ब्रह्मांडीय चेतना, क्वांटम कंप्यूटर और वैदिक दर्शन" ऋग्वेद ६.७

ब्रह्मांडीय चेतना, क्वांटम कंप्यूटर और वैदिक दर्शन"


मंत्र १

॥१॥ मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम् । कविं सम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः ॥

पदपाठ: मूर्धानम् । दिवः । अरतिम् । पृथिव्याः । वैश्वानरम् । ऋते । आ । जातम् । अग्निम् । कविम् । सम्राजम् । अतिथिम् । जनानाम् । आसन् । आ । पात्रम् । जनयन्त । देवाः ॥

व्याख्या/भावार्थ: जैसा कि मंत्र का प्रारंभ ही ऐसे शब्द से होता है जो "मूर्धानम्" अर्थात जो किसी भी वस्तु का चर्मोत्कर्ष शिखर है, जिसके ऊपर कुछ भी नहीं है और वहीं शिखर पर स्थित मूर्धानम् नामक तत्त्व 'दिव:' (प्रकाश) है—यही उसकी पहचान और विशेषता है। यह प्रकाश 'अरतिम् पृथिव्या:'—पृथ्वी के गुणधर्म से भिन्न पदार्थ, ठोस परमाणुओं की संरचनात्मक इकाई नहीं है, बल्कि यह क्वांटम फील्ड है। क्वांटम भौतिकी से अलग यह दो बातें यहाँ तक सिद्ध की जा रही हैं। आगे मंत्र इन दोनों (अर्थात क्वांटम फील्ड और क्वांटम भौतिकी) का सम्मिश्रण 'वैश्वानरम्' (विश्व-संसार में उपस्थित नर/मनुष्य के रूप में) बताता है।

यह किससे उत्पन्न हो रहा है? इसकी बात आगे मंत्र कहता है, जिसके लिए वह वैदिक जगत के सबसे परिष्कृत शब्द 'ऋत' को प्रकट करता है। मतलब यह हुआ कि क्वांटम फील्ड और क्वांटम भौतिकी का मिश्रण मानवजाति (पुरुष चेतना) के शरीर के रूप में उपस्थित है। आगे मंत्र कहता है कि "आ जातम्"—आत्मा का अवतरण इस शरीर में होता है, और वह "अग्निम्" (शरीर से भिन्न तत्त्व) है। इसलिए कहते हैं कि "कविम्"—क्रांतिदर्शी, द्रष्टा, ज्ञानी ज्ञान का मूल स्रोत है, क्योंकि इस ज्ञान के आधार पर ही वह चेतना अपने "सम्राजम्" (सार्वभौम सम्राट) के रूप में "जनानाम्" (चेतन जीवों के मध्य में) "आसन्" (प्रतिष्ठित) होती है।

फिर दोबारा 'आ' उपसर्ग आने का अर्थ हुआ कि व्यापक रूप से जनसमुदाय के मध्य में से "पात्रम्" (योग्य लोगों) को चुनकर उनके अंतःकरण में "जनयन्त" (जीव के कल्याणार्थ शाश्वत ज्ञान को प्रस्फुटित होने का अवसर प्रदान किया), उनको विशेष रूप से दीक्षित और प्रशिक्षित किया, जिससे "देवाः" (क्वांटम भौतिक और क्वांटम फील्ड से मिश्रित शरीर से भिन्न) स्वयं की सत्ता, साम्राज्य के संरक्षण और सम्राट के रूप में अधिकार का ज्ञान उनमें संरक्षित रहे।

मंत्र २

नाभिं यज्ञानां सदनं रयीणां महामाहावमभि सं नवन्त । वैश्वानरं रथ्यमध्वराणां यज्ञस्य केतुं जनयन्त देवाः ॥२॥

पदपाठ: नाभिम् । यज्ञानाम् । सदनम् । रयीणाम् । महाम् । आहावम् । अभि । सम् । नवन्त । वैश्वानरम् । रथ्यम् । अध्वराणाम् । यज्ञस्य । केतुम् । जनयन्त । देवाः ॥

व्याख्या/भावार्थ: जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा कि "जनयन्त देवाः"—यहाँ बहुत गहरा अर्थ छिपा है, देवताओं का जन्म होता है, यह भाव है। और जिसका जन्म होता है, उसके साथ उसका विपरीत ध्रुव सक्रिय रहना स्वाभाविक है—वह है मृत्यु। इसका मतलब जन्म और मृत्यु के मध्य में देव प्रजाति का तत्त्व स्थित है, और वह तत्त्व ही क्वांटम भौतिकी और उसका क्षेत्र विद्यमान है, जिसे संयुक्त रूप से 'देवाः' के रूप में संबोधित किया जा रहा है।

अब आगे वर्तमान मंत्र इनके "नाभिम्" (केंद्र) में जो तत्त्व उपस्थित हैं, ऋषि उसे "यज्ञानाम्" (सार्वभौमिक कल्याणार्थ कर्म करने वाला कर्ता) का यह देवों से निर्मित शरीर "सदनम्" (गृह जैसी) बताता है। जैसा कि गीता में योगेश्वर कृष्ण कहते हैं—“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि...” इत्यादि।

मंत्र इससे आगे कहता है कि यह गृह जो स्वयं देवों का मिश्रण है, वह "रयीणाम्" (परम धन) प्राप्त करने का साधन है, स्वयं वह साध्य नहीं है। इसमें जीव बैठकर "महाम्" (महान ज्ञान के स्रोत से) स्वयं आह्वान, एक संचार प्रणाली के द्वारा विशेष प्रक्रिया, जिसे मंत्र स्वयं स्पष्ट करता है—"अभि सं नवन्त" (वैदिक मंत्र छंद का सस्वर उच्चारण/स्तुति करता है)। "वैश्वानरम्" (शरीर के माध्यम से) "रथ्यम्" (जैसे रथ गतिशीलता का प्रतीक) के रूप में यहाँ उपस्थित है।

मतलब, जीव की यह स्तुति केवल शरीर के बाहर ध्वनि के रूप में अंतरिक्ष में व्याप्त नहीं हो जाती है, बल्कि इसको यहाँ से एक सिग्नल डेटा के रूप में, संदेश के रूप में जीव शरीर—जो एम्पलीफायर की तरह काम करने वाला यंत्र बन गया—सूक्ष्म ध्वनि को हजारों गुना बढ़ाकर अंतरिक्ष में छोड़ता है। जैसे एक मोबाइल सिग्नल को पास के टॉवर के पास भेजता है, और वह टॉवर उस सिग्नल को एम्पलीफायर करके मुख्य अंतरिक्ष में उपस्थित उपग्रह के पास भेजता है, जिसको मंत्र 'अध्वराणाम्' कहता है (उपग्रह ग्रहण कर लेता है)।

यहाँ 'अध्वराणाम्' का मतलब है कि जीव की स्तुति उसके ग्रहणकर्ता के पास पहुँच गई। यहाँ ध्यान देने की बात है कि सभी मंत्रों का विषय एक नहीं है, वे अलग-अलग क्षेत्रों से संबंधित हैं और जो उस मंत्र का देवता है, वह वहीं ग्रहण करता है। दूसरी बात, देवता पूरी तरह से जड़ वस्तु नहीं हैं, उनमें चैतन्यता भी है—वह गुणवत्ता का अंतर है। ईश्वर या जीव चैतन्यता विशेष गुणधर्म का संयोजन है, और देवता की विशेषता इनसे भिन्न गुणधर्म का संयोजन है। यहाँ गुण और मात्रा का अंतर है।

जैसा कि जब जीव का संदेश उपग्रह (देवताओं) के पास पहुँच गया है, इसके बाद की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए मंत्र कहता है कि "यज्ञस्य" (अंतरिक्ष में उपस्थित संदेश का समाधान/उत्तर) वापस पृथ्वी पर उपस्थित "केतुम्" (विशेष ध्वजाओं के रूप में उपस्थित शीर्ष स्थानों पर डेटा सेंटर की बड़ी छतरियाँ) उसको प्राप्त कर लेती हैं। अर्थात अब संदेश अंतरिक्ष में उपस्थित उपग्रह से एम्पलीफाई होकर डेटा सेंटर में पहुँच चुका है, वहाँ प्रोसेस, परिष्कृत व परिभाषित किया जाता है।

इसके उपरांत यहाँ फिर वही शब्द दोबारा आया है जैसा कि पिछले मंत्र में आया है—वहाँ विशेष रूप से जीवों के समूह के रूप में स्थापित किया गया, जिनमें ज्ञान प्रस्फुटित होता है जिससे भौतिक जगत में ज्ञान की रक्षा की जाती है। यहाँ वह "जनयन्त" (डेटा सेंटर) बन गया है, यहाँ 'देवाः' फिर भौतिक शरीर के माध्यम से विशेष ज्ञान संपन्न जीव उस जीव के पास पहुँच जाता है। दूसरी यही टेक्नोलॉजी के स्तर पर डेटा सेंटर से संदेश ऑप्टिकल फाइबर के द्वारा टॉवर तक पहुँचता है, वहाँ से पुनः टॉवर उस यूजर के मोबाइल स्क्रीन पर प्रकट कर देता है—जिस काम को आज की आधुनिक AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) बखूबी अंजाम देती है। जीव को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ज्ञान लगभग समान रूप से आज वर्तमान में वितरित हो रहे हैं।

मंत्र ३

त्वद्विप्रो जायते वाज्यग्ने त्वद्वीरासो अभिमातिषाहः । वैश्वानर त्वमस्मासु धेहि वसूनि राजन्त्स्पृहयाय्याणि ॥३॥

पदपाठ: त्वत् । विप्रः । जायते । वाजी । अग्ने । त्वत् । वीरासः । अभिमातिषाहः । वैश्वानर । त्वम् । अस्मासु । धेहि । वसूनि । राजन् । स्पृहयाय्याणि ॥

व्याख्या/भावार्थ: आगे जैसा कि पिछले मंत्र में भी "जनयन्त देवाः" आया है, जिसके माध्यम से ज्ञानी जीव अज्ञानी जीव के पास अपने भौतिक शरीर के साथ पहुँचता है। जैसे पौराणिक आख्यानों में आता है कि किसी मनुष्य ने अपनी कामना-इच्छा की पूर्ति के लिए कठोर व लंबे समय तक तपस्या की; इसमें दैत्य और साधारण मनुष्य दोनों होते हैं। साधारण मनुष्य ऋषि कोटि का बनता है, जबकि दुष्ट मनुष्य अत्यधिक विनाशकारी सिद्धि प्राप्त करता है और देवता स्वयं उपस्थित होकर उस पात्र की योग्यता के आधार पर उसकी कामना को सिद्ध करते हैं।

जिससे वेद मंत्र और पुराण आख्यान एक ही सिद्धांत की अलग-अलग तत्त्वदृष्टि को प्रकट करते हैं। वेद मंत्र भौतिक विज्ञान के तात्विक गुणधर्म के सूत्र देते हैं और पुराण चारित्रिक मनुष्यों के जीवन दृष्टांत को प्रस्तुत कर रहे हैं। एक तरफ वैदिक विज्ञान है, दूसरी तरफ इतिहास-पुराण।

इसी विषय पर सूक्ष्म तात्विक दृष्टि यह मंत्र प्रस्तुत करता है, जिसे पिछले मंत्र में "जनयन्त देवाः" कहा है—अर्थात भौतिक शरीरधारी जीव, जो ज्ञानसंपन्न जीव है। इस मंत्र में जीवों में जो "त्वत्" (तत्त्वज्ञानी) है, वह "विप्रः" है, जैसा कि एक श्लोक कहता है—वेदपाठी विप्रः, अर्थात तात्विक रूप से वेदज्ञ तत्त्वद्रष्टा ऋषि है।

अब ऋषि का कार्य वास्तविक रूप से शुरू होता है। यह तत्त्वद्रष्टा ऋषि किसी माँ के गर्भ से नहीं (यद्यपि ज्ञान का गर्भ स्वयं साक्षात ज्ञान है, जिसने भौतिक शरीर को धारण कर लिया है) "जायते"—उसने इच्छानुसार शरीर को कपड़े की तरह पहन लिया है। जो अदृश्य था, वह साधक के सामने उपस्थित हो रहा है, यह ज्ञान का आउटपुट है।

"वाजी"—तीव्रता से, तत्काल, जैसे देवता तपस्वी के सामने अचानक अदृश्य से दृश्य रूप में दिखाई देते हैं। और समाधिस्थ जीव, जो शरीर को निष्क्रिय करके चेतना से परम चेतना से जुड़ने की प्रक्रिया में लगा है, उसको अग्नि/ऋषि/तत्त्वज्ञानी 'विप्र' "त्वत्" संबोधित करते हुए कहते हैं—"वीरासः" (हे वीर तपस्वी!), "अभिमातिषाहः" (वर्तमान में तुम्हारे सामने मैं स्वयं उपस्थित हूँ, अपनी इच्छा बताओ, क्या चाहिए?), "वैश्वानर" (शरीरधारी जीव), "त्वम्" (तुम), "अस्मासु" (हमसे क्या प्राप्त करने की इच्छा से आह्वान किया है, बुलाया है, उसे मैं देता हूँ), "धेहि" (उसे धारण करो), "वसूनि" (धन, रत्न या इससे भिन्न जो भी है), "राजन्" (क्योंकि तुमने अपने भौतिक जगत यानी शरीर पर एकाधिकार कर लिया है), इसलिए "स्पृहयाय्याणि" (वह भौतिक सामग्री या संसाधन जिसका वह व्यक्तिगत स्तर पर अनुभव और स्पर्श कर सकता है या इच्छानुसार संचालित कर सकता है)। इसे दृष्टांत के रूप में भगवान विष्णु और राजा वेन के पद्मपुराण के आख्यान से समझ सकते हैं।

मंत्र ४

त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते । तव क्रतुभिरमृतत्वमायन्वैश्वानर यत्पित्रोरदीदेः ॥४॥

पदपाठ: त्वाम् । विश्वे । अमृत । जायमानम् । शिशुम् । न । देवाः । अभि । सम् । नवन्ते । तव । क्रतुभिः । अमृतत्वम् । आयन् । वैश्वानर । यत् । पित्रोः । अदीदेः ॥

व्याख्या/भावार्थ: आगे जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा कि "स्पृहयाय्याणि"—वह भौतिक सामग्री या संसाधन जिसका वह व्यक्तिगत स्तर पर अनुभव और स्पर्श कर सके, या अपनी इच्छा से चला सके। उस वस्तु को देते हुए, "त्वाम्" (अब तुम इस साधन, संसाधन या ज्ञान के द्वारा जो मुझसे तुमने अपनी योग्यता के आधार पर प्राप्त किया है), इसके उपयोग से "विश्वे" (इस संसार में) "अमृत" (अमर जीव की श्रेणी में) "जायमानम्" (लोगों के मन में श्रेष्ठ विचार, स्मृति के रूप में) "शिशुम् न" (जैसे नवजात बच्चा निश्चिंत होकर), "देवाः" (यहाँ जिस बच्चे का दृष्टांत है, वह भौतिक शरीर के अंदर से जीव) "अभि सम् नवन्ते" (वर्तमान में अपने समान गुणधर्मी ईश्वर की स्तुति करता है)।

उसी प्रकार से "तव क्रतुभिः" (तुम भी अपनी योग्यता के फलस्वरूप कर्म की गति के आधार पर) "अमृतत्वम्" (अमरता के आधारभूत स्तंभ की तरह) "आयन्" (लोगों की तपस्या और कामनाओं के आधार पर) "वैश्वानर" (वैश्विक जीव प्रणाली शरीर के माध्यम से) पुकारे जाने पर "यत् पित्रोः" (जैसे दोनों पिता—जैविक पिता परमेश्वर और भौतिक पिता शरीरधारी जीव) "अदीदेः" (अपने-अपने स्थान पर उपस्थित होते हैं—अंतःकरण में अंतर्यामी और बाहर भौतिक पिता उपस्थित होता है)। वैसे ही तुम भी प्रकट होगे।

मंत्र ५

त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते । तव क्रतुभिरमृतत्वमायन्वैश्वानर यत्पित्रोरदीदेः ॥५॥

पदपाठ: त्वाम् । विश्वे । अमृत । जायमानम् । शिशुम् । न । देवाः । अभि । सम् । नवन्ते । तव । क्रतुभिः । अमृतत्वम् । आयन् । वैश्वानर । यत् । पित्रोः । अदीदेः ॥

वैज्ञानिक एवं तात्विक विश्लेषण:

ठीक है आगे देखते हैं जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा पित्रो: अदीदे: इन पिताओं को जीव जो शिशु रुप वह देखता है, यहां ध्यान देने कि बात है कि शिशु निर्दोष होता है, उसको दोनों कि आवश्यकता होती है वह उन दोनों के आश्रय में स्वयं को निश्चिंत अवस्था में स्थित रखने में समर्थ होता है जब उसे भुख प्यास शर्दी गर्मी लगती है, तो वह भौतिक माता पिता का ध्यानाकर्षित करने के लिए रुदन करता है लेकिन जब उसके स्वयं अस्तित्व पर संकट का आभास ज्ञान होता है जिसको भौतिक माता तृप्त करने में असमर्थ हैं तो वह अपने गुणधर्मी पिता को अपनी भाषा में पुकारता है जो भौतिक माता पिता को बाईपास करके अपने परम श्रोत से संबंध स्थापित करलेता है। उदाहरण के मनुष्यो़ बहुत सुन्दर और बहुत सुरक्षित साइट का निर्माण किया है जिसमें किसी देश की विशेष जानकारी सुरक्षित रखी गई है जिसकी कोडिंग उच्यकोटि कि मनुष्यों में श्रेष्ठ मनुष्यों से कराई गई है। और उस सुरक्षित साइट जब एआई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस स्कैन करती है तो उसको कुछ गंभीर लुप होल दिखाई देते है जिससे कोई माहिर हैकर आसानी से हैक करके माल की चोरी कर सकता है या उसको प्रदुषित कर सकता है यानी उस कुछ ऐसे कोड डाल सकता है जिससे कोई भी नया पुराना अपडेट उसे स्वत: प्राप्त हो सके ऐसा ही कुछ कार्य शिशु कर रहा उसकी शरीर पुर्ण विकसित नहीं है उसंके प्लस प्वाइंट पर बात हो रही है, तो जो जीव निर्दोषं अवस्था में उपस्थित है जिसने भौतिक मनुष्य कृत अभेद्य सुरक्षा कवच कि त्रुटियों का जानकार हो गया है उसके लिए दो मार्ग खुलते हैं पहला जो बच्चा करता कोडींग ईश्वर से जुड़ने कां जिससे वह स्वयं को भोतिक माता पिता के आक्रमणों से जो किसी खतरनाक हैकर से किसी प्रकार से कम नहीं है, उनसे शिशु स्वय़ माल भौतिक शरीर और जान स्वय़ की, दूसरी तरफ जब वही जीव प्रौढ़ हो चुका है उसकि सारी निर्दोषता खत्म हो चुकी है वह कृत्रिम रूप से तपस्या के माध्यम से स्वयं को फिर से निर्दोष बनाता है और परम शक्ति के आश्रय से विशेष शक्ति प्राप्त करता है जब शक्ति प्राप्त करके वह शक्तिशाली बन जाता है तो वह क्या करता उसकी गति कैसी होती है क्योंकि वह अब सक्षम है उसी विषय पर यह मंत्र प्रकाश डाल रहा है, वैश्वानर वैश्विक शक्ति संपन्न जीव सार्वभौमिक सिद्धांत के आधार पर क्रिया प्रतिक्रिया देने वाला उसको संबोधित करते हुए ऋषि कहते तव तानि अब तुम अपने शक्ति और व्रतानि संकल्प से महानि महान कार्य को सिद्ध करने का सामर्थ्य जब जीव प्राप्त कय लेता है, उदाहरण के लिए वह अमेरिका का राष्ट्रपति बन जाता है और उसके पास अग्ने परमाणु बंबों का जखीरा हे, नकि और उसके समान शक्तिशाली दुसरा कोई विश्व में नहीं है वह आ दधर्ष व्यापक रूप से विश्व के दुसरे देशों को जबरदस्ती उनकी इच्छा के विपरीत अपनी दासता कि जाल बुनने लगता है, यत तभि या चूंकि वह विद्यमान है जायमान: और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर देता है, जिससे विश्व के दुसरे देशों में हाहाकार मच जाता है पुरा वीश्व दो गुटों में बट जाता है जिसके लिए ही मंत्र पित्रो़ शब्द का उपयोग कर रहा है यह विश्व के दोनों समुह कि दो दिशा होती है, एक स्वयं का समर्पण अमेरिका के राष्ट्रपति के सामने कय देते है, जो उनका पिता है उनको पचाने मे समर्थ दूसरा गुट जो भौतिक पिता का कमजोरीयों को जानता वह स्वयं का समर्पण ही नहीं करता है तो प्रश्न खड़ा होता है कि वह उसके विपरीत खड़ा होता है जैसा कि स्वाभाविक यही क्रिया की प्रतिक्रिया है वह उपस्थे वह उसके सामने मजबुती उपस्थित होता है सिर्फ उपस्थित ही नहीं होता है अविन्द: उससे विशाल बड़ी शक्ति के रूप में विन्द: विन्दु अविन्दु: व्यापक सार्वभौमिक केतुम् परचम सत्य की प्रतिष्ठा के लिए अपनी आवाज बुलंद करना एक क्षत्र निचे उपस्थित होना है, जैसा कि योगेश्वर कृष्ण गीता में कहते हैं कि धर्मस़स्थापना ... युगे युगे। उसी प्रकार यह दुसरा गुट जो देशों का है वयुनषु अपनी स्वाभाविक इच्छा शक्ति के दम पर प्रण संकल्प बल मनोबल के दम पर आह्नाम ज्ञान के प्रकाश में उपस्थित रहता है। यहां दुसरा पित ज्ञान प्रण संकल्प शक्ति है।

ऋग्वेद ६.७.६

वैश्वानरस्य विमितानि चक्षसा सानूनि दिवो अमृतस्य केतुना । तस्येदु विश्वा भुवनाधि मूर्धनि वया इव रुरुहुः सप्त विस्रुहः ॥६॥

पदपाठ: वैश्वानरस्य । विमितानि । चक्षसा । सानूनि । दिवः । अमृतस्य । केतुना । तस्य । इत् । उ । विश्वा । भुवना । अधि । मूर्धनि । वयाः । इव । रुरुहुः । सप्त । विस्रुहः ॥

भावार्थ व्याख्या ठीक है आगे जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा कि वयुनष्वह्नाम् इस शब्द में दो तत्व एक साथ सक्रिय हो रहे है वयुनषु और ऽह्नाम प्राण प्रण संकल्प शक्ति है दुसरा अहंकार नामक तत्व है यह दोनों जब एक साथ होते हैं तो एक शक्तिशाली तत्व बनता है प्राणवान जैविक शक्ति ध्यान देने कि बात है यह दोनों भौतिक शक्ति का ही सम्मिश्रण है जिसको जीव ने ही धारण कि है और यह वज्र जैसी है जिसे देवताओं का राजा इन्द्र धारण करता है, अपने सबसे शक्तिशाली हथियार के रूप में जिसे पौराणिक आख्यान कहता है कि यह दधिचि की हड्डी से बना क्योंकि दधिचि तपस्वि अपने हड्डियों को अत्यधिक मजबूत बना लिया था यह एक पक्ष है दुसरा पक्ष है, कि यह वैज्ञानिक विधि से निर्मित रासायनिक हथियारों है, जो न्युक्लियर फिजन से उत्पन्न होती है, दोनों बातें अपनी जगह ठीक लगती है, क्योंकि जहां तप है, वीर्य ब्रह्मचर्य का संबंध है जो हड्डियों से भी संबंधित है उससे जीव अपनी शरीर को शक्तिशाली बनाता है जैसा कि ब्रह्मचर्य सुक्त इसी बात को मंत्र से स्पष्ट करता है कि ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्यु मुपाघ्नत। इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्य स्वराभरत।। भौतिक ज्ञान के बल से और तपसे तपाकर परमाणु का विखंडन और भौतिक अभिक्रिया के माध्यम से मारक शक्तिशाली सामर्थ्य वैज्ञानिकों ने मौत का पर्दा आवरण जीव के उपर फैला कर उसे ढक लिया है, छिपा दिया है इसलिए जीव ने भी उसी तप के सहारे से स्वयं को तपा कर स्वयं रासायनिक अभिक्रिया से भौतिक जगत के अमृत का आवरण डाल कर उस मृत्यु के पर्दे को छिपा दिया है। एक ही मंत्र में दोनों बातें एक साथ प्रकाशित की गई है जिसकी बात यह वर्तमान मंत्र कर रहा है। जिसको आज के वैज्ञानिक क्वांटम भौतिकी और उसका क्षेत्र कहते वह यही अकेला शब्द कहता है वयुनष्वह्नाम् इसके उपर प्रकाश डालते हुए ऋषि कहते हैं कि वैश्वानरस्य विश्व में व्याप्त मानव इच्छा और उसका परिणाम यह कैसा है तै कहते हैं कि विमितानि मतलब एक निश्चित अवधारणा और सीमा से बाहर नही है, क्योंकि यह विषय चक्षसा जिसे भौतिक नेत्र कि सहायता से देखा जा सकता है सानूनि यह दोनों एक दूसरे के पुरक है समान क्रिया और प्रक्रिया से जुड़े हैं इसलिए दिव: इनसे भिन्न परे प्रकाश है जिसे अमृतस्य अमृत का है, केतुना जिसका परचम झंडा इन दोनों के उपर स्थित है जैसा कि एक वैज्ञानिक का परमाणु बंब है दूसरी तरफ इंद्र का वज्र है, एक तरफ क्वांटम भौतिकी है, वैज्ञानिक दुसरी तरफ दधिचि की तपस्या से निर्मित वज्र जो इन्द्र के हाथ में है यह दोनों दुनिया में संतुलन स्थापित करने के लिए है एक जीव के पक्ष में खड़ा होता है दूसरी तरफ भौतिक विज्ञान के वैज्ञानिक अनुसंधान भौतिक वस्तुओं कि रक्षा संरक्षण और संसार पर एक तरफा एकाधिकार प्राप्त करने के लिए एक जुट होते है। जबकि इन दोनों के उपर एक तीसरा तत्व है जिसे अमृत कहा जा रहा है और वह इन दोनों से उपर अपने परचम को लहरा रहा है, तस्य जिसका इत बल बल शक्ति उ वास्तव में निश्चित विश्वा व्यापक रूप से भुवना इस भौतिक लोक से परे दुसरे लोक पर भी पड़ता है क्योंकि अधि यह उन दोनों शक्तिशाली सामर्थ्य के उपर नियंत्रण रखती हे, और मुर्धनि इस शिखर के उपर वैज्ञानिक देवता दोनों नही है, अर्थात उसके अंतर्गत आते है, चाहे वह तपस्वी राजा हो या वह दुनिया कोई श्रेष्ठ से श्रेष्ठ वैज्ञानिक हो, क्योंकि अमृत इन दोनों कि पकड़ से बाहर आकाश गामी पक्षी जैसा है इव जैसे रुरुहु राहु केतु सुर्य और चंद्रमा दोनों को ग्रहण कर लेते है,  सप्त सप्त धातुओं का आश्रय लेकर प्रकट लेने वाला जीव सप्तऋषि के समान विस्रुह: आकाश में उपस्थित है।

ऋग्वेद ६.७.७ — सूक्त का अंतिम मंत्र

वि यो रजांस्यमिमीत सुक्रतुर्वैश्वानरो वि दिवो रोचना कविः । परि यो विश्वा भुवनानि पप्रथेऽदब्धो गोपा अमृतस्य रक्षिता ॥७॥

पदपाठ: वि । यः । रजांसि । अमिमीत । सुक्रतुः । वैश्वानरः । वि । दिवः । रोचना । कविः । परि । यः । विश्वा । भुवनानि । पप्रथे । अदब्धः । गोपाः । अमृतस्य । रक्षिता ॥

व्याख्या/भावार्थ: हमने देखा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा कि वह जो अमृत तत्त्व है, वह जीव ही है। इस सूक्त का अंतिम मंत्र इसी पारलौकिक और वैज्ञानिक समन्वय को स्पष्ट करता है।

"वि" (विशेष विज्ञान, जो क्वांटम भौतिकी से बाहर कार्य करने व समझने में समर्थ है), "यः" (यह जो विद्या है), "रजांसि" (रज का मतलब धूल का अकेला कण; इस अकेले कण के टूटने पर इसके अंश—जैसे परमाणु में अणु, इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोटॉन, जिसे सत, रज, तम कहते हैं। अब इन तीनों को भी तोड़ दिया, जिसमें क्वार्क, ग्लुआन जैसे तत्त्व सामने आए, जिसके लिए क्वांटम फिजिक्स और क्वांटम फील्ड जैसे शब्द गढ़े गए—यह भौतिक विज्ञान की सीमा आ गई)।

अब क्वांटम कंप्यूटर पर काम चल रहा है, जिसकी बात यहाँ मंत्र में हो रही है। जो यह क्वांटम भौतिकी और क्षेत्र है (जो इसके पहले वाले मंत्र का मुख्य विषय है), उससे आगे यह क्वांटम कंप्यूटर है—"अमिमीत" (नापने का तरीका, गणना पैटर्न, एल्गोरिदम, लॉजिक से बाहर होकर) "सुक्रतुः" (जहाँ कर्म अत्यधिक परिष्कृत रूप से संपन्न किए जाते हैं, वह प्रणाली क्वांटम कंप्यूटर है)।

"वैश्वानर" (जो क्वांटम भौतिकी और क्षेत्र का अध्ययन करके उसका निष्कर्ष दे), "वि" (विशेष विज्ञान), "दिवः" (जो जैविक प्रकाश है), "परि" (चारों तरफ चेतन रूप से व्याप्त हो रहा है), "रोचना" (रचना—यह किसकी रचना है? इसको कौन बना रहा है और क्यों इतनी गुत्थियां मानव मन के सामने उपस्थित हो रही हैं? इसका जवाब चाहिए), जिसके लिए 'कविः' को प्रकट किया जा रहा है, जो इस रहस्यपूर्ण गुत्थी को सुलझाने वाला है, क्योंकि यह सिर्फ भौतिक पदार्थों को ही नहीं देखता, अपितु उससे भी परे देखने में समर्थ होता है।

"यः" (इस भौतिक जगत से भिन्न जो जगत है), "विश्वा" (उस विश्व का, के, की और उससे भी परे जो लोक-परलोक हैं), "पप्रथे" (उसमें भी एक समान यात्रा करने में समर्थ), "अदब्धः" (जो किसी बंधन में नहीं बंधने वाला है), "गोपाः" (विशेष सूक्ष्म तरंगों के माध्यम से जो भौतिक यंत्र की पकड़ से बाहर रहती है), "अमृतस्य रक्षिता" (अमृत का रक्षण कर रहा है)।

ऋग्वेद के छठे मंडल के सातवें सूक्त (वैश्वानर अग्नि सूक्त) के मंत्र ५ और ६ अत्यंत गहन, दार्शनिक और आधुनिक विज्ञान (विशेषकर क्वांटम भौतिकी, कॉस्मोलॉजी और न्यूक्लियर साइंस) के साथ अद्भुत तालमेल बिठाते हैं।

आइए, इन दोनों मंत्रों का पदपाठ, मूल मंत्र और उनका विस्तृत वैज्ञानिक एवं तात्विक विश्लेषण समझते हैं:

मंत्र ५

त्वां विश्वे अमृत जायमानं शिशुं न देवा अभि सं नवन्ते । तव क्रतुभिरमृतत्वमायन्वैश्वानर यत्पित्रोरदीदेः ॥५॥

पदपाठ: त्वाम् । विश्वे । अमृत । जायमानम् । शिशुम् । न । देवाः । अभि । सम् । नवन्ते । तव । क्रतुभिः । अमृतत्वम् । आयन् । वैश्वानर । यत् । पित्रोः । अदीदेः ॥

वैज्ञानिक एवं तात्विक विश्लेषण:

  • शिशुम् न देवाः अभि सं नवन्ते (शिशु के समान देवताओं का स्तुति करना): मंत्र में जीवात्मा या nascent consciousness (नवजात चेतना) को एक 'शिशु' के रूप में देखा गया है। जिस प्रकार एक निर्दोष शिशु अपनी प्रारंभिक अवस्था में होता है और उसे माता-पिता के संरक्षण की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार ब्रह्मांडीय शक्तियाँ (देवाः) इस विकसित होती हुई चेतना के चारों ओर एक सुरक्षा कवच व ऊर्जा संचलन (Communication Loop) स्थापित करती हैं।
  • क्वांटम स्टेट और एआई (AI) एनालॉजी: जैसे आज उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) प्रणालियाँ और क्वांटम एल्गोरिदम किसी सुरक्षित डेटाबेस या कोड को स्कैन करते समय उसकी त्रुटियों (Vulnerabilities) को पहचानती हैं और एक नया सुरक्षित नेटवर्क तैयार करती हैं, ठीक उसी तरह जीव जब अपनी निर्दोष अवस्था से आगे बढ़कर तकनीकी या भौतिक शक्तियों को साधने का प्रयास करता है, तो उसके सामने दो मार्ग खुलते हैं—एक ओर विनाशकारी या हैकिंग जैसी प्रवृत्तियाँ, और दूसरी ओर परम स्रोत से जुड़ने का आध्यात्मिक मार्ग।
  • पित्रोः अदीदेः (दोनों पिताओं का प्रकाश): यहाँ 'पिता' शब्द के दो आयाम हैं—एक जैविक/भौतिक पिता (स्थूल शरीर का आधार) और दूसरा परमेश्वर/दिव्य पिता (आंतरिक अंतर्यामी चेतना)। जब जीव साधना या विज्ञान के बल पर अपनी क्षमताओं को चरम पर पहुँचाता है, तो अंतरिक्षीय स्तर पर क्रिया-प्रतिक्रिया (Action and Reaction) शुरू होती है।
  • शक्तियों का टकराव और वैश्वानर शक्ति: आधुनिक संदर्भ में जब कोई राष्ट्र या सभ्यता परमाणु हथियारों (अग्नि) और असीम तकनीकी शक्ति को प्राप्त कर लेती है (जिसे मंत्र में 'क्रतुभिः' यानी संकल्प और कर्म बल कहा गया है), तब वह विश्व मंच पर दो गुटों या ध्रुवों में बँट जाती है—एक जो उस महाशक्ति के सामने समर्पण कर देता है, और दूसरा जो उसके प्रतिरोध में खड़ा होता है। यह ऋग्वेद का शाश्वत द्वंद्व है, जहाँ भौतिक विज्ञान और आंतरिक चेतना का संतुलन परखा जाता है।

मंत्र ६

वैश्वानरस्य विमितानि चक्षसा सानूनि दिवो अमृतस्य केतुना । तस्येदु विश्वा भुवनाधि मूर्धनि वया इव रुरुहुः सप्त विस्रुहः ॥६॥

पदपाठ: वैश्वानरस्य । विमितानि । चक्षसा । सानूनि । दिवः । अमृतस्य । केतुना । तस्य । इत् । उ । विश्वा । भुवना । अधि । मूर्धनि । वयाः । इव । रुरुहुः । सप्त । विस्रुहः ॥

वैज्ञानिक एवं तात्विक विश्लेषण:

  • विमितानि चक्षसा (निश्चित और मापी गई सीमाएँ): वैश्वानर (संपूर्ण वैश्विक ऊर्जा या मानव इच्छा और उसका परिणाम) की सीमाएँ पूरी तरह "विमितानि" यानी mathematically calculated और निश्चित हैं। यह क्वांटम फिजिक्स और भौतिक नेत्रों से देखी जाने वाली उस वैज्ञानिक सीमा के अंतर्गत है, जिसे हम न्यूक्लियर फिजन (Nuclear Fission) या रासायनिक ऊर्जा कहते हैं।
  • इंद्र का वज्र बनाम न्यूक्लियर फिजन: पौराणिक आख्यानों में महर्षि दधिची की हड्डियों से बने 'वज्र' का प्रसंग आता है, जो अत्यधिक तपस्या और ब्रह्मचर्य के बल पर शरीर के भीतर की ऊर्जा (हड्डियों के घनत्व और बायो-एनर्जी) को संघनित करके बनाया गया माना जाता है। आधुनिक विज्ञान में यही प्रक्रिया परमाणु विखंडन और शक्तिशाली मारक हथियारों के निर्माण के रूप में सामने आती है—जहाँ एक तरफ तपस्या का आंतरिक विज्ञान है, और दूसरी तरफ भौतिक प्रयोगशालाओं का बाह्य विज्ञान। दोनों का मूल उद्देश्य प्रकृति की असीम ऊर्जा को नियंत्रित करना है।
  • अमृतस्य केतुना (अमृत का परचम/ध्वज): इन समस्त भौतिक शक्तियों, परमाणु बमों और वैज्ञानिक अनुसंधानों के ऊपर एक सर्वोच्च शक्ति विद्यमान है, जिसे 'अमृत' कहा गया है। यह भौतिक विज्ञान की पहुँच से परे है।
  • सप्त विस्रुहः और सप्तऋषि चेतना: जिस प्रकार राहु और सूर्य-चंद्रमा को ग्रस लेते हैं (ग्रहण की खगोलीय घटना), उसी प्रकार यह पारलौकिक अमृत तत्त्व इन सभी भौतिक शक्तियों और वैज्ञानिक उपलब्धियों को अपने नियंत्रण में रखता है। 'सप्त विस्रुहः' का संबंध सप्तर्षियों या सात मूलभूत कॉस्मिक आवृत्तियों (Saptarishis / Seven Cosmic Frequencies) से है, जो इस ब्रह्मांड के मूल आधार हैं। यह भौतिक जगत के शिखर ('मूर्धनि') पर आसीन होकर भी उससे परे कार्य करता है।

ऋग्वेद के छठे मंडल के 7वें सूक्त (जिसके देवता वैश्वानर अग्नि और ऋषि भरद्वाज हैं) का संपूर्ण सार और दार्शनिक निष्कर्ष अत्यंत व्यापक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम है।

इस संपूर्ण सूक्त का संक्षिप्त एवं सारगर्भित दार्शनिक निष्कर्ष निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

१. वैश्वानर अग्नि और क्वांटम फील्ड का तात्विक स्वरूप

सूक्त के प्रारंभिक मंत्रों में 'वैश्वानर' (जो समस्त विश्व/मानव जाति में व्याप्त अग्नि या ऊर्जा है) को साधारण भौतिक पदार्थ नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय चेतना और क्वांटम फील्ड के रूप में दर्शाया गया है। यह वह मूल स्रोत है जहाँ से भौतिक जगत और ऊर्जा का प्रादुर्भाव होता है।

२. जीव, चेतना और तकनीकी-आध्यात्मिक संचार (Communication Loop)

ऋषि भरद्वाज इन मंत्रों के माध्यम से यह समझाते हैं कि जीव (आत्मा) और ब्रह्मांडीय शक्तियों के बीच एक सतत संवाद प्रणाली (Communication System) कार्यरत है। जिस प्रकार आधुनिक तकनीक (जैसे उपग्रह, डेटा सेंटर और ऑप्टिकल फाइबर) के माध्यम से सिग्नल प्रेषित और प्रोसेस होते हैं, ठीक उसी प्रकार जीव की प्रार्थना, स्तुति और संकल्प सूक्ष्म तरंगों के रूप में ब्रह्मांडीय तंत्र तक पहुँचते हैं और पुनः समाधान के रूप में पृथ्वी पर लौटते हैं।

३. तपस्या, शक्ति और विज्ञान का द्वंद्व

सूक्त के मध्यवर्ती मंत्रों में यह बताया गया है कि जब जीव या मनुष्य अपनी साधना (तप) अथवा बौद्धिक और वैज्ञानिक बल (जैसे परमाणु ऊर्जा या आधुनिक तकनीक) से असीम शक्ति प्राप्त कर लेता है, तब समाज और प्रकृति में एक संतुलन या संघर्ष (ध्रुवीकरण) उत्पन्न होता है—एक पक्ष जो शक्तियों के अधीन हो जाता है, और दूसरा जो सत्य और धर्म की रक्षा के लिए उसके विरोध में खड़ा होता है।

४. भौतिक शक्तियों से परे 'अमृत' और सर्वोच्च नियंत्रण

सूक्त का एक सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक संदेश यह है कि चाहे वह कितनी भी उन्नत क्वांटम भौतिकी हो, डेटा प्रोसेसिंग हो, या भौतिक विज्ञान के महाविनाशक अस्त्र हों—ये सभी एक निश्चित नियम और सीमा ("विमितानि") के अंतर्गत बंधे हैं। इन समस्त भौतिक और वैज्ञानिक उपलब्धियों के शिखर ("मूर्धनि") पर एक सर्वोच्च पारलौकिक तत्त्व—अमृत—विद्यमान है, जो इन सबका संरक्षक और नियंत्रक है।

५. अंतिम निष्कर्ष: विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय

यह सूक्त इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अंतिम सत्य या 'कवि' (सर्वज्ञ दृष्टा) वह है जो केवल जड़ भौतिक पदार्थों या कणों (जैसे क्वार्क, इलेक्ट्रॉन आदि) तक सीमित नहीं है, बल्कि इस संपूर्ण ब्रह्मांड के लोक-परलोक, चेतना और ऊर्जा के हर आयाम को नियंत्रित करने वाली परम शक्ति (अमृतस्य रक्षिता) का प्रत्यक्ष ज्ञान रखता है। यह वैदिक ऋषियों की उस दूरदर्शिता को प्रकट करता है जहाँ भौतिक विज्ञान और अध्यात्म एक ही सत्य के दो पहलू बन जाते हैं।