महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत सभामार्गप्रदानपर्व (या आद्य प्रकरण) के 228वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय से आदिपर्व का समापन चरण प्रारंभ होता है, जिसमें जनमेजय के प्रश्न पर वैशंपायन ऋषि इंद्रप्रस्थ में पांडवों के जीवन, देवर्षि नारद के आगमन तथा नारद द्वारा सुंद-उपसुंद की कथा के माध्यम से पांडवों को एक नीति-निर्देश देने का प्रसंग सुनाते हैं।
श्लोक 1 से 4 (राजा जनमेजय के प्रश्न)
श्लोक 1, 2, 3 और 4:
जनमेजय उवाच। एवं संप्राप्य राज्यं तदिन्द्रप्रस्थे तपोधन। अत ऊर्ध्वं नरव्याघ्राः किमकुर्वत पाण्डवाः।। सर्व एव महात्मानः सर्वे मम पितामहाः। द्रौपदी धर्मपत्नी च कथं तानन्ववर्तत।। कथमासुश्च कृष्णायामेकस्यां ते नरर्षभाः।वर्तमाना महाभागा नाभिद्यन्त परस्परम्।। श्रोतुमिच्छाम्यहं तत्र विस्तरेण यथातथम्। तेषां चेष्टितमन्योन्यं युक्तानां कृष्णया सह।।
- हिन्दी अनुवाद: राजा जनमेजय ने कहा— "हे तपोधन! इंद्रप्रस्थ में इस प्रकार राज्य प्राप्त करके वे नरव्याघ्र पांडव इसके आगे क्या करते रहे? वे सभी महात्मान मेरे पितामह हैं और उनकी धर्मपत्नी द्रौपदी उन सबके साथ किस प्रकार बर्ताव करती थीं? वे सभी महाभाग नरर्षभ एक ही कृष्णा (द्रौपदी) के साथ रहते हुए भी आपस में कभी विभाजित (उनमें फूट) क्यों नहीं हुए? द्रौपदी के साथ रहकर उन सबका पारस्परिक आचरण कैसा था? मैं यह सब विस्तार से और ज्यों-का-त्यों सुनना चाहता हूँ।"
- व्याख्या: राजा जनमेजय वैशंपायन ऋषि से यह जानना चाहते हैं कि इंद्रप्रस्थ में बसने के बाद पाँचों पांडवों और द्रौपदी का पारिवारिक जीवन कैसा था और एक ही पत्नी होने के बावजूद उनके बीच कभी मनमुटाव या मतभेद क्यों नहीं हुआ।
श्लोक 5 से 8 (इंद्रप्रस्थ में पांडवों का राज्य-संचालन और सुखमय जीवन)
श्लोक 5, 6, 7 और 8:
वैशंपायन उवाच। धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञाता इन्द्रप्रस्थं प्रविश्य तत्। रेमिरे पुरुषव्याघ्राः कृष्णया सह पाण्डवाः।। प्राप्य राज्यं महातेजाः सत्यसन्धो युधिष्ठिरः।पालयामास धर्मेण पृथिवीं भ्रातृभिः सह।। जितारयो महात्मानः सत्यधर्मपरायणाः। एवं पुरमिदं प्राप्य तत्रोषुः पाण्डुनन्दनाः।। कुर्वाणाः पौरकार्याणि सर्वाणि भरतर्षभाः। आसांचक्रुर्महार्हेषु पार्थिवेष्वासनेषु च।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— धृतराष्ट्र द्वारा अनुज्ञा (आज्ञा) प्राप्त कर इंद्रप्रस्थ में प्रवेश करके वे पुरुषव्याघ्र पांडव कृष्णा (द्रौपदी) के साथ आनंदपूर्वक रहने लगे। महातेजस्वी और सत्यसंधी राजा युधिष्ठिर ने राज्य प्राप्त करके अपने भाइयों के साथ धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन किया। शत्रुओं को जीतने वाले, महात्मान और सत्य-धर्म के परायण वे पाण्डुनंदन उस नगर को पाकर वहीं निवास करने लगे। हे भरतर्षभ! प्रजा के सभी कार्यों को करते हुए वे सभी पांडव उत्तम और बहुमूल्य राजासनों पर विराजमान हुए।
- व्याख्या: पांडवों ने इंद्रप्रस्थ को अपनी राजधानी बनाकर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन किया और सभी भाई द्रौपदी के साथ अत्यंत प्रेम और समन्वय से जीवन व्यतीत करने लगे।
श्लोक 9 से 37 (देवर्षि नारद का इंद्रप्रस्थ आगमन और उनका दिव्य स्वरूप)
श्लोक 9, 10, 11, 12, 13, 14, 15, 16 और 17:
तेषु तत्रोपविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु। आययौ धर्मराजं तु द्रष्टुकामोऽथ नारदः।। पथा नक्षत्रजुष्टेन सुपर्णाचरितेन च। चन्द्रसूर्यप्रकाशेन सेवितेन महर्षिभिः।। नभस्स्थलेन दिव्येन दुर्लभेनातपस्विनामूथार्चितो भूतधरां राष्ट्रमन्दिरभूषिताम्।। अवेक्षमाणो द्युतिमानाजगाम महातपाः। सर्ववेदान्तगो विप्रः सर्ववेदाङ्गपारगः।। परेण तपसा युक्तो ब्राह्मेण तपसा वृतः। नये नीतौ च निस्तो विश्रुतश्च महामुनिः।। परात्परतरं प्राप्तो धर्मान्समभिजग्मिवान्। भावितात्मा गतरजाः शान्तो मृदुर्ऋजुर्दिबजः।। धर्मेणाधिगतः सर्वैर्देवदानवमानुषैः। क्षीणकर्मसु पापेषु भूतेषु विविधेषु च।। सर्वथा कृतमर्यादो वेदेषु विविधेषु च। शतशः सोमपा यज्ञे पुण्येषु पुण्यकृदग्निचित्।। ऋक्सामयजुषां वेत्ता न्यायदृग्धर्मकोविदः। ऋजुरारोहबान्बुद्धो भूयिष्ठपथिकोऽनघः।।
- हिन्दी अनुवाद: जब वे महात्मना पांडव वहाँ (अपने सिंहासन पर) बैठे हुए थे, तब धर्मराज युधिष्ठिर से मिलने की इच्छा से देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। नक्षत्रों से सुजुष्ट, गरुड़ (सुपर्ण) द्वारा सेवित, चंद्रमा और सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित, महर्षियों द्वारा सेवित तथा तपस्वियों के लिए भी दुर्लभ ऐसे दिव्य आकाश-मार्ग से वे महातपस्वी द्युतिमान नारद जी आए। वे समस्त वेदान्त के ज्ञाता, सभी वेदों और अंगों के पारगामी, श्रेष्ठ तपस्या से युक्त, नीति में निपुण, लोकविख्यात महामुनि थे। वे परमात्मा को प्राप्त करने वाले, धर्म को जानने वाले, शांत, कोमल स्वभाव वाले, सरल और दिव्य जन्म वाले थे। देवता, दानव और मनुष्य सभी उनके धर्म की सराहना करते थे। वे वेदों के मर्मज्ञ, सैकड़ों यज्ञ करने वाले, अग्निचयन करने वाले, ऋक्, साम और यजुर्वेद के ज्ञाता तथा न्यायशास्त्र व धर्म के मर्मज्ञ थे।
- व्याख्या: इन श्लोकों में देवर्षि नारद के अलौकिक आगमन और उनके महान ब्रह्मतेज, वेदज्ञान तथा तपस्या का विस्तृत वर्णन किया गया है।
श्लोक 18 से 37 (न नारद जी का आभूषण, तेज और पांडवों द्वारा उनका सत्कार):
- संक्षिप्त भाव: नारद जी दिव्य वस्त्र, प्रदीप्त कुंडल और श्वेत छत्र धारण किए हुए थे। वे बृहस्पति के समान तेजस्वी लग रहे थे। उन्हें आया देख राजा युधिष्ठिर तुरंत अपने स्थान से उठे, उनका अभिनंदन किया, उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें कृष्णाजी (मृगचर्मासन) से युक्त एक सुंदर आसन पर बैठाया। युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक उनका अर्ध्य से स्वागत किया और अपने राज्य को उनके चरणों में समर्पित कर दिया। नारद जी ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
श्लोक 38 से 45 (द्रौपदी का आगमन और नारद जी का आदेश)
श्लोक 38, 39, 40, 41, 42, 43, 44 और 45:
आसनं रुचिरं तस्मै प्रददौ स युधिष्ठिरः। कृष्णाजिनोत्तरे तस्मिन्नुपविष्टो महानृषिः।। देवर्षेरुपविष्टस्य स्वयमर्ध्यं यथाविधि। प्रादाद्युधिष्ठिरो धीमान्राज्यं तस्मै न्यवेदयत्। प्रतिगृह्य तां पूजामृषिः प्रीतमनास्तदा।। आशीर्भिर्वर्धयित्वा च तमुवाचास्यतामिति। निषसादाभ्यनुज्ञातस्ततो राजा युधिष्ठिरः।। प्रेषयामास कृष्णायै भगवन्तमुपस्थितम्। श्रुत्वैतद्द्रौपदी चापि शुचिर्भूत्वा समाहिता।। जगाम तत्र यत्रास्ते नारदः पाण्डवैः सह। तस्याभिवाद्य चरणौ देवर्षेर्धर्मचारिणी।। कृताञ्जलिः सुसंवीता स्थिताऽथ द्रुपदात्मजा। तस्याश्चापि स धर्मात्मा सत्यवागृषिसत्तमः।। आशिषो विविधाः प्रोच्य राजपुत्र्यास्तु नारदः। गम्यतामिति होवाच भगवांस्तामनिन्दिताम्।। गतायामथ कृष्णायां युधिष्ठिरपुरोगमान्। विविक्ते पाण्डवान्सर्वानुवाच भगवानृषिः।।
- हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर द्वारा दिए गए रुचिकर आसन पर महान ऋषि नारद बैठ गए। धीमन् युधिष्ठिर ने स्वयं विधिपूर्वक उनका अर्ध्य-स्वागत किया और राज्य उन्हेंनिवेदित किया। उस पूजा को ग्रहण कर प्रीतमना ऋषि ने आशीर्वाद दिया और बैठने को कहा। तब राजा युधिष्ठिर उनकी आज्ञा से बैठ गए। युधिष्ठिर ने भगवान नारद के आने का समाचार कृष्णा (द्रौपदी) के पास भिजवाया। यह सुनकर पवित्र और समाहित चित्त हुई द्रौपदी भी वहाँ चली गईं, जहाँ पांडवों के साथ नारद जी बैठे थे। धर्मचारिणी द्रुपदपुत्री ने देवर्षि के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर तथा वस्त्रों से सुसंयमित होकर खड़ी हो गईं। धर्मात्मा, सत्यवादी और ऋषिश्रेष्ठ नारद जी ने उस अनिंदिता राजपुत्री को विविध आशीर्वाद दिए और कहा— "अब तुम जाओ।" कृष्णा के चले जाने पर भगवान ऋषि नारद ने युधिष्ठिर आदि सभी पांडवों से एकांत में यह (महत्वपूर्ण) बात कही।
- व्याख्या: द्रौपदी नारद जी को प्रणाम करने आती हैं। उनके जाने के बाद नारद जी एकांत में पांडवों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यावहारिक नीति की बात समझाना चाहते हैं, जिससे उनके बीच भविष्य में कोई मतभेद न हो।
श्लोक 46 से 49 (न नारद जी द्वारा पांडवों को चेतावनी और नीति-उपदेश)
श्लोक 46, 47, 48 और 49:
पाञ्चाली भवतामेका धर्मपत्नी यशस्विनी। यथा वो नात्र भेदः स्यात्तथा नीतिर्विधीयतां।। सुन्दोपसुन्दौ हि पुरा भ्रातरौ सहितावुभौ। आस्तामवध्यावन्येषां त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ।। एकराज्यावेकगृहावेकशय्यासनाशनौ। तिलोत्तमायास्तौ हेतोरन्योन्यमभिजघ्नतुः।। रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीतिभावकम्। यथा वो नात्र भेदः स्यात्कुरुष्व युधिष्ठिर।।
- निकृष्ट अनुवाद: "यशस्विनी पाञ्चाली तुम सबकी एक ही धर्मपत्नी है। अतः ऐसा प्रबंध (नीति) किया जाए जिससे तुम लोगों में आपस में कभी कोई भेद (फूट) न पड़े। प्राचीनकाल में सुंद और उपसुंद नाम के दो भाई थे, जो एक साथ रहते थे, तीनों लोकों में विश्रुत (प्रसिद्ध) थे और जिन्हें अन्य कोई मार नहीं सकता था। उनका एक ही राज्य था, एक ही घर था, और वे एक ही साथ शयन, आसन तथा भोजन करते थे— किंतु तिलोत्तमा नामक अप्सरा के कारण उन दोनों ने आपस में ही एक-दूसरे का वध कर लिया था। इसलिए हे युधिष्ठिर! तुम ऐसा उपाय करो जिससे तुम भाइयों का यह सौहार्द और पारस्परिक प्रेम बना रहे और तुममें कभी कोई भेद उत्पन्न न हो।"
- व्याख्या: देवर्षि नारद युधिष्ठिर और पांडवों को सचेत करते हैं कि एक ही पत्नी (द्रौपदी) होने के कारण भविष्य में उनमें भाई-भाइयों में विवाद न हो, इसके लिए वे अभी से नियम बना लें। इसका उदाहरण देते हुए वे सुंद और उपसुंद असुर भाइयों की कथा का प्रसंग उठाते हैं, जिन्होंने एक ही स्त्री (तिलोत्तमा) के चक्कर में आपस में लड़कर जान गंवा दी थी।
श्लोक 50 से 52 (युधिष्ठिर का प्रश्न)
श्लोक 50, 51 और 52:
युधिष्ठिर उवाच। सुन्दोपसुन्दावसुरौ कस्य पुत्रौ महामुने। उत्पन्नश्च कथं भेदः कथं चान्योन्यमघ्नताम्।। अप्सरा देवकन्या वै कस्य चैषा तिलोत्तमा। यस्याः कामेन संमत्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम्।। एतत्सर्वं यथा वृत्तं विस्तरेण तपोधन। श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन्परं कौतूहलं हि मे।।
- हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर ने कहा— "हे महामुने! वे असुर सुंद और उपसुंद किसके पुत्र थे? उनमें आपसी भेद कैसे उत्पन्न हुआ और वे किस प्रकार आपस में एक-दूसरे को मार बैठे? और देवकन्या अप्सरा वह तिलोत्तमा किसकी है, जिसके काम-मोह से मत्त होकर उन दोनों ने परस्पर एक-दूसरे का वध कर डाला? हे तपोधन ब्रह्मन्! यह संपूर्ण इतिहास जैसा घटित हुआ था, मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ, क्योंकि मेरे मन में इसके प्रति अत्यधिक कौतूहल है।"
- व्याख्या: युधिष्ठिर देवर्षि नारद से अनुरोध करते हैं कि वे सुंद और उपसुंद की उस कथा को विस्तार से सुनाएं, ताकि वे समझ सकें कि एक ही वस्तु या व्यक्ति को लेकर अपनों में विवाद क्यों नहीं होना चाहिए।
इसी के साथ 228वाँ अध्याय पूर्ण होता है। (इसी अध्याय के साथ महाभारत के आदिपर्व का समापन और 'सुंदोपसुंदोपख्यान' / सभापर्व की पृष्ठभूमि का आरंभ होता है)।
