महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के अंतिम यानी 227वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है।
इस अध्याय में द्रौपदी का हस्तिनापुर की रानियों द्वारा स्वागत, धृतराष्ट्र द्वारा पांडवों को आधा राज्य (खांडवप्रस्थ) देने की घोषणा, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, और अंत में श्रीकृष्ण के निर्देश पर विश्वकर्मा द्वारा खांडवप्रस्थ के स्थान पर अलौकिक 'इंद्रप्रस्थ' नगर का निर्माण तथा श्रीकृष्ण का द्वारका लौटना वर्णित है।
श्लोक 1 से 7: (द्रौपदी का स्वागत और कुंती का पांडवों सहित पांडु भवन में प्रवेश)
श्लोक 1, 2, 3 और 4:
वैशंपायन उवाच। दुर्योधनस्य महिषी काशिराजसुता तदा। धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां वधूभिः सहिता तदा।। पाञ्चालीं प्रतिजग्राह साध्वीं श्रियमिवापराम्। पूजयामास पूजार्हां शचीदेवीमिवागताम्।। ववन्दे तत्र गान्धारीं कृष्णया सह माधवी। आशिषश्च प्रयुक्त्वा तु पाञ्चालीं परिषस्वजे।। परिष्वज्यैव गान्धारी कृष्णां कमललोचनम्। पुत्राणां मम पाञ्चाली मृत्युरेवेत्यमन्यत।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तब दुर्योधन की महिषी (पत्नी, जो काशिराज की पुत्री थीं) ने धृतराष्ट्र के अन्य पुत्रों की बहुओं के साथ मिलकर पाञ्चाली (द्रौपदी) का ऐसे स्वागत किया मानो दूसरी साक्षात् लक्ष्मी आ गई हों। उन्होंने पूजा के योग्य उन द्रौपदी का ऐसे पूजन किया जैसे साक्षात् शचीदेवी (इंद्राणी) आ गई हों। तब माधवी (कुंती) के साथ कृष्णा ने वहाँ गांधारी की वंदना की। गांधारी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कमललोचना कृष्णा (द्रौपदी) को गले से लगा लिया। किंतु गांधारी ने कृष्णा को गले लगाते हुए मन ही मन यह विचार किया कि— "यह पाञ्चाली तो मेरे पुत्रों के लिए साक्षात् मृत्यु ही बनकर आई है!"
- व्याख्या: हस्तिनापुर पहुँचने पर कौरव बहुओं और दुर्योधन की पत्नी ने द्रौपदी का भव्य स्वागत किया। गांधारी ने स्नेहवश द्रौपदी को गले तो लगाया, किंतु भविष्य की विभीषिका को भापते हुए उनके मन में यह आशंका भी उत्पन्न हुई कि यही कन्या आगे चलकर कौरव वंश के विनाश का कारण बनेगी।
श्लोक 5, 6 और 7:
संचिन्त्य विदुरं प्राह युक्तितः सुबलात्मजा। कुन्तीं राजसुतां क्षत्तः सवधूं सपरिच्छदाम्।। पाण्डोर्निवेशनं शीघ्रं नीयतां यदि रोचते। करणेन मुहूर्तेन नक्षत्रेण शुभे तिथौ।। यथा सुखं तथा कुन्ती रंस्यते स्वगृहे सुतैः। तथेत्येव तदा क्षत्ता कारयामास तत्तथा।।
- हिन्दी अनुवाद: सुबलात्मजा (गांधारी) ने विदुर का स्मरण करके उनसे युक्तिपूर्वक कहा— "हे क्षत्ता! राजसुता कुंती को, उनकी बहू (द्रौपदी) और परिवार के साथ शीघ्र ही पांडु के भवन में पहुँचा दिया जाए, यदि आपको यह रुचिकर लगे। किसी शुभ मुहूर्त, नक्षत्र और तिथि में ऐसा प्रबंध कीजिए, जिससे कुंती अपने घर में पुत्रों के साथ सुखपूर्वक निवास कर सकें।" विदुर जी ने "बहुत अच्छा" कहकर वैसा ही करवाया।
- व्याख्या: गांधारी के सुझाव पर विदुर जी ने कुंती, पांडवों और द्रौपदी के रहने के लिए महाराज पांडु के मूल निवास-स्थान को सुंदर ढंग से व्यवस्थित करवाकर उन्हें वहाँ प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 8 से 18 (कौरवों का सत्कार और धृतराष्ट्र द्वारा खांडवप्रस्थ/आधा राज्य देने की घोषणा)
श्लोक 8, 9, 10 और 11:
पूजयामासुरत्यर्थं बान्धवाः पाण्डवांस्तदा। नागराः श्रेणिमुख्याश्च पूजयन्ति स्म पाण्डवान्।। भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णो बाह्लीकः ससुतस्तदा। शासनाद्धृतराष्ट्रस्य अकुर्वन्नतिथिक्रियाम्।। एवं विहरतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम्। नेता सर्वस्य कार्यस्य विदुरो राजशासनात्।। विश्रान्तास्ते महात्मानः कंचित्कालं सकेशवाः। आहूता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च।।
- हिन्दी अनुवाद: तब सभी संबंधियों, नागरिकों और श्रेणी-मुख्यों (व्यापारी संघों के प्रमुखों) ने पांडवों का अत्यधिक सत्कार किया। धृतराष्ट्र की आज्ञा से भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण और बाह्लीक अपने पुत्रों सहित पांडवों की अतिथि-क्रिया (स्वागत-सत्कार) में जुट गए। इस प्रकार उन महात्मा पांडवों के विहार करते समय राजा की आज्ञा से विदुर जी ही सभी कार्यों के संचालक रहे। कुछ समय तक श्रीकृष्ण के साथ उन महात्मना पांडवों ने विश्राम किया, और तत्पश्चात राजा धृतराष्ट्र तथा शांतनुनंदन भीष्म द्वारा उन्हें बुलाया गया।
- व्याख्या: हस्तिनापुर में सभी ने पांडवों का आदर-सत्कार किया। कुछ दिन विश्राम करने के पश्चात धृतराष्ट्र और भीष्म ने पांडवों को राज्य के बँटवारे और भविष्य के विषय में चर्चा के लिए बुलाया।
श्लोक 12, 13, 14, 15, 16, 17 और 18:
धृतराष्ट्र उवाच। भ्रातृभिः सह कौन्तेय निबोधेदं वचो मम।
पाण्डुना वर्धितं राज्यं पाण्डुना पालितं जगत्।। शासनान्मम कौन्तेय मम भ्राता महाबलः।कृतवान्दुष्करं कर्म नित्यमेव विशांपते।। तस्मात्त्वमपि कौन्तेय शासनं कुरु मा चिरम्। मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वेऽहंकारसंयुताः।। शासनं न करिष्यन्ति मम नित्यं युधिष्ठिर। स्वकार्यनिरतैर्नित्यमवलिप्तैर्दुरात्मभिः।।' पुनर्वै विग्रहो मा भूत्खाण्डवप्रस्थमाविश। न हि वो वसतस्तत्र कश्चिच्छक्तः प्रबाधितुम्।। संरक्ष्यमाणान्पार्थेन त्रिदशानिव वज्रिणा। अर्धराज्यं तु संप्राप्य खाण्डवप्रस्थणाविश।।केशवो यदि मन्यते तत्कर्तव्यमसंशयम्।।'
- हिन्दी अनुवाद: धृतराष्ट्र ने कहा— "हे कौंतेय युधिष्ठिर! भाइयों सहित मेरे इस वचन को सुनो। महाराज पांडु द्वारा यह राज्य बढ़ाया गया था और पांडु ने ही इस जगत का पालन किया था। हे विशांपते कौंतेय! मेरी ही आज्ञा से मेरे महाबलवान भाई (पांडु) ने सदैव दुष्कर कार्य किए थे। इसलिए हे कौंतेय! अब तुम भी बिना विलंब किए यहाँ शासन संभालो। किंतु मेरे ये दुरात्मा पुत्र अहंकार से युक्त हैं, इसलिए हे युधिष्ठिर! ये मेरे अनुशासन में कभी नहीं रहेंगे। अपने कार्यों में लगे रहने वाले, घमंडी और दुरात्मा होने के कारण ये तुम्हारी आज्ञा भी नहीं मानेंगे। अतः भविष्य में पुनः कोई गृहयुद्ध (विग्रह) न हो, इसके लिए तुम 'खांडवप्रस्थ' में जाकर निवास करो। वहाँ निवास करते हुए तुम्हें कोई भी पराजित करने में समर्थ नहीं होगा। जिस प्रकार वज्रधारी इंद्र देवताओं की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार अर्जुन द्वारा रक्षित होकर तुम वहाँ निवास करो। इस प्रकार आधा राज्य प्राप्त करके तुम खांडवप्रस्थ चले जाओ। यदि केशव (श्रीकृष्ण) भी ऐसा ही मानते हैं, तो निःसंशय वैसा ही किया जाना चाहिए।"
- व्याख्या: धृतराष्ट्र अपने पुत्रों (दुर्योधनादि) की हठधर्मिता और अहंकार से वाकिफ थे। वे जानते थे कि एक ही नगर में रहने पर कौरव-पांडवों में पुनः युद्ध होगा, इसलिए वे पांडवों को आधा राज्य देकर उन्हें 'खांडवप्रस्थ' (जो बाद में इंद्रप्रस्थ बना) में बसने की सलाह देते हैं।
श्लोक 19 से 35 (युधिष्ठिर का राज्याभिषेक और व्यास-भीष्म-द्रोण द्वारा अनुष्ठान)
श्लोक 19, 20, 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27, 28 और 29:
वैशंपायन उवाच। प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं नृपं सर्वे प्रणम्य च। `वासुदेवेन संमन्त्र्य पाण्डवाः समुपाविशन्।। धृतराष्ट्र उवाच। अभिषेकस्य संभारान्क्षत्तरानय मा चिरम्। अभिषिक्तं करिष्यामि ह्यद्य वै कुरुनन्दनम्।। ब्राह्मणा नैगमश्रेष्ठाः श्रेणीमुख्याश्च सर्वतः। आहूयन्तां प्रकृतयो बान्धवाश्च विशेषतः।। पुण्याहं वाच्यतां तात गोसहस्रं प्रदीयताम्। ग्राममुख्याश्च विप्रेभ्यो दीयन्तां बहुदक्षिणाः।। अङ्गदे मकुटं क्षत्तर्हस्ताभरणमानय। मुक्तावलीश्च हारं च निष्काणि कटकानि च।। कटिबन्धश्च सूत्रं च तथोदरनिबन्धनम्। अष्टोत्तरसहस्रं तु ब्राह्मणाधिष्ठिता गजाः।। जाह्नवीसलिलं शीघ्रमानीयन्तां पुरोहितैः। अभिषेकोदकक्लिन्नं सर्वाभरणभूषितम्।। औपवाह्योपरिगतं दिव्यचारमरवीजितम्। सुवर्णमणिचित्रेण श्वेतच्छत्रेण शोभितम्।। जयेति द्विजवाक्येन स्तूयमानं नृपैस्तथा। दृष्ट्वा कुन्तीसुतं ज्येष्ठमाजमीढं युधिष्ठिरम्।। प्रीताः प्रीतेन मनसा प्रशंसन्तु परे जनाः। पाण्डोः कृतोपकारस्य राज्यं दत्वा ममैव च।। प्रतिक्रिया कृतमिदं भविष्यति न संशयः। भीष्मो द्रोणः कृपः क्षत्ता साधुसाध्वित्यथाब्रुवन्।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— उस वचन को स्वीकार करके तथा राजा (धृतराष्ट्र) को प्रणाम कर वासुदेव (श्रीकृष्ण) से मंत्रणा करके पांडव बैठ गए। धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा— "हे क्षत्ता! अभिषेक की सारी सामग्रियाँ शीघ्र लाओ, आज ही मैं कुरुनंदन युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करूँगा। ब्राह्मणों, नगर के श्रेष्ठ व्यापारियों, श्रेणी-प्रमुखों, प्रकृतिजनों और विशेष रूप से बांधवों को बुलाया जाए। हे तात! पुण्याहवाचन कराया जाए, एक हजार गायें दान दी जाएं, और ब्राह्मणों को मुख्य ग्राम तथा बहुमूल्य दक्षिणाएँ दी जाएं। हे क्षत्ता! अंगद, मुकुट, हाथ के आभूषण, मोतियों की मालाएँ, हार, निष्क, कड़े, कटिबंध और उदर-निबंधन (कमरबंद) लाओ। ब्राह्मणों से अधिष्ठित एक हजार आठ (1008) हाथी लाए जाएँ। पुरोहितगण शीघ्र ही गंगाजल (जाह्नवी सलिल) लाएँ। अभिषेक के जल से सिक्त, समस्त आभूषणों से भूषित, सवारी के उत्तम हाथी पर बैठे हुए, दिव्य चंवरों से हवा किए हुए और सुवर्ण-मणियों से चित्रित श्वेत छत्र से सुशोभित— 'जय हो' इन द्विज-वक्यों तथा राजाओं द्वारा स्तुति किए जाने वाले जेष्ठ कुंतेय आजमीढ युधिष्ठिर को देखकर प्रीतिमान मन वाले अन्य लोग भी उनकी प्रशंसा करें। पांडु के किए हुए उपकार का तथा अपने राज्य का यह उचित प्रत्यपकार (बदला) होगा, इसमें संशय नहीं है।" भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और क्षत्ता (विदुर) ने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर इसका समर्थन किया।
- व्याख्या: धृतराष्ट्र युधिष्ठिर के राज्याभिषेक की भव्य तैयारियाँ करने का आदेश देते हैं। वे कहते हैं कि पांडु के उपकारों का बदला चुकाने और कुल की शांति के लिए युधिष्ठिर का राजा बनना आवश्यक है।
श्लोक 30, 31, 32, 33, 34 और 35:
श्रीवासुदेव उवाच। युक्तमेतन्महाभाग कौरवाणां यशस्करम्। शीघ्रमद्यैव राजेन्द्र त्वयोक्तं कर्तुमर्हसि।। इत्येवमुक्तो वार्ष्णेयस्त्वरयामास तत्तदा। तथोक्तं धृतराष्ट्रेण कारयामास केशवः।। तस्मिन्क्षणे महाराज कृष्णद्वैपायनस्तदा। आगत्य कुरुभिः सर्वैः पूजितः ससुहृद्गणैः।। मूर्धाभिषिक्तैः सहितो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः। कारयामास विधिवत्केशवानुमते तदा।। कृपो द्रोणश्च भीष्मश्च धौम्यश्च व्यासकेशवौ। बाह्लीकः सोमदत्तश्च चातुर्वेद्यपुरस्कृताः।। अभिषेकं तदा चक्रुर्भद्रपीठे सुसंस्कृतम्।।
- हिन्दी अनुवाद: श्रीवासुदेव (श्रीकृष्ण) ने कहा— "हे महाभाग! कौरवों की कीर्ति बढ़ाने वाला यह कार्य अत्यंत उपयुक्त है। हे राजेन्द्र! आपने जो कहा है, उसे आज ही शीघ्र करना चाहिए." श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण) ने उस कार्य में त्वरा (शीघ्रता) लाई और धृतराष्ट्र के कहे अनुसार केशव ने सारा प्रबंध कराया। महाराज! उसी क्षण महाभाग कृष्णद्वैपायन व्यासजी वहाँ आ गए और सुहृदों सहित समस्त कौरवों ने उनका पूजन किया। वेदपारंगत मूर्धाभिषिक्त ब्राह्मणों के साथ व्यासजी ने केशव की सहमति से विधिपूर्वक राज्याभिषेक का अनुष्ठान कराया। कृपाचार्य, द्रोण, भीष्म, धौम्य, व्यास, केशव, बाह्लीक और सोमदत्त— इन सभी ने मिलकर अत्यंत सुसंस्कृत भद्रपीठ (सिंहासन) पर युधिष्ठिर का राज्याभिषेक किया।
- व्याख्या: श्रीकृष्ण इस निर्णय का पूर्ण समर्थन करते हैं और महर्षि व्यास की उपस्थिति में तथा भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि गुरुजनों की देखरेख में युधिष्ठिर का राज्याभिषेक संपन्न होता है।
श्लोक 36 से 48 (व्यासजी का आशीर्वाद और युधिष्ठिर को खांडवप्रस्थ प्रस्थान का आदेश)
श्लोक 36, 37, 38, 39, 40 और 41:
व्यास उवाच। जित्वा तु पृथिवीं कृत्स्नां वशे कृत्वा नृपान्भवान्। राजसूयादिभिर्यज्ञैः क्रतुभिर्वरदक्षिणैः।। स्नात्वा ह्यवभृथस्नानं मोदतां बान्धवैः सह।। एवमुक्त्वा तु ते सर्वे आशीर्भिरभिपूजयन्।। मूर्धाभिषिक्तः कौरव्यः सर्वाभरणभूषितः। जयेति संस्तुतो राजा प्रददौ धनमक्षयम्।। सर्वमूर्धाभिषिक्तैश्च पूजितः कुरनन्दनः। औपवाह्यमथारुह्य श्वेतच्छत्रेण शोभितः।। रराज राजाभिमतो महेन्द्र इव दैवतैः। ततः प्रदक्षिणीकृत्य नगरं नागसाह्वयम्।। प्रविवेश तदा राजा नागरैः पूजितो गृहम्। मूर्धाभिषिक्तं कौन्तेयमभ्यगच्छन्त कौरवाः।।
- /अनुवाद: महर्षि व्यास ने आशीर्वाद दिया— "आप संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर, राजाओं को अपने वश में करके, प्रचुर दक्षिण वाले राजसूय आदि यज्ञों द्वारा अवभृथ स्नान करके अपने बांधवों के साथ आनंदित हों!" ऐसा कहकर उन सभी ने आशीर्वाद से उनका पूजन किया। राज्याभिषेक से संपन्न, समस्त आभूषणों से भूषित कुरुराज युधिष्ठिर ने 'जय हो' इस उद्घोष के बीच प्रचुर धन दान में दिया। श्वेत छत्र से सुशोभित और हाथियों/वाहनों पर आसीन कुरूनंदन युधिष्ठिर देवताओं के बीच महेंद्र (इंद्र) की भाँति सुशोभित हुए। तदंतर हस्तिनापुर नगर की परिक्रमा (प्रदक्षिणा) करके, नागरिकों द्वारा पूजित वे राजा अपने भवन में प्रविष्ट हुए। राज्याभिषेक के पश्चात कौरव भी उनके पास पहुँचे।
- व्याख्या: व्यासजी युधिष्ठिर को चक्रवर्ती बनने और राजसूय यज्ञ करने का दिव्य आशीर्वाद देते हैं। युधिष्ठिर नगर की परिक्रमा कर अपनी प्रजा से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
श्लोक 42, 43, 44, 45, 46, 47 और 48:
गान्धारिपुत्राः शोचन्तः सर्वे ते सह बान्धवैः। ज्ञात्वा शोकं च पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदं।। समक्षं वासुदेवस्य कुरूणां च समक्षतः। अभिषेकस्त्वया प्राप्तो दुष्प्रापो ह्यकृतात्मभिः।। गच्छ त्वमद्यैव नृप कृतकृत्योऽसि कौरव। आयुषः पुरूरवा राजन्नहुषेण ययातिना।। तत्र, निवसन्ति स्म खाण्डवे तु नृपोत्तम। राजधानी तु सर्वेषां पौरवाणां महाभुज।। विनाशितं मुनिगणैर्लोभाद्बुधसुतस्य वै। तस्मात्त्वं खाण्डवप्रस्थं पुरं राष्ट्रं च वर्धय।। ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च कृतलक्षणाः। त्वद्भक्त्या जन्तवश्चान्ये भजन्त्येव पुरं शुभम्।। पुरं राष्ट्रं समृद्धं वै धनधान्यसमाकुलम्। तस्माद्गच्छस्व कौन्तेय भ्रातृभिः सहितोऽनघ।।
- /अनुवाद: गांधारी के पुत्र और उनके सभी बांधी शोक में डूबे हुए थे। अपने पुत्रों के उस शोक को जानकर धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण और सभी कुरुओं के समक्ष युधिष्ठिर से कहा— "अकृतात्मा (दुराचारी) मनुष्यों के लिए दुर्लभ ऐसा यह राज्याभिषेक तुमने वासुदेव और कुरुओं के समक्ष प्राप्त कर लिया है। हे नृप कौरव! तुम आज ही प्रस्थान करो, तुम कृतकृत्य हो चुके हो। हे महाभुज नृपोत्तम! पुरूरवा, अहुष और ययाति के समय से ही पौरव वंशियों की मुख्य राजधानी खांडव वन में रही है, जो बाद में मुनियों द्वारा (लोभवश) नष्ट कर दी गई थी। इसलिए तुम उस 'खांडवप्रस्थ' नगर और राष्ट्र को पुनर्जीवित व समृद्ध करो। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य सभी सत्पुरुष तुम्हारी भक्ति के कारण उस शुभ नगर का सेवन करें। वह नगर और राष्ट्र धन-धान्य से समृद्ध है, अतः हे अनघ कौंतेय! तुम अपने भाइयों के साथ आज ही वहाँ जाओ।"
- व्याख्या: धृतराष्ट्र औपचारिक रूप से युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा तो घोषित कर देते हैं, किंतु गृहकलह से बचने के लिए उन्हें अपनी प्राचीन पौरव राजधानी 'खांडवप्रस्थ' (जहाँ कभी जंगल था) जाकर नया नगर बसाने का आदेश देते हैं।
श्लोक 49 से 67 (खांडवप्रस्थ प्रस्थान और श्रीकृष्ण के अनुरोध पर विश्वकर्मा द्वारा 'इंद्रप्रस्थ' का निर्माण)
श्लोक 49, 50, 51, 52 और 53:
वैशंपायन उवाच। प्रतिगृह्य तद्वाक्यं तस्मै सर्वे प्रणम्य च। रथैर्नागैर्हयैश्चापि सहितास्तु पदातिभिः।। प्रतस्थिरे ततो घोषसंयुक्तैः स्यन्दनैर्वरैः। तान्दृष्ट्वा नागराः सर्वे भक्त्या चैव प्रतस्थिरे।। गच्छतः पाण्डवैः सार्धं दृष्ट्वा नागपुरालयात्। पाण्डवैः सहिता गन्तुं नार्हतेति च नागरान्।। घोयायामास नगरे धार्तराष्ट्रः ससौबलः।। ततस्ते पाण्डवास्तत्र गत्वा कृष्णपुरोगमाः।। मण्डयाञ्चक्रिरे तद्वै पुरं स्वर्गादिव च्युतम्।
- /अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— उस वचन को स्वीकार कर उन सबको प्रणाम करके पांडव रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकों के साथ उत्तम रथों की गड़गड़ाहट के बीच प्रस्थान कर गए। उन्हें जाते देखकर समस्त नगरवासी भी भक्तिभाव से उनके पीछे चल पड़े। तब शकुनि सहित धृतराष्ट्र ने नगर में यह घोषणा करवा दी कि "नागरिकों को पांडवों के साथ हस्तिनापुर छोड़कर नहीं जाना चाहिए।" तदनंतर श्रीकृष्ण को आगे करके वे पांडव उस स्थान (खांडवप्रस्थ) पर पहुँचे और उस नगर को ऐसे सुसज्जित किया मानो स्वर्ग से उतरा हुआ कोई नगर हो।
- व्याخشा/व्याख्या: पांडव अपनी सेना, भाइयों और द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर से खांडवप्रस्थ के लिए प्रस्थान करते हैं। यद्यपि हस्तिनापुर की प्रजा उनके साथ जाना चाहती थी, किंतु राज्याज्ञा के कारण वे लौट आए। पांडव श्रीकृष्ण के साथ उस वीरान/जंगलनुमा खांडवप्रस्थ क्षेत्र में पहुँचते हैं।
श्लोक 54, 55, 56 और 57:
`वासुदेवो जगन्नाथश्चिन्तयामास वासवम्।। महेन्द्रश्चिन्तितो राजन्विश्वकर्माणमादिशत्। विश्वकर्मन्महाप्राज्ञ अद्यप्रभृति तत्पुरम्।। इन्द्रप्रस्थमिति ख्यातं दिव्यं भूम्यां भविष्यति। महेन्द्रशासनाद्गत्वा विश्वकर्मा तु केशवम्।। प्रणम्य प्रणिपातार्हं किं करोमीत्यभाषत। वासुदेवस्तु तच्छ्रुत्वा विश्वकर्माणमूचिवान्।। कुरुष्व कुरुराजस्य महेन्द्रपुरसन्निभम्। इन्द्रेण कृतनामानमिन्द्रप्रस्थं महापुरम्।।
- /अनुवाद: जगन्नाथ वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने मन ही मन देवराज इंद्र (वासव) का स्मरण किया। हे राजन्! स्मरण किए जाने पर महेंद्र (इंद्र) ने विश्वकर्मा को आदेश दिया— "हे महाप्राज्ञ विश्वकर्मा! आज से पृथ्वी पर वह नगर 'इंद्रप्रस्थ' नाम से प्रसिद्ध एक दिव्य नगर होगा।" महेंद्र की आज्ञा पाकर विश्वकर्मा ने केशव के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और पूछा— "मैं क्या करूँ?" वासुदेव ने विश्वकर्मा से कहा— "कुरुराज युधिष्ठिर के लिए इंद्रपुरी के समान भव्य और स्वयं इंद्र द्वारा नामित 'इंद्रप्रस्थ' नामक इस महापुर का निर्माण करो।"
- /व्याख्या: खांडवप्रस्थ की बंजर या वनभूमि को देखकर श्रीकृष्ण अपनी दिव्य शक्ति से देवराज इंद्र और शिल्पी विश्वकर्मा का आह्वान करते हैं, जिससे वहाँ देवताओं की अमरावती के समान भव्य 'इंद्रप्रस्थ' नामक नगर का निर्माण हो सके।
श्लोक 58, 59, 60, 61, 62, 63, 64, 65, 66 और 67:
वैशंपायन उवाच। ततः पुण्ये शिवे देशे शान्तिं कृत्वा महारथाः। स्वस्तिवाच्य यथान्यायमन्द्रप्रस्थं भवत्विति।। तत्पुरं मापयामासुर्द्वैपायनपुरोगमाः। `ततः स विश्वकर्मा तु चकार पुरमुत्तमम्।।' सागरप्रतिरूपाभिः परिखाभिरलङ्कृतम्। प्राकारेण च संपन्नं दिवमावृत्य तिष्ठता।। पाण्डुराभ्रप्रकाशेन हिमरश्मिनिभेन च। शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा।। द्विपक्षगरुडप्रख्यैर्द्वारैः सौधैश्च शोभितम्। गुप्तमभ्रचयप्रख्यैर्गोपुरैर्मन्दरोपमैः।। विविधैरपि निर्विद्धैः शस्त्रोपेतैः सुसंवृतैः। शक्तिभिश्चावृतं तद्धि द्विजिह्वैरिव पन्नगैः।। तल्पैश्चाभ्यासिकैर्युक्तं शुशुभे योधरक्षितम्। तीक्ष्णाङ्कुशशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैश्च शोभितम्।। आयसैश्च महाचक्रैः शुशुभे तत्पुरोत्तमम्। सुविभक्तमहारथ्यं देवताबाधवर्जितम्।। विरोचमानं विविधैः पाण्डुरैर्भवनोत्तमैः। तत्त्रिविष्टपसंकाशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत।। मेघवृन्दमिवाकाशे विद्धं विद्युत्समावृतम्।
- /अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर द्वैपायन व्यासजी की अगुवाई में महारथियों ने उस पवित्र और कल्याणकारी देश में 'यह इंद्रप्रस्थ हो' ऐसा कहकर स्वस्तिवाचन और शांति-कर्म किया तथा उस नगर की माप (नियोजन) कराई। तब विश्वकर्मा ने एक उत्तम नगर का निर्माण किया। वह नगर समुद्र के समान गंभीर और विशाल परिखाओं (खाइयों), तथा आकाश को छूती हुई श्वेत बादलों और चंद्रमा के समान कांतिमान प्राचीरों (चारदीवारी) से अलंकृत था। गरुड़ के समान विशाल द्वारों, मंदर पर्वत के समान ऊँचे गोपुरों और महलों से वह नागलोक की भोगवती पुरी की भाँति सुशोभित था। वह नगर तीखे अस्त्र-शस्त्रों, शतघ्नी यंत्रों, लोहे के बड़े-बड़े चक्रों और वीर योद्धाओं द्वारा पूरी तरह सुरक्षित था। वहाँ की सड़कें सुंदर ढंग से विभाजित थीं, वह दैवी आपदाओं से मुक्त था और श्वेत एवं सुंदर भवनों से ऐसा जगमगा रहा था मानो बादलों के बीच बिजली चमक रही हो। वह स्वर्ग (त्रिविष्टप) के समान सुंदर 'इंद्रप्रस्थ' नगर सुशोभित हुआ।
- /व्याख्या: महर्षि व्यास और श्रीकृष्ण की उपस्थिति में विश्वकर्मा ने खांडवप्रस्थ की भूमि पर अमरावती के समान अकल्पनीय सुंदरता, सुरक्षा और भव्यता से परिपूर्ण 'इंद्रप्रस्थ' नगर का निर्माण कर दिया।
महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 227वें अध्याय के श्लोक 68 से 109 तक के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इन श्लोकों में नव-निर्मित इंद्रप्रस्थ नगर की अलौकिक सुंदरता, उसकी समृद्धि, युधिष्ठिर का शासन, तथा अंत में भगवान श्रीकृष्ण और महर्षि व्यास की विदाई का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है।
महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 227वें अध्याय के श्लोक 68 से 109 तक के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इन श्लोकों में नव-निर्मित इंद्रप्रस्थ नगर की अलौकिक सुंदरता, उसकी समृद्धि, युधिष्ठिर का शासन, तथा अंत में भगवान श्रीकृष्ण और महर्षि व्यास की विदाई का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है।
श्लोक 68 से 78 (इंद्रप्रस्थ की बसाहट, व्यापार, और प्राकृतिक सौंदर्य)
श्लोक 68, 69 और 70:
तत्रागच्छन्द्विजा राजन्सर्ववेदविदां वराः। निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा।। वणिजश्चाययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः। सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा।। उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः।
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! वहाँ सभी वेदों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ ब्राह्मण आकर निवास करने लगे। विभिन्न भाषाओं को जानने वाले विद्वान भी वहाँ बसने के इच्छुक हुए। देश-विदेश (विभिन्न दिशाओं) से धन की इच्छा रखने वाले व्यापारी और समस्त शिल्पकलाओं में निपुण शिल्पी भी वहाँ आकर बस गए। उस नगर के चारों ओर अत्यंत रमणीय उद्यान (बाग-बगीचे) थे।
- व्याख्या: विश्वकर्मा द्वारा निर्मित इस नए नगर की ख्याति फैलते ही देश भर से विद्वान ब्राह्मण, कुशल व्यापारी, शिल्पी और ज्ञानी जन इंद्रप्रस्थ में आकर बसने लगे, जिससे यह नगर शीघ्र ही सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बन गया।
तत्रागच्छन्द्विजा राजन्सर्ववेदविदां वराः। निवासं रोचयन्ति स्म सर्वभाषाविदस्तथा।। वणिजश्चाययुस्तत्र नानादिग्भ्यो धनार्थिनः। सर्वशिल्पविदस्तत्र वासायाभ्यागमंस्तदा।। उद्यानानि च रम्याणि नगरस्य समन्ततः।
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! वहाँ सभी वेदों के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ ब्राह्मण आकर निवास करने लगे। विभिन्न भाषाओं को जानने वाले विद्वान भी वहाँ बसने के इच्छुक हुए। देश-विदेश (विभिन्न दिशाओं) से धन की इच्छा रखने वाले व्यापारी और समस्त शिल्पकलाओं में निपुण शिल्पी भी वहाँ आकर बस गए। उस नगर के चारों ओर अत्यंत रमणीय उद्यान (बाग-बगीचे) थे।
- व्याख्या: विश्वकर्मा द्वारा निर्मित इस नए नगर की ख्याति फैलते ही देश भर से विद्वान ब्राह्मण, कुशल व्यापारी, शिल्पी और ज्ञानी जन इंद्रप्रस्थ में आकर बसने लगे, जिससे यह नगर शीघ्र ही सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बन गया।
श्लोक 71, 72, 73, 74 और 75:
आम्रैराम्रातकैर्नीपैर्अशोकैश्चम्पकैस्तथा। पुन्नागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा।। शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः। मनोहरैः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितैः।। प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपिष्पितैः। जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुब्जकैरतिमुक्तकैः।। करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्द्रुमैः। नित्यपुष्पफलोपेतैर्नानाद्विजगणायुतैः।। मत्तबर्हिणसंघुष्टकोकिलैश्च सदामदैः। गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः।।
- व्याख्या/अनुवाद: वहाँ आम, आम्ररेणु (अमड़ा), कदंब, अशोक, चंपा, पुन्नाग, नागकेसर, बढ़हल (लकुच), कटहल (पनस), शाल, ताल, तमाल, बकुल, केतकी, तथा फलों के भार से झुके हुए सुंदर फूलों वाले वृक्ष सुशोभित थे। आमावत, लोध्र, अङ्कोल के प्रफुल्लित वृक्ष, जामुन, गुलाबी पाटल, कुब्जक, मालती (अतिमूक्त), कनेर, पारिजात और अन्य भाँति-भांति के सदाबहार फूल-फलों वाले वृक्ष थे जिन पर पक्षियों के झुंड चहकते थे। मतवाले मयूरों और कोकिलों की मीठी गूँज से वह वन आच्छादित था, तथा वहाँ दर्पण के समान निर्मल घरों और सुंदर लता-गृहों की शोभा थी।
- व्याख्या: इंद्रप्रस्थ के चारों तरफ प्राकृतिक हरियाली, फलों-फूलों से लदे वृक्ष और पक्षियों की कलरव करती प्राकृतिक सुंदरता ने इस नगर को स्वर्ग जैसा बना दिया था।
आम्रैराम्रातकैर्नीपैर्अशोकैश्चम्पकैस्तथा। पुन्नागैर्नागपुष्पैश्च लकुचैः पनसैस्तथा।। शालतालतमालैश्च बकुलैश्च सकेतकैः। मनोहरैः सुपुष्पैश्च फलभारावनामितैः।। प्राचीनामलकैर्लोध्रैरङ्कोलैश्च सुपिष्पितैः। जम्बूभिः पाटलाभिश्च कुब्जकैरतिमुक्तकैः।। करवीरैः पारिजातैरन्यैश्च विविधैर्द्रुमैः। नित्यपुष्पफलोपेतैर्नानाद्विजगणायुतैः।। मत्तबर्हिणसंघुष्टकोकिलैश्च सदामदैः। गृहैरादर्शविमलैर्विविधैश्च लतागृहैः।।
- व्याख्या/अनुवाद: वहाँ आम, आम्ररेणु (अमड़ा), कदंब, अशोक, चंपा, पुन्नाग, नागकेसर, बढ़हल (लकुच), कटहल (पनस), शाल, ताल, तमाल, बकुल, केतकी, तथा फलों के भार से झुके हुए सुंदर फूलों वाले वृक्ष सुशोभित थे। आमावत, लोध्र, अङ्कोल के प्रफुल्लित वृक्ष, जामुन, गुलाबी पाटल, कुब्जक, मालती (अतिमूक्त), कनेर, पारिजात और अन्य भाँति-भांति के सदाबहार फूल-फलों वाले वृक्ष थे जिन पर पक्षियों के झुंड चहकते थे। मतवाले मयूरों और कोकिलों की मीठी गूँज से वह वन आच्छादित था, तथा वहाँ दर्पण के समान निर्मल घरों और सुंदर लता-गृहों की शोभा थी।
- व्याख्या: इंद्रप्रस्थ के चारों तरफ प्राकृतिक हरियाली, फलों-फूलों से लदे वृक्ष और पक्षियों की कलरव करती प्राकृतिक सुंदरता ने इस नगर को स्वर्ग जैसा बना दिया था।
श्लोक 76, 77 और 78:
मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथाऽजगतिप्रवतैः। वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा।। सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः। हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः।। रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः। तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च।।
- हिन्दी अनुवाद: वहाँ मनमोहक चित्रशालाएँ, सुंदर जल-प्रपात, और उत्तम जल से भरी हुई भाँति-भाँति की वाधियाँ (बावड़ियाँ) थीं। कमल और उत्पल (नीलोत्पल) की सुगंध से सुवासित अत्यंत रमणीय सरोवर थे, जिनमें हंस, कारंडव (मुर्गाबी) और चक्रवाक पक्षी सुशोभित होते थे। वनों से घिरी हुई वे सुंदर पुष्करिणियाँ (तालाब) और बड़े-बड़े रमणीय तड़ाग उस नगर की शोभा बढ़ाते थे।
- व्याख्या: जल संसाधनों, सरोवरों और बाग-बगीचों की बहुलता के कारण यह नगर ग्रीष्म ऋतु में भी शीतल और सुहावना रहता था।
मनोहरैश्चित्रगृहैस्तथाऽजगतिप्रवतैः। वापीभिर्विविधाभिश्च पूर्णाभिः परमाम्भसा।। सरोभिरतिरम्यैश्च पद्मोत्पलसुगन्धिभिः। हंसकारण्डवयुतैश्चक्रवाकोपशोभितैः।। रम्याश्च विविधास्तत्र पुष्करिण्यो वनावृताः। तडागानि च रम्याणि बृहन्ति सुबहूनि च।।
- हिन्दी अनुवाद: वहाँ मनमोहक चित्रशालाएँ, सुंदर जल-प्रपात, और उत्तम जल से भरी हुई भाँति-भाँति की वाधियाँ (बावड़ियाँ) थीं। कमल और उत्पल (नीलोत्पल) की सुगंध से सुवासित अत्यंत रमणीय सरोवर थे, जिनमें हंस, कारंडव (मुर्गाबी) और चक्रवाक पक्षी सुशोभित होते थे। वनों से घिरी हुई वे सुंदर पुष्करिणियाँ (तालाब) और बड़े-बड़े रमणीय तड़ाग उस नगर की शोभा बढ़ाते थे।
- व्याख्या: जल संसाधनों, सरोवरों और बाग-बगीचों की बहुलता के कारण यह नगर ग्रीष्म ऋतु में भी शीतल और सुहावना रहता था।
श्लोक 79 से 92 (नगर की समृद्धि, प्रजा का सुख और युधिष्ठिर का शासन)
श्लोक 79, 80, 81 और 82:
नदी च नन्दिनी नाम सा पुरीमुपगूहति। चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णमन्यैः शिल्पिभिरावृतम्।। सर्वदाभिसृतं सद्भिः कारितं विश्वकर्मणा। उपभोगसमृद्धैश्च सर्वद्रव्यसमावृतम्।। नित्यमार्यजनोपेतं नरनारीगणैर्युतम्। वाजिवारणसंपूर्णं गोभिरुष्ट्रैः खरैरजैः।। तत्त्रिविष्टपसङ्काशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत। पुरीं सर्वगुणोपेतां निर्मितां विश्वकर्मणा।।
- हिन्दी अनुवाद: 'नन्दिनी' नाम की नदी उस पूरी (नगर) को चारों ओर से आलिंगन करती हुई (घेरती हुई) बहती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र— इन चारों वर्णों तथा विभिन्न शिल्पियों से वह नगर सुसज्जित था। सज्जनों द्वारा हमेशा सेवित, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, भोग-सामग्री और समस्त द्रव्यों से परिपूर्ण था। वह नगर हमेशा श्रेष्ठ जनों, स्त्री-पुरुषों के समूहों, घोड़ों, हाथियों, गायों, ऊँटो, गधों और बकरियों से भरा रहता था। स्वर्ग (त्रिविष्टप) के समान सुंदर, समस्त गुणों से युक्त विश्वकर्मा द्वारा रचित वह 'इन्द्रप्रस्थ' नगर अत्यंत सुशोभित हुआ।
- व्याख्या: इंद्रप्रस्थ में समाज के हर वर्ग के लोग शांतिपूर्वक रहते थे। नदी, पशुधन और वैभव की परिपूर्णता ने इसे आदर्श जनपद बना दिया था।
नदी च नन्दिनी नाम सा पुरीमुपगूहति। चातुर्वर्ण्यसमाकीर्णमन्यैः शिल्पिभिरावृतम्।। सर्वदाभिसृतं सद्भिः कारितं विश्वकर्मणा। उपभोगसमृद्धैश्च सर्वद्रव्यसमावृतम्।। नित्यमार्यजनोपेतं नरनारीगणैर्युतम्। वाजिवारणसंपूर्णं गोभिरुष्ट्रैः खरैरजैः।। तत्त्रिविष्टपसङ्काशमिन्द्रप्रस्थं व्यरोचत। पुरीं सर्वगुणोपेतां निर्मितां विश्वकर्मणा।।
- हिन्दी अनुवाद: 'नन्दिनी' नाम की नदी उस पूरी (नगर) को चारों ओर से आलिंगन करती हुई (घेरती हुई) बहती थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र— इन चारों वर्णों तथा विभिन्न शिल्पियों से वह नगर सुसज्जित था। सज्जनों द्वारा हमेशा सेवित, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित, भोग-सामग्री और समस्त द्रव्यों से परिपूर्ण था। वह नगर हमेशा श्रेष्ठ जनों, स्त्री-पुरुषों के समूहों, घोड़ों, हाथियों, गायों, ऊँटो, गधों और बकरियों से भरा रहता था। स्वर्ग (त्रिविष्टप) के समान सुंदर, समस्त गुणों से युक्त विश्वकर्मा द्वारा रचित वह 'इन्द्रप्रस्थ' नगर अत्यंत सुशोभित हुआ।
- व्याख्या: इंद्रप्रस्थ में समाज के हर वर्ग के लोग शांतिपूर्वक रहते थे। नदी, पशुधन और वैभव की परिपूर्णता ने इसे आदर्श जनपद बना दिया था।
मुझे क्षमा करें! पिछले उत्तर में श्लोकों की अधिक संख्या और लंबी विषयवस्तु होने के कारण 79 से 92 और अन्य कुछ श्लोकों का विस्तृत पद-दर-पद अनुवाद संक्षिप्त कर दिया गया था, ताकि आपकी स्क्रीन पर उत्तर अत्यधिक बड़ा न हो जाए।
मुझे क्षमा करें! पिछले उत्तर में श्लोकों की अधिक संख्या और लंबी विषयवस्तु होने के कारण 79 से 92 और अन्य कुछ श्लोकों का विस्तृत पद-दर-पद अनुवाद संक्षिप्त कर दिया गया था, ताकि आपकी स्क्रीन पर उत्तर अत्यधिक बड़ा न हो जाए।
श्लोक 83, 84 और 85:
पौरवाणामधिपतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। कृतमङ्गलसत्कारैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।। द्वैपायनं पुरस्कृत्य धौम्यस्याभिमते स्थितः। भ्रातृभिः सहितो राजा राजमार्गमतीत्य च।। औपवाह्यगतो राजा केशवेन सहाभिभूः। तोरणद्वारसुमुखं द्वात्रिंशद्द्वारसंयुतम्।।
- हिन्दी अनुवाद: पौरव वंश के अधिपति कुंतीपुत्र युधिष्ठिर ने वेदपारंगत ब्राह्मणों द्वारा मंगल-सत्कार कराकर, महर्षि व्यास को आगे रखकर तथा पुरोहित धौम्य की अनुमति के अनुसार अपने भाइयों सहित राजमार्ग को पार किया। महानद्युतिमान राजा युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण के साथ सवारी के उत्तम हाथी पर आरूढ़ होकर, तोरण द्वारों से सुसज्जित और बत्तीस (32) द्वारों वाले उस नगर में प्रविष्ट हुए।
- व्याख्या: युधिष्ठिर ने अपने गुरुओं (व्यास और धौम्य) तथा श्रीकृष्ण के साथ इंद्रप्रस्थ के मुख्य भव्य द्वार से नगर में प्रवेश किया।
पौरवाणामधिपतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। कृतमङ्गलसत्कारैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।। द्वैपायनं पुरस्कृत्य धौम्यस्याभिमते स्थितः। भ्रातृभिः सहितो राजा राजमार्गमतीत्य च।। औपवाह्यगतो राजा केशवेन सहाभिभूः। तोरणद्वारसुमुखं द्वात्रिंशद्द्वारसंयुतम्।।
- हिन्दी अनुवाद: पौरव वंश के अधिपति कुंतीपुत्र युधिष्ठिर ने वेदपारंगत ब्राह्मणों द्वारा मंगल-सत्कार कराकर, महर्षि व्यास को आगे रखकर तथा पुरोहित धौम्य की अनुमति के अनुसार अपने भाइयों सहित राजमार्ग को पार किया। महानद्युतिमान राजा युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण के साथ सवारी के उत्तम हाथी पर आरूढ़ होकर, तोरण द्वारों से सुसज्जित और बत्तीस (32) द्वारों वाले उस नगर में प्रविष्ट हुए।
- व्याख्या: युधिष्ठिर ने अपने गुरुओं (व्यास और धौम्य) तथा श्रीकृष्ण के साथ इंद्रप्रस्थ के मुख्य भव्य द्वार से नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 86, 87, 88 और 89:
वर्धमानपुरद्वारात्प्रविवेश महाद्युतिः। शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषाः श्रूयन्ते बहवो भृशम्।। जयेति द्विजवाक्षरः श्रूयन्ते च सहस्रशः। संस्तूयमानो मुनिभिः सूतमागधबन्दिभिः।। औपवाह्यगतो राजा राजमार्गमतीत्य च। कृतमङ्गलसत्कारं प्रविवेश गृहोत्तमम्।। प्रविश्य भवनं राजा नागरैरभिसंवृतः। प्रहृष्टमुदितैरासीत्सत्कारैरभिपूजितः।।
- हिन्दी अनुवाद: 'वर्धमानपुर' द्वार से महाद्युतिमान राजा ने प्रवेश किया। उस समय वहाँ शंख और दुंदुभि (नगाड़ों) की बहुत सी ध्वनियाँ गूँज रही थीं। हजारों ब्राह्मणों द्वारा 'जय हो' ऐसे वचन कहे जा रहे थे तथा मुनियों, सूत, मागध और वंदिजनों द्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी। हाथी पर सवार राजा राजमार्ग को पार करके मंगल-सत्कार से युक्त अपने उत्तम भवन में प्रविष्ट हुए। नागरिकों से घिरे हुए, प्रहर्षित और आनंदित राजा ने उस भवन में प्रवेश कर सबका सत्कार स्वीकार किया।
- व्याख्या: नगर प्रवेश के समय पूरे इंद्रप्रस्थ में उत्सव का माहौल था। जनता और वंदिगण राजा युधिष्ठिर की जय-जयकार कर रहे थे।
वर्धमानपुरद्वारात्प्रविवेश महाद्युतिः। शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषाः श्रूयन्ते बहवो भृशम्।। जयेति द्विजवाक्षरः श्रूयन्ते च सहस्रशः। संस्तूयमानो मुनिभिः सूतमागधबन्दिभिः।। औपवाह्यगतो राजा राजमार्गमतीत्य च। कृतमङ्गलसत्कारं प्रविवेश गृहोत्तमम्।। प्रविश्य भवनं राजा नागरैरभिसंवृतः। प्रहृष्टमुदितैरासीत्सत्कारैरभिपूजितः।।
- हिन्दी अनुवाद: 'वर्धमानपुर' द्वार से महाद्युतिमान राजा ने प्रवेश किया। उस समय वहाँ शंख और दुंदुभि (नगाड़ों) की बहुत सी ध्वनियाँ गूँज रही थीं। हजारों ब्राह्मणों द्वारा 'जय हो' ऐसे वचन कहे जा रहे थे तथा मुनियों, सूत, मागध और वंदिजनों द्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी। हाथी पर सवार राजा राजमार्ग को पार करके मंगल-सत्कार से युक्त अपने उत्तम भवन में प्रविष्ट हुए। नागरिकों से घिरे हुए, प्रहर्षित और आनंदित राजा ने उस भवन में प्रवेश कर सबका सत्कार स्वीकार किया।
- व्याख्या: नगर प्रवेश के समय पूरे इंद्रप्रस्थ में उत्सव का माहौल था। जनता और वंदिगण राजा युधिष्ठिर की जय-जयकार कर रहे थे।
श्लोक 90 और 91:
पूजयामास विप्रेन्द्रान्केशवेन महात्मना। ततस्तु राष्ट्रं नगरं नरनारीगणायुतम्।। गोधनैश्च समाकीर्णं सस्यैर्वृद्धिं तदागमत्।।
- व्याख्या/अनुवाद: राजा युधिष्ठिर ने महात्मा केशव (श्रीकृष्ण) के साथ मिलकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन किया। तत्पश्चात वह राष्ट्र और नगर स्त्री-पुरुषों के समूहों से तथा गोधन और प्रचुर फसलों (सस्यों) से समृद्ध हो गया और उसमें भारी वृद्धि हुई।
- व्याख्या: युधिष्ठिर ने राजा बनते ही सबसे पहले ब्राह्मणों और देवताओं का पूजन किया, जिससे इंद्रप्रस्थ का राष्ट्र धन-धान्य और अन्न से संपन्न हो गया।
महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 227वें अध्याय के श्लोक 92 से 109 (अंतिम श्लोक) तक के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इन श्लोकों में पांडवों के इंद्रप्रस्थ में स्थायी निवास, श्रीकृष्ण और व्यासजी की विदाई, तथा माता कुंती और श्रीकृष्ण के बीच हुए भावुक एवं मर्मस्पर्शी संवाद का वर्णन है।
पूजयामास विप्रेन्द्रान्केशवेन महात्मना। ततस्तु राष्ट्रं नगरं नरनारीगणायुतम्।। गोधनैश्च समाकीर्णं सस्यैर्वृद्धिं तदागमत्।।
- व्याख्या/अनुवाद: राजा युधिष्ठिर ने महात्मा केशव (श्रीकृष्ण) के साथ मिलकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन किया। तत्पश्चात वह राष्ट्र और नगर स्त्री-पुरुषों के समूहों से तथा गोधन और प्रचुर फसलों (सस्यों) से समृद्ध हो गया और उसमें भारी वृद्धि हुई।
- व्याख्या: युधिष्ठिर ने राजा बनते ही सबसे पहले ब्राह्मणों और देवताओं का पूजन किया, जिससे इंद्रप्रस्थ का राष्ट्र धन-धान्य और अन्न से संपन्न हो गया।
महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व के 227वें अध्याय के श्लोक 92 से 109 (अंतिम श्लोक) तक के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इन श्लोकों में पांडवों के इंद्रप्रस्थ में स्थायी निवास, श्रीकृष्ण और व्यासजी की विदाई, तथा माता कुंती और श्रीकृष्ण के बीच हुए भावुक एवं मर्मस्पर्शी संवाद का वर्णन है।
श्लोक 92 से 99 (इंद्रप्रस्थ में पांडवों का निवास और श्रीकृष्ण की विदाई)
श्लोक 92 और 93:
तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशतां महत्। पाण्डवानां महाराज शश्वत्प्रीतिरवर्धत।। `सौबलेन च कर्णेन धार्तराष्ट्रैः कृपेण च।' तथा भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयिना सदा।।
- हिन्दी अनुवाद: हे महाराज! पवित्र जनों से युक्त उस विशाल राष्ट्र में प्रवेश करने वाले उन पांडवों की प्रीति (आनंद और प्रेम) निरंतर बढ़ने लगी। शकुनि, कर्ण, धार्तराष्ट्र (दुर्योधन आदि), कृपाचार्य, तथा सदा धर्मप्रेमी राजा भीष्म— इन सबकी उपस्थिति (सद्भावना या संबंध) के बीच वे पांडव खांडवप्रस्थ (इंद्रप्रस्थ) में निवास करने वाले हुए।
- व्याख्या: पांडवों ने इंद्रप्रस्थ को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया और वे वहीं स्थायी रूप से बस गए, जहाँ हस्तिनापुर के बड़ों और शिष्टों के संबंध भी उनके साथ बने रहे।
तेषां पुण्यजनोपेतं राष्ट्रमाविशतां महत्। पाण्डवानां महाराज शश्वत्प्रीतिरवर्धत।। `सौबलेन च कर्णेन धार्तराष्ट्रैः कृपेण च।' तथा भीष्मेण राज्ञा च धर्मप्रणयिना सदा।।
- हिन्दी अनुवाद: हे महाराज! पवित्र जनों से युक्त उस विशाल राष्ट्र में प्रवेश करने वाले उन पांडवों की प्रीति (आनंद और प्रेम) निरंतर बढ़ने लगी। शकुनि, कर्ण, धार्तराष्ट्र (दुर्योधन आदि), कृपाचार्य, तथा सदा धर्मप्रेमी राजा भीष्म— इन सबकी उपस्थिति (सद्भावना या संबंध) के बीच वे पांडव खांडवप्रस्थ (इंद्रप्रस्थ) में निवास करने वाले हुए।
- व्याख्या: पांडवों ने इंद्रप्रस्थ को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया और वे वहीं स्थायी रूप से बस गए, जहाँ हस्तिनापुर के बड़ों और शिष्टों के संबंध भी उनके साथ बने रहे।
श्लोक 94, 95 और 96:
पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः। पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समावृतम्।। शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा। `ततस्तु विश्वकर्माणं पूजयित्वा विसृज्य च।। द्वैपायनं च संपूज्य विसृज्य च नराधिपः। वार्ष्णेयमब्रवीद्राजा गन्तुकामं कृतक्षणम्।।
- हिन्दी अनुवाद: वे पाँचों महान धनुर्धर, इंद्र के समान तेजस्वी पांडव खांडवप्रस्थ के निवासी बन गए। नागों की 'भोगवती' नगरी की भाँति वह श्रेष्ठपुर उन पाँचों वीरों से सुशोभित हुआ। तदंतर नराधिप युधिष्ठिर ने विश्वकर्मा का पूजन करके उन्हें विदा किया, तथा महर्षि द्वैपायन व्यासजी का भी पूजन कर उन्हें विसर्जन (विदाई) दिया। इसके पश्चात जाने के लिए तत्पर हुए वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण) से राजा युधिष्ठिर ने यह बात कही—
- व्याख्या: युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ को बसाने वाले विश्वकर्मा और वेद व्यासजी का यथोचित सम्मान कर उन्हें विदा किया और द्वारका लौटने की इच्छा जता रहे श्रीकृष्ण से संवाद प्रारंभ किया।
पाण्डवाः समपद्यन्त खाण्डवप्रस्थवासिनः। पञ्चभिस्तैर्महेष्वासैरिन्द्रकल्पैः समावृतम्।। शुशुभे तत्पुरश्रेष्ठं नागैर्भोगवती यथा। `ततस्तु विश्वकर्माणं पूजयित्वा विसृज्य च।। द्वैपायनं च संपूज्य विसृज्य च नराधिपः। वार्ष्णेयमब्रवीद्राजा गन्तुकामं कृतक्षणम्।।
- हिन्दी अनुवाद: वे पाँचों महान धनुर्धर, इंद्र के समान तेजस्वी पांडव खांडवप्रस्थ के निवासी बन गए। नागों की 'भोगवती' नगरी की भाँति वह श्रेष्ठपुर उन पाँचों वीरों से सुशोभित हुआ। तदंतर नराधिप युधिष्ठिर ने विश्वकर्मा का पूजन करके उन्हें विदा किया, तथा महर्षि द्वैपायन व्यासजी का भी पूजन कर उन्हें विसर्जन (विदाई) दिया। इसके पश्चात जाने के लिए तत्पर हुए वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण) से राजा युधिष्ठिर ने यह बात कही—
- व्याख्या: युधिष्ठिर ने इंद्रप्रस्थ को बसाने वाले विश्वकर्मा और वेद व्यासजी का यथोचित सम्मान कर उन्हें विदा किया और द्वारका लौटने की इच्छा जता रहे श्रीकृष्ण से संवाद प्रारंभ किया।
श्लोक 97, 98 और 99:
तव प्रसादाद्वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयाऽनघ। प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम्।। तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च भवामहे। गतिस्त्वमापत्कालेऽपि पाण्डवानां च माधव।। ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान्हि नः। यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयाऽनघ।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे अनघ वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण)! आपकी ही कृपा से मैंने यह राज्य प्राप्त किया है। हे वीर! आपकी ही कृपा से यह शून्य और सुदुर्गम राष्ट्र हमें मिला है। हे माधव! केवल आपकी ही कृपा से हम सब राज्य पर प्रतिष्ठित हुए हैं और आप ही आपदाकाल में भी पांडवों की परम गति (सहारा) हैं। अब आप ही हमारे उचित कर्तव्य को जानकर हमें निर्देश दीजिए। हे अनघ! पांडवों के लिए जो भी अभीष्ट (प्रिय/कल्याणकारी) हो, उसे आप ही अनुमोदित कीजिए।"
- व्याख्या: युधिष्ठिर अपनी सफलता का पूरा श्रेय श्रीकृष्ण को देते हैं और उन्हें अपना सर्वोच्च मार्गदर्शक एवं रक्षक मानते हुए आगे का मार्गदर्शन माँगते हैं।
तव प्रसादाद्वार्ष्णेय राज्यं प्राप्तं मयाऽनघ। प्रसादादेव ते वीर शून्यं राष्ट्रं सुदुर्गमम्।। तवैव तु प्रसादेन राज्यस्थाश्च भवामहे। गतिस्त्वमापत्कालेऽपि पाण्डवानां च माधव।। ज्ञात्वा तु कृत्यं कर्तव्यं कारयस्व भवान्हि नः। यदिष्टमनुमन्तव्यं पाण्डवानां त्वयाऽनघ।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे अनघ वार्ष्णेय (श्रीकृष्ण)! आपकी ही कृपा से मैंने यह राज्य प्राप्त किया है। हे वीर! आपकी ही कृपा से यह शून्य और सुदुर्गम राष्ट्र हमें मिला है। हे माधव! केवल आपकी ही कृपा से हम सब राज्य पर प्रतिष्ठित हुए हैं और आप ही आपदाकाल में भी पांडवों की परम गति (सहारा) हैं। अब आप ही हमारे उचित कर्तव्य को जानकर हमें निर्देश दीजिए। हे अनघ! पांडवों के लिए जो भी अभीष्ट (प्रिय/कल्याणकारी) हो, उसे आप ही अनुमोदित कीजिए।"
- व्याख्या: युधिष्ठिर अपनी सफलता का पूरा श्रेय श्रीकृष्ण को देते हैं और उन्हें अपना सर्वोच्च मार्गदर्शक एवं रक्षक मानते हुए आगे का मार्गदर्शन माँगते हैं।
श्लोक 100 से 103 (श्रीकृष्ण का उपदेश और माता कुंती की वंदना)
श्लोक 100, 101, 102 और 103:
श्रीवासुदेव उवाच। त्वत्प्रभावान्महाराज्यं संप्राप्तं हि स्वधर्मतः। पितृपैतामहं राज्यं कथं न स्यात्तव प्रभो।। धार्तराष्ट्रा दुराचाराः किं करिष्यन्ति पाण्डवान्। यथेष्टं पालय जगच्छश्वद्धर्मधुरं वह।। पुनः पुनश्च संहर्षाद्ब्राह्मणान्भर पौरव। अद्यैव नारदः श्रीमानागमिष्यति सत्वरः।। आदत्स्व तस्य वाक्यानि शासनं कुरु तस्य वै। एवमुक्त्वा ततः कुन्तीमभिवाद्य जनार्दनः।।
- हिन्दी अनुवाद: श्रीवासुदेव ने कहा— "हे प्रभो! आपने अपने ही प्रभाव और स्वधर्म से यह महाराज्य प्राप्त किया है। फिर यह आपके पिता-पदादा का राज्य है, वह आपको क्यों न मिलता? वे दुराचारी धार्तराष्ट्र पांडवों का क्या बिगाड़ सकते हैं? आप यथेष्ट रूप से इस जगत का पालन करें और हमेशा धर्म की धुरी को वहन करते रहें। हे पौरव! आप बार-बार प्रसन्नचित्त होकर ब्राह्मणों का भरण-पोषण (सत्कार) करें। आज ही श्रीमान नारद मुनि यहाँ बहुत शीघ्र आने वाले हैं। आप उनके वचनों को ग्रहण करना और उनके शासन का पालन करना।" ऐसा कहकर जनार्दन (श्रीकृष्ण) ने माता कुंती को प्रणाम किया।
- व्याख्या: श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को आश्वस्त करते हैं कि वे धर्म के मार्ग पर चलते हुए निडर होकर राज्य करें। कौरव उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। साथ ही, वे देवर्षि नारद के आगमन की सूचना देकर उनके वचनों का पालन करने का निर्देश देते हैं।
श्रीवासुदेव उवाच। त्वत्प्रभावान्महाराज्यं संप्राप्तं हि स्वधर्मतः। पितृपैतामहं राज्यं कथं न स्यात्तव प्रभो।। धार्तराष्ट्रा दुराचाराः किं करिष्यन्ति पाण्डवान्। यथेष्टं पालय जगच्छश्वद्धर्मधुरं वह।। पुनः पुनश्च संहर्षाद्ब्राह्मणान्भर पौरव। अद्यैव नारदः श्रीमानागमिष्यति सत्वरः।। आदत्स्व तस्य वाक्यानि शासनं कुरु तस्य वै। एवमुक्त्वा ततः कुन्तीमभिवाद्य जनार्दनः।।
- हिन्दी अनुवाद: श्रीवासुदेव ने कहा— "हे प्रभो! आपने अपने ही प्रभाव और स्वधर्म से यह महाराज्य प्राप्त किया है। फिर यह आपके पिता-पदादा का राज्य है, वह आपको क्यों न मिलता? वे दुराचारी धार्तराष्ट्र पांडवों का क्या बिगाड़ सकते हैं? आप यथेष्ट रूप से इस जगत का पालन करें और हमेशा धर्म की धुरी को वहन करते रहें। हे पौरव! आप बार-बार प्रसन्नचित्त होकर ब्राह्मणों का भरण-पोषण (सत्कार) करें। आज ही श्रीमान नारद मुनि यहाँ बहुत शीघ्र आने वाले हैं। आप उनके वचनों को ग्रहण करना और उनके शासन का पालन करना।" ऐसा कहकर जनार्दन (श्रीकृष्ण) ने माता कुंती को प्रणाम किया।
- व्याख्या: श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को आश्वस्त करते हैं कि वे धर्म के मार्ग पर चलते हुए निडर होकर राज्य करें। कौरव उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। साथ ही, वे देवर्षि नारद के आगमन की सूचना देकर उनके वचनों का पालन करने का निर्देश देते हैं।
श्लोक 104 से 109 (माता कुंती का भावुक विलाप/संवाद और श्रीकृष्ण की द्वारका वापसी)
श्लोक 104, 105 और 106:
उवाच श्लक्ष्णया वाचा गमिष्यामि नमोस्तु ते। कुन्त्युवाच। जातुषं गृहमासाद्य मया प्राप्तं यदानघ।। आर्येण समभिज्ञातं त्वया वै यदुपुङ्गव। त्वया नाथेन गोविन्द दुःखं तीर्णं महत्तरम्।। त्वं हि नाथस्त्वनाथानां दरिद्राणां विशेषतः। सर्वदुःखानि शाम्यन्ति तव संदर्शनान्मम।।
- हिन्दी अनुवाद: श्रीकृष्ण ने अत्यंत कोमल (श्लक्ष्ण) वाणी में कहा— "अब मैं प्रस्थान करूँगा, आपको नमस्कार है।" कुंती ने कहा— "हे अनघ यदुपुंगव गोविन्द! जब हम लाक्षागृह (जातुष गृह) के षड्यंत्र में फँसे थे, तब आपके द्वारा भेजे गए आर्य (विदुर) ने ही हमें पहचाना था और हमारी रक्षा की थी। आपके रूप में नाथ (रक्षक) मिल जाने के कारण ही हमने इस महान दुःख को पार किया है। आप सचमुच अनाथों और विशेषकर दरिद्रों के नाथ हैं! आपके दर्शन मात्र से मेरे सारे दुःख शांत हो जाते हैं।"
- व्याख्या: माता कुंती श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अगाध भक्ति और कृतज्ञता प्रकट करती हैं। वे याद करती हैं कि कैसे संकट के हर मोड़ पर श्रीकृष्ण ने परोक्ष रूप से उनकी रक्षा की थी।
उवाच श्लक्ष्णया वाचा गमिष्यामि नमोस्तु ते। कुन्त्युवाच। जातुषं गृहमासाद्य मया प्राप्तं यदानघ।। आर्येण समभिज्ञातं त्वया वै यदुपुङ्गव। त्वया नाथेन गोविन्द दुःखं तीर्णं महत्तरम्।। त्वं हि नाथस्त्वनाथानां दरिद्राणां विशेषतः। सर्वदुःखानि शाम्यन्ति तव संदर्शनान्मम।।
- हिन्दी अनुवाद: श्रीकृष्ण ने अत्यंत कोमल (श्लक्ष्ण) वाणी में कहा— "अब मैं प्रस्थान करूँगा, आपको नमस्कार है।" कुंती ने कहा— "हे अनघ यदुपुंगव गोविन्द! जब हम लाक्षागृह (जातुष गृह) के षड्यंत्र में फँसे थे, तब आपके द्वारा भेजे गए आर्य (विदुर) ने ही हमें पहचाना था और हमारी रक्षा की थी। आपके रूप में नाथ (रक्षक) मिल जाने के कारण ही हमने इस महान दुःख को पार किया है। आप सचमुच अनाथों और विशेषकर दरिद्रों के नाथ हैं! आपके दर्शन मात्र से मेरे सारे दुःख शांत हो जाते हैं।"
- व्याख्या: माता कुंती श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अगाध भक्ति और कृतज्ञता प्रकट करती हैं। वे याद करती हैं कि कैसे संकट के हर मोड़ पर श्रीकृष्ण ने परोक्ष रूप से उनकी रक्षा की थी।
श्लोक 107, 108 और 109:
स्मरस्वैनान्महाप्राज्ञ तेन जीवन्ति पाण्डवाः।। वैशंपायन उवाच। करिष्यामीति चामन्त्र्य अभिवाद्य पितृष्वसाम्। गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः सहानुगः।। तन्निवेश्य ततो वीरः सह रामेण कौरवान्। ययौ द्वारवतीं राजन्पाण्डवानुमते तदा।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे महाप्राज्ञ! इन पांडवों को हमेशा स्मरण रखिएगा, इसी से ये पांडव जीवित रह सकेंगे।" वैशंपायन जी कहते हैं— "ऐसा ही करूँगा" यह कहकर, अपनी फूफी (कुंती) का अभिवादन करके वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने अपने अनुगामी जनों के साथ प्रस्थान करने का मन बनाया। तब वीर वासुदेव ने उन पांडवों को उस नगर में भली-भांति बसाकर तथा बलरामजी (राम) के साथ कौरवों से अनुमति लेकर, हे राजन्! पांडवों की अनुमति से अपनी राजधानी द्वारवती (द्वारका) के लिए प्रस्थान कर दिया।
- व्याख्या: कुंती के अंतिम भावुक अनुरोध को श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं और पांडवों को इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर सुसज्जित कर, बलरामजी के साथ अपनी नगरी द्वारका के लिए लौट जाते हैं।
इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 'विदुरागमनराज्यलाभपर्व' (अध्याय 214 से 227) का यह संपूर्ण प्रसंग और 227वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
स्मरस्वैनान्महाप्राज्ञ तेन जीवन्ति पाण्डवाः।। वैशंपायन उवाच। करिष्यामीति चामन्त्र्य अभिवाद्य पितृष्वसाम्। गमनाय मतिं चक्रे वासुदेवः सहानुगः।। तन्निवेश्य ततो वीरः सह रामेण कौरवान्। ययौ द्वारवतीं राजन्पाण्डवानुमते तदा।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे महाप्राज्ञ! इन पांडवों को हमेशा स्मरण रखिएगा, इसी से ये पांडव जीवित रह सकेंगे।" वैशंपायन जी कहते हैं— "ऐसा ही करूँगा" यह कहकर, अपनी फूफी (कुंती) का अभिवादन करके वासुदेव (श्रीकृष्ण) ने अपने अनुगामी जनों के साथ प्रस्थान करने का मन बनाया। तब वीर वासुदेव ने उन पांडवों को उस नगर में भली-भांति बसाकर तथा बलरामजी (राम) के साथ कौरवों से अनुमति लेकर, हे राजन्! पांडवों की अनुमति से अपनी राजधानी द्वारवती (द्वारका) के लिए प्रस्थान कर दिया।
- व्याख्या: कुंती के अंतिम भावुक अनुरोध को श्रीकृष्ण स्वीकार करते हैं और पांडवों को इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर सुसज्जित कर, बलरामजी के साथ अपनी नगरी द्वारका के लिए लौट जाते हैं।
इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 'विदुरागमनराज्यलाभपर्व' (अध्याय 214 से 227) का यह संपूर्ण प्रसंग और 227वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
इसी के साथ महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत विदुरागमनराज्यलाभपर्व का यह 227वाँ अध्याय तथा 'विदुरागमनराज्यलाभपर्व' संपूर्ण रूप से पूर्ण होता है।
