महाभारत् -०१ आदिपर्व -२५९

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२५९

महाभारत के आदिपर्व (मयदर्शन पर्व के अंतर्गत) के इस 259वें अध्याय में महर्षि मन्दपाल का अपनी दूसरी पत्नी लपिता के साथ वन में विलाप करना, जरिता का अपने पुत्रों के पास वापस लौटना, बच्चों का सकुशल मिलना, तथा मन्दपाल और जरिता के बीच उपजी अनबन और संवाद का अत्यंत सजीव वर्णन है।

इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 7

वैशंपायन उवाच। मन्दपालोऽञपि कौरव्यं चिन्तयामास पुत्रकान्। उक्त्वाऽपि च स तिग्मांशुं नैव शर्माधिगच्छति।। 1 ।। स तप्यमानः पुत्रार्थे लपितामिदमब्रवीत। कथं नु शक्ताः शरणे लपिते मम पुत्रकाः।। 2 ।। वर्धमाने हुतवहे वाते चाशु प्रवायति। असमर्था विमोक्षाय भविष्यन्ति ममात्मजाः।। 3 ।। कथं त्वशक्ता त्राणाय माता तेषां तपस्विनी। भविष्यति हि शोकार्ता पुत्रत्राणमपश्यती।। 4 ।। कथमुड्डीयनेऽशक्तान्पतने च ममात्मजान्। सन्तप्यमाना बहुधा वाशमाना प्रधावती।। 5 ।। जरितारिः कथं पुत्रः सारिसृक्कः कथं च मे। स्तम्बमित्रः कथं द्रोणः कथं सा च तपस्विनी।। 6 ।। लालप्यमानं तमृषइं मन्दपालं तथा वने। लपिता प्रत्युवाचेदं सासूयमिव भारत।। 7 ।।

हिन्दी अनुवाद:

वैशम्पायन जी कहते हैं—हे कौरव्य (जनमेजय)! महर्षि मन्दपाल भी अग्निदेव (तिग्मांशु) से अपने पुत्रों की रक्षा का वचन कहने के बाद भी चैन नहीं पा रहे थे और अपने पुत्रों का ही चिंतन कर रहे थे। पुत्रों के शोक से संतप्त हुए उन्होंने लपिता से कहा—"हे लपिते! तेज प्रज्वलित होते हुए अग्नि और तीव्र वायु के प्रवाह में मेरे वे नासमझ बालक कैसे अपनी रक्षा करने में समर्थ होंगे? शोकार्ता और पुत्रों की रक्षा का कोई उपाय न देखने वाली वह तपस्विनी माता उन सबकी रक्षा करने में कैसे समर्थ होगी? उड़ने और चलने में असमर्थ मेरे वे बालक तड़पते हुए और पुकारते हुए कैसे दौड़ रहे होंगे? मेरा पुत्र जरितारि कैसा है, सारिसृक्क कैसा है, स्तम्बमित्र और द्रोण कैसे हैं, और वह तपस्विनी जरिता कैसी है?" वन में इस प्रकार विलाप कर रहे उस ऋषि मन्दपाल से लपिता ने ईर्ष्याभाव से भरकर उत्तर दिया।

व्याख्या:

यद्यपि अग्निदेव ने मन्दपाल को आश्वासन दिया था कि उनके पुत्र सुरक्षित रहेंगे, फिर भी एक पिता के रूप में मन्दपाल का मन अपने बच्चों और उनकी माँ जरिता की चिंता में व्याकुल हो रहा था। वह बार-बार अपनी दूसरी पत्नी लपिता के सामने बच्चों की रक्षा को लेकर आशंका व्यक्त कर रहे थे।

श्लोक 8 - 13

न ते पुत्रेष्ववेक्षाऽस्ति यानृषीनुक्तवानसि। तेजस्विनो वीर्यवन्तो न तेषां ज्वलनाद्भयम्।। 8 ।। त्वयाऽग्नौ ते परीताश्च स्वयं हि मम सन्निधौ। श्रुतं तथा चेति ज्वलनेन महात्मना।। 9 ।। पलो न तां वाचमुक्त्वा मिथ्या करिष्यति। न्धुकृत्ये न तेन ते स्वस्थ मानसम्।। 10 ।। तामेव तु ममामित्रां चिन्तयन्परितप्यसे। ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तपयं पुराऽभवत।। 11 ।। नहि पक्षवता न्याय्यं निः हेन सुहृज्जने। पीड्यमान उपद्रष्टुं शक्तेना मा कथंचन।। 12 ।। गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे। चरिष्याम्यहमप्येका यथा पुरुषाश्रिता।। 13 ।।

हिन्दी अनुवाद:

लपिता बोली—"जिन ऋषियों (पुत्रों) के लिए तुम कह रहे हो, उनके प्रति तुम्हारी कोई उपेक्षा नहीं है; वे तेजस्वी और वीर हैं, उन्हें अग्नि से कोई भय नहीं है। स्वयं तुम्हारे सामने ही अग्निदेव ने उन्हें सुरक्षित रखने की प्रतिज्ञा की थी और मैंने भी महात्मा अग्निदेव के मुख से यह सुना है। वे अग्निदेव अपनी कही हुई बात को कभी मिथ्या नहीं करेंगे। फिर भी बन्धुकृत्य (मोह) के कारण तुम्हारा मन स्वस्थ नहीं है। तुम अपनी उसी शत्रु (जरिता) का चिंतन करके परितप्यमान हो रहे हो। निश्चित रूप से अब मुझमें तुम्हारा वह पहले जैसा स्नेह नहीं रहा है। पंखों वाले (उडऩे में समर्थ) किसी भी दयालु व्यक्ति के लिए यह न्यायसंगत नहीं है कि वह समर्थ होते हुए भी किसी संकट में पड़े हुए सुहृजन को कष्ट में देखे। जिस जरिता के लिए तुम इतने परितप्त हो रहे हो, तुम उसी के पास चले जाओ। मैं भी अकेली ही किसी अन्य पुरुष का आश्रय लेकर अपना जीवन बिता लूँगी।"

व्याख्या:

लपिता को मन्दपाल की यह चिंता और अपनी सौत जरिता के प्रति उनका मोह चुभ रहा था। उसे लगा कि मन्दपाल का मन अब भी अपनी पहली पत्नी जरिता और उसके बच्चों में ही अटका हुआ है। इसलिए उसने ईर्ष्या और अभिमान में आकर मन्दपाल को ताना मारा कि वे चाहें तो जरिता के पास वापस जा सकते हैं।

श्लोक 14 - 16

मन्दपाल उवाच। नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे। अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम।। 14 ।। भूतं हित्वा च भाव्यर्थे योऽवलम्बेत्स मन्दधीः। अवमन्येत तं लोको यथेच्छसि तथा कुरु।। 15 ।। एष हि प्रज्वलन्नग्निर्लेलिहानी महीरुहान्। आविग्ने हृदि सन्तापं जनयत्यशिवं मम।। 16 ।।

हिन्दी अनुवाद:

मन्दपाल बोले—"हे लपिते! मैं इस संसार में वैसा आचरण नहीं कर रहा हूँ जैसा तुम समझ रही हो। मैं तो केवल संतान के हेतु विचार कर रहा हूँ, और वह इस समय घोर संकट में है। जो व्यक्ति वर्तमान (भूत) को छोड़कर भविष्य के अर्थ पर निर्भर रहता है, वह मन्दबुद्धि होता है; संसार उसकी अवमानना करता है। (फिर भी) जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा करो। यह प्रज्वलित अग्नि पेड़ों को चाटती हुई मेरे भयभीत हृदय में अशुभ और भारी संताप उत्पन्न कर रही है।"

व्याख्या:

मन्दपाल ने लपिता को समझाया कि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का संसारी मोह या पक्षपात नहीं है, बल्कि संकट में फँसी अपनी संतान के प्रति एक पिता का स्वाभाविक कर्तव्य और पीड़ा है।

श्लोक 17 - 26 (जरिता का लौटना और पिता से मिलन)

वैशंपायन उवाच। भर्तुर्हि वाक्यं सा श्रुत्वा लपिता दुःखिताऽभवत्। सान्त्वयामास च पुनः पति पतिपरायणा।। 17 ।। तस्माद्देशादतिक्रान्ते ज्वलने जरिता पुनः। जगाम पुत्रकानेन जरिता पुत्रगृद्धिनी।। 18 ।। सा तान्कुशलिनः सर्वान्विमुक्ताञ्जातवेदसः। रोरूयमाणान्ददृशे वने पुत्रान्निरामयान्।। 19 ।। अश्रूणि मुमुचे तेषां दर्शनात्सा पुनःपुनः। न श्रद्धेयं ततस्तेषांर्शनं वै पुनःपुनः।। 20 ।। इति मत्वाऽब्रवीद्वाकजरिता पुत्रगृद्धिनी। एकाकशश्च पुत्रांस्तन्त्र्शमानान्वपद्यत।। 21 ।। जरिता तु परिष्वज्युत्रस्नेहाच्चुचुम्ब ह।। 22 ।। ततोऽभ्यगच्छत्सहसमन्दपालोऽपि भारत। अथ ते सर्व-एवैनं भ्यनन्दंस्तदा सुताः।। 23 ।। गुरुत्वान्मन्दपालस्तपसश्च विशेषतः। अभिवादामहे सर्वे तपक्षाः प्रसादतः।। 24 ।। एवमुक्तवतां तेषां तनन्द्य महातपाः। परिष्वज्य ततो मू उपाघ्राय च बालकान्। पुत्रान्स्वयं समाहूयतः प्रोवाच गौतमः।। 25 ।। लालप्यमानमेकैकंरितां च पुनःपुनः। न चैवोचुस्तदा किंतमृषिं साध्वसाधु वा।। 26 ।।

हिन्दी अनुवाद:

वैशम्पायन जी कहते हैं—पति के वचन सुनकर पतिपरायणा लपिता दुःखी हुई और उसने अपने पति को फिर से सान्त्वना दी। उधर, उस स्थान से अग्नि के आगे निकल जाने पर, पुत्रों के प्रति अतिशय लालसा रखने वाली जरिता पुनः अपने पुत्रों के पास लौट गई। उसने वन में अपने सभी पुत्रों को अग्नि से मुक्त, पूरी तरह कुशल, स्वस्थ और रोते हुए देखा। अपने पुत्रों को जीवित देखकर उसने बार-बार अपनी आँखों से हर्ष के आँसू बहाए। "क्या उनका यह पुनः दर्शन सत्य है या कोई भ्रम?" ऐसा सोचकर पुत्रों की लालसा रखने वाली जरिता ने उन्हें बार-बार गले से लगाया और स्नेहवश उनके मस्तक को चूमा। हे भारत! तभी वहाँ महर्षि मन्दपाल भी अचानक आ पहुँचे। तब उन सभी पुत्रों ने हर्षपूर्वक अपने पिता का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा—"पिता होने के कारण और अपनी विशेष तपस्या के प्रभाव से हम सभी आपके प्रसाद (कृपा) से प्रणाम करते हैं।" उनके ऐसा कहने पर महातपस्वी गौतम (मन्दपाल) ने उन बालकों को गले से लगाया, उनके मस्यों को सूँघा और प्रेमपूर्वक उन्हें अपने पास बुलाया। जरिता और मन्दपाल को इस प्रकार बार-बार लाड़ करते देखकर उन बच्चों ने ऋषि से कोई भी अच्छा या बुरा वचन नहीं कहा (वे मौन रहे)।

व्याख्या:

अग्नि के शांत होने पर माता जरिता तुरंत अपने बच्चों के पास दौड़ी गई। उसने देखा कि उसके चारों बच्चे पूरी तरह सुरक्षित और जीवित हैं। उसी समय महर्षि मन्दपाल भी वहाँ आ पहुँचे। माता-पिता दोनों ने अपने बच्चों को पाकर अपार आनंद का अनुभव किया और उन्हें गले से लगाया।

श्लोक 27 - 37 (मन्दपाल और जरिता का संवाद)

मन्दपाल उवाच। ज्येष्ठः सुतस्ते कत कतमस्तस्य चानुजः। मध्यमः कतमश्चैव यान्कतमश्च ते।। 27 ।। एवं ब्रुवन्तं दुःखाकं मा न प्रतिभाषसे। कृतवानस्मि हव्यानैव शान्तिमितो लभे। एवमुक्त्वा तु तां मन्दपालस्तदाऽस्पृशत्।। 28 ।। जरितोवाच। किं नु ज्येष्ठेन ते किमनन्तरजेन ते। किं वा मध्यमजातेन किं कनिष्ठेन वा पुनः।। 29 ।। यां त्वं मां सर्वतो हीनामुत्सृज्यासि गतः पुरा। तामेव लपितां गच्छ तरुणीं चारुहासिनीम्।। 30 ।। मन्दपाल उवाच। न स्त्रीणां विद्यते किंचिदमुत्र पुरुषान्तरात्। सापत्नकमृते लोके नान्यदर्थविनाशनम्।। 31 ।। वैराग्निदीपनं चैव भृशुद्वेगकारि च। सुव्रता चापि कल्याणी सर्वभूतेषु विश्रुता।। 32 ।। अरुन्धती महात्मानं वसिष्ठं पर्यशङ्कत। विशुद्धभावमत्यन्तं सदा प्रियहिते रतम्।। 33 ।। सप्तर्षिमध्यगं वीरमवमेने च तं मुनिम्। अपध्यानेन सा तेन धूमारुणसमप्रभा। लक्ष्याऽलक्ष्या नाभिरूपा निमित्तमिव पश्यति।। 34 ।। अपत्यहेतोः संप्राप्तं तथा त्वमपि मामिह। इष्टमेवं गते हि त्वं सा तथैवाद्य वर्तते।। 35 ।। न हि भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथंचन। न हि कार्यमनुध्याति नारी पुत्रवती सती।। 36 ।। वैशंपायन उवाच। ततस्ते सर्व एवैनं पुत्राः सम्यगुपासते। स च तानात्मजान्सर्वानाश्वासयितुमुद्यतः।। 37 ।।

हिन्दी अनुवाद:

मन्दपाल ने कहा—"इनमें तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र कौन है, उसका छोटा भाई कौन है, मध्यम कौन है और सबसे कनिष्ठ कौन है? दुःख से आकुल होकर ऐसा पूछने पर भी तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो? मैंने हव्य (यज्ञ) संपन्न कर लिए हैं और अब मुझे यहाँ शांति प्राप्त हुई है।" ऐसा कहकर मन्दपाल ने जरिता को छूना चाहा। जरिता बोली—"अब तुम्हारे लिए ज्येष्ठ, छोटे, मध्यम या कनिष्ठ पुत्र से क्या प्रयोजन है? जिस मुझे तुम सर्व प्रकार से हीन समझकर पहले ही छोड़कर चले गए थे, तुम उसी तरुणी और चारुहासिनी (सुंदर हँसी वाली) लपिता के पास जाओ।" मन्दपाल बोले—"स्त्रियों के लिए पर-पुरुष के बिना परलोक में कुछ भी नहीं होता (अर्थात उनका मुख्य आश्रय पति ही है)। इस संसार में सौत के आपसी वैमनस्य (सापत्न्य) के समान दूसरा कोई अर्थ का विनाश करने वाला, वैराग्य की अग्नि को प्रज्वलित करने वाला और अत्यधिक उद्वेग पैदा करने वाला नहीं है। सुव्रता और कल्याणी होने पर भी, तथा सर्वत्र विश्रुत होने पर भी, महात्मना अरुन्धती ने परम विशुद्ध भाव वाले और सदा प्रिय-हित में रत रहने वाले वसिष्ठ मुनि पर भी आशंका (संदेह) की थी। सप्तर्षियों के मध्य में विराजमान उन वीर मुनि का उन्होंने अवमानना की थी। उसी कुविचार (अपध्यान) के कारण धूम्र-अरुण के समान कांति वाली वे अरुन्धती आज भी आकाश में स्पष्ट-अस्पष्ट रूप से (नक्षत्र रूप में) निमित्त के समान दिखाई देती हैं। जैसे अरुन्धती ने संतान के हेतु (संदेह) किया था, वैसे ही तुम भी आज मेरे प्रति वैसा ही व्यवहार कर रही हो। इसलिए पुरुष को कभी भी अपनी पत्नी पर पूरी तरह विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि पुत्रवती होने पर भी नारी अपने कर्तव्य का पूर्ण स्मरण नहीं रख पाती।" वैशम्पायन जी कहते हैं—तदनन्तर वे सभी पुत्र विधिपूर्वक अपने पिता की उपासना (सेवा) करने लगे और मन्दपाल भी अपने उन सभी पुत्रों को आश्वस्त करने में प्रवृत्त हुए।

व्याख्या:

संकट टलने के बाद पारिवारिक कलह सामने आती है। जरिता अपने पति मन्दपाल के पूर्ववर्ती व्यवहार से आहत है और ताना मारती है कि वे वापस लपिता के पास चले जाएँ। इसके उत्तर में मन्दपाल जरिता को समझाते हैं कि सौत का ईर्ष्याभाव स्वाभाविक है और इतिहास में अरुन्धती जैसी महान पत्नियों ने भी वसिष्ठ ऋषि पर संदेह किया था। अंत में, तमाम मनमुटाव के बाद मन्दपाल अपने सभी पुत्रों के साथ प्रेमपूर्वक रहने लगे।

(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत मयदर्शन पर्व का 259वाँ अध्याय पूर्ण हुआ।)

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