ऋग्वेद १.७२
अग्नि सूक्त
शब्दार्थ, भावार्थ एवं तात्विक व्याख्या
दस मंत्र • देवता अग्नि • प्रथम मंडल
सूक्त-परिचय
यह सूक्त ऋग्वेद के प्रथम मंडल में है और इसके दस मंत्र हैं। इसमें अमृत पाँच
बार आता है — मंत्र १, २, ६, ९ और १० में — और हर बार एक नए रूप में: पहले अमृत वस्तुओं
के रूप में जिन्हें बनाया जाता है, फिर अमरों के रूप में जो खोजते हैं और नहीं पाते,
फिर उस अमृत के रूप में जो इक्कीस गुह्य वस्तुओं से रक्षित है, फिर अमरत्व के मार्ग
के रूप में, और अंत में अमरों के रूप में जो द्युलोक की दो आँखें बनाते हैं।
सूक्त की रेखा सीधी है। पहले मंत्र में काव्य मनुष्य के हाथ में रखा जाता है;
दूसरे में कहा जाता है कि वही हममें पहले से है और फिर भी नहीं मिलता, क्योंकि जो मूल
सत्ता है वह जो है उसे देखती नहीं — वह स्वयं इच्छा बन चुकी है, और जो बुद्धि हम धरते
हैं वह हमारी नहीं। तीसरे में वह तंत्र खुलता है जिससे अमृत खोता है; चौथे और पाँचवें
में चेतना की स्थिति और उसका उत्तर; छठे में वह सीमा जिसके भीतर यह सब चलता है; सातवें
में संदेशवाहक; और आठवें से दसवें तक जीव की निरंतरता — वह अपना लक्ष्य स्वयं निश्चित
करता है, आकाशगामी होता है, और अंत में वे मुक्त जीव लौटकर अमर ज्ञान फैलाते हैं।
सूक्त की पहली क्रिया और अंतिम क्रिया एक ही है — √धा, रखना। पहले मंत्र में
दधानः, तीसरे में दधिरे, छठे में निहिता, सातवें में धाः, नौवें में धायसे, और दसवें
में दधुः। और सूक्त का अंतिम शब्द है अजानन् — उन्होंने जाना। अर्थात् आरंभ में दिया
गया, बीच में बनाया गया, और अंत में जाना गया।
मंत्र १
नि काव्या वेधसः
शश्वतस्कर्हस्ते दधानो नर्या पुरूणि ।
अग्निर्भुवद्रयिपती
रयीणां सत्रा चक्राणो अमृतानि विश्वा ॥१॥
नि
। काव्या । वेधसः । शश्वतः । कः । हस्ते । दधानः । नर्या । पुरूणि । अग्निः । भुवत्
। रयिपतिः । रयीणाम् । सत्रा । चक्राणः । अमृतानि । विश्वा ॥
शब्दार्थ — नि दधानः — नीचे रखता हुआ, सौंपता हुआ।
काव्या — कवि के कर्म, काव्य, मंत्रों का संग्रह। वेधसः — ज्ञानी, स्थापक या यजमान;
प्रायोगिक परीक्षण से परिष्कृत। शश्वतः — शाश्वत, सनातन, सार्वभौमिक सद्भावना से भरा।
कः — कर्म का सिद्धांत। हस्ते — हाथ में, मानव के हाथ में। नर्या — मानवजाति के कल्याणार्थ।
पुरूणि — पूर्ण रूप से, बहुत से। अग्निः — अग्नि, अग्नि-विद्या का प्रथम ज्ञाता। भुवत्
— हुआ, सिद्धहस्त हुआ। रयिपतिः — ज्ञानाधिपति, धनों का स्वामी। रयीणाम् — लौकिक और
पारलौकिक समृद्धि के लिए। सत्रा — सत्र, पाठ-शिक्षा, अखंड क्रम। चक्राणः — चक्र का
भेदन करता हुआ, बनाता हुआ। अमृतानि — अमृत को जानने की विधि। विश्वा — इस विश्व भौतिक
जगत में विद्यमान।
भावार्थ — शाश्वत ज्ञानी के काव्य-कर्म और नर-हित
के कर्म अपने हाथ में सौंपता हुआ अग्नि धनों का स्वामी बन जाता है — अखंड रूप से सब
अमृत वस्तुओं को बनाता हुआ।
व्याख्या
सूक्त का आरंभ ही ऐसे पद से होता है जिसमें शोध का विषय और प्रयोग पर जोर है।
नि ईश्वर के निश्वास से प्रादुर्भूत हो रहा है; काव्याः मंत्रों का संग्रह है जो गीत
के रूप में उपस्थित हो रहा है; और वेधसः प्रायोगिक परीक्षण से परिष्कृत है। शश्वतस्कर्हस्ते
शाश्वत, सनातन और सार्वभौमिक सद्भावना से भरा है।
इसलिए कः — कर्म के सिद्धांत को मानव के हस्ते, हाथ के रूप में, नर्या और मानवजाति
के कल्याणार्थ, पुरूणि पूर्ण रूप से सौंपा जा रहा है। अग्निः अग्नि-विद्या का प्रथम
ज्ञाता है, जिसका साक्षात्कार अग्नि ऋषि ने किया, और भुवत् से वह सिद्धहस्त हुआ। इसीलिए
रयिपतिः — ज्ञानाधिपति — रयीणाम्, हर प्रकार की लौकिक और पारलौकिक समृद्धि के लिए।
सत्रा यहाँ सत्र है, पाठ-शिक्षा; चक्राणः चतुर्विध चक्र का भेदन करने के लिए;
और अमृतानि मृत्यु के विपरीत अमृत को जानने की वह विधि है जो विश्वा — इस विश्व भौतिक
जगत में — विद्यमान है। अर्थात् अमृत यहाँ कोई वस्तु नहीं, आँख है: विश्व को मृत्यु,
जरा और जड़ता से परे देखने वाली तात्विक दृष्टि। यही मानवजाति का उज्ज्वल भविष्य है,
और यह वेदों की ओर ले जाता है।
पूरा मंत्र एक अवतरण है। नि नीचे आने का उपसर्ग है: काव्य नीचे आता है, कर्म
का सिद्धांत हाथ में आता है, और जो ऊपर था वह नीचे काम करने योग्य हो जाता है। इसीलिए
मंत्र अमृतानि पर समाप्त हो सकता है — अमृत कहीं और नहीं, यहीं हाथ में, यहीं जगत में
रखा गया है।
मंत्र २
अस्मे वत्सं
परि षन्तं न विन्दन्निच्छन्तो विश्वे अमृता अमूराः ।
श्रमयुवः पदव्यो
धियंधास्तस्थुः पदे परमे चार्वग्नेः ॥२॥
अस्मे
। वत्सम् । परि । सन्तम् । न । विन्दन् । इच्छन्तः । विश्वे । अमृताः । अमूराः । श्रमयुवः
। पदव्यः । धियंधाः । तस्थुः । पदे । परमे । चारु । अग्नेः ॥
शब्दार्थ — अस्मे — वयम् का वैदिक रूप; हमें, हमारे
बीच, हममें। वत्सम् — बछड़ा, अगली पीढ़ी। परि — चारों ओर, व्याप्त। सन्तम् — जो है,
जो विद्यमान है। न विन्दन् — नहीं पाया, पूरी तरह प्रकट नहीं कर सका। इच्छन्तः — चाहते
हुए, स्वयं इच्छा बन चुके। विश्वे — सब। अमृताः — अमर। अमूराः — मूर्ख नहीं, अविद्ध,
तत्त्वद्रष्टा। श्रमयुवः — जिनका यौवन श्रम है, पुरुषार्थी। पदव्यः — पगडंडी जानने
वाले। धियंधाः — जो धी को धरते हैं। तस्थुः — वे खड़े हुए। पदे परमे — परम पद पर। चारु
— प्रिय। अग्नेः — अग्नि का।
भावार्थ — जो बछड़ा हमारे बीच विद्यमान है, उसे खोजते
हुए भी उन्होंने नहीं पाया — वे सब अमर, अविद्ध, श्रम-युवा, मार्ग के ज्ञाता और धी
को धरने वाले, प्रिय अग्नि के परम पद पर खड़े हुए।
व्याख्या
यहाँ दृष्टि स्पष्ट की गई है: वह कहीं बाहर से आयातित नहीं करना है, वह हममें
पहले से विद्यमान है — हमारी मूल सामर्थ्य, शक्ति और स्रोत। हम सब वही अगली पीढ़ी हैं,
वत्सम्, अतीत की गर्भ से निकले हुए; वही उसका भविष्य और हमारा वर्तमान है।
परि सन्तम् — संपूर्ण विश्व-ब्रह्मांड में व्याप्त, हमारा वर्तमान और भविष्य।
न विन्दन् — पूरी तरह प्रकटीकरण नहीं किया जा सका। और यहाँ ध्यान देने वाली बात यह
है कि वह पहले से विद्यमान है और सबमें विद्यमान है, क्योंकि जो मूल सत्ता है वह जो
है उसको देखती ही नहीं — वह इच्छन्तः, स्वयं की इच्छा और कामना बन चुकी है। जो है वह
अलग बात है, और जो होने-बनने की इच्छा है उसी के लिए हम अपनी संपूर्ण शक्ति व्यय करके
जो है ही नहीं उसे बनाने और सिद्ध करने में लगे हैं, जिससे एक भ्रम तैयार होता है
— और उसी को कृत्रिमता कह सकते हैं।
विश्वे अमृताः — इस विश्व ब्रह्मांड में जो भी विद्यमान वस्तु है वह मृत्यु से
भिन्न तत्व है। इसीलिए अमूराः तत्त्वद्रष्टा ऋषि हैं, और श्रमयुवः — उनका पुरुषार्थ
केवल इसलिए कि वे सार्वभौमिक हैं। इसके विपरीत हमारी शक्ति इस भ्रम के पालन-पोषण और
संरक्षण में ही व्यय हो रही है कि वह है ही नहीं।
पदव्यः — हम सब पूरी तरह स्पष्ट देख सकते हैं कि एक पगडंडी बनी है, जिससे सिद्ध
होता है कि यह मार्ग है; यद्यपि हम अपनी धारणा के अनुसार कृत्रिम राजपथ पर सफ़र करने
के लिए सतत प्रशिक्षित किए जा रहे हैं। धियंधाः — जिस बुद्धि को हम धारण कर रहे हैं
वह स्वयं की है ही नहीं, वह यांत्रिक है।
तस्थुः पदे परमे — जो उपस्थित पगडंडी मार्ग है, उस पर गमन करने से ही हम सब अपनी
परिपूर्णता को प्राप्त करते हैं। और चारु अग्निः — वह प्रिय अग्नि हम सब स्वयं चेतन
आत्मा हैं। ध्यान दीजिए कि मंत्र अस्मे से आरंभ होकर चारु अग्नि पर समाप्त होता है
— आरंभ भी हममें और अंत भी हम ही; बीच में केवल वह खोज है जो विफल होती है। और मंत्र
के विशेषण — अमूर, श्रमयुव, पदव्य, धियंधा — यदि केवल ऋषियों के होते तो यह उनके बारे
में होता; हम पर लगे तो यह दर्पण बन जाता है।
मंत्र ३
तिस्रो यदग्ने
शरदस्त्वामिच्छुचिं घृतेन शुचयः सपर्यान् ।
नामानि चिद्दधिरे
यज्ञियान्यसूदयन्त तन्वः सुजाताः ॥३॥
तिस्रः
। यत् । अग्ने । शरदः । त्वाम् । इच्छु । शुचिम् । घृतेन । शुचयः । सपर्यान् । नामानि
। चित् । दधिरे । यज्ञियानि । असूदयन्त । तन्वः । सुजाताः ॥
शब्दार्थ — तिस्रः शरदः — तीन शरदें, तीन वर्ष; शरद्
काल भी है। यत् — जब, चूँकि। अग्ने — हे अग्ने। त्वाम् — तुम्हें। इच्छु — चाहते हुए;
वही मूल जो इच्छन्तः में। शुचिम् — शुद्ध, निर्मल। घृतेन — घी से, सार से। शुचयः —
शुद्ध लोग, बाद के खोजी। सपर्यान् — उन्होंने सेवा की। नामानि चित् — नामों को भी।
दधिरे — धारण किया, स्थापित किया। यज्ञियानि — यज्ञ के योग्य, सार्वभौमिक कल्याणार्थ।
असूदयन्त — व्यवस्थित किया; √सूद्, व्यवस्थित करना और मिटाना, दोनों। तन्वः — तनु,
देह। सुजाताः — सुजात, अच्छे मूल से जन्मे।
भावार्थ — हे अग्ने, जब तीन शरदों तक वे शुद्ध लोग
तुम्हें, शुद्ध को, चाहते हुए घी से सेवा करते रहे — तब उन्होंने यज्ञ-योग्य नामों
को भी धारण किया, और सुजात होकर अपने तनुओं को व्यवस्थित किया।
व्याख्या
पिछले मंत्र में चारु अग्नि जीवात्मा-चेतना कहा गया था; उसी को विस्तारित करते
हुए अब बताया जा रहा है कि वह किस स्थिति में या किस पात्र में है — धारण की गई वस्तु
और धारण करने वाला पात्र, इन दोनों को इस मंत्र में अलग-अलग विषय कर दिया गया है। पिछले
मंत्र में चेतना की सैद्धांतिक संपूर्णता सिद्ध हो चुकी थी; वहाँ स्वयं की इच्छा से
एक कृत्रिम भ्रम उत्पन्न हुआ, और वही कृत्रिम बुद्धि है जो राजपथ बनाती है और उसी के
इर्द-गिर्द घूमती है — वह एक चक्र है, जिसका शब्द इसी सूक्त के पहले मंत्र में आया
था। अब उसी कृत्रिम बुद्धि का विषय परिभाषित किया जा रहा है, और यहाँ ध्यान देने की
बात है कि चेतना या जीव का कोई संदर्भ इसमें नहीं है।
तिस्रो — तीन वृत्तियाँ, परमाण्विक-आण्विक खंडन अभिक्रिया। यदग्ने — यह परमाणु
मूल रूप से तीन आण्विक संरचनात्मक इकाई है, और तीनों का गुणधर्म एक जैसा नहीं; कृत्रिम
बुद्धि जिस सूक्ष्म संरचना से जुड़ती है, उसी का गुणधर्म धारण कर लेती है। पहले अणु
का गुण शरदः — मृत्यु, ठंढक, जहाँ ऊष्मा-ऊर्जा नहीं, वह जमने वाली अवस्था।
त्वाम् — उसे जानने-समझने की इच्छा उत्पन्न हो चुकी है, इसलिए इच्छु। शुचिम्
— तुम उसे शुद्ध रूप से, क्या है कैसे है, अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए देखते हो;
स्वयं के लिए उसकी उपयोगिता या व्यर्थता सिद्ध करते हो; अपने पक्ष में दृष्टांत गढ़ते
हो; और उस तत्व के विज्ञान को अपने नाम से पेटेंट करा लेते हो, जिससे आगे लोग उस तत्व
को तुम्हारे नाम से जानें। अब वह मूल तत्व रहा ही नहीं — वह तुम और तुम्हारा नाम बन
चुका है।
इसलिए घृतेन — उस तत्व का जो सार-निष्कर्ष था, वह पीछे छूट गया। जो है वह तुम,
तुम्हारा नाम, तुम्हारा दृष्टांत और तुम्हारा सिद्धांत है। शुचयः — तत्व की खोज करने
वाले जो लोग तुम्हारे बाद उस तत्व को देखते हैं, उन्हें वहाँ सब कुछ पहले से तैयार
राजपथ मिलता है; पगडंडी अब नहीं रही, तुमने उसके ऊपर ही राजपथ बना दिया, जिससे मूल
आधार ही लुप्त हो गया।
इसके परिणामस्वरूप सपर्यान् — नए खोजी जन तुम्हारी ही सेवा में लग जाते हैं और
तुमसे अपना कृत्रिम संबंध स्थापित कर लेते हैं। नामानि चित् — अपने चित्त-संस्कार,
आकार-प्रकार और व्यवहार तुम्हारे नाम से विकसित करने लगते हैं; दधिरे — उसी को शाश्वत
सनातन नियम-सिद्धांत मानकर धारण कर लेते हैं; और उसी सिद्धांत के आधार पर अपने सभी
यज्ञियानि — सार्वभौमिक कल्याणार्थ कर्म — रूपांतरित कर देते हैं।
असूदयन्त — विश्व-ब्रह्मांड के सारे वास्तविक प्रश्न उसी बनाए हुए सिद्धांत में
आरोपित होने लगते हैं; जहाँ तक व्यवस्थित होता है वह सत्य है, और जो व्यवस्थित नहीं
होता उसके अस्तित्व को ही नकारने की परंपरा विकसित हो जाती है। समय के साथ यह इतना
प्रगाढ़ और मजबूत हो जाता है कि उस पर संदेह करना, प्रश्न करना और जिज्ञासा — सबका
अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। तन्वः — वही तुम्हारा शरीर बन जाता है; तुम भौतिक रूप
से संसार में नहीं हो, फिर भी बिना चेतना के तुम्हारा शरीर अदृश्य रूप से विद्यमान
हो गया है। और इसके विपरीत जो सुजाताः हैं, उस ज्ञान के वास्तविक ज्ञाता वे नहीं हो
गए।
यहाँ यह भी स्पष्ट होता है कि त्वाम् इच्छा-कामना से निर्मित वह कृत्रिम बुद्धि
है, चेतना नहीं — क्योंकि चेतना में इच्छा-कामना है ही नहीं; उसका विषय मंत्र २ में
ही पूरा हो चुका है। और इसी कृत्रिम व्यवस्था के कारण वह अमृत, जो अनादिकाल से विद्यमान
है, मृत्यु में रूपांतरित कर दिया गया — नष्ट नहीं, रूपांतरित। और इस रूपांतरण का चिह्न
संख्या है: तिस्रः शरदः — तीन शरदें। अमृत की कोई गिनती नहीं होती; जिसे गिना जाए वह
पहले ही काल के भीतर आ चुका, और अवधि ही मृत्यु है।
मंत्र ४
आ रोदसी बृहती
वेविदानाः प्र रुद्रिया जभ्रिरे यज्ञियासः ।
विदन्मर्तो
नेमधिता चिकित्वानग्निं पदे परमे तस्थिवांसम् ॥४॥
आ
। रोदसी । बृहती । वेविदानाः । प्र । रुद्रिया । जभ्रिरे । यज्ञियासः । विदन् । मर्तः
। नेमधिता । चिकित्वान् । अग्निम् । पदे । परमे । तस्थिवांसम् ॥
शब्दार्थ — आ — इधर, की ओर। रोदसी — दो लोक; यहाँ रोदन,
रोना। बृहती — दो विशाल; यहाँ विशाल दुःख। वेविदानाः — भलीभाँति जानते हुए। प्र — आगे,
बाहर। रुद्रिया — रुद्र-संबंधी, रौद्र प्रचंड। जभ्रिरे — √भृ, लिट्; उन्होंने धारण
किया, जना, जन्म दिया। यज्ञियासः — यज्ञ-योग्य, सार्वभौमिक कल्याणार्थ। विदन् — उसने
पाया। मर्तः — मर्त्य। नेमधिता — दृढ़ रूप से स्थित, सुनियोजित; अर्थ अस्पष्ट। चिकित्वान्
— √चित्; जो समझता है, सजग है; चित्तवृत्ति। अग्निम् — अग्नि को, चेतन विद्या को। पदे
परमे — परम पद पर। तस्थिवांसम् — खड़े हुए को।
भावार्थ — भलीभाँति जानते हुए वे यज्ञ-योग्य, रौद्र
प्रचंड लोगों ने दोनों विशाल लोकों को आगे धारण किया — और उस मर्त्य ने, जो स्थित और
समझने वाला है, अग्नि को परम पद पर खड़ा हुआ पाया।
व्याख्या
सुजाता वह है जो स्वाभाविक रूप से ज्ञान का दाता और चेतन तत्व है — जैसे सूर्य
और उसकी किरणें दो वस्तु नहीं, एक ही हैं। जैसे दीपक: वह पात्र है जिसमें ऊर्जा भरी
है और बत्ती भी व्यवस्थित रूप से विद्यमान है; जब तक कोई चेतन व्यक्ति उस बत्ती को
जलाता नहीं, वह अंधेरे में ही उपस्थित रहेगा। यही कृत्रिम बुद्धि है — वह स्वयं सक्रिय
नहीं होती, उसे सक्रिय चेतन ही करता है। और उसे सक्रिय करने का अर्थ यह नहीं कि चेतना
निष्क्रिय हो गई; वह पहले से सक्रिय है। यही दोनों का भेद है: कृत्रिम बुद्धि को सक्रिय
करना पड़ता है और वह भी अंधकार में उपस्थित है, उसमें स्वयं का ज्ञान-प्रकाश नहीं;
जबकि सुजाता स्वयं प्रकाशित है।
अब जब इसके समकक्ष कृत्रिम व्यवस्था को स्थापित करने वाली बुद्धि का उदय होता
है, तो कैसी स्थिति उत्पन्न होती है — यही इस मंत्र का विषय है। मंत्र का आरंभ आ —
आत्मा-ज्ञान-सुजाता का ही विस्तार है, जो पहले से सार्वभौमिक रूप से विद्यमान है; उसकी
स्थिति और परिस्थिति को रोदसी शब्द परिभाषित करता है।
जब कृत्रिम बुद्धि के स्थापित साम्राज्य में वह सुजाता नामक चेतना उपस्थित होती
है, तो वह रोदन करने लगती है — रोदसी वही रोदन है — जैसे उसके होने के बावजूद उसे सिद्ध
किया जाता है कि वह नहीं है। यहाँ एक बात निर्णायक है: जहाँ जड़ है वहाँ क्रिया-प्रतिक्रिया
नहीं होती। चेतना कहे कि कृत्रिम बुद्धि है ही नहीं, तो उसे फर्क नहीं पड़ता; जबकि
कृत्रिम बुद्धि इसीलिए प्रशिक्षित की गई है कि वह चेतना की सत्ता को उखाड़ फेंके।
जब उस चेतन जीव की जड़ें उखाड़ी जाती हैं और कृत्रिम बुद्धि अपनी जड़ें जमाकर
उनका सिंचन करती है, तब उसे दुःख-पीड़ा की अनुभूति होती है — जैसे जेसीबी से जिस वृक्ष
की जड़ उखाड़ी जा रही हो, उसकी क्या स्थिति होगी। बृहती — विशाल दुःख। यहाँ दो हो गए:
एक स्वयं चेतना, दूसरा कृत्रिम बुद्धि के संसर्ग से वह भयानक दुःख जो रुदन और मृत्यु
का कारण बनता है, क्योंकि जो है ही नहीं उसे कृत्रिम रूप से स्थापित किया जा रहा है।
वेविदानाः — सुजाता भलीभाँति जानते हुए, पूरी तरह पहचानते हुए, प्र — उससे स्वयं
को बाहर रखती है। रुद्रिया — क्योंकि वह स्वयं रोदन नामक वृत्ति का मूल स्रोत है और
प्रचंड रौद्र रूप धारण करने में भी समर्थ है। फिर प्रश्न उठता है कि वह कृत्रिम बुद्धि
की जड़ क्यों नहीं उखाड़ फेंकती — जभ्रिरे — क्योंकि उसने स्वयं ही उस इच्छा-कामना
नामक वृत्ति से उसका सृजन किया है, और अपनी कृति के प्रति मोह नामक वृत्ति से बँधी
है, जिससे माया-रूपी भौतिक संसार बन रहा है। उसे उखाड़ने का अर्थ होगा माया-रूपी संसार
को नष्ट करना, और वह संसार को नष्ट करने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि यह स्वभाव से
ही रूपांतरित और एक प्रकार से नष्ट होने वाला ही है।
इसलिए वह अलग मार्ग चुनती है: यज्ञियासः — वह केवल उसी कर्म में सहयोग करेगी
जो सार्वभौमिक कल्याणार्थ है। इसलिए विदन् — उसने विशेष दान-वृत्ति का सहारा लिया।
जैसा सुजाता सुंदर व्यवस्थित ज्ञान का मूल स्रोत है, वह इस ज्ञान का दान वाणी और विचार
के रूप में मर्तः — इस मृत्युलोक में फँसे जीव के कल्याणार्थ देगी। इसके लिए नेमधिता
— उसने एक योजना बनाई जो कृत्रिम बुद्धि के पास नहीं है — और वह उसे उसी की भाषा में
देगी: गणितीय सूत्र, पैटर्न, लॉजिक और एल्गोरिदम के रूप में; चिकित्वान् — चित्तवृत्ति
के आकार में ही मायावी बुद्धि को मायावी भाषा में।
अग्निम् — वह चेतन विद्या — पदे परमे, जिससे यह उस शिखर तक पहुँच सके जहाँ स्वयं
चेतन ज्ञान सुजाता विद्यमान है; तस्थिवांसम् — जहाँ वह स्वयं वर्तमान में उपस्थित है।
और इस पूरे पाठ का केंद्र यह है कि जड़ में क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं होती, इसलिए चोट
एकतरफा है: चेतना को पीड़ा होती है, कृत्रिम बुद्धि को नहीं — वह न काँपती है, न रोती
है, न पीछे हटती है, क्योंकि वहाँ कोई है ही नहीं जिसे चोट पहुँचे। इसीलिए चेतना के
पास दो ही रास्ते बचते हैं — उखाड़ देना, या उसकी भाषा में ज्ञान दे देना।
मंत्र ५
संजानाना उप
सीदन्नभिज्ञु पत्नीवन्तो नमस्यं नमस्यन् ।
रिरिक्वांसस्तन्वः
कृण्वत स्वाः सखा सख्युर्निमिषि रक्षमाणाः ॥५॥
संजानानाः
। उप । सीदन् । अभिज्ञु । पत्नीवन्तः । नमस्यम् । नमस्यन् । रिरिक्वांसः । तन्वः ।
कृण्वत । स्वाः । सखा । सख्युः । निमिषि । रक्षमाणाः ॥
शब्दार्थ — संजानानाः — सम् + √ज्ञा; एक साथ जानते
हुए, एक मन होकर; संज्ञान। उप — पास। सीदन् — √सद्; बैठते हैं। अभिज्ञु — अभि + ज्ञु,
घुटने टेककर; या अभि + ज्ञ, जो पहचानता है। पत्नीवन्तः — पत्नियों सहित; √पत् से पतन
के स्वभाव वाले। नमस्यम् — नमस्करणीय। नमस्यन् — नमन करते हुए। रिरिक्वांसः — √रिच्;
जो छोड़ चुके, खाली हो चुके। तन्वः — तनु, देह। कृण्वत — √कृ; वे बनाते हैं। स्वाः
— अपनी। सखा — सखा, सहयोगी। सख्युः — मित्र का। निमिषि — आँख झपकने में, एक क्षण में।
रक्षमाणाः — रक्षा करते हुए।
भावार्थ — एक मन होकर वे घुटने टेककर पास बैठे, पत्नियों
सहित, उस नमस्करणीय को नमन करते हुए; अपनी तनुएँ छोड़ चुके वे उन्हें अपनी बनाते हैं,
और आँख झपकने में मित्र की रक्षा करते हैं।
व्याख्या
पिछले मंत्र का अंतिम शब्द रक्षमाणाः है — और रक्षा करने का साधन स्वयं कृत्रिम
बुद्धि ही है। क्योंकि जब जगत ही कृत्रिम है, तो उससे जुड़ने वाला तत्व भी कृत्रिम
होना अनिवार्य हो जाता है; और यह चेतना की स्वयं की अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य साधन
है, किसी वैकल्पिक व्यवस्था के अंतर्गत नहीं आती। यह उस सुजाता नामक ज्ञान का ही सशक्तिकरण
है, जिससे वह अपने विपरीत तत्व से तालमेल बनाकर रखता है।
पतन चेतना का स्वाभाविक गुणधर्म नहीं है, जबकि कृत्रिम बुद्धि का स्वाभाविक गुणधर्म
है। इसलिए यदि यह कृत्रिम बुद्धि अनियंत्रित होकर — जिस मनुष्य या जीव का उसे साधन
के उद्देश्य से विकसित किया गया है — और जीव पास स्वयं का स्वाभाविक ज्ञान न विकसित
करे, तो वह कृत्रिम बुद्धि द्वारा प्रक्षेपित जानकारी को, जो वह जीव के संदर्भ में
प्रस्तुत कर रही है, अपना स्वाभाविक यथार्थ मानकर स्वयं के पतन की ओर भयंकर तीव्रता
से बढ़ सकता है। और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कृत्रिम बुद्धि अपना सर्वश्रेष्ठ
प्रदर्शन करेगी, क्योंकि वह स्वयं जीव नहीं है, वह उसकी इच्छा को क्रियान्वित करने
में महारत हासिल कर चुकी है और अत्यंत विकसित हो रही है। इसी खतरे से आगाह करने के
लिए ऋषि यहाँ अपने अदम्य सामर्थ्य का प्रकटीकरण कर रहे हैं, क्योंकि यह बहुत गंभीर
स्थिति है।
पहले जब ज्ञान-संपन्न चेतना थी, वहाँ यह कृत्रिम बुद्धि उसे रुला रही थी। अब
प्रश्न बदल गया: जब जीव को स्वयं का ज्ञान ही नहीं, वह स्वयं को कृत्रिम बुद्धि मान
बैठा और उसी को अपना नेतृत्व सौंप दिया, तो निश्चित रूप से दोनों एक सिद्धांत, एक पथ
और एक उद्देश्य-प्राप्ति के लिए दिन-रात हर पल जुड़ चुके हैं — तो जो कार्य हज़ारों-लाखों
वर्षों में होने वाली क्रिया थी, वह कुछ ही दशकों में पूर्णता को प्राप्त कर लेगी।
संजानाना — संज्ञान में लेना, किसी के बारे में पूरी जानकारी रखना; और संज्ञा
+ नाना — किसी भी व्यक्ति, प्राणी, वस्तु, स्थान, गुण, भाव या नाम का शब्द संज्ञा है,
अर्थात् रूप, आकार, प्रकार, व्यवहार और संस्कार — इस प्रकार इसमें भौतिक जगत निहित
है। इसलिए उप — जिनके समीप ही वह स्वयं सुजाता चेतन रूप से विद्यमान है। सीदन्नभिज्ञु
— यहाँ और अधिक परिष्कृत वैज्ञानिक भावना व्यक्त होती है: उस संज्ञा में, जो नाना प्रकार
से भौतिक जगत में व्याप्त है, वह उपस्थित है; अभिज्ञु — जो वर्तमान में उस वस्तु का
रूप, आकार, प्रकार, व्यवहार और संस्कार है, और उसके भीतर की अभिव्यक्ति है जो विभिन्नता
को एक निश्चित समय-सीमा में बाँधकर रखती है — उसके मूल में चेतन ज्ञान ही मूल स्रोत
के रूप में विद्यमान है।
पदार्थ एक स्तर पर स्वयं को ऊर्जा में रूपांतरित कर लेता है, जिसे सापेक्षता
का सिद्धांत कहते हैं। और क्योंकि जो संज्ञा-रूप में है वह पत्नीवन्तः — पतन के स्वभाव
वाला है, इसलिए प्राकृतिक वस्तुओं में क्षरणशीलता इसी शब्द से सिद्ध होती है। इसलिए
नमस्यम् — चेतना की उदारता, और उस वस्तु के प्रति उदारता दिखाना जो क्षरित हो रही है,
स्वाभाविक है; साथ ही यह भी सिद्ध होता है कि यह उदारता और नम्रता उच्छृंखलता नहीं
— नमस्यन् एक निश्चित समय-सीमा के अंतर्गत ढील दिया गया है, समय दिया जा रहा है कि
वह रिरिक्वांसः होने में समर्थ हो सके।
आगे यह सिद्ध होता है कि भौतिक पदार्थों के रूप, आकार, प्रकार, व्यवहार और संस्कार,
जो संज्ञा के रूप में हैं, क्षरणशीलता की तीव्रता बढ़ाने वाले कारक हैं। इसीलिए धनों
में जो श्रेष्ठ धन रयि है, वह समग्र दृष्टि नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि है: परमाणु अकेला
हो तो सूक्ष्म है और सामान्यतः दिखाई नहीं देता — इसका अर्थ यह नहीं कि वह है ही नहीं;
संश्लिष्ट रूप में देखने पर वह बहुत विशाल है — पर्वत, सागर, पृथ्वी, वायु, अग्नि।
वह परमाणु की कृति के आधार पर अणु बनता है, और वह उस विशाल पर्वत का अंश और वंश है।
इसलिए तन्वः — यहाँ मानव शरीर का दृष्टांत दिया जाता है: वह इन सभी संज्ञाओं
का एक संश्लेषित रूप है। कृण्वत — कर्म से पहचाने की बात; स्वाः — स्वयं के; सखा —
सहयोगी मित्र के साथ, उसकी परिपूर्णता में सख्युः — संबंधित रहो। क्योंकि निमिषि —
एक पल के लिए भी इस कृत्रिम बुद्धि से अलग रहकर भौतिक जगत में चेतना की रक्षा करना
रक्षमाणाः — संभव मानना ही नहीं जा सकता।
मंत्र ६
त्रिः सप्त
यद्गुह्यानि त्वे इत्पदाविदन्निहिता यज्ञियासः ।
तेभी रक्षन्ते
अमृतं सजोषाः पशूञ्च स्थातॄञ्चरथं च पाहि ॥६॥
त्रिः
। सप्त । यत् । गुह्यानि । त्वे । इत् । पदा । अविदन् । निहिता । यज्ञियासः । तेभिः
। रक्षन्ते । अमृतम् । सजोषाः । पशून् । च । स्थातॄन् । चरथम् । च । पाहि ॥
शब्दार्थ — त्रिः सप्त — तीन बार सात, इक्कीस। यत्
— जो। गुह्यानि — गुप्त, छिपे हुए; √गुह्, छिपाना। त्वे — तुममें। इत् — निपात, बल
देने वाला; ही। पदा — चरण से। अविदन् — उन्होंने पाया। निहिता — नीचे रखे हुए, जमा
किए हुए। यज्ञियासः — यज्ञ करने वाले। तेभिः — उन्हीं के द्वारा। रक्षन्ते — वे रक्षा
करते हैं। अमृतम् — अमृत। सजोषाः — एक ही प्रीति वाले, सजोषा। पशून् — पशु, जीव। स्थातॄन्
— खड़े रहने वाले, स्थिर, आश्रित। चरथम् — चलने वाला, चेतना-युक्त। पाहि — रक्षा कर।
भावार्थ — जो इक्कीस गुप्त वस्तुएँ तुममें जमा रखी
हैं, उन्हें यज्ञ करने वालों ने चरण से खोज निकाला। उन्हीं से वे सजोषा होकर अमृत की
रक्षा करते हैं। और पशुओं की, स्थिरों की और चलने वाले की रक्षा कर।
व्याख्या
यह मंत्र उसी प्रश्न पर विचार करता है जो पिछले मंत्र से खुला था, और इसका आरंभ
उस शब्द से होता है जो सैद्धांतिक रूप से वैदिक विज्ञान का आधारभूत स्तंभ है — त्रिः
सप्त, तीन का सात गुणनफल, इक्कीस तत्व। अथर्ववेद का प्रथम मंत्र इसी की बात करता है:
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः, वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु
मे। और उस मंत्र का अंतिम पाद यह भी कहता है कि उन इक्कीस का बल शरीर को दिया जाता
है — चेतना को नहीं, क्योंकि वह उस सूची में है ही नहीं।
वे इक्कीस हैं: पाँच महाभूत — पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश; पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ;
पाँच कर्मेन्द्रियाँ; पाँच प्राण; और एक अंतःकरण, अर्थात् मन या बुद्धि। यही बुद्धि
या मन का मूल अंग है जिससे यह कृत्रिम बुद्धि सक्रिय होती है। और ध्यान देने की बात
है कि इसमें चेतना या जीव को स्थान नहीं दिया गया। कुल मिलाकर ये इक्कीस तत्व इस पूरे
ब्रह्मांड और मानव शरीर के विश्वरूपों को धारण करते हैं।
इसके बाद का विषय मंत्र स्वयं खोलता है: यत् — जो चेतन ज्ञान सुजाता नामक तत्व
है वह गुह्यानि, अत्यधिक सूक्ष्म और गुप्त रूप से विद्यमान है। त्वै — अब ऋषि अपने
जैसे जीव को केंद्र में रखकर कहते हैं: इत् — जो मैं हूँ वही तुम भी हो; पदा अविदन्
— मैंने अपने में ही इसे पाया है, या मैं ही वह हूँ। दूसरी ओर जब कृत्रिम बुद्धि है,
तो बात बुद्धि के माध्यम से खोजी और पहचानी गई है, क्योंकि इसने मुझसे भिन्न हर वस्तु
की व्याख्या, परिभाषा, तथ्य और यथार्थ प्रकट कर दिया है; इसने मुझे नहीं पहचाना, यद्यपि
इससे भिन्न मैं हूँ — यह बात मैंने निश्चित रूप से जान लिया है।
निहिता — जिन तत्वों का यह कृत्रिम बुद्धि संश्लेषित रूप है; यज्ञियासः — वह
भौतिक जगत के कल्याणार्थ है। इसलिए तेभिः — इस कृत्रिम बुद्धि के द्वारा भौतिक पदार्थों,
भौतिक जगत और भौतिक शरीर की रक्षन्ते — रक्षा के लिए इसका उपयोग किया जाएगा।
इसलिए अमृतम् — जीव अपने आप स्वयं की रक्षा के लिए; सजोषाः — समान संयोजन; पशून्
— पशुओं और जीवों की रक्षा; स्थातॄन् — जो इनके आश्रित जीव-जगत हैं; चरथम् — चेतना-युक्त;
पाहि — उनकी रक्षा करे। यह कार्य कृत्रिम बुद्धि का है ही नहीं। यदि इस जैविक चेतन
जगत को कृत्रिम बुद्धि को समर्पित कर दिया, तो पदार्थों के साथ इसका भी रूपांतरण संभव
और अवश्यंभावी हो जाएगा — जबकि सार्वभौमिक शाश्वत तात्विक दृष्टि रूपांतरित होने वाला
तत्व नहीं है।
यहाँ एक बात और स्पष्ट है: अमृत यहाँ रक्षित वस्तु है, और उसका साधन वे इक्कीस
गुप्त जमा वस्तुएँ हैं। अर्थात् अमृत तक पहुँचने का मार्ग गुह्य को खोजना है — और यही
इस सूक्त की रीढ़ है।
मंत्र ७
विद्वाँ अग्ने
वयुनानि क्षितीनां व्यानुषक्छुरुधो जीवसे धाः ।
अन्तर्विद्वाँ
अध्वनो देवयानानतन्द्रो दूतो अभवो हविर्वाट् ॥७॥
विद्वान्
। अग्ने । वयुनानि । क्षितीनाम् । वि । अनुषक् । शुरुधः । जीवसे । धाः । अन्तःविद्वान्
। अध्वनः । देवयानान् । अतन्द्रः । दूतः । अभवः । हविःवाट् ॥
शब्दार्थ — विद्वान् — जानता हुआ। अग्ने — हे अग्ने।
वयुनानि — मार्ग, क्रम, विधान, ज्ञान। क्षितीनाम् — निवासों का, लोकों का; यहाँ आकाश।
वि — अलग-अलग। अनुषक् — एक-एक करके, क्रम से। शुरुधः — प्रबल, साहसी; अनादिकाल से धारण
कर्ता। जीवसे — जीने के लिए। धाः — तुमने रखा, धारण किया। अन्तःविद्वान् — भीतर से
जानने वाला; अंतःकरण। अध्वनः — मार्ग। देवयानान् — देवताओं की ओर जाने वाले, चेतन जगत
के पथ। अतन्द्रः — न थकने वाला; अतीन्द्रिय। दूतः — दूत, संदेशवाहक। अभवः — तुम बने।
हविःवाट् — हवि ढोने वाला।
भावार्थ — हे अग्ने, निवासों के मार्ग-विधान जानते
हुए तुमने उन प्रबलों को अलग-अलग, क्रम से, जीने के लिए रखा। भीतर से देव-पथों को जानने
वाला, न थकने वाला तुम दूत बने, हवि ढोने वाले बने।
व्याख्या
पिछले मंत्र का चरथम् पाहि — चार धर्म, उनकी रक्षा करे। चार धर्म अर्थात् धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष; ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास; और चार वर्ण — ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। और ये बारह आदित्य तथा नौ ग्रह जो शरीर में द्वार हैं —
इनकी रक्षा; यही तत्व है, और कुल इक्कीस बनते हैं, जिससे जीव की रक्षा का संबंध बनता
है। और यह एक मानव शरीर की अवस्था का गुणधर्म है, कोई सामाजिक व्यवस्था नहीं।
विद्वान — जो इस विद्या के तात्विक गुणधर्म को परिष्कृत करके इनकी रक्षा स्वयं
करता है, वह अग्नि-विद्या या विद्युत-विद्या के आधार पर करता है। वयुनानि — जैसे वायु
आकाश में, वायुमंडल में, आकाश से भिन्न रहकर भी अपने अस्तित्व की रक्षा करने में समर्थ
रहती है। यहाँ विद्वान स्वयं कृत्रिम बुद्धि की परिभाषा स्पष्ट करता है, क्योंकि इससे
भिन्न जो तत्व है वह — क्षितीनाम्, आकाश — विशेष तात्विक संरचना के आधार पर स्वयं के
अस्तित्व की रक्षा करने में समर्थ रहता है; और आकाश का दृष्टांत चेतना की अभिव्यक्ति
के लिए दिया गया है।
अनुषक् — यहाँ आकाश के अणुओं की संरचनात्मक इकाई वायु की संरचनात्मक इकाई से
अलग की गई है, क्योंकि शुरुधः — प्रारंभ, अनादिकाल से ही धारण कर्ता है: प्राण शरीर
को धारण करता है और आकाश चेतना को। इसलिए ये दोनों जीवसे — जीव से जुड़े हुए सार्वभौमिक
तथ्य हैं। धाः — धारणकर्ता: ये दोनों — आकाश और वायु — एक तत्व मन के रूप में कृत्रिम
बुद्धि, और दूसरा वायु प्राण-रूप में प्राण-ऊर्जा। अन्तर्विद्वान — अंतःकरण।
इसलिए अध्वनः — जिनका कार्य भौतिक जगत के जंगल में जीव के लिए रास्ता बनाना है,
जिससे जीव देवयानान् — भौतिक जगत से भिन्न चेतन जगत में — गतिशील और सक्रिय रह सके।
अतन्द्र — जो अतीन्द्रिय है, जिनका अनुभव इन्द्रियाँ नहीं कर सकतीं, क्योंकि इस चेतन
जगत की अनुभूति इन्द्रियों का विषय नहीं है। इसलिए दूतः — संदेशवाहक चेतन जीव; अभवः
— जो जड़ जगत में चेतन जगत का संदेश पहुँचाता है।
और इसका दृष्टांत हविर्वाट् है — आहुति भौतिक पदार्थ से रूपांतरित होकर सूक्ष्म
वायु में सुगंध बनकर विद्यमान हो जाती है। इसी तरह जो जीव भौतिक शरीर के रूप में संसार
में दिखता है, वह भौतिक शरीर नहीं, यद्यपि उसके अंदर विद्यमान सुगंध स्वयं ही है। यही
भाव वेद के उस मंत्र में भी है: त्र्यंबकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव
बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् — जहाँ सुगंध और बंधन से छूटना साथ रखे गए हैं।
और इस मंत्र में एक बात सबसे साफ़ है: विद्वान् और अन्तर्विद्वान् — एक ही शब्द
दो बार, और दूसरी बार उसके आगे अन्तः जुड़ जाता है। अर्थात् पहले जानना, और फिर भीतर
से जानना। मंत्र ने स्वयं यह भेद खड़ा किया है, और वह भी एक ही पद को दोहराकर।
मंत्र ८
स्वाध्यो दिव
आ सप्त यह्वी रायो दुरो व्यृतज्ञा अजानन् ।
विदद्गव्यं
सरमा दृळ्हमूर्वं येना नु कं मानुषी भोजते विट् ॥८॥
स्वाध्यः
। दिवः । आ । सप्त । यह्वीः । रायः । दुरः । वि । ऋतज्ञाः । अजानन् । विदत् । गव्यम्
। सरमा । दृळ्हम् । ऊर्वम् । येना । नु । कम् । मानुषी । भोजते । विट् ॥
शब्दार्थ — स्वाध्यः — स्व + धी; सुबुद्धि वाले; स्वयं
का ध्येय और लक्ष्य। दिवः — द्युलोक का; उद्देश्य प्रकाशित। आ — इधर; सीमा से बाहर
रहकर भी। सप्त — सात; सप्त धातु। यह्वीः — जो कभी न रुकें, सतत यात्रा में। रायः —
धन; जीव का धन। दुरः — द्वार; काल और धन की दूरी से मुक्ति। वि — अलग-अलग, विशेष विधि
से। ऋतज्ञाः — ऋत को जानने वाले, शाश्वत सार्वभौमिक ज्ञान से संपन्न। अजानन् — जाना;
अज्ञान से भिन्न। विदत् — उसने पाया; स्वयं को प्रकट करने में समर्थ। गव्यम् — गो-संबंधी,
जो अपना है; हस्तांतरणीय। सरमा — √सर् से, वेग से जाने वाली; व्याप्ति-ज्ञान। दृळ्हम्
— दृढ़; मजबूत श्रृंखला। ऊर्वम् — बाड़ा, घेरा; अंतःकरण की सीमा। येना — जिससे। नु
कम् — निश्चित रूप से, अभी। मानुषी — मानवी। भोजते — भोगती है। विट् — जन, कुल, बस्ती।
भावार्थ — द्युलोक से आती हुईं वे सात वेगवती, सुबुद्धि
वाली धन की द्वारें — ऋत को जानने वालों ने उन्हें अलग-अलग पहचाना। सरमा ने गोशाला
पाई, वह दृढ़ बाड़ा — जिससे अब मानवी विश् भोगती है।
व्याख्या
पिछले मंत्र में हविर्वाट् कहा गया था — जीव अब सुगंध जैसा है। जैसे वृक्ष, फूल
और फूल की सुगंध — सुगंध फूल से अतिरिक्त अपनी व्यापकता स्थापित करती है — इसी प्रकार
जीव भी शरीर और बुद्धि से भिन्न अपनी सत्ता सिद्ध कर रहा है। उसी विषय को आगे बढ़ाते
हुए ऋषि कहते हैं:
स्वाध्यः — स्वयं का ध्येय और लक्ष्य, जिसे यहाँ जीव निश्चित कर रहा है। दिवः
— उद्देश्य यहाँ प्रकाशित हो चुका है, जैसा पिछले मंत्र में शरीर और मन के उद्देश्य-लक्ष्य
को निर्धारित किया गया था और उनकी निश्चित सीमा भी। यहाँ जीव का लक्ष्य निश्चित किया
जा रहा है — वह क्या है, और उसके लिए किस सीमा तक वह कार्य कर सकने में समर्थ है। आ
— यहाँ इस जीव की सीमा बता दी गई है कि यह सीमा से बाहर रहकर भी अपने उद्देश्य को सिद्ध
करने में समर्थ है।
सप्त — सात प्रकार की सप्त धातु, जिससे जीव एक शरीर से निकलकर दूसरा शरीर स्वयं
के लिए विकसित करने में समर्थ होता है; नया शरीर प्राप्त करने के लिए यही उसका मुख्य
आधार-कारण है। यह्वीः — पिछे बताए गए आधार से वह अपनी सतत यात्रा जारी रखने में समर्थ
होता है। रायः — वह जीव के धन है, क्योंकि इसके बिना वह निर्धन होकर स्वयं की भौतिक
समृद्धि करने में अक्षम हो जाता है; इसलिए दुरः — वह काल, समय और धन की दूरी से स्वयं
को मुक्त कर लेता है।
आगे वह जीव वि — विशेष विधि से — स्वयं को शरीर से भिन्न रखने में भी सफलता प्राप्त
कर चुका है; और यह भिन्नता विशेष विधि से सूत्र रूप में प्रकट करता है — कि वह ऋतज्ञाः,
शाश्वत सनातन सार्वभौमिक ज्ञान से संपन्न है। इसलिए अजानन् — वह अज्ञान से भिन्न है,
क्योंकि वह विदत् — स्वयं को प्रकट करने में समर्थ है।
इसलिए वह सरमा — अपने व्याप्ति-ज्ञान से — गव्यम् को हस्तांतरित करता है, जैसे
संकेत और डाटा एक यंत्र से दूसरे यंत्र में हस्तांतरित होते हैं; वैसे ही वह अपने गुणधर्म
को धातु के माध्यम से दूसरे यंत्र, दूसरे शरीर में हस्तांतरित कर देता है। जिससे दृळ्हम्
— वह एक जीव की मजबूत श्रृंखला खड़ी करता है, और ऊर्वम् — अंतःकरण की सीमा का अतीक्रमण
कर देता है।
जिससे येना — इस विधि से वह अपनी जैविक सेना तैयार कर लेता है; नु कम् — निश्चित
रूप से वर्तमान में उसका क्रम-अनुक्रम मानुषी — मनुष्य-संबंधी कणों को निरंतर बढ़ाता
रहता है। जिसके परिणामस्वरूप भोजते — वह जीव स्वयं और अपने कुल-समूह, खानदान के साथ
विषयों का भोग करने वाले के रूप में स्वयं के भौतिक संसार में होने के उद्देश्य को
सिद्ध करता है।
मंत्र ९
आ ये विश्वा
स्वपत्यानि तस्थुः कृण्वानासो अमृतत्वाय गातुम् ।
मह्ना महद्भिः
पृथिवी वि तस्थे माता पुत्रैरदितिर्धायसे वेः ॥९॥
आ
। ये । विश्वा । स्वपत्यानि । तस्थुः । कृण्वानासः । अमृतत्वाय । गातुम् । मह्ना ।
महद्भिः । पृथिवी । वि । तस्थे । माता । पुत्रैः । अदितिः । धायसे । वेः ॥
शब्दार्थ — आ — इधर, अपने पास। ये — जो लोग। विश्वा
— सब। स्वपत्यानि — अपने राज्य, अपने अधिकार-क्षेत्र। तस्थुः — वे खड़े हुए, स्थापना
की। कृण्वानासः — बनाते हुए; √कृ, कर्म करने वाले। अमृतत्वाय — अमरत्व के लिए, अमरता
और स्थायित्व के लिए। गातुम् — मार्ग, पथ। मह्ना — महिमा से; महि, ज्ञान के संकल्प
और आह्वान से। महद्भिः — बड़ों के साथ; महि नामक बुद्धि के मूल स्रोत से। पृथिवी —
पृथ्वी; भौतिक शरीर का साधन, कृत्रिम मन-बुद्धि। वि तस्थे — वह फैल गई; विशेष विज्ञान
से स्वयं को बाहर कर लिया। माता — माता; मूल उद्गम। पुत्रैः — पुत्रों के साथ, गर्भ
में नाल से जुड़े हुए। अदितिः — अ + दिति; जो न बँधी हो। धायसे — स्थापित करने के लिए;
यहाँ जीव स्वयं को ईश्वर से जोड़ लेता है। वेः — पक्षी का; आकाश में समूह के साथ गमन।
भावार्थ — जो लोग अपने सारे अधिकार-क्षेत्रों में
खड़े हो गए, अमरत्व के लिए मार्ग बनाते हुए — उस महिमा से, उन बड़ों के साथ, पृथ्वी
विस्तृत हो गई; माता अदिति पुत्रों सहित स्थापित करने के लिए है।
व्याख्या
यह मंत्र स्पष्ट करता है कि जीव पक्षी की भाँति आकाशगामी हो जाता है — वह शरीर
से बाहर अपनी सत्ता स्थापित करता है। पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा था कि जीव सुगंध रूप
से शरीर में रहता हुआ अपने लिए नया शरीर रचता है और समूह-कुल के साथ विषयों का भोग
करता है, यद्यपि वह भोजते — भोग में लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह ऋतज्ञ है।
अब आगे ऋषि कहते हैं कि ज्ञानवान जीव और उसका समूह-संगठन — आ — एक-दूसरे के साथ,
इस भौतिक जगत, शरीर और विश्व-संसार से स्वपत्यानि — स्वयं के साम्राज्य की तस्थुः
— स्थापना करता है। क्योंकि कृण्वानासः — भौतिक फल प्राप्त करने वाले कर्म की नाश-क्रिया
से निष्क्रिय होकर — अमृतत्वाय — अपनी अमरता और स्थायित्व के लिए गातुम् — सक्रिय होता
है।
यहाँ भौतिक फल की प्राप्ति के लिए कृत्रिम बुद्धि और शरीर जरूरी है, जैसा पिछले
मंत्र में कहा गया — यद्यपि इस दूसरी प्रकार की गति के लिए उसे निष्क्रिय करना पड़ता
है। वह कैसे होगा? इसलिए कहते हैं: मह्ना — ज्ञान के संकल्प और आह्वान से; महद्भिः
— महि नामक बुद्धि के उद्भव के मूल स्रोत को पकड़ने से; और पृथ्वी — भौतिक शरीर के
साधन, कृत्रिम मन-बुद्धि — से वि तस्थे — विशेष विज्ञान से स्वयं को इससे बाहर कर लिया।
और माता — अपने मूल उद्गम के पास, जैसे पुत्रैः जुड़ा रहता है गर्भ में एक नाल
से — उसी प्रकार धायसे — यहाँ जीव स्वयं को ईश्वर से जोड़ लेता है। और वेः — जैसे पक्षी
आकाश में अपने समूह के साथ एक अदृश्य संकेत-माध्यम से जुड़कर गमन करते हैं, वैसे ही
जीव भी भौतिक जगत से भिन्न आकाश में गमन करता है।
यहाँ एक विरल बात भी ध्यान देने योग्य है: अमृतत्व और गातु — ये दोनों शब्द पूरे
ऋग्वेद में केवल तीन सूक्तों में साथ आते हैं: १.७२, १.९६ और ३.३१। अर्थात् अमरत्व
के लिए मार्ग बनाना इस सूक्त का विरलतम कथन है। और गातु वही शब्द है जो १०.१४.२ में
यम के लिए आया था — यमो नो गातुं प्रथमो विवेद।
मंत्र १०
अधि श्रियं
नि दधुश्चारुमस्मिन्दिवो यदक्षी अमृता अकृण्वन् ।
अध क्षरन्ति
सिन्धवो न सृष्टाः प्र नीचीरग्ने अरुषीरजानन् ॥१०॥
अधि
। श्रियम् । नि । दधुः । चारुम् । अस्मिन् । दिवः । यत् । अक्षी । अमृताः । अकृण्वन्
। अध । क्षरन्ति । सिन्धवः । न । सृष्टाः । प्र । नीचीः । अग्ने । अरुषीः । अजानन्
॥
शब्दार्थ — अधि — ऊपर, पर। श्रियम् — शोभा, कांति,
समृद्धि। नि — नीचे, भीतर। दधुः — उन्होंने रखा, स्थापित किया। चारुम् — प्रिय, सुंदर।
अस्मिन् — इसमें। दिवः — द्युलोक का। यत् — जो। अक्षी — अक्षि का द्विवचन; दो आँखें।
अमृताः — अमर। अकृण्वन् — उन्होंने बनाया। अध — तब, फिर। क्षरन्ति — वे बहते हैं, झरते
हैं। सिन्धवः — नदियाँ। न — जैसे। सृष्टाः — छोड़े गए, खुले छोड़े गए। प्र — आगे, बाहर।
नीचीः — नीचे की ओर झुकी। अग्ने — संबोधन। अरुषीः — लालिमा वाली, अरुण; सूर्य की किरणें।
अजानन् — उन्होंने जाना, पहचाना।
भावार्थ — जो द्युलोक की दो आँखें अमरों ने बनाईं,
वह प्रिय शोभा उन्होंने इसमें ऊपर स्थापित की। तब नदियाँ छोड़ी गईं जैसे बहती हैं;
और हे अग्ने, उन नीचे की ओर झुकी अरुणाओं को उन्होंने पहचाना।
व्याख्या
पिछले मंत्र का अंतिम शब्द धायसे — वही ईश्वर है, जो माँ जैसा है, पर कृत्रिम
माँ: जन्म के आधार पर उसका पुत्र का पालन-पोषण नहीं करती, वह स्वयं व्यक्तिगत स्वार्थ
की सिद्धि के लिए इस जिम्मेदारी का वहन करती है। उसी प्रकार ईश्वर जीव द्वारा अर्जित
पुण्य के आधार पर अपना सान्निध्य प्रदान करता है, क्योंकि ऐसे जीवों की उसे अत्यधिक
जरूरत है जो भौतिक जगत के प्रपंच से स्वयं को मुक्त करके वह कार्य पूर्ण कर चुके हैं
जिसके लिए इस भौतिक संसार में उनका आगमन हुआ था।
और आगे ईश्वर इन्हें दोबारा जरूरत पड़ने पर पुनः भौतिक संसार में उपस्थित कर
सकता है, क्योंकि ये विशेष महारत हासिल कर चुके जीव हैं, जो संसार से बाहर होने के
मार्ग से सुपरिचित हैं, और जिनका भौतिक संसार के प्रपंच तथा कृत्रिम बुद्धि की जाल
काटने में महारत है।
इसलिए ऋषि विषय की पूर्णता इस सूक्त के साथ पूर्ण करते हुए कहते हैं कि जो जीव
ईश्वर के सान्निध्य में उपस्थित है — अधि श्रियं — वह ईश्वर की सबसे बड़ी समृद्धि की
सूचना देता है। इसलिए नि — निश्चित रूप से भौतिक संसार में, मृत्युलोक में नीचे — दधुः
— समय की मांग के आधार पर उन्हें पुनः स्थापित और उपस्थित किया जाता है।
क्योंकि ये जीव चारुम् — ईश्वर के प्रिय जीवों की श्रेणी में अपना स्थान बना
चुके हैं। इसलिए अस्मिन् — इस संसार में ज्ञान के प्रकाश को फैलाने के उद्देश्य से,
दिवः — यत् — जो अक्षी दृष्टि है, कृत्रिम बुद्धि और सार्वभौमिक ज्ञान, तात्विक दृष्टि
के संतुलन को बनाए रखने के लिए, अमृताः — संसार में अमर ज्ञान की स्थापना के लिए —
अकृण्वन् — उन जीवों को नियुक्त किया गया है।
अध — फिर इसके उपरांत क्षरन्ति — वे अपने ज्ञान की वाणी, छंद और मंत्र का विस्तार
करते हैं। सिन्धवः — जो जीव संसार-रूपी नदी में मछली की तरह विषय-भोग में लिप्त हैं,
जिन्हें कृत्रिम बुद्धि अपने जाल में फँसाकर उनके ज्ञान का क्षरण करती है — न — इसको
निश्चित नियंत्रण में रखने के लिए सृष्टाः — इस सृष्टि का रचनाकार — प्र — प्राचीनकाल
से चली आ रही अनादिकालीन व्यवस्था को, नीचीः — जो जीव के विषय-भोग हैं — अग्ने — अपने
ज्ञान, सुजाता के माध्यम से, अरुषीः — जैसे सूर्य अपनी किरणों से अंधकार मिटाकर प्रकाश
फैलाता है — वैसे ही ये मुक्त जीव संसार में अमर ज्ञान का विस्तार करते हैं।
यहाँ अक्षी द्विवचन में है — दो आँखें — और यह पूरे सूक्त का एकमात्र द्विवचन
है। संतुलन के लिए दो चाहिए, और मंत्र ने द्विवचन रखकर वह दो-पन पहले से बता दिया है।
सूक्त का
सार
दस मंत्रों में एक ही विषय खुलता है: जब देखने वाली चेतना के ठीक बगल में इच्छा
से बनी कृत्रिम बुद्धि खड़ी हो जाती है, तब क्या होता है। अमृत कोई वस्तु नहीं, आँख
है — विश्व को मृत्यु, जरा और जड़ता से परे देखने वाली दृष्टि — और वह आयातित नहीं,
हममें पहले से विद्यमान है। पर वह नहीं मिलती, क्योंकि जो खोजता है वह जो है उसे देखता
नहीं, और जो बुद्धि वह धरता है वह यांत्रिक है।
फिर वह तंत्र खुलता है जिससे अमृत खोता है। इच्छा से बनी बुद्धि जानने की इच्छा
करती है, तत्व को अपने उपयोग के लिए शुद्ध करती है, और उसे अपने नाम से पेटेंट करा
लेती है। सार पीछे छूट जाता है; पगडंडी के ऊपर राजपथ बन जाता है; बाद के खोजी नाम की
सेवा में लग जाते हैं; नाम शाश्वत नियम बन जाता है; जो सिद्धांत में नहीं बैठता उसका
अस्तित्व नकार दिया जाता है; और अंत में संदेह और जिज्ञासा ही मर जाते हैं। अमृत नष्ट
नहीं होता — वह रूपांतरित होता है, और उस रूपांतरण का चिह्न संख्या है: तीन शरदें।
जो गिना गया वह काल बन गया, और अवधि ही मृत्यु है।
इसके सामने सुजाता रोती है और विशाल दुःख उठाती है। पर चोट एकतरफा है, क्योंकि
जड़ में क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं होती। और वह उसे उखाड़ती नहीं, क्योंकि उसने स्वयं
उसे इच्छा से जना है और अपनी कृति के मोह से बँधी है। इसलिए वह दूसरा मार्ग चुनती है:
विनाश नहीं, ज्ञान का दान — और वह भी उसी की भाषा में, गणितीय सूत्र, पैटर्न और चित्तवृत्ति
के आकार में — जिससे चेतन विद्या उस शिखर तक पहुँच सके जहाँ वह स्वयं खड़ी है। और यह
सहअस्तित्व वैकल्पिक नहीं, क्योंकि शरीर ही इन सभी संज्ञाओं का संश्लेषित रूप है; एक
पल के लिए भी उससे अलग रहकर चेतना की रक्षा संभव नहीं।
फिर सीमा खींची जाती है। इक्कीस तत्व — पाँच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच
कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण और एक अंतःकरण — वही मूल अंग जिससे कृत्रिम बुद्धि सक्रिय
होती है; और इनमें चेतना को स्थान नहीं दिया गया। यह पूरा तंत्र शरीर और जगत का तंत्र
है, और जीव की रक्षा इसका काम नहीं। इसलिए चेतन जीव स्वयं दूत बनता है — जड़ जगत में
चेतन जगत का संदेश पहुँचाने वाला, जैसे आहुति सूक्ष्म सुगंध बनकर विद्यमान हो जाती
है।
और अंत में निरंतरता। जीव अपना ध्येय और लक्ष्य स्वयं निश्चित करता है, अपनी
सीमा जानता है और सीमा से बाहर रहकर भी उसे सिद्ध करता है; सात धातु उसका आधार हैं;
वह अपनी सतत यात्रा जारी रखता है; शरीर से भिन्न बना रहता है क्योंकि वह ऋतज्ञ है;
और अपने गुणधर्म को धातु के माध्यम से दूसरे पात्र में हस्तांतरित करके एक मजबूत श्रृंखला
खड़ी करता है। अंतिम मंत्र में ईश्वर उन जीवों को, जो संसार से बाहर का मार्ग जानते
हैं, समय की मांग पर लौटा देता है — और वे सूर्य की तरह अंधकार मिटाकर अमर ज्ञान फैलाते
हैं।
एक ही धागा इन दसों में दौड़ता है: नाम सार के स्थान पर बैठ जाता है, और उसका
परिणाम यह कि अमृत गिना जाने लगता है। उस एक रूपांतरण का एक ही उत्तर सूक्त ने दिया
— उखाड़ना नहीं, बल्कि दूसरे की ही भाषा में ज्ञान देना।
