सुदर्शन) को उन असुरी शक्तियों के नाश के लिए छोड़ा। उस चक्र से पीड़ित होकर क्षुद्र योनियों के प्राणी, दानव और निशाचर सैकड़ों की संख्या में कट-कटकर क्षण भर में अग्नि में जा गिरे। श्रीकृष्ण के चक्र से विदीर्ण (कटे हुए), वसा (चरबी) और रक्त से सने हुए वे दैत्य ऐसे दिख रहे थे मानो संध्या काल के लाल बादल हों। हे भारत! वार्ष्णेय श्रीकृष्ण साक्षात् 'काल' (यमराज) के समान वहाँ पिशाचों, पक्षियों, नागों और हज़ारों पशुओं का संहार करते हुए विचरण कर रहे थे। शत्रुहंता श्रीकृष्ण द्वारा बार-बार फेंका गया चक्र अनेक प्राणियों को काटकर पुनः उनके हाथों में लौट आता था। पिशाचों, नागों और राक्षसों का इस प्रकार संहार करते हुए सर्वभूतात्मा श्रीकृष्ण का रूप उस समय अत्यंत उग्र और भयंकर हो गया था।
व्याख्या:
इन श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के संहारक रूप का वर्णन है। जो दानव, राक्षस और हिंसक जीव अग्नि की लपटों से बचकर भागने का प्रयास करते थे, श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र उनका वध कर उन्हें वापस अग्निदेव के मुख में धकेल देता था।
श्लोक 13 - 21
समेतानां च सर्वेषां दानवानां च सर्वशः। विजेता नाभवत्कश्चित्कृष्णपाण्डवयोर्मृधे।। 13 ।। तयोर्बलात्परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः। नाशक्नुवञ्शमयितुं तदाऽभूवन्पराङ्मुखाः।। 14 ।। शतक्रतुस्तु संप्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा। बभूव मुदितो राजन्प्रशंसन्केशवार्जुनौ।। 15 ।। निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाशरीरिणी। शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना।। 16 ।। न ते सखा सन्निहितस्तक्षको भुजगोत्तमः। दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ।। 17 ।। न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव। वासुदेवार्जुनावेतौ निबोध वचनान्मम।। 18 ।। नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ। भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ।। 19 ।। नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि। अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ।। 20 ।। पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः। यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः। तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव।। 21 ।।
हिन्दी अनुवाद:
एकत्रित हुए समस्त दानवों में से कोई भी युद्ध में श्रीकृष्ण और पांडव अर्जुन को जीतने में समर्थ नहीं हुआ। जब देवता भी अपने बल से उस खाण्डव वन को बचाने और अग्नि को शांत करने में असमर्थ रहे, तब वे युद्ध से विमुख होकर पीछे हट गए। हे राजन्! देवताओं को विमुख होते देखकर शतक्रतु (इंद्र) भी केशव और अर्जुन की प्रशंसा करते हुए मन ही मन प्रसन्न हुए। जब देवता हट गए, तब आकाश से एक अति गंभीर अशरीरिणी वाग् (आकाशवाणी) देवराज इंद्र से बोली—"हे वासव! तुम्हारा मित्र नागराज तक्षक इस समय यहाँ उपस्थित नहीं है, खाण्डव वन के दाह काल में वह कुरुक्षेत्र गया हुआ है। और मेरी बात सुनो, युद्ध में इन वासुदेव और अर्जुन को किसी भी प्रकार जीता नहीं जा सकता। ये दोनों स्वर्ग में विख्यात प्राचीन देवता 'नर और नारायण' हैं। आप स्वयं भी जानते हैं कि इनका वीर्य और पराक्रम कैसा है। संग्राम में दुर्धर्ष और अजेय इन दोनों को तीनों लोकों में कोई नहीं जीत सकता। ये पुरातन श्रेष्ठ ऋषि सभी सुरों, असुरों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों और नागों द्वारा परम पूजनीय हैं। इसलिए हे वासव! आप देवताओं के साथ यहाँ से लौट जाएँ।"
व्याख्या:
जब देवसेना पीछे हट गई, तब आकाश से दिव्य अशरीरिणी वाणी (आकाशवाणी) हुई। आकाशवाणी ने इंद्र को स्मरण कराया कि श्रीकृष्ण और अर्जुन कोई साधारण मानव नहीं बल्कि साक्षात् 'नारायण और नर' के अवतार हैं। साथ ही यह भी बताया गया कि तक्षक नाग यहाँ नहीं है, अतः इंद्र को यह हठ छोड़कर देवताओं सहित लौट जाना चाहिए।
श्लोक 22 - 25
दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत्खाण्डवस्य विनाशनम्। इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः।। 22 ।। क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य संप्रतस्थे दिवं तदा। तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः।। 23 ।। सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरन्दरम्। देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु।। 24 ।। वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः। देवराजे गते राजन्प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ।। 25 ।।
हिन्दी अनुवाद:
"खाण्डव वन के इस विनाश को काल (दैव) का विधान समझो।" इस परम सत्य वचन को सुनकर देवराज इंद्र ने अपना क्रोध और अमर्ष त्याग दिया और स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान किया। हे राजन्! महात्मा इंद्र को प्रस्थान करते देखकर समस्त देवता अपनी सेना के साथ पुरंदर (इंद्र) के पीछे-पीछे चले गए। देवराज को देवताओं सहित जाते हुए देखकर वीर वासुदेव और अर्जुन ने घोर सिंहनाद किया। हे राजन्! देवराज के चले जाने पर केशव और अर्जुन अत्यंत प्रसन्न हुए।
व्याख्या:
आकाशवाणी के वचनों को नियति का विधान मानकर देवराज इंद्र ने अपना हठ छोड़ दिया और अपने लोक लौट गए। उनके जाते ही युद्ध समाप्त हो गया और अर्जुन तथा श्रीकृष्ण ने विजय का सिंहनाद किया।
श्लोक 26 - 32
निर्विशङ्कमवनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा। स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वाऽर्जुनः सुरान्।। 26 ।। व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान्। न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः।। 27 ।। संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना। नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम्।। 28 ।। निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे। शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्रिणाम्।। 29 ।। व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात्कालहता इव। न चालभन्त ते शर्म रोधःसु विषमेषु च।। 30 ।। पितृदेवनिवासेषु सन्तापश्चाप्यजायत। भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम्।। 31 ।। रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः। तेन शब्देन वित्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः।। 32 ।।
हिन्दी अनुवाद:
तब उन दोनों वीरों ने शंकारहित होकर खाण्डव वन को जलाना जारी रखा। जैसे वायु बादलों को उड़ा देती है, वैसे ही देवताओं को भगाकर अर्जुन ने अपने बाण-समूहों से खाण्डव वन के प्राणियों का संहार किया। सव्यसाची अर्जुन द्वारा चलाए जा रहे बाणों से छिन्न-भिन्न होता हुआ कोई भी जीव वहाँ से बाहर नहीं निकल सका। विशालकाय जीव भी रणक्षेत्र में अमोघ अस्त्रधारी अर्जुन की ओर देखने में असमर्थ थे, फिर युद्ध करने की तो बात ही क्या! अर्जुन ने एक बाण से सौ पक्षियों को और सौ बाणों से एक-एक पक्षी को बेध दिया। वे प्राणी साक्षात् काल के मारे हुए बेप्राण होकर आग में गिर पड़े। उन्हें पर्वतों या उबड़-खाबड़ स्थानों में भी कहीं शरण नहीं मिली। इस भयंकर संताप से पितरों और देवताओं के लोकों में भी व्याकुलता छा गई। जीवों के अनेक समुदाय दीन होकर भारी चीत्कार करने लगे। हाथी, मृग और लकड़बग्घे रोने लगे। उस भयंकर शब्द से गंगा और समुद्र में तैरने वाली मछलियाँ भी भयभीत हो गईं।
व्याख्या:
इंद्र के जाने के बाद अर्जुन ने बाणों की ऐसी बाड़ लगा दी कि वन का कोई भी अवांछित प्राणी बचकर भाग न सका। अर्जुन का बाण-कौशल इतना अद्भुत था कि उड़ते हुए पक्षी भी बाणों से बिंधकर सीधे अग्नि की लपटों में गिर रहे थे।
श्लोक 33 - 38
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः। न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम्।। 33 ।। निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद्योद्धुं कुतः पुनः। एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन।। 34 ।। राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान्हरिः। ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद्गतासवः।। 35 ।। पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि। समांसरुधिरौधैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः।। 36 ।। उपर्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत। दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च संप्रदीप्तमहाननः।। 37 ।। दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन्प्राणभृतां वसाम्। तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः।। 38 ।। बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः।।
हिन्दी अनुवाद:
हे महाबाहो! वहाँ रहने वाले विद्याधरगण और वनवासी जीवों में से कोई भी अर्जुन अथवा जनार्दन श्रीकृष्ण की ओर देखने में भी समर्थ नहीं था, युद्ध करना तो दूर की बात थी। जो कुछ राक्षस, दानव और नाग संकरे रास्तों से होकर बाहर निकले, श्रीहरि ने उन्हें चक्र से मार डाला। वे चक्र के वेग से कटे हुए सिर और धड़ वाले होकर निष्प्राण हो गए। अन्य कई विशालकाय प्राणी उस प्रज्वलित अग्निदेव (वसुरेता) में जा गिरे। मांस, रक्त की धाराओं और वसा (चरबी) से भली-भांति तृप्त होकर अग्निदेव धुएँ से रहित होकर आकाश में ऊपर उठ गए। प्रज्वलित नेत्रों, चमचमाती जीभ, विशाल देदीप्यमान मुख, ऊपर उठे चमकते केशों और पीली आँखों वाले अग्निदेव प्राणियों की वसा का पान करने लगे। कृष्ण और अर्जुन द्वारा सुलभ कराई गई उस अमृतमयी वसा को पाकर हुताशन (अग्नि) अत्यंत प्रसन्न, तृप्त और परम शांति को प्राप्त हुए।
व्याख्या:
अग्निदेव ने प्राणियों के मांस और वसा का स्वेच्छापूर्वक पान किया। इससे उनका जो 'अरुचि' (मंदाग्नि) रोग था, वह पूरी तरह नष्ट हो गया और वे धुएँ से रहित होकर पुनः अपने संपूर्ण परम तेजस्वी स्वरूप में प्रज्वलित हो उठे।
श्लोक 39 - 45
तथाऽसुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात्।। 39 ।। विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः। तमग्निः प्रार्थनामास दिधक्षुर्वातसारथिः।। 40 ।। शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः। विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनाम् वरम्।। 41 ।। जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः। स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम्।। 42 ।। अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत्। तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः।। 43 ।। प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत। तं न भेतव्यम्त्यिाह मयं पार्थो दयापरः।। 44 ।। तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम्। न हन्तुमैच्छद्दाशार्हः पावको न ददाह च।। 45 ।।
हिन्दी अनुवाद:
इसी बीच तक्षक नाग के निवास स्थान से 'मय' नाम के असुर को अचानक भागते हुए मधुसूदन श्रीकृष्ण ने देखा। वायु रूपी सारथी वाले अग्निदेव ने जटाधारी शरीर धारण करके मेघ के समान गर्जना करते हुए उस मय दानव को जलाने की प्रार्थना की। दानवों के श्रेष्ठ शिल्पी मय दानव को जानकर वासुदेव श्रीकृष्ण अपना सुदर्शन चक्र उठाकर उसका वध करने के लिए उद्यत हो गए। श्रीकृष्ण का चक्र उठा हुआ और अग्निदेव को भस्म करने के लिए तत्पर देखकर मय दानव चिल्लाता हुआ भागा—"हे अर्जुन! मेरी रक्षा करो! रक्षा करो!" उस भयभीत वाणी को सुनकर दयालु पार्थ धनंजय (अर्जुन) ने मानो जीवनदान देते हुए कहा—"डरो मत!" अर्जुन द्वारा अभयदान दिए जाने पर, नमुचि के भाई मय दानव को दाशार्ह श्रीकृष्ण ने मारना उचित नहीं समझा और अग्निदेव ने भी उसे नहीं जलाया।
व्याख्या:
तक्षक के भवन से मय दानव (दानवों का महान वास्तुकार/शिल्पी) प्राण बचाकर भागा। श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र से और अग्निदेव अपनी ज्वाला से उसका अंत करना चाहते थे। किंतु मय दानव ने अर्जुन की शरण ली और "त्राहि-माम" कहा। शरणगत-वत्सल अर्जुन ने उसे 'अभयदान' (मा भैः—डरो मत) दे दिया। अर्जुन के वचन का मान रखते हुए श्रीकृष्ण और अग्निदेव दोनों ने मय दानव को छोड़ दिया। यही मय दानव आगे चलकर पांडवों के लिए अद्भुत 'मयसभा' का निर्माण करता है।
श्लोक 46 - 47
तद्वनं पावको धीमान्दिनानि दश पञ्च च। ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात्।। 46 ।। तस्मिन्वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च। अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा।। 47 ।।
हिन्दी अनुवाद:
बुद्धिमान अग्निदेव ने कृष्ण और अर्जुन द्वारा रक्षित होकर देवराज इंद्र के प्रकोप से बचते हुए पंद्रह (15) दिनों तक उस खाण्डव वन को लगातार जलाया। उस वन के जलने पर भी अग्निदेव ने केवल छह (6) प्राणियों को नहीं जलाया—
- अश्वसेन (तक्षक का पुत्र),
- मय दानव (दानव शिल्पी), और
- चार शार्ङ्गक पक्षी (मंदपाल ऋषि के चार पुत्र—जड़ारि, सरीसृक्त, स्तम्बमित्र और द्रोण)।
व्याख्या:
खाण्डव दाह का यह महायज्ञ पूरे 15 दिनों तक चला। इस पूरे वन में केवल ६ जीव जीवित बच सके: तक्षक का पुत्र अश्वसेन (जिसे इंद्र ने बचा लिया था), मय दानव (जिसे अर्जुन ने अभयदान दिया), और ४ शार्ङ्गक पक्षी (जिनकी कथा आगे आती है कि वे ऋषि मंदपाल के पुत्र थे और धर्म-प्रभाव से बच गए थे)।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत मयदर्शन पर्व / खाण्डवदाह पर्व का 254वाँ अध्याय पूर्ण हुआ। इसके साथ ही खाण्डवदाह का मुख्य प्रसंग पूर्ण होता है।)
