महाभारत के आदिपर्व (मयदर्शन पर्व के अंतर्गत) के इस 258वें अध्याय में शार्ङ्गक पक्षी के चारों बालकों (जरितारु, सारिसृक्क, स्तम्बमित्र और द्रोण) द्वारा अग्निदेव की अत्यंत सुंदर एवं प्रभावशाली स्तुति करने, अग्निदेव द्वारा उन्हें वरदान देने तथा उन बालकों के निवेदन पर पास ही छिपे हुए बिल्लियों के परिवार को भस्म करने का अत्यंत रोचक प्रसंग वर्णित है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 5 (चारों भाइयों का आपसी संवाद)
जरितारिरुवाच। पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पुरुषः। स कृच्छ्रकालं संप्राप्य व्यथां नैवैति कर्हिचित्।। 1 ।। यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नावबुध्यते। सकृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विन्दते महत्।। 2 ।। सारिसृक्क उवाच। धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः। प्राज्ञः शूरो बहूनां हि भवत्येको न संशयः।। 3 ।। स्तम्बमित्र उवाच। ज्येष्ठस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः। ज्येष्ठश्चेन्न प्रजानाति नीयान्किं करिष्यति।। 4 ।। द्रोण उवाच। हिरण्यरेतास्त्वरितो जलन्नायाति नः क्षयम्। सप्तजिह्वाननः क्रूरो लिहानो विसर्पति।। 5 ।।
हिन्दी अनुवाद:
ज्येष्ठ पुत्र जरितारि ने कहा—"बुद्धिमान पुरुष संकट का समय आने से पहले ही सचेत रहता है। वह संकट काल आने पर कभी भी व्यथा को प्राप्त नहीं होता। किंतु जो मूर्ख व्यक्ति उपस्थित संकट को पहले से नहीं समझता, वह संकट आने पर व्यथित होकर महान श्रेय को प्राप्त नहीं कर पाता।" सारिसृक्क ने कहा—"तुम धीर और मेधावी हो, और यह हमारे प्राणों पर सबसे बड़ा संकट है। निसंदेह बहुत से लोगों में कोई एक ही बुद्धिमान और शूरवीर होता है।" स्तम्बमित्र ने कहा—"पिता के समान ज्येष्ठ (बड़ा भाई) ही होता है, और ज्येष्ठ ही संकट से बचाता है। यदि बड़ा भाई ही (संकट को) न समझे, तो छोटा भाई क्या करेगा?" द्रोण ने कहा—"हिरण्यरेता (अग्निदेव) वेग से प्रज्वलित होकर हमारे विनाश के लिए आ रहे हैं। उनकी सात जीभों वाला क्रूर मुख लपटों को चाटता हुआ चारों ओर फैल रहा है।"
व्याख्या:
चारों भाई संकट की इस घड़ी में भी पूरी तरह विवेकशील हैं। वे आपस में चर्चा करते हैं कि कैसे बड़े भाई जरितारि को अपने ज्ञान और धैर्य का परिचय देकर इस विपत्ति से पार पाना चाहिए, क्योंकि अग्निदेव अत्यंत तीव्र गति से उनकी ओर बढ़ रहे हैं।
श्लोक 6 - 11 (अग्निदेव की स्तुति)
वैशंपायन उवाच। एवं संभाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः। तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाऽग्निं शृणु पार्थिव।। 6 ।। जरितारिरुवाच। आत्माऽसि वायोर्ज्वलन शरीरमसि वीरुधाम्। योनिरापश्च ते शुक्रं योनिस्त्वमसि चाम्भसः।। 7 ।। ऊर्ध्वं चाधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा। अर्चिषस्ते महावीर्य रश्यमः सवितुर्यथा।। 8 ।। सारिसृक्क उवाच। माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः पक्षा जाता नै नो धूमकेतो। न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्य- स्तस्मादस्मांस्त्राहि बालांस्त्वमग्ने।। 9 ।। यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः। तेन नः परिपाहि त्वमार्तान्नः शरणैषिणः।। 10 ।। त्वमेवैकस्तपसे जप्तवेदो नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव। ऋषीनस्मान्बालकान्पालयस्व परेणास्मान्प्रेहि वै हव्यवाह।। 11 ।।
हिन्दी अनुवाद:
वैशम्पायन जी कहते हैं—हे पार्थिव! आपस में इस प्रकार विचार करके मन्दपाल के उन पुत्रों ने पवित्रचित्त होकर जिस प्रकार अग्निदेव की स्तुति की, उसे सुनो। जरितारि ने कहा—"हे ज्वलन! तुम वायु की आत्मा हो, औषधियों (वनस्पतियों) के शरीर हो, जल तुम्हारा शुक्र (बीज) है और तुम स्वयं जल की योनि हो। हे महावीर्य! जिस प्रकार सूर्य की किरणें होती हैं, उसी प्रकार तुम्हारी लपटें ऊपर, नीचे, पीछे और चारों ओर फैलती हैं।" सारिसृक्क ने कहा—"हमारी माता चली गई है, हम पिता को नहीं जानते, हे धूमकेतु! अभी हमारे पंख भी नहीं उगे हैं। तुम्हारे सिवा हमारा कोई दूसरा रक्षक नहीं है, इसलिए हे अग्ने! हम नन्हें बालकों की रक्षा करो। हे अग्ने! तुम्हारा जो कल्याणकारी रूप है और तुम्हारी जो सात लपटें हैं, शरण की इच्छा रखने वाले हम आर्तों की उन्हीं के द्वारा रक्षा करो। हे देव जातवेदो! तपस्या के लिए तुम ही एकमात्र हो, तुम्हारे सिवा दूसरा कोई तपता नहीं है। हम ऋषि-तुल्य बालकों की रक्षा करो और हे हव्यवाह! हमें छोड़कर आगे निकल जाओ।"
व्याख्या:
छोटे-छोटे पक्षी-शावकों ने अपनी बुद्धि और वेद-ज्ञान के अनुसार अग्निदेव के विभिन्न रूपों (धूमकेतु, जातवेदा, हव्यवाह) का गुणगान किया। उन्होंने अत्यंत करुणा के साथ अपनी असहाय स्थिति (माता-पिता का न होना, पंखों का न उगना) का हवाला देते हुए अग्निदेव से अपने प्राणों की भीख माँगी।
श्लोक 12 - 19 (स्तम्बमित्र और द्रोण द्वारा स्तुति)
स्तम्बमित्र उवाच। सर्वमग्ने त्वमेवैकस्त्वयि सर्वमिदं जगत्। त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च।। 12 ।। त्वमग्निर्हव्यवाहस्त्वं त्वमेव परमं हविः। मनीषिणस्त्वां जानन्ति बहुधा चैकधापि च।। 13 ।। सृष्ट्वा लोकांस्त्रीनिमान्हव्यवाह काले प्राप्ते पचसि पुनः समिद्धः। त्वं सर्वस्य भुवनस्य प्रसूति- स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा।। 14 ।। द्रोण उवाच। त्वमन्नं प्राणिभिर्भुक्तमन्तर्भूतो जगत्पते। नित्यप्रवृद्धः पचसि त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।। 15 ।। सूर्यो भूत्वा रश्मिभिर्जातवेदो भूमेरम्भो भूमिजातान्रसांश्च। विश्वानादाय पुनरुत्सृज्य काले दृष्ट्वा वृष्ट्या भावयसीह शुक्र।। 16 ।। त्वत्त एताः पुनः शुक्र वीरुधो हरितच्छदाः। जायन्ते पुष्करिण्यश्च सुभद्रश्च महोदधिः।। 17 ।। इदं वै सद्म तिग्मांशो वरुणस्य परायणम्। शिवस्त्राता भवास्माकं माऽस्मानद्य विनाशय।। 18 ।। पिङ्गाक्ष लोहितग्रीव कृष्णवर्त्मन्हुताशन। परेण प्रेहि मुञ्चास्मान्सागरस्य गृहानिव।। 19 ।।
हिन्दी अनुवाद:
स्तम्बमित्र ने कहा—"हे अग्ने! तुम अकेले ही सब कुछ हो, यह संपूर्ण जगत् तुममें ही स्थित है। तुम ही समस्त प्राणियों को धारण करते हो और इस भुवन का पोषण करते हो। तुम ही अग्नि और हव्यवाह हो, और तुम ही परम हवि हो। ज्ञानी लोग तुम्हें अनेक प्रकार से और एक रूप में भी जानते हैं। हे हव्यवाह! इन तीनों लोकों को सृजकर, समय आने पर प्रज्वलित होकर तुम ही उनका संहार (पचन) करते हो। हे अग्ने! तुम ही इस संपूर्ण भुवन की उत्पत्ति के कारण हो और तुम ही इसकी अंतिम प्रतिष्ठा हो।" द्रोण ने कहा—"हे जगत्पते! प्राणियों द्वारा खाया जाने वाला अन्न भी तुम ही हो, जो उनके भीतर रहकर नित्य प्रवृद्ध होकर उसे पचाता है। तुममें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। हे जातवेदो! तुम ही सूर्य बनकर अपनी किरणों से भूमि का जल, वनस्पतियों के रस और संसार की सभी चीजों को ग्रहण करते हो और समय आने पर पुनः वर्षा के रूप में उसे बरसाकर इस पृथ्वी का पोषण करते हो। हे शुक्र! तुम से ही ये हरी पत्तियों वाली वनस्पतियाँ, सुंदर कमल-सरोवर और यह महान समुद्र उत्पन्न होते हैं। यह स्थान तिग्मांशु (सूर्य) और वरुण देव का आश्रय है, तुम हमारे लिए कल्याणकारी रक्षक बनो और आज हमारा विनाश मत करो। हे पिङ्गाक्ष (पिली आँख वाले), लोहितग्रीव (लाल गर्दन वाले), कृष्णवर्त्मन् (काला मार्ग बनाने वाले) हुताशन! तुम हमें छोड़कर वैसे ही आगे निकल जाओ जैसे समुद्र के जल को पार कर जाते हैं।"
व्याख्या:
चारों भाइयों ने अपनी स्तुति में अग्निदेव को संपूर्ण ब्रह्मांड का निर्माता, पालनकर्ता और संहारक बताया। उन्होंने दार्शनिक तर्कों के साथ-साथ अग्निदेव के विभिन्न रूपों (जैसे उदर में पचन क्रिया करने वाली जठराग्नि और जल को खींचकर वर्षा करने वाले सूर्य रूप) का स्मरण करते हुए अपनी रक्षा की गुहार लगाई।
श्लोक 20 - 25 (अग्निदेव का वरदान और बिल्लियों का संहार)
वैशंपायन उवाच। एवमुक्तो जातवेदा द्रोणेन ब्रह्मवादिना। द्रोणमाह प्रतीतात्मा मन्दपालप्रतिज्ञया।। 20 ।। अग्निरुवाच। ऋषिर्द्रोणस्त्वमसि वै ब्रह्मैतद्व्याहृतं ईप्सितं ते करिष्यामि न च ते...।। 21 ।। मन्दपालेन वै यूयं मम पूर्वं निवेदिताः। वर्जयेः पुत्रकान्मह्यं दहन्दावमिति स्म ह।। 22 ।। तस्य तद्वचनं द्रोण त्वया यच्चेह भाषितम्। उभयं मे गरीयस्तु ब्रूहि किं करवाणि ते। भृशं प्रीतोऽस्मि भद्रं ते ब्रह्मंस्तोत्रेण सत्तम।। 23 ।। द्रोण उवाच। इमे मार्जारकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः। एतान्कुरुष्व दग्धांस्त्वं हुताशन सबान्धवान्।। 24 ।। वैशंपायन उवाच। तथा तत्कृतवानग्निरभ्यनुज्ञाय शार्ङ्गकान्। ददाह खाण्डवं दावं समिद्धो जनमेजय।। 25 ।।
हिन्दी अनुवाद:
वैशम्पायन जी कहते हैं—ब्रह्मवादी द्रोण द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, मन्दपाल (उनके पिता) के साथ अपनी पूर्व प्रतिज्ञा का स्मरण करके प्रसन्नचित्त हुए जातवेदा अग्निदेव ने द्रोण से कहा— अग्निदेव बोले—"हे द्रोण! तुम वास्तव में ऋषि हो और तुमने जो कहा है वह ब्रह्म (सत्य) है। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा। तुम्हारे पिता मन्दपाल ने पहले ही मुझसे निवेदन किया था कि 'वन को जलाते समय तुम मेरे पुत्रों को छोड़ देना (बचा लेना)।' उनके उस वचन को और तुम्हारे इस सुंदर भाषण (स्तोत्र) को—ये दोनों ही मेरे लिए अत्यंत आदरणीय हैं। हे ब्रह्मन्! मैं तुम्हारी इस स्तुति से अत्यधिक प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। बोलो, मैं तुम्हारे लिए और क्या करूँ?" द्रोण ने कहा—"हे शुक्र (अग्नि)! पास ही ये बिल्लियाँ (मार्जार) रहती हैं जो नित्य हमें उद्विग्न (भयभीत) करती हैं। हे हुताशन! आप इन सपरिवार बिल्लियों को यहीं भस्म कर डालिए।" वैशम्पायन जी कहते हैं—हे जनमेजय! अग्निदेव ने उन शार्ङ्गक पक्षियों को अभयदान (सुरक्षित रखने की अनुमति) देकर वैसा ही किया और फिर प्रचंड रूप से प्रज्वलित होकर खाण्डव वन को जलाना शुरू कर दिया।
व्याख्या:
अग्निदेव ने द्रोण की स्तुति से प्रसन्न होकर न केवल उन चारों भाइयों के प्राण बचाए, बल्कि जब द्रोण ने उनसे पास ही रहने वाले बिल्लियों के परिवार (जो पक्षियों के लिए हमेशा से एक बड़ा खतरा थे) को जलाने का अनुरोध किया, तो अग्निदेव ने उन बिल्लियों को भी वहीं भस्म कर दिया। इस प्रकार मन्दपाल के वे चारों पुत्र पूरी तरह सुरक्षित बच गए।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत मयदर्शन पर्व का 258वाँ अध्याय पूर्ण हुआ।)
