महाभारत के आदिपर्व (मयदर्शन पर्व के अंतर्गत) के इस अंतिम 260वें अध्याय में महर्षि मन्दपाल द्वारा अपने पुत्रों को दिए गए संतोषजनक उपदेश, खाण्डव वन के पूर्ण दाह की समाप्ति, देवराज इंद्र द्वारा कृष्ण और अर्जुन को वरदान देना, तथा मय दानव सहित उन सभी का नदी तट पर विश्राम करने का अत्यंत सुंदर वर्णन है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 3
मन्दपाल उवाच। युष्माकमपवर्गार्थं ती ज्वलनो मया। अग्निना च तथेत्येतिज्ञातं महात्मना।। 1 ।। अग्नेर्वचनमाज्ञाय धर्मज्ञतां च वः। भवतां च परं वीर्यं नाहमिहागतः।। 2 ।। न सन्तापो हि वर्त्थः पुत्रका हृदि मां प्रति। ऋषीन्वेद हुताशो ब्रह्म तद्विदितं च वः।। 3 ।।
हिन्दी अनुवाद:
मन्दपाल ने अपने पुत्रों से कहा—"तुम लोगों के अपवर्ग (कल्याण/मुक्ति) के लिए ही मैंने अग्निदेव की स्तुति की थी और महात्मा अग्निदेव ने भी 'तथास्तु' कहकर उसे स्वीकार किया था। अग्निदेव के उस वचन को, तुम सबकी धर्मज्ञता को और तुम्हारे परम वीर्य को अच्छी तरह जानकर ही मैं तुरंत यहाँ नहीं आया था (अर्थात मुझे विश्वास था कि तुम सुरक्षित रहोगे)। हे पुत्रकों! मेरे प्रति तुम्हारे हृदय में कोई व्यर्थ का संताप या संदेह नहीं होना चाहिए। हुताशन (अग्नि) ऋषियों को भली-भांति जानते हैं, हे ब्रह्मन्! यह बात तुम सबको भी विदित है।"
व्याख्या:
मन्दपाल अपने पुत्रों को समझाते हैं कि उनका तुरंत वहाँ न पहुँचना कोई उपेक्षा नहीं थी, बल्कि वे भली-भांति जानते थे कि अग्निदेव ने उनके पुत्रों को सुरक्षित रखने का वचन दिया है और वे बालक स्वयं ऋषि-तुल्य पराक्रमी हैं।
श्लोक 4 - 6
वैशंपायन उवाच। एवमाश्वासितान्पुत्रान्भार्यामादाय स द्विजः। मन्दपालस्ततो देशादन्यं देशं जगाम ह।। 4 ।। भगवानापि तिग्मांशुः समिद्धः खाण्डवं ततः। ददाह सह कृष्णाभ्यां जनयञ्जगतो हितम्।। 5 ।। वसामेदोवहाः कुल्यास्तत्र पीत्वा च पावकः। जगाम दर्शयामास चार्जुनम्।। 6 ।।
हिन्दी अनुवाद:
वैशम्पायन जी कहते हैं—इस प्रकार अपने पुत्रों को आश्वस्त करके, वे द्विज महर्षि मन्दपाल अपनी पत्नी (जरिता) को साथ लेकर उस देश से दूसरे देश को चले गए। उधर भगवान प्रज्वलित तिग्मांशु (अग्निदेव) ने कृष्ण और अर्जुन के साथ मिलकर जगत का हित करते हुए उस खाण्डव वन को पूरी तरह जला दिया। वहाँ प्राणियों की वसा (चरबी) और मेद (चर्बी) की बहने वाली नदियों (नहरों) का पान करके अग्निदेव तृप्त हो गए और उन्होंने अर्जुन को (अपना आभार) प्रकट किया।
व्याख्या:
मन्दपाल अपने परिवार को लेकर अन्यत्र चले गए। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण और अर्जुन के सहयोग से अग्निदेव ने खाण्डव वन को पूरी तरह भस्म कर दिया। प्राणियों की वसा और मेद का भरपूर पान करके उनका मंदाग्नि (अरुचि) रोग हमेशा के लिए समाप्त हो गया और वे पूरी तरह तृप्त हो गए।
श्लोक 7 - 14
ततोऽञन्तरिक्षाद्भगवानवतीर्य पुरन्दरः। मरुद्गणैर्वृतः पार्थं केशवं चेदमब्रवीत्।। 7 ।। कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम्। वरं वृणीतं तुष्टोऽस्मि दुर्लभं पुरुषेष्विह।। 8 ।। पार्थस्तु वरयामास शक्रादस्त्राणि सर्वशः। प्रदातुं तच्च शक्रस्तु कालं चक्रे महाद्युतिः।। 9 ।। यदा प्रसन्नो भगवान्महादेवो भविष्यति। तदातुभ्यं प्रदास्यामि पाण्डवास्त्राणि सर्वशः।। 10 ।। अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन। तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम्।। 11 ।। आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वशः। मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनञ्जय।। 12 ।। वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम्। ददौ सुरपतिश्चैव वरं कृष्णाय धीमते।। 13 ।। एवं दत्त्वा वरं ताभ्यां सह देवैर्मरुत्पतिः। हुताशनमनुज्ञाप्य जगामत्रिदिवं प्रभुः।। 14 ।।
हिन्दी अनुवाद:
तदनन्तर, मरुद्गणों से घिरे हुए भगवान पुरंदर (इंद्र) आकाश से नीचे उतरकर पार्थ और केशव के पास आए और बोले—"तुम दोनों ने यह ऐसा कार्य किया है जो देवताओं के लिए भी दुष्कर (कठिन) है। मैं तुम दोनों से अत्यंत प्रसन्न हूँ, इस लोक में मनुष्यों के लिए जो दुर्लभ हो, वह कोई भी वर माँग लो।" पार्थ (अर्जुन) ने शक्र (इंद्र) से सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र प्रदान करने का वर माँगा। तब महाद्युतिमान शक्र ने उसके लिए समय निर्धारित करते हुए कहा—"हे पाण्डव! जब भगवान महादेव प्रसन्न होंगे, तब मैं तुम्हें सभी अस्त्र प्रदान करूँगा। हे कुरुनन्दन! उस उचित समय को मैं स्वयं जानूँगा और भारी तपस्या के बाद मैं तुम्हें वे अस्त्र दूँगा। हे धनंजय! आग्नेय, वायव्य और मेरे पास जितने भी अस्त्र हैं, तुम वे सब मुझसे प्राप्त करोगे।" वासुदेव श्रीकृष्ण ने भी पार्थ के साथ अपनी शाश्वत प्रीति ग्रहण की और सुरपति इंद्र ने धीमान श्रीकृष्ण को भी उत्तम वर प्रदान किया। उन दोनों को इस प्रकार वर देकर, मरुतों के स्वामी प्रभु पुरंदर देवताओं के साथ अग्निदेव से अनुमति लेकर त्रिदिव (स्वर्गलोक) को प्रस्थान कर गए।
व्याख्या:
जब खाण्डव वन का दाह पूरा हो गया और अर्जुन ने देवराज इंद्र के आक्रमण को भी विफल कर दिया, तब इंद्र स्वयं प्रसन्न होकर नीचे उतरे। उन्होंने कृष्ण और अर्जुन के पराक्रम की सराहना की। अर्जुन ने इन्द्र से दिव्यास्त्रों की याचना की, जिस पर इंद्र ने आश्वासन दिया कि उचित समय आने पर (महादेव को प्रसन्न करने के पश्चात) वे उन्हें अपने सभी दिव्यास्त्र प्रदान करेंगे।
श्लोक 15 - 21
पावकश्च तदा दावं दग्ध्वसमृगपक्षिणम्। अहोभिरेकविंशद्भिर्विरराग्सुतर्पितः।। 15 ।। जग्ध्वा मांसानि पीत्वा चदांसि रुधिराणि च। युक्तः परमया प्रीत्या तावुत्वाच्युतार्जुनौ।। 16 ।। युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां ततोऽस्मि यथासुखम्। अनुजानामि वां वीरौ चरतंत्र वाञ्छितम्।। 17 ।। गाण्डिवं च धनुर्दिव्यमक्षौ च महेषुधी। कपिध्वजो रथश्चायं तव द महामते।। 18 ।। अनेन धनुषा चैव रथेनाने भारत। विजेष्यसि रणे शत्रून्सदेवामानुषान्।। 19 ।। एवं तौ समनुज्ञातौ पाववेमहात्मना। अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्चयस्तथा।। 20 ।। परिक्रम्य ततः सर्वे त्रयोऽभरतर्षभ। रमणीयै नदीकूले सहितामुपाविशंन्।। 21 ।।
हिन्दी अनुवाद:
पशुओं और पक्षियों सहित उस वन को इक्कीस (21) दिनों तक जलाकर, भली-भांति तृप्त हुए पावक (अग्निदेव) सुशोभित हुए। मांस और रुधिर का पान करके परम प्रीति से युक्त हुए अग्निदेव ने अच्युत और अर्जुन से कहा—"हे श्रेष्ठ पुरुषों! तुम दोनों के कारण मुझे यथोच्छिष्ट सुख और तृप्ति प्राप्त हुई है। हे वीरौ! मैं तुम दोनों को अपनी अनुमति देता हूँ, अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ चाहो विचरण करो। हे महामते! यह दिव्य गाण्डीव धनुष, दोनों अक्षय तूणीर और यह कपिध्वज रथ—यह सब तुम्हारे ही पास रहे। हे भारत! तुम इसी धनुष और इसी रथ के द्वारा रणक्षेत्र में देवता और मनुष्यों सहित समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे।" महात्मा अग्निदेव द्वारा इस प्रकार अनुमति दिए जाने पर—अर्जुन, वासुदेव श्रीकृष्ण और वे दानव (मय दानव)—ये तीनों, हे भरतर्षभ! उनकी परिक्रमा करके एक रमणीय नदी के तट पर एकसाथ विश्राम करने के लिए बैठ गए।
व्याख्या:
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि मुख्य कथा में पहले १५ दिनों का वर्णन आया था, और यहाँ कुल 21 दिनों (अहोभिरेकविंशद्भिः) तक खाण्डव वन के जलने का कुल काल बताया गया है। अग्निदेव ने पूरी तरह तृप्त होकर अर्जुन और कृष्ण को आशीर्वाद दिया तथा गाण्डीव रथ व अस्त्र-शस्त्र उन्हीं के पास रहने की अनुमति दी। इसके बाद अर्जुन, श्रीकृष्ण और मय दानव तीनों ने एक सुंदर नदी के तट पर बैठकर विश्राम किया।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां आदिपर्वणि मयपर्वणि षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः—अर्थात् आदिपर्व का 260वाँ अध्याय पूर्ण हुआ। और इसी के साथ मयदर्शन पर्व / खाण्डवदाह पर्व समाप्त होता है।)
