पद्मपुराण — भूमिखण्ड, वेनोपाख्यान, सुकलाचरित्र
अध्याय ४८ : पद्मावती का पितृगृह में निवास
इस अध्याय में कथा उग्रसेन और पद्मावती के दाम्पत्य जीवन से आगे बढ़ती है। पद्मावती के पिता सत्यकेतु अपनी पुत्री से मिलने के लिए उसे मथुरा से विदर्भ बुलाते हैं। उग्रसेन स्नेहवश उसे जाने देते हैं। पिता के घर पहुँचकर पद्मावती पहले की तरह स्वतंत्रतापूर्वक विहार करने लगती है। अध्याय का केंद्र उसके पितृगृह के सुख और उसी सुख के प्रति बढ़ते मोह का चित्रण है।
श्लोक १
मूलपाठ
माथुरे विषये रम्ये मथुरायां नृपोत्तमः । उग्रसेनेति विख्यातो यादवः परवीरहा ॥१॥
शब्दार्थ: माथुरे विषये — मथुरा प्रदेश में; रम्ये — रमणीय; मथुरायाम् — मथुरा में; नृपोत्तमः — श्रेष्ठ राजा; उग्रसेनः — उग्रसेन; इति — इस नाम से; विख्यातः — प्रसिद्ध; यादवः — यदुवंशी; परवीरहा — शत्रुपक्ष के वीरों को पराजित करने वाला।
भावार्थ: रमणीय मथुरा प्रदेश में उग्रसेन नाम के एक श्रेष्ठ यादव राजा राज्य करते थे। वे शत्रुपक्ष के वीरों को पराजित करने के लिए प्रसिद्ध थे।
व्याख्या: कथा का परिचय उग्रसेन के राज्य, वंश और वीरता से आरम्भ होता है। आगे उनके दाम्पत्य जीवन तथा पद्मावती के पितृगृह जाने की घटनाएँ इसी राजपरिवार के संदर्भ में प्रस्तुत होंगी।
श्लोक २
मूलपाठ
सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञो वेदज्ञः श्रुतवान्बली । दाता भोक्ता गुणग्राही सद्गुणान्वेत्ति भूपतिः ॥२॥
शब्दार्थ: सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञः — धर्म और उसके प्रयोजन के तत्त्व को जानने वाला; वेदज्ञः — वेदों का ज्ञाता; श्रुतवान् — शास्त्रों का विद्वान; बली — बलवान; दाता — दान देने वाला; भोक्ता — भोग करने वाला; गुणग्राही — गुणों को ग्रहण और पहचानने वाला; सद्गुणान् — अच्छे गुणों को; वेत्ति — जानता है; भूपतिः — राजा।
भावार्थ: राजा उग्रसेन धर्म के तत्त्व को जानने वाले, वेदज्ञ, विद्वान और बलवान थे। वे दानी थे, जीवन के सुखों का उपभोग करते थे तथा दूसरों के सद्गुणों को पहचानते थे।
व्याख्या: इस श्लोक में उग्रसेन के व्यक्तित्व के अनेक पक्ष बताए गए हैं—ज्ञान, बल, दानशीलता और गुणग्राहकता। उनका परिचय केवल एक शक्तिशाली राजा के रूप में नहीं, बल्कि धर्म और विद्या को जानने वाले शासक के रूप में भी कराया गया है।
श्लोक ३
मूलपाठ
राज्यं चकार मेधावी प्रजा धर्मेण पालयेत् । एवं स च महातेजा उग्रसेनः प्रतापवान् ॥३॥
शब्दार्थ: राज्यम् चकार — राज्य किया; मेधावी — बुद्धिमान; प्रजाः — प्रजा को; धर्मेण — धर्मपूर्वक; पालयेत् — पालन करता था; एवम् — इस प्रकार; सः — वह; महातेजाः — महान तेज वाला; उग्रसेनः — उग्रसेन; प्रतापवान् — प्रतापशाली।
भावार्थ: बुद्धिमान और प्रतापशाली उग्रसेन धर्मपूर्वक राज्य करते तथा अपनी प्रजा का पालन करते थे।
व्याख्या: राजा के गुणों का व्यावहारिक परिणाम उसके शासन में दिखाई देता है। धर्मज्ञान का संबंध यहाँ प्रजा के संरक्षण और राज्य के संचालन से जोड़ा गया है। इससे उग्रसेन की राजधर्मपरायण छवि स्थापित होती है।
श्लोक ४
मूलपाठ
वैदर्भे विषये पुण्ये सत्यकेतुः प्रतापवान् । तस्य कन्या महाभागा पद्माक्षी कमलानना ॥४॥
शब्दार्थ: वैदर्भे विषये — विदर्भ प्रदेश में; पुण्ये — पवित्र अथवा समृद्ध; सत्यकेतुः — सत्यकेतु नामक राजा; प्रतापवान् — प्रतापशाली; तस्य — उसकी; कन्या — पुत्री; महाभागा — सौभाग्यशालिनी; पद्माक्षी — कमल के समान नेत्रों वाली; कमलानना — कमल के समान मुख वाली।
भावार्थ: पवित्र विदर्भ प्रदेश में सत्यकेतु नाम के प्रतापशाली राजा राज्य करते थे। उनकी पुत्री अत्यन्त सौभाग्यशालिनी थी। उसके नेत्र कमल के समान और मुख कमल की भाँति सुंदर था।
व्याख्या: कथा अब मथुरा से विदर्भ की ओर बढ़ती है। सत्यकेतु और उनकी पुत्री पद्मावती का परिचय आगे आने वाली घटनाओं का आधार है। पद्मावती के सौंदर्य का वर्णन उसके राजसी परिवेश और परिवार में उसके विशेष स्थान को भी रेखांकित करता है।
श्लोक ५
मूलपाठ
नाम्ना पद्मावती नाम सत्यधर्मपरायणा । सा तु स्त्रीणां गुणैर्युक्ता द्वितीयेव समुद्रजा ॥५॥
शब्दार्थ: नाम्ना — नाम से; पद्मावती — पद्मावती; सत्यधर्मपरायणा — सत्य और धर्म में तत्पर; सा — वह; तु — निश्चय ही; स्त्रीणाम् गुणैः — स्त्रियों के गुणों से; युक्ता — युक्त; द्वितीया इव — दूसरी के समान; समुद्रजा — समुद्र से उत्पन्न, लक्ष्मी का विशेषण।
भावार्थ: उसका नाम पद्मावती था। वह सत्य और धर्म में तत्पर तथा स्त्रियों के गुणों से युक्त बताई गई है। उसका सौंदर्य समुद्र से उत्पन्न लक्ष्मी के समान कहा गया है।
व्याख्या: समुद्रजा समुद्र से उत्पन्न लक्ष्मी का संकेत है। पद्मावती की तुलना लक्ष्मी से करके उसके सौंदर्य, सौभाग्य और राजसी गरिमा को व्यक्त किया गया है। कथा में उसका आरम्भिक परिचय गुणवान और धर्मपरायण स्त्री के रूप में है; आगे उसके व्यवहार में आने वाला परिवर्तन इसी प्रारम्भिक परिचय के साथ पढ़ना आवश्यक है।
श्लोक ६
मूलपाठ
वैदर्भी शुशुभे राजन्स्वगुणैः सत्यकारणैः । माथुर उग्रसेनस्तु उपयेमे सुलोचनाम् ॥६॥
शब्दार्थ: वैदर्भी — विदर्भ की राजकुमारी; शुशुभे — सुशोभित हुई; राजन् — हे राजन्; स्वगुणैः — अपने गुणों से; सत्यकारणैः — सत्यनिष्ठ आचरण के कारण; माथुरः — मथुरा का राजा; उग्रसेनः — उग्रसेन; तु — और; उपयेमे — विवाह किया; सुलोचनाम् — सुंदर नेत्रों वाली स्त्री को।
भावार्थ: विदर्भ की राजकुमारी अपने गुणों और सत्यनिष्ठा से सुशोभित थी। मथुरा के राजा उग्रसेन ने उस सुंदर नेत्रों वाली पद्मावती से विवाह किया।
व्याख्या: इस श्लोक में दोनों राजपरिवारों का संबंध विवाह के माध्यम से स्थापित होता है। पद्मावती विदर्भ की राजकुमारी है और उग्रसेन मथुरा के राजा। उनका विवाह आगे की कथा में दोनों राज्यों और परिवारों के संबंधों को जोड़ने वाली घटना बनता है।
श्लोक ७
मूलपाठ
तया सह महाभाग सुखं रेमे प्रतापवान् । अतिप्रीतो गुणैस्तस्यास्तया सह सुखीभवेत् ॥७॥
शब्दार्थ: तया सह — उसके साथ; महाभाग — हे महाभाग; सुखम् — सुखपूर्वक; रेमे — रमण किया, जीवन बिताया; प्रतापवान् — प्रतापशाली राजा; अतिप्रीतः — अत्यन्त प्रसन्न; गुणैः तस्याः — उसके गुणों से; तया सह — उसके साथ; सुखी भवेत् — सुखी रहता था।
भावार्थ: उग्रसेन पद्मावती के साथ सुखपूर्वक जीवन बिताते थे। उसके गुणों से वे अत्यन्त प्रसन्न थे और उसके साथ सुखी रहते थे।
व्याख्या: विवाह के बाद उग्रसेन और पद्मावती के संबंध को प्रेमपूर्ण और सुखमय बताया गया है। राजा का स्नेह केवल पद्मावती के सौंदर्य से नहीं, बल्कि उसके गुणों से भी जुड़ा हुआ है।
श्लोक ८
मूलपाठ
तस्याः स्नेहेन प्रीत्या च संमुग्धो माथुरेश्वरः । पद्मावती महाभागा तस्य प्राणप्रियाभवत् ॥८॥
शब्दार्थ: तस्याः — उसके; स्नेहेन — स्नेह से; प्रीत्या — प्रेम से; च — और; संमुग्धः — अत्यन्त मोहित; माथुरेश्वरः — मथुरा का राजा; पद्मावती — पद्मावती; महाभागा — सौभाग्यशालिनी; तस्य — उसकी; प्राणप्रिया — प्राणों के समान प्रिय; अभवत् — हो गई।
भावार्थ: पद्मावती के स्नेह और प्रेम से मथुरा के राजा उग्रसेन अत्यन्त मोहित हो गए। पद्मावती उन्हें अपने प्राणों के समान प्रिय हो गई।
व्याख्या: यहाँ दाम्पत्य प्रेम की गहनता व्यक्त की गई है। पद्मावती उग्रसेन के जीवन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेती है। यही गहरा लगाव आगे उसके पिता के बुलावे पर उसे विदर्भ भेजने के निर्णय में दिखाई देगा।
श्लोक ९
मूलपाठ
तया विना न बुभुजे तया सह प्रक्रीडयेत् । तया विना न सेवेत परमं सुखमेव सः ॥९॥
शब्दार्थ: तया विना — उसके बिना; न बुभुजे — भोजन नहीं करता था; तया सह — उसके साथ; प्रक्रीडयेत् — विहार करता था; तया विना — उसके बिना; न सेवेत — उपभोग नहीं करता था; परमम् सुखम् — परम सुख; एव — ही; सः — वह।
भावार्थ: उग्रसेन पद्मावती के बिना भोजन तक नहीं करते थे। वे उसके साथ ही विहार करते और उसके बिना परम सुख का अनुभव नहीं करते थे।
व्याख्या: यह श्लोक उग्रसेन के पद्मावती के प्रति गहरे अनुराग का वर्णन करता है। उनकी दिनचर्या और सुख का केंद्र पद्मावती बन गई थी। कथा में इस अनुराग को आगे की घटनाओं के लिए महत्त्वपूर्ण बनाया गया है, क्योंकि पद्मावती का पिता के घर जाना इसी लगाव के बीच घटित होगा।
श्लोक १०
मूलपाठ
एवं प्रीतिकरौ जातौ परस्परमनुत्तमौ । स्नेहवंतौ द्विजश्रेष्ठ सुखसंप्रीतिदायकौ ॥१०॥
शब्दार्थ: एवम् — इस प्रकार; प्रीतिकरौ — एक-दूसरे को प्रसन्न करने वाले; जातौ — हो गए; परस्परम् — एक-दूसरे के प्रति; अनुत्तमौ — अनुपम; स्नेहवन्तौ — स्नेह से युक्त; द्विजश्रेष्ठ — हे श्रेष्ठ ब्राह्मण; सुख-संप्रीति-दायकौ — सुख और प्रसन्नता देने वाले।
भावार्थ: इस प्रकार उग्रसेन और पद्मावती एक-दूसरे को प्रसन्न रखने वाले, अनुपम प्रेम और स्नेह से युक्त तथा परस्पर सुख देने वाले दम्पती बन गए।
व्याख्या: पहले के श्लोकों में अलग-अलग उनके प्रेम का वर्णन था; यहाँ उस संबंध का सार प्रस्तुत है। उनका दाम्पत्य परस्पर स्नेह और प्रसन्नता पर आधारित था। अब कथा इस सुखमय जीवन में आने वाले परिवर्तन की ओर बढ़ती है।
श्लोक ११
मूलपाठ
सत्यकेतुश्च राजेंद्रः सस्मार स पद्मावतीम् । स्वसुतां तां महाभागो माता तस्याः सुदुःखिता ॥११॥
शब्दार्थ: सत्यकेतुः — सत्यकेतु; च — और; राजेन्द्रः — राजाओं में श्रेष्ठ; सस्मार — स्मरण करने लगा; सः — वह; पद्मावतीम् — पद्मावती को; स्वसुताम् — अपनी पुत्री को; ताम् — उसे; महाभागः — सौभाग्यशाली; माता तस्याः — उसकी माता; सुदुःखिता — अत्यन्त दुःखी।
भावार्थ: राजा सत्यकेतु को अपनी पुत्री पद्मावती का स्मरण हुआ। उसकी माता भी पुत्री से दूर रहने के कारण अत्यन्त दुःखी थी।
व्याख्या: विवाह के बाद पद्मावती मथुरा में रहने लगी थी, जबकि उसके माता-पिता विदर्भ में थे। समय बीतने पर पिता को पुत्री की याद आती है और माता भी उससे मिलने के लिए व्याकुल होती है। इसी पारिवारिक स्नेह से उसे बुलाने का प्रसंग आरम्भ होता है।
श्लोक १२
मूलपाठ
स दूतान्प्रेषयामास वैदर्भो मथुरां प्रति । उग्रसेनं नृवीरेंद्रं सादरेण द्विजोत्तम ॥१२॥
शब्दार्थ: सः — उसने; दूतान् — दूतों को; प्रेषयामास — भेजा; वैदर्भः — विदर्भ का राजा; मथुराम् प्रति — मथुरा की ओर; उग्रसेनम् — उग्रसेन के पास; नृवीरेन्द्रम् — राजाओं में वीरश्रेष्ठ; सादरेण — आदरपूर्वक; द्विजोत्तम — हे श्रेष्ठ ब्राह्मण।
भावार्थ: विदर्भ के राजा सत्यकेतु ने मथुरा के राजा उग्रसेन के पास आदरपूर्वक दूत भेजे।
व्याख्या: सत्यकेतु सीधे पद्मावती को बुलाने के बजाय पहले उसके पति उग्रसेन से संदेश द्वारा संपर्क करते हैं। यह दोनों राजपरिवारों के बीच सम्मानपूर्ण व्यवहार को दिखाता है।
श्लोक १३
मूलपाठ
उग्रसेनं महाराजं स दूतो वाक्यमब्रवीत् । विदर्भाधिपतिर्वीरो भक्त्या स्नेहेन नंदयन् ॥१३॥
शब्दार्थ: उग्रसेनम् — उग्रसेन से; महाराजम् — महान राजा; सः दूतः — उस दूत ने; वाक्यम् — संदेश; अब्रवीत् — कहा; विदर्भाधिपतिः — विदर्भ का राजा; वीरः — वीर; भक्त्या — आदर से; स्नेहेन — स्नेह से; नन्दयन् — प्रसन्न करते हुए।
भावार्थ: दूत ने महाराज उग्रसेन से कहा कि विदर्भ के वीर राजा सत्यकेतु ने आदर और स्नेह के साथ उनके लिए संदेश भेजा है।
व्याख्या: दूत का संदेश औपचारिक सम्मान से आरम्भ होता है। सत्यकेतु उग्रसेन के राजकीय पद और उनके पारिवारिक संबंध—दोनों का सम्मान करते हैं। अगले श्लोक में संदेश का वास्तविक आशय बताया जाता है।
श्लोक १४
मूलपाठ
आत्मनः कुशलं ब्रूते भवतां परिपृच्छति । सत्यकेतुर्महाराज त्वामेवं परिपृष्टवान् ॥१४॥
शब्दार्थ: आत्मनः — अपना; कुशलम् — कुशल-क्षेम; ब्रूते — कहता है; भवताम् — आपका; परिपृच्छति — कुशल पूछता है; सत्यकेतुः — सत्यकेतु; महाराज — हे महाराज; त्वाम् — आपसे; एवम् — इस प्रकार; परिपृष्टवान् — पूछताछ की है।
भावार्थ: दूत कहता है—राजा सत्यकेतु अपना कुशल-क्षेम बताते हैं और आपका कुशल पूछते हैं। उन्होंने आपके लिए यह संदेश भेजा है।
व्याख्या: संदेश में पहले परस्पर कुशल-क्षेम का आदान-प्रदान होता है। यह शिष्टाचार के साथ-साथ दोनों राजाओं के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध का संकेत है।
श्लोक १५
मूलपाठ
दर्शनाय प्रेषयस्व सुतां पद्मावतीं मम । यदि त्वं मन्यसे नाथ प्रीतिस्नेहं हितस्य च ॥१५॥
शब्दार्थ: दर्शनाय — दर्शन के लिए; प्रेषयस्व — भेज दीजिए; सुताम् — पुत्री को; पद्मावतीम् — पद्मावती को; मम — मेरे पास; यदि — यदि; त्वम् — आप; मन्यसे — उचित समझें; नाथ — हे स्वामी; प्रीति-स्नेहम् — प्रेम और स्नेह; हितस्य — हित अथवा कल्याण के लिए; च — और।
भावार्थ: सत्यकेतु निवेदन करते हैं—हे नाथ! यदि आप हमारे स्नेह और पारिवारिक हित को उचित समझते हैं, तो मेरी पुत्री पद्मावती को कुछ समय के लिए मुझसे मिलने भेज दीजिए।
व्याख्या: पिता अपनी पुत्री से मिलने की इच्छा प्रकट करता है, लेकिन उसका निवेदन उग्रसेन के निर्णय और सम्मान को ध्यान में रखकर किया गया है। यह आग्रह अधिकार जताने के बजाय प्रेमपूर्ण अनुरोध के रूप में प्रस्तुत होता है।
श्लोक १६
मूलपाठ
प्रेषयस्व महाभागां प्रियां प्रीतिकरां तव । औत्कण्ठ्येन महाराज स सोत्कंठेन वर्तते ॥१६॥
शब्दार्थ: प्रेषयस्व — भेज दीजिए; महाभागाम् — सौभाग्यशालिनी; प्रियम् — प्रिय पुत्री; प्रीतिकराम् — प्रसन्नता देने वाली; तव — आपकी; औत्कण्ठ्येन — उत्कण्ठा के कारण; महाराज — हे महाराज; सः — वह; स-उत्कण्ठेन — उत्कण्ठित होकर; वर्तते — रह रहा है।
भावार्थ: सत्यकेतु निवेदन करते हैं—हे महाराज! अपनी प्रिय और सबको प्रसन्न करने वाली पद्मावती को मेरे पास भेज दीजिए। मैं उससे मिलने के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित हूँ।
व्याख्या: यहाँ पिता की भावनात्मक स्थिति स्पष्ट होती है। पद्मावती उसके लिए केवल विवाहित पुत्री नहीं, बल्कि परिवार की प्रिय सदस्य है। उसके दूर रहने से उत्पन्न व्याकुलता ही इस निमंत्रण का मुख्य कारण है।
श्लोक १७
मूलपाठ
समाकर्ण्य ततो वाक्यमुग्रसेनो नृपोत्तमः । प्रीत्या स्नेहेन तस्यापि सत्यकेतोर्महात्मनः ॥१७॥
शब्दार्थ: समाकर्ण्य — सुनकर; ततः — तब; वाक्यम् — संदेश; उग्रसेनः — उग्रसेन; नृपोत्तमः — श्रेष्ठ राजा; प्रीत्या — प्रसन्नता से; स्नेहेन — स्नेह के कारण; तस्य अपि — उसके प्रति भी; सत्यकेतोः — सत्यकेतु के; महात्मनः — महानुभाव।
भावार्थ: सत्यकेतु का संदेश सुनकर राजा उग्रसेन प्रसन्न हुए। सत्यकेतु के प्रति उनके मन में भी स्नेह और सम्मान था।
व्याख्या: उग्रसेन संदेश को विरोध या अधिकार के प्रश्न के रूप में नहीं लेते। सत्यकेतु के प्रति स्नेह होने के कारण वे उनकी पुत्री से मिलने की इच्छा को समझते हैं। अगले श्लोक में उसी भावना के अनुसार उनका निर्णय सामने आता है।
श्लोक १८
मूलपाठ
दाक्षिण्येन च विप्रेंद्र प्रेषयामास भूपतिः । पद्मावतीं प्रियां भार्यामुग्रसेनः प्रतापवान् ॥१८॥
शब्दार्थ: दाक्षिण्येन — सौजन्य और उदारता से; च — और; विप्रेन्द्र — हे श्रेष्ठ ब्राह्मण; प्रेषयामास — भेज दिया; भूपतिः — राजा; पद्मावतीम् — पद्मावती को; प्रियम् — प्रिय; भार्याम् — पत्नी को; उग्रसेनः — उग्रसेन; प्रतापवान् — प्रतापशाली।
भावार्थ: प्रतापशाली राजा उग्रसेन ने सौजन्य और स्नेहवश अपनी प्रिय पत्नी पद्मावती को उसके पिता के पास भेज दिया।
व्याख्या: उग्रसेन का निर्णय उनके दाम्पत्य प्रेम और सत्यकेतु के प्रति सम्मान—दोनों के बीच संतुलन दिखाता है। वे पद्मावती को रोकते नहीं, बल्कि उसके माता-पिता से मिलने की व्यवस्था करते हैं।
श्लोक १९
मूलपाठ
प्रेषितानेन राजेंद्र गता पद्मावती स्वकम् । पूर्वं गृहं सती सा तु महाहर्षेण संकुला ॥१९॥
शब्दार्थ: प्रेषिता — भेजी गई; अनेन — इनके द्वारा; राजेन्द्र — हे राजन्; गता — गई; पद्मावती — पद्मावती; स्वकम् — अपने; पूर्वम् गृहम् — पुराने/पैतृक घर को; सती — सद्गुणवती स्त्री; सा तु — वह; महाहर्षेण — महान हर्ष से; संकुला — परिपूर्ण।
भावार्थ: उग्रसेन द्वारा भेजे जाने पर पद्मावती अपने पैतृक घर पहुँची। वह अत्यन्त प्रसन्न थी।
व्याख्या: पद्मावती के लिए पिता का घर परिचित परिवेश था। वहाँ लौटने पर उसे अपने पुराने जीवन, परिवार और स्वतंत्र विहार की स्मृतियों से जुड़ा सुख मिलता है। आगे कथा इसी परिवेश में उसके व्यवहार को दिखाती है।
श्लोक २०
मूलपाठ
पितृपूर्वं कुटुंबं तु ददृशे चारुमंगला । पितुः पादौ ननामाथ शिरसा सत्यतत्परा ॥२०॥
शब्दार्थ: पितृपूर्वम् — पिता सहित; कुटुम्बम् — परिवार को; तु — और; ददृशे — देखा; चारुमङ्गला — सुन्दर और मंगलमयी; पितुः — पिता के; पादौ — दोनों चरणों को; ननाम — प्रणाम किया; अथ — फिर; शिरसा — सिर से; सत्यतत्परा — सत्य में तत्पर।
भावार्थ: पद्मावती ने अपने पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को देखा। उसने श्रद्धापूर्वक अपने पिता के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।
व्याख्या: घर लौटने पर पद्मावती अपने पिता के प्रति आदर प्रकट करती है। इस क्षण तक कथा में उसके व्यवहार को पुत्री के रूप में सम्मानपूर्ण ही दिखाया गया है। आगे के श्लोकों में पिता के घर के सुख और उसकी दिनचर्या का वर्णन आता है।
श्लोक २१
मूलपाठ
आगतायां महाराजा पद्मावत्यां द्विजोत्तम । हर्षेण महताविष्टो विदर्भाधिपतिर्नृपः ॥२१॥
शब्दार्थ: आगतायाम् — आने पर; पद्मावत्याम् — पद्मावती के; महाराजा — महान राजा; द्विजोत्तम — हे श्रेष्ठ ब्राह्मण; हर्षेण — हर्ष से; महता — अत्यधिक; आविष्टः — भर गया; विदर्भाधिपतिः — विदर्भ का राजा; नृपः — राजा।
भावार्थ: पद्मावती के आगमन पर विदर्भ के राजा सत्यकेतु अत्यन्त प्रसन्न हुए।
व्याख्या: पिता की उत्कण्ठा अब पुत्री के आगमन से प्रसन्नता में बदल जाती है। यह प्रसंग माता-पिता और विवाहित पुत्री के बीच बने रहने वाले स्नेह को व्यक्त करता है।
श्लोक २२
मूलपाठ
वर्द्धिता दानमानैश्च वस्त्रालंकारभूषणैः । पद्मावती सुखेनापि पितुर्गेहे प्रवर्तते ॥२२॥
शब्दार्थ: वर्द्धिता — सम्मानित और सत्कृत; दानमानैः — उपहारों और आदर से; च — तथा; वस्त्र — वस्त्रों से; अलंकार-भूषणैः — आभूषणों से; पद्मावती — पद्मावती; सुखेन — सुखपूर्वक; अपि — भी; पितुः गेहे — पिता के घर में; प्रवर्तते — रहती और व्यवहार करती है।
भावार्थ: पिता ने पद्मावती का आदर-सत्कार किया और उसे वस्त्र, आभूषण तथा अन्य उपहार दिए। वह पिता के घर में सुखपूर्वक रहने लगी।
व्याख्या: पद्मावती को पिता के घर में विशेष सम्मान और सुख-सुविधाएँ मिलती हैं। यह वातावरण उसके लिए अत्यन्त प्रिय है। कथा आगे बताती है कि इस सुख में डूबकर वह पहले की तरह निश्चिन्त होकर रहने लगती है।
श्लोक २३
मूलपाठ
सखीभिः सहिता सा तु निःशंका परिवर्तते । रमते सा तदा तत्र यथापूर्वं तथैव च ॥२३॥
शब्दार्थ: सखीभिः सहिता — सखियों के साथ; सा — वह; तु — और; निःशङ्का — निश्चिन्त होकर; परिवर्तते — घूमती-फिरती है; रमते — रमण करती है; सा तदा — वह तब; तत्र — वहाँ; यथापूर्वम् — पहले की तरह; तथैव — उसी प्रकार; च — और।
भावार्थ: पद्मावती अपनी सखियों के साथ निश्चिन्त होकर घूमती-फिरती और पिता के घर में पहले की तरह आनंदपूर्वक समय बिताती थी।
व्याख्या: पितृगृह में पद्मावती को अपने पुराने जीवन का परिचित वातावरण मिलता है। वहाँ वह सखियों के साथ स्वतंत्रतापूर्वक विहार करती है। कथा इस निश्चिन्तता को आगे उसके मोह और व्यवहार में आने वाले परिवर्तन से जोड़ती है।
श्लोक २४
मूलपाठ
गृहे वने तडागेषु प्रासादे च तथैव सा । पुनर्बालेव भूता सा निर्लज्जा संप्रवर्तते ॥२४॥
शब्दार्थ: गृहे — घर में; वने — वन में; तडागेषु — तालाबों में/तालाबों के पास; प्रासादे — महल में; च — और; तथैव — उसी प्रकार; सा — वह; पुनः — फिर; बालैव भूता — बालिका जैसी हो गई; निर्लज्जा — संकोच रहित; संप्रवर्तते — व्यवहार करने लगी।
भावार्थ: वह घर, वन, तालाबों और महल में पहले की तरह घूमती-फिरती थी। वह फिर से बालिका जैसी होकर बिना संकोच के विहार करने लगी।
व्याख्या: इस श्लोक में पद्मावती के व्यवहार में आए परिवर्तन का संकेत है। विवाहित जीवन के बाद वह पिता के घर लौटकर फिर अपने पुराने बाल्यकालीन वातावरण में रम जाती है। बालैव भूता का आशय उसके व्यवहार में पुराने निश्चिन्त ढंग की वापसी से है।
श्लोक २५
मूलपाठ
निःशंका वर्तते विप्र सखीभिः सह सर्वदा । पतिव्रता महाभागा हर्षेण महतान्विता ॥२५॥
शब्दार्थ: निःशङ्का — निश्चिन्त; वर्तते — रहती है; विप्र — हे ब्राह्मण; सखीभिः सह — सखियों के साथ; सर्वदा — सदा; पतिव्रता — पति के प्रति निष्ठावान; महाभागा — सौभाग्यशालिनी; हर्षेण — हर्ष से; महता — महान; अन्विता — युक्त।
भावार्थ: वह अपनी सखियों के साथ सदा निश्चिन्त रहती और बहुत प्रसन्न रहती थी। उसे पतिव्रता तथा सौभाग्यशालिनी भी कहा गया है।
व्याख्या: इस श्लोक में दो बातें साथ आती हैं—पद्मावती का अपने पिता के घर में निश्चिन्त विहार और उसका पतिव्रता होना। कथा के इस चरण में पिता के घर में उसका सुख उसके वैवाहिक जीवन से अलग एक परिचित स्वतंत्रता का अनुभव कराता है। आगे यही सुख उसके मन में मोह उत्पन्न करता है।
श्लोक २६
मूलपाठ
सुखं तु पितृगेहस्य दुर्लभं श्वशुरे गृहे । एवं ज्ञात्वा तदा रेमे कदा ईदृग्भविष्यति ॥२६॥
शब्दार्थ: सुखम् — सुख; तु — निश्चय ही; पितृगेहस्य — पिता के घर का; दुर्लभम् — दुर्लभ; श्वशुरे गृहे — ससुराल के घर में; एवम् ज्ञात्वा — ऐसा जानकर; तदा — तब; रेमे — आनंद लेने लगी; कदा — कब; ईदृक् — ऐसा; भविष्यति — होगा।
भावार्थ: पद्मावती सोचने लगी कि पिता के घर का सुख ससुराल में दुर्लभ है। इस विचार से वह वहाँ और अधिक रमने लगी और मन में सोचती कि ऐसा सुख फिर कब मिलेगा।
व्याख्या: यह अध्याय का निर्णायक बिंदु है। अब पद्मावती केवल पिता के घर में प्रसन्न नहीं है; वह दोनों घरों के सुख की तुलना करने लगती है। पिता के घर की परिचित स्वतंत्रता उसे इतनी प्रिय लगती है कि वह उसके दोबारा मिलने की चिंता करने लगती है। इस प्रकार साधारण प्रसन्नता धीरे-धीरे आसक्ति का रूप लेने लगती है।
श्लोक २७
मूलपाठ
अनेन मोहभावेन क्रीडालुब्धा वरानना । सखीभिः सहिता नित्यं वनेषूपवने तदा ॥२७॥
शब्दार्थ: अनेन — इस; मोहभावेन — मोह की भावना से; क्रीडालुब्धा — विहार के लिए लालायित; वरानना — सुंदर मुख वाली; सखीभिः सहिता — सखियों के साथ; नित्यम् — प्रतिदिन; वनेषु — वनों में; उपवने — उपवनों में; तदा — उस समय।
भावार्थ: पिता के घर के सुख के प्रति मोह के कारण सुंदर मुख वाली पद्मावती विहार में अधिक आसक्त हो गई। वह प्रतिदिन अपनी सखियों के साथ वन और उपवनों में घूमती रहती थी।
व्याख्या: पद्मावती के व्यवहार का वर्णन अब उसके मन में उत्पन्न मोह से जुड़ जाता है। पहले वह पिता के घर आने पर प्रसन्न हुई थी; अब वही प्रसन्नता वहाँ बने रहने और बार-बार उसी सुख का अनुभव करने की इच्छा में बदल रही है। अध्याय इस मानसिक परिवर्तन को स्पष्ट करके समाप्त होता है।
अध्याय ४८ का निष्कर्ष
इस अध्याय में उग्रसेन और पद्मावती के प्रेमपूर्ण दाम्पत्य जीवन से कथा आरम्भ होती है। सत्यकेतु अपनी पुत्री को देखने के लिए बुलाते हैं और उग्रसेन आदरपूर्वक उसे विदर्भ भेज देते हैं। पिता के घर में पद्मावती को पुराना सुख, सखियों का साथ और निश्चिन्त विहार मिलता है।
अध्याय का मुख्य परिवर्तन श्लोक २६–२७ में सामने आता है: पिता के घर का सुख उसे केवल प्रिय नहीं रह जाता, बल्कि वह उस सुख के प्रति आसक्त होने लगती है। इसी मोह के कारण वह बार-बार उसी वातावरण में रमती है। आगे की कथा में यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि यह आसक्ति उसके आचरण और उसके वैवाहिक संबंध को किस दिशा में ले जाती है।
