महाभारत् -०१ आदिपर्व -२५५

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२५५

महाभारत के आदिपर्व (मयदर्शन पर्व के अंतर्गत) के इस 255वें अध्याय में राजा जनमेजय द्वारा खाण्डवदाह के समय चार शार्ङ्गक (पक्षी रूपी) बालकों के बचने का रहस्य पूछने और महर्षि मन्दपाल तथा उनकी तपस्या, देव-ऋण, तथा अग्निदेव की स्तुति का अत्यंत सुंदर प्रसंग वर्णित है।

इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 4

जनमेजय उवाच। किमर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथा गते। तस्मिन्वने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत्प्रचक्ष्व मे।। 1 ।। अदाहे ह्यश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च। कारणं कीर्तितं ब्रह्मञ्शार्ङ्गकाणां न कीर्तितम्।। 2 ।। तदेतदद्भुतं ब्रह्मञ्शार्ङ्गकाणामनामयम्। कीर्तयस्वाग्निसंमर्दे कथं ते न विनाशिताः।। 3 ।। वैशंपायन उवाच। यदर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथा गते। तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथा भूतमरिन्दम।। 4 ।।

हिन्दी अनुवाद:

राजा जनमेजय ने पूछा—"हे ब्रह्मन्! उस खाण्डव वन के जलने पर भगवान अग्निदेव ने उन शार्ङ्गक पक्षियों (के बच्चों) को क्यों नहीं जलाया? यह मुझे बताइए। हे ब्रह्मन्! अश्वसेन और मय दानव के न जलने का कारण तो आपने बता दिया, परंतु शार्ङ्गक बालकों के न जलने का कारण नहीं बताया। हे ब्रह्मन्! अग्नि की उस भीषण ज्वाला और विनाश के बीच उन शार्ङ्गक बच्चों का सकुशल बच जाना बड़ा अद्भुत है। वे उस अग्निसंमर्द में कैसे नष्ट नहीं हुए, यह मुझे विस्तार से बताइए।" वैशम्पायन जी कहते हैं—"हे अरिंदम राजन्! जिस कारण से अग्निदेव ने उन शार्ङ्गक पक्षियों को नहीं जलाया, वह सारा इतिहास जैसा घटित हुआ था, मैं तुमसे कहता हूँ।"

व्याख्या:

जनमेजय की यह जिज्ञासा अत्यंत स्वाभाविक थी। 15 दिनों तक खाण्डव वन में मूसलाधार जलने वाली आग में से केवल ६ प्राणी बचे थे। अश्वसेन को इंद्र की चालाकी और मय दानव को अर्जुन के अभयदान ने बचाया, किंतु चार छोटे-छोटे असहाय पक्षी बच्चे उस प्रचंड आग में कैसे जीवित बच गए, जनमेजय यही रहस्य जानना चाहते हैं।

श्लोक 5 - 10

धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः। आसीन्महर्षिः श्रुतवान्मन्दपाल इति श्रुतः।। 5 ।। स मार्गमाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम्। स्वाध्यायवान्धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रियः।। 6 ।। स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत। जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम्।। 7 ।। स लोकानफलान्दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि। पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान्दिवौकसः।। 8 ।। मन्दपाल उवाच। किमर्थमावृता लोका ममैते तपसाऽर्जिताः। किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत्कर्मणः फलम्।। 9 ।। तत्राहं तत्करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम्। फलमेतस्य तपसः कथयध्वं दिवौकसः।। 10 ।।

हिन्दी अनुवाद:

वैशम्पायन जी कहते हैं—धर्मज्ञों में श्रेष्ठ, कठोर व्रतों का पालन करने वाले और वेद-शास्त्रों के ज्ञाता 'मन्दपाल' नाम से प्रसिद्ध एक महर्षि थे। हे राजन्! वे बाल-ब्रह्मचारी (ऊर्ध्वरेता) ऋषियों के मार्ग पर चलने वाले, निरंतर स्वाध्यायरत, धर्मपरायण, तपस्वी और जितेन्द्रिय थे। हे भारत! वे अपनी तपस्या के अंतिम पार पहुँचकर (पूर्ण सिद्ध होकर) शरीर त्यागने के बाद पितृलोक गए, किंतु वहाँ उन्हें अपनी तपस्या का फल प्राप्त नहीं हुआ। अपनी तपस्या से जीते गए लोकों को भी फलहीन देख कर उन्होंने धर्मराज (यमराज) के समीप उपस्थित देवताओं से पूछा—मन्दपाल ने कहा—"हे देवगण! मेरी तपस्या से अर्जित ये श्रेष्ठ लोक मेरे लिए अवरुद्ध (अधुरे) क्यों हैं? मुझसे ऐसा कौन-सा कार्य छूट गया है जिसका यह परिणाम है? आप मुझे बताएँ, मैं वही कार्य पूरा करूँ जिसके लिए मेरे ये लोक रुके हुए हैं।"

व्याख्या:

महर्षि मन्दपाल आजीवन बाल-ब्रह्मचारी रहे और घोर तपस्या की। किंतु देहत्याग के बाद जब वे पितृलोक पहुँचे, तो उन्हें सर्वोच्च लोक का आनंद नहीं मिला, क्योंकि उन्होंने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न नहीं की थी।

श्लोक 11 - 14

देवा ऊचुः। ऋणिनो मानवा ब्रह्मञ्जायन्ते येन तच्छृणु। क्रियाभिर्ब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः।। 11 ।। तदपाक्रियते सर्वं यज्ञेन तपसा सुतैः। तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा।। 12 ।। त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः। प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान्।। 13 ।। पुन्नाम्नो नरकात्पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः। तस्मादपत्यसन्ताने यतस्व ब्रह्मसत्तम।। 14 ।।

हिन्दी अनुवाद:

देवताओं ने कहा—"हे ब्रह्मन्! मनुष्य जन्म लेते ही तीन प्रकार के ऋणों से युक्त होता है, उसे सुनो—यज्ञ-क्रियाओं से (देव-ऋण), ब्रह्मचर्य व अध्ययन से (ऋषि-ऋण) और संतानोत्पत्ति से (पितृ-ऋण)। यह सारा ऋण क्रमशः यज्ञों, तपस्या और पुत्रोत्पत्ति (संतान) से चुकाया जाता है। आप तपस्वी हैं और आपने यज्ञ भी किए हैं, किंतु आपकी कोई प्रजा (संतान) नहीं है। इसीलिए संतान न होने के कारण आपके ये पुण्यलोक ढके हुए (अवरुद्ध) हैं। अतः आप संतान उत्पन्न कीजिए, तभी आप इन प्रचुर लोकों का उपभोग कर सकेंगे। वेद-श्रुति कहती है कि पुत्र 'पुन्' नामक नरक से पिता का त्राण (रक्षा) करता है, इसलिए हे ब्रह्मसत्तम! आप संतान-परंपरा बढ़ाने का यत्न कीजिए।"

व्याख्या:

शाश्वत सनातन मान्यता के अनुसार त्रि-ऋण (देव-ऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण) में से पितृ-ऋण से मुक्ति संतान उत्पन्न करने पर ही मिलती है। देवताओं ने मन्दपाल को समझाया कि बिना संतान के कोई भी पुरुष पूर्ण सद्गति प्राप्त नहीं कर सकता।

श्लोक 15 - 20

वैशंपायन उवाच। तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम्। क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद्बहुलं चेत्यचिन्तयत्।। 15 ।। स चिन्तयन्नभ्यगच्छत्सुबहुप्रसवान्खगान्। शार्ङ्गिकां शार्ङ्गको भूत्वा जरितां समुपेयिवान्।। 16 ।। तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः। तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति।। 17 ।। बालान्स तानण्डगतान्सह मात्रा मुनिर्वने। तस्मिन्गते महाभागे लपितां प्रति भारत।। 18 ।। अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत्। तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान्वने।। 19 ।। न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान्। बभार चैतान्संजातान्स्ववृत्त्या स्नेहविक्लवा।। 20 ।।

हिन्दी अनुवाद:

वैशम्पायन जी कहते हैं—देवताओं के उन वचनों को सुनकर मन्दपाल विचार करने लगे—"किस योनि में अतिशीघ्र और बहुत सी संतानें उत्पन्न हो सकती हैं?" ऐसा सोचते हुए वे अत्यधिक संतान उत्पन्न करने वाले पक्षी वर्ग के पास पहुँचे। वे स्वयं 'शार्ङ्गक' (एक प्रकार का पक्षी) रूप धारण करके 'जरिता' नाम की शार्ङ्गिका चिड़िया के पास गए। उन्होंने जरिता से चार वेदवादी (ब्रह्मज्ञानी) पुत्र उत्पन्न किए। किंतु उन अंडागत बालकों को वहीं छोड़कर वे मुनि (मन्दपाल) 'लपिता' नाम की दूसरी पक्षी-स्त्री के पास चले गए। हे भारत! जब वे महाभाग मुनि लपिता के पास चले गए, तब संतान-स्नेह से युक्त जरिता ने बहुत चिंता की। उन त्यागे जाने के अयोग्य, अभी अंडे में ही स्थित उन बाल-ऋषियों को वन में छोड़कर पति के चले जाने पर भी, पुत्र-शोक से आकुल जरिता ने खाण्डव वन में अपने बच्चों को नहीं छोड़ा और अत्यंत स्नेहवश अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनका पालन-पोषण करती रही।

व्याख्या:

मन्दपाल ऋषि ने शीघ्रता से संतान प्राप्त करने के लिए पक्षी (शार्ङ्गक) योनि चुनी क्योंकि पक्षी एक साथ कई बच्चे पैदा करते हैं। उन्होंने जरिता नाम की चिड़िया से ४ पुत्र उत्पन्न किए, जो अंडे में ही थे। किंतु ऋषि उन्हें छोड़कर लपिता नाम की दूसरी मादा पक्षी के साथ रहने चले गए। माँ जरिता ने अकेले उन अंडों और बच्चों का पोषण किया।

श्लोक 21 - 31

ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः। मन्दपालश्चरंस्तस्मिन्वने लपितया सह।। 21 ।। तं संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांश्च बालकान्। सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिब्रार्ह्मणो जातवेदसम्।। 22 ।। पुत्रान्प्रतिवदन्भीतो लोकपालं महौजसम्। मन्दपाल उवाच। त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट्।। 23 ।। त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक। त्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः।। 24 ।। त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन्। त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः।। 25 ।। त्वदृते हि जगत्कृत्स्नं सद्यो नश्येद्धुताशन। तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम्।। 26 ।। गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम्। त्वामग्ने जलदानाहुः खेविषक्तान्सविद्युतः।। 27 ।। दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः। जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते।। 28 ।। तवैव कर्मविहितं भूतं सर्वं चराचरम्। त्वयापो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत्।। 29 ।। त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत्संप्रतिष्ठितम्। त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः।। 30 ।। त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः। 31 ।।

हिन्दी अनुवाद:

तदनन्तर, लपिता के साथ उस वन में विचरते हुए महर्षि मन्दपाल ने खाण्डव वन को जलाने के लिए आते हुए अग्निदेव को देखा। अग्नि के इस संकल्प को जानकर और अपने नन्हें बालकों को याद करके, वे विप्रर्षि भयभीत होकर महौजस्वी लोकपाल जातवेदा (अग्निदेव) की स्तुति करने लगे। मन्दपाल ने कहा—"हे अग्ने! तुम समस्त लोकों के मुख हो, तुम हव्यवाहन हो। हे पावक! तुम समस्त प्राणियों के भीतर गूढ (सूक्ष्म) रूप से विचरते हो। विद्वान तुम्हें एक कहते हैं और पुनः तुम्हें तीन प्रकार का (गार्हपत्य, आहवनीय, अन्वाहार्यपचन) कहते हैं। तुम्हें आठ प्रकार का (अष्टवसु रूप) मानकर ऋषियों ने यज्ञ का वाहक बनाया है। परमर्षि कहते हैं कि तुमसे ही यह संपूर्ण विश्व रचा गया है। हे हुताशन! तुम्हारे बिना यह संपूर्ण जगत् क्षण भर में नष्ट हो जाएगा। तुम्हें प्रणाम करके ब्राह्मण अपने कर्मों द्वारा जीती हुई सनातन गति को अपनी पत्नियों और पुत्रों के साथ प्राप्त करते हैं। हे अग्ने! तुम्हें ही आकाश में बिजली से युक्त होकर जल देने वाले मेघ कहते हैं। तुम्हारी ही लपटें तुमसे निकलकर समस्त प्राणियों को जलाती हैं। हे महाद्युते जातवेदस! तुमसे ही यह विश्व रचा गया है। यह संपूर्ण चराचर जगत् तुम्हारा ही कर्म-विधान है। तुमने ही पहले जल की रचना की और तुममें ही यह पूरा जगत् स्थित है। तुममें ही देवताओं के लिए 'हव्य' और पितरों के लिए 'कव्य' भली-भांति प्रतिष्ठित है। हे देव! तुम ही दहन (दाहक) हो, तुम ही धाता (सृष्टा) हो, तुम ही बृहस्पति हो, तुम ही अश्विनीकुमार, यमराज, मित्र, सोम और वायु हो।"

व्याख्या:

महर्षि मन्दपाल ने जब देखा कि खाण्डव वन में उनके असहाय बच्चे जलने वाले हैं, तो वे तुरंत अग्निदेव के पास पहुँचे और उनकी अत्यंत वैदिक और स्तुत्य प्रार्थना की। उन्होंने अग्नि को समस्त ब्रह्मांड का आधार, देवों और पितरों का मुख तथा सृष्टि का रचयिता बताया।

श्लोक 32 - 34

वैशंपायन उवाच। एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः।। 31b/32a तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः। उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते।। 32b ।। तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम्। प्रदहन्खाण्डवं दावं मम पुत्रान्विसर्जय।। 33 ।। तथेति तत्प्रतिश्रुत्य भगवान्हव्यवाहनः। खाण्डवे तेन काले न प्रजज्वाल दिदक्षया।। 34 ।।

हिन्दी अनुवाद:

वैशम्पायन जी कहते हैं—हे राजन्! इस प्रकार मन्दपाल द्वारा स्तुति किए जाने पर पावक (अग्निदेव) उस अमित तेजस्वी मुनि पर अत्यंत संतुष्ट हुए। प्रसन्नचित्त अग्निदेव ने उनसे कहा—"मैं तुम्हारा क्या प्रिय (इष्ट) काम करूँ?" मन्दपाल ने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निदेव से कहा—"खाण्डव वन को जलाते समय आप मेरे पुत्रों को छोड़ दें (उनकी रक्षा करें)।" भगवान हव्यवाहन ने "तथास्तु" (ऐसा ही होगा) कहकर अपनी सहमति दी और उसके बाद खाण्डव वन में प्रज्वलित होकर दाह आरंभ किया।

व्याख्या:

मन्दपाल मुनि की इस अनन्य और ओजस्वी स्तुति से प्रसन्न होकर अग्निदेव ने उन्हें यह वरदान दे दिया कि खाण्डव वन जलाते समय उनके चारों पुत्रों की रक्षा की जाएगी और उन्हें आग की एक बूँद भी नहीं छुएगी। यही कारण था कि खाण्डवदाह में वे चार शार्ङ्गक पक्षी बाल-बाल बच गए।

(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत मयदर्शन पर्व का 255वाँ अध्याय पूर्ण हुआ।)

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