श्री पद्मपुराण भूमिखण्ड • वेनोपाख्यान मातापितृतीर्थ-माहात्म्य चतुःषष्टितमोऽध्यायः (अध्याय ६४)

श्री पद्मपुराण  भूमिखण्ड  •  वेनोपाख्यान  मातापितृतीर्थ-माहात्म्य  चतुःषष्टितमोऽध्यायः (अध्याय ६४)


श्री पद्मपुराण

भूमिखण्ड  •  वेनोपाख्यान

मातापितृतीर्थ-माहात्म्य

चतुःषष्टितमोऽध्यायः (अध्याय ६४)

 

नहुष-ययाति-चरित्र तथा ययाति-मातलि-संवाद

श्लोक १–९५  •  शब्दार्थ, भावार्थ एवं व्याख्या

 

अध्याय-परिचय

यह श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड में वेनोपाख्यान का चौंसठवाँ अध्याय है और पिछले अध्याय से सीधे जुड़ता है। वहाँ सुकर्मा ने माता-पिता की सेवा की महिमा कहते हुए यदु के सुख और रुरु के पाप का संकेत दिया था; यहाँ पिप्पल वही कथा विस्तार से पूछते हैं और सुकर्मा नहुष-ययाति का चरित्र सुनाते हैं।

अध्याय के वक्ता बदलते रहते हैं—पिप्पल, सुकर्मा, विष्णु, इन्द्र, नारद, ययाति और मातलि। श्लोक १६ से ३० तक 'विष्णुरुवाच' का उद्धरण है, अर्थात् सुकर्मा के कथन के भीतर विष्णु का वह कथन आता है जिसमें नारद इंद्रलोक जाते हैं और ययाति की महिमा सुनाकर इंद्र के भय का कारण बनते हैं। श्लोक ३१ से सुकर्मा फिर अपनी कथा पर लौट आते हैं।

अध्याय दो भागों में बँटा है। पहले भाग (श्लोक १–५२) में कथा है—नहुष का पुण्य और पतन, ययाति का धर्म-राज्य, इंद्र का भय, और मातलि का ययाति को स्वर्ग-निमंत्रण। दूसरे भाग (श्लोक ५३–९५) में संवाद है—ययाति शरीर, आत्मा, पुण्य-पाप और जरा पर प्रश्न पूछते हैं और मातलि उत्तर देते हैं। यहाँ कथा शरीर-विज्ञान और दर्शन में बदल जाती है।

पाठ-संबंध में तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, श्लोक ५३ से ९३ तक का शरीर-वर्णन पुराण-कालीन सांख्य और आयुर्वेद की मान्यताओं पर आधारित है—रस से रक्त, रक्त से वीर्य, वीर्य से देह, और जरा तक की श्रृंखला। आधुनिक जीव-विज्ञान इन रूपांतरणों को इस रूप में स्वीकार नहीं करता, अतः नीचे व्याख्या में इसे उस युग की दृष्टि के रूप में ही प्रस्तुत किया गया है, चिकित्सा-निर्देश के रूप में नहीं। दूसरी, मूल पाठ में कहीं-कहीं वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है (जैसे २–३, ६४–६५, ९४–९५), और कुछ पद संभवतः मुद्रण-भ्रम से विकृत हैं (श्लोक ७, ३४ का 'भूषं' = 'भूपं', श्लोक ५८ का 'सूत' संबोधन); ऐसे स्थानों पर अर्थ-संगति से काम लिया गया है और संकेत दे दिया गया है। तीसरी, श्लोक ९५ केवल आधा है—अध्याय ययाति के उत्तर से ठीक पहले समाप्त हो जाता है।

प्रत्येक श्लोक के नीचे तीन खंड हैं—शब्दार्थ (पदों का अर्थ), भावार्थ (श्लोक का सीधा आशय) और व्याख्या (भाव का विस्तार और संदर्भ)।

श्लोक १

पिप्पल उवाच—

पितुःप्रसादभावाद्वै यदुना सुखमुत्तमम् ।

कथं प्राप्तं सुभुक्तं च तन्मे विस्तरतो वद ॥१॥

 

शब्दार्थ — पितुः प्रसादभावात् वै — पिता के प्रसाद-भाव से; यदुना — यदु के द्वारा; सुखम् उत्तमम् — उत्तम सुख; कथम् प्राप्तम् — कैसे प्राप्त हुआ; सुभुक्तम् — भलीभाँति भोगा गया; तत् मे — वह मुझे; विस्तरतः वद — विस्तार से कहिए।

भावार्थ — पिप्पल बोले—पिता की प्रसन्नता से यदु को उत्तम सुख कैसे प्राप्त हुआ और उसने उसे कैसे भोगा, यह मुझे विस्तार से बताइए।

व्याख्या — यह अध्याय पिछले अध्याय के अंत से सीधे जुड़ता है, जहाँ सुकर्मा ने यदु के सुख और रुरु के पाप का संकेत देकर कथा को अधूरा छोड़ दिया था। पिप्पल का प्रश्न दो भागों में है—पहला फल का (यदु का सुख) और दूसरा कारण का (रुरु का पाप)। यही प्रश्न-उत्तर शैली पूरे अध्याय की रीढ़ है, और कथा इन्हीं दो धागों को पकड़कर आगे बढ़ती है।

 

श्लोक २

कस्मात्पापप्रभावं च रुरुर्भुंक्ते द्विजोत्तम ।

सकलं विस्तरेणापि वद मे कुंडलात्मज ॥२॥

 

शब्दार्थ — कस्मात् — किस कारण से; पापप्रभावम् — पाप के प्रभाव को; च — और; रुरुः — रुरु; भुङ्क्ते — भोगता है; द्विजोत्तम — हे द्विजश्रेष्ठ; सकलम् — सब कुछ; विस्तरेण अपि — विस्तार से भी; वद मे — मुझे कहिए; कुण्डलात्मज — हे कुण्डल-नंदन!

भावार्थ — और रुरु किस कारण पाप का फल भोग रहा है—हे कुण्डल-नंदन, यह सब भी विस्तार से कहिए।

व्याख्या — 'कुण्डलात्मज' संबोधन से सुकर्मा की पहचान होती है—वे कुण्डल नामक ऋषि के पुत्र हैं। प्रश्न 'कस्मात्' से आरंभ होता है, अर्थात् पिप्पल केवल घटना नहीं, कारण जानना चाहते हैं; पुराण की शिक्षण-पद्धति में कारण-जिज्ञासा ही कथा का द्वार है। यहाँ 'रुरु' पिछले अध्याय के अंत में आए पुरुवंशी रुरु हैं, जिन्हें पिता के शाप का फल भोगना पड़ा।

 

श्लोक ३

सुकर्मोवाच—

श्रूयतामभिधास्यामि चरित्रं पापनाशनम् ।

नहुषस्य सुपुण्यस्य ययातेश्च महात्मनः ॥३॥

 

शब्दार्थ — श्रूयताम् — सुना जाए; अभिधास्यामि — मैं कहूँगा; चरित्रम् — चरित/कथा; पापनाशनम् — पाप का नाश करने वाली; नहुषस्य — नहुष का; सुपुण्यस्य — महापुण्यवान का; ययातेः च — और ययाति का; महात्मनः — महात्मा का।

भावार्थ — सुकर्मा बोले—सुनिए, मैं पापों का नाश करने वाला महापुण्यवान नहुष और महात्मा ययाति का चरित्र कहता हूँ।

व्याख्या — 'पापनाशनम्' विशेषण श्रोता को आश्वस्त करता है कि यह कथा केवल मनोरंजन नहीं, श्रवणमात्र से पाप हरने वाली है—यह पुराण-साहित्य की घोषणा-शैली है। कथा का केंद्र दो पीढ़ियाँ हैं, पिता नहुष और पुत्र ययाति; इसी जोड़ी से आगे पितृ-प्रसाद और पितृ-कोप दोनों का उदाहरण मिलेगा।

 

श्लोक ४

सोमवंशात्प्रभूतो हि नहुषो मेदिनीपतिः ।

दानधर्माननेकांश्च चकाराह्यतुलानपि ॥४॥

 

शब्दार्थ — सोमवंशात् — सोमवंश (चंद्रवंश) से; प्रभूतः — उत्पन्न; हि — तो; नहुषः — नहुष; मेदिनीपतिः — पृथ्वी का स्वामी; दानधर्मान् — दान-धर्म; अनेकान् — अनेक; च — और; चकार — किए; अहि — निश्चय ही; अतुलान् अपि — अनुपम भी।

भावार्थ — सोमवंश में उत्पन्न नहुष पृथ्वीपति हुआ, जिसने अनेक अनुपम दान-धर्म किए।

व्याख्या — सोमवंश का उल्लेख वंश-प्रतिष्ठा के लिए है। नहुष का चित्र यहाँ पुण्य के शिखर पर खींचा गया है—दान, धर्म, यज्ञ, सब उसके पास है; यही चित्र आगे उसके पतन को और तीव्र बनाएगा। पुराण की कथा-दृष्टि यही है: पहले महिमा, फिर भ्रष्टता, अंत में शिक्षा।

 

श्लोक ५

मखानामश्वमेधानामियाज शतमुत्तमम् ।

वाजपेयशतं चापि अन्यान्यज्ञाननेकधा ॥५॥

 

शब्दार्थ — मखानाम् — यज्ञों में; अश्वमेधानाम् — अश्वमेध यज्ञों का; इयाज — इष्टवान्, यज्ञ किया; शतम् उत्तमम् — सौ उत्तम; वाजपेयशतम् च अपि — सौ वाजपेय यज्ञ भी; अन्यान् — और; यज्ञान् — यज्ञ; अनेकधा — अनेक प्रकार से।

भावार्थ — उसने सौ उत्तम अश्वमेध, सौ वाजपेय तथा अनेक अन्य यज्ञ अनेक प्रकार से किए।

व्याख्या — सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय—ये संख्याएँ अलौकिक पुण्य-संपत्ति का प्रतीक हैं; वाजपेय की सफलता से इंद्र-पद की प्राप्ति जुड़ी मानी जाती है। यही संकेत आगे कथा की दिशा तय करता है: जो यज्ञ इंद्र-पद देते हैं, उन्हीं के कारण नहुष स्वर्ग पहुँचा और वहीं से गिरा भी।

 

श्लोक ६

आत्मनः पुण्यभावेन इंद्रलोकमवाप सः ।

पुत्रं धर्मगुणोपेतं प्रजापालं चकार सः ॥६॥

 

शब्दार्थ — आत्मनः पुण्यभावेन — अपने पुण्य-भाव से; इन्द्रलोकम् अवाप — इंद्रलोक को प्राप्त हुआ; सः — वह; पुत्रम् — पुत्र को; धर्मगुणोपेतम् — धर्म-गुणों से युक्त; प्रजापालम् — प्रजा का पालक; चकार सः — उसने बनाया।

भावार्थ — अपने पुण्य के प्रभाव से वह इंद्रलोक में गया और अपने धर्मगुण-संपन्न पुत्र को प्रजा-पालन का भार सौंप दिया।

व्याख्या — 'पुण्यभावेन' शब्द कारण बताता है—इंद्रलोक की प्राप्ति उपहार नहीं, पुण्य का स्वाभाविक फल है। साथ ही एक व्यवस्था दिखती है: पिता जब ऊर्ध्वगामी होता है, तब पुत्र को पृथ्वी का भार सौंपता है; यही क्रम आगे ययाति भी दोहराएगा (श्लोक ४२)। राज्य-हस्तांतरण यहाँ उत्तराधिकारी की योग्यता के साथ जोड़कर दिखाया गया है।

 

श्लोक ७

ययातिं सत्यसंपन्नं धर्मवीर्यं महामतिम् ।

एंद्रं पदं गतो राजा तस्य पुत्रः पदे स्वके ॥७॥

 

शब्दार्थ — ययातिम् — ययाति को; सत्यसंपन्नम् — सत्य से युक्त; धर्मवीर्यम् — धर्म में वीर्यवान; महामतिम् — महामति; ऐन्द्रम् पदम् — इंद्र का पद; गतः राजा — राजा (नहुष) गया; तस्य पुत्रः — उसका पुत्र; पदे स्वके — अपने पद पर (स्थापित हुआ)।

भावार्थ — सत्यनिष्ठ, धर्मवीर्य-संपन्न और महामति ययाति—नहुष इंद्रपद को गया और उसका पुत्र अपने राज्य-पद पर प्रतिष्ठित हुआ।

व्याख्या — इस श्लोक का पद-क्रम कुछ टूटा हुआ है, पर आशय स्पष्ट है—पिता का स्थान पुत्र ने लिया। 'सत्यसंपन्न' विशेषण आगे बार-बार दोहराया जाएगा, क्योंकि ययाति के चरित्र का केंद्र सत्य ही है। तुलना ध्यान देने योग्य है: पिता पुण्य के बल पर स्वर्ग गया और पुत्र धर्म के बल पर पृथ्वी पर राज्य करेगा—मार्ग भिन्न, आधार एक।

 

श्लोक ८

ययातिः सत्यसंपन्नः प्रजा धर्मेण पालयेत् ।

स्वयमेव प्रपश्येत्स प्रजाकर्माणि तान्यपि ॥८॥

 

शब्दार्थ — प्रजाः — प्रजा को; धर्मेण पालयेत् — धर्म से पाले; स्वयम् एव — स्वयं ही; प्रपश्येत् — देखे; सः — वह; प्रजाकर्माणि — प्रजा के कर्मों को; तानि अपि — उन सबको भी।

भावार्थ — ययाति सत्यनिष्ठ होकर प्रजा का धर्म से पालन करे और प्रजा के कर्मों को स्वयं ही देखे।

व्याख्या — 'स्वयमेव प्रपश्येत्' पद राजधर्म का सार है—राजा प्रजा के कार्य मध्यस्थों के भरोसे न छोड़े, स्वयं देखे। यह चित्र नहुष के विपरीत रखा गया है, जो स्वर्ग जाकर अपनी स्थिति भूल गया। शास्त्र यहाँ कहता है कि शासन का आधार सत्य है और उसकी कसौटी प्रत्यक्ष निरीक्षण।

 

श्लोक ९

याजयामास धर्मज्ञः श्रुत्वा धर्ममनुत्तमम् ।

यज्ञतीर्थादिकं सर्वं दानपुण्यं चकार सः ॥९॥

 

शब्दार्थ — याजयामास — यज्ञ कराए (याजन किया); धर्मज्ञः — धर्म को जानने वाला; श्रुत्वा — सुनकर; धर्मम् अनुत्तमम् — उत्तम धर्म; यज्ञतीर्थादिकम् — यज्ञ, तीर्थ आदि; सर्वम् — सब; दानपुण्यम् — दान-पुण्य; चकार सः — उसने किया।

भावार्थ — धर्मज्ञ ययाति ने उत्तम धर्म सुनकर यज्ञ कराए तथा यज्ञ, तीर्थ, दान-पुण्य आदि सब कुछ किया।

व्याख्या — 'श्रुत्वा' शब्द महत्वपूर्ण है—ययाति का धर्म अंध-परंपरा नहीं, श्रवण और जानकारी पर आधारित है। 'याजयामास' का अर्थ है उसने स्वयं यज्ञ नहीं किया, ब्राह्मणों से कराया—यह राजा का याजन-कर्म है। यज्ञ, तीर्थ और दान तीनों का समावेश दिखाता है कि उसका धर्म व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों क्षेत्रों में फैला था।

 

श्लोक १०

राज्यं चकार मेधावी सत्यधर्मेण वै तदा ।

यावदशीतिसहस्राणि वर्षाणां नृपनंदनः ॥१०॥

 

शब्दार्थ — राज्यम् चकार — राज्य किया; मेधावी — बुद्धिमान; सत्यधर्मेण — सत्य-धर्म से; वै तदा — उस समय; यावत् अशीतिसहस्राणि वर्षाणाम् — जब तक अस्सी हज़ार वर्ष; नृपनन्दनः — राजा के नंदन।

भावार्थ — बुद्धिमान ययाति ने अस्सी हज़ार वर्षों तक सत्य-धर्म से राज्य किया।

व्याख्या — 'अशीति सहस्र' अर्थात् अस्सी हज़ार वर्ष—पुराण की काल-गणना में यह दिव्य या दीर्घ आयु का सूचक है, ऐतिहासिक अवधि का नहीं। वही संख्या आगे श्लोक ३० में दोहराई जाती है और मातलि भी उसका उल्लेख करते हैं (श्लोक ४९); अर्थात् ययाति का पुण्य-काल पूरा हो चुका है—यही इंद्र के भय का कारण बनेगा।

 

श्लोक ११

तावत्कालं गतं तस्य ययातेस्तु महात्मनः ।

तस्य पुत्राश्च चत्वारस्तद्वीर्यबलविक्रमाः ॥११॥

 

शब्दार्थ — तावत्कालम् — उतना समय; गतम् — बीत गया; तस्य ययातेः — उस ययाति का; महात्मनः — महात्मा का; तस्य पुत्राः च चत्वारः — उसके चार पुत्र; तद्वीर्यबलविक्रमाः — उसी के समान वीर्य, बल और पराक्रम वाले।

भावार्थ — उस महात्मा ययाति का उतना समय बीत गया; उसके चार पुत्र थे, जो वीर्य, बल और पराक्रम में उसी के समान थे।

व्याख्या — कथा अब अगली पीढ़ी की ओर मुड़ती है। 'तद्वीर्यबलविक्रमाः' कहकर सूत बताता है कि पुत्र पिता के प्रतिरूप हैं—पुराण में यह वंश-निरंतरता का प्रतीक है। चार पुत्रों का उल्लेख आगे चंद्रवंश की शाखाओं का बीज है, और यहीं से रुरु की कथा का धागा भी शुरू होता है।

 

श्लोक १२

तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः ।

तस्यासीज्ज्येष्ठपुत्रस्तु रुरुर्नाम महाबलः ॥१२॥

 

शब्दार्थ — तेषाम् नामानि — उनके नाम; वक्ष्यामि — कहूँगा; शृणुष्व — सुनो; एकाग्रमानसः — एकाग्र मन से; तस्य — उसका; आसीत् — था; ज्येष्ठपुत्रः तु — ज्येष्ठ पुत्र तो; रुरुः नाम — रुरु नाम का; महाबलः — महाबल।

भावार्थ — उनके नाम मैं कहता हूँ, एकाग्र मन से सुनो—उसका ज्येष्ठ पुत्र महाबल रुरु था।

व्याख्या — 'एकाग्रमानसः' संबोधन श्रोता को सतर्क करता है, क्योंकि आगे वंशावली आती है जिसे ठीक से सुनना आवश्यक है। रुरु का ज्येष्ठ पुत्र होना महत्वपूर्ण है—ज्येष्ठ होकर भी जिसे शाप भोगना पड़ा, उसकी कथा पिप्पल के दूसरे प्रश्न का उत्तर बनेगी।

 

श्लोक १३

पुरुर्नाम द्वितीयोऽभूत्कुरुश्चान्यस्तृतीयकः ।

यदुर्नाम स धर्मात्मा चतुर्थो नृपतेः सुतः ॥१३॥

 

शब्दार्थ — पुरुः नाम — पुरु नाम; द्वितीयः अभूत् — दूसरा हुआ; कुरुः च — और कुरु; अन्यः तृतीयकः — तीसरा; यदुः नाम — यदु नाम; सः धर्मात्मा — वह धर्मात्मा; चतुर्थः — चौथा; नृपतेः सुतः — राजा का पुत्र।

भावार्थ — दूसरा पुरु, तीसरा कुरु और चौथा धर्मात्मा यदु—ये राजा के पुत्र हुए।

व्याख्या — पुरु, कुरु और यदु—इन तीन नामों से चंद्रवंश की तीन महान शाखाएँ चलीं: यदु से यादव-कुल, पुरु से पौरव-वंश और कुरु से कौरव-पांडव। यदु को यहाँ 'धर्मात्मा' कहा गया है, जो पिप्पल के पहले प्रश्न (यदु के सुख) से सीधे जुड़ता है।

 

श्लोक १४

एवं चत्वारः पुत्राश्च ययातेस्तु महात्मनः ।

तेजसा पौरुषेणापि पितृतुल्यपराक्रमाः ॥१४॥

 

शब्दार्थ — एवम् — इस प्रकार; चत्वारः पुत्राः — चार पुत्र; महात्मनः — महात्मा के; तेजसा — तेज से; पौरुषेण अपि — पुरुषार्थ से भी; पितृतुल्यपराक्रमाः — पिता के समान पराक्रम वाले।

भावार्थ — इस प्रकार महात्मा ययाति के चार पुत्र थे, जो तेज और पुरुषार्थ में पिता के समान पराक्रमी थे।

व्याख्या — यह श्लोक पिछले का पुष्टिकरण है—'पितृतुल्यपराक्रमाः' पद बार-बार आकर यह स्थापित करता है कि ययाति की संतान उससे किसी बात में कम नहीं। इससे आगे की कथा में तुलना का स्वर बनता है: पिता और पुत्र दोनों समर्थ, फिर भी एक शाप भोगता है और दूसरा स्वर्ग जाता है—अंतर केवल पुण्य-पाप का रह जाता है।

 

श्लोक १५

एवं राज्यं कृतं तेन धर्मेणापि ययातिना ।

तस्य कीर्तिर्यशो भावस्त्रैलोक्ये प्रचुरोभवत् ॥१५॥

 

शब्दार्थ — एवम् राज्यम् कृतम् — इस प्रकार राज्य किया; तेन — उसने; धर्मेण अपि — धर्म से भी; तस्य — उसकी; कीर्तिः यशः — कीर्ति और यश; भावः — प्रभाव; त्रैलोक्ये — तीनों लोकों में; प्रचुरः अभवत् — विस्तृत हो गया।

भावार्थ — इस प्रकार ययाति ने धर्म से राज्य किया और उसकी कीर्ति तथा यश तीनों लोकों में फैल गया।

व्याख्या — यहाँ तक की कथा नहुष-ययाति की महिमा का चित्र है, जो आगे के प्रसंग का आधार बनता है। तीनों लोकों में यश फैलने का अर्थ यह भी है कि इंद्र तक को उसकी सूचना मिली—और यही सूचना आगे भय का बीज बनेगी।

 

श्लोक १६

विष्णुरुवाच—

एकदा तु द्विजश्रेष्ठो नारदो ब्रह्मनंदनः ।

एंद्रं लोकं गतो राजन्द्रष्टुं चैव पुरंदरम् ॥१६॥

 

शब्दार्थ — एकदा — एक बार; द्विजश्रेष्ठः — द्विजश्रेष्ठ; नारदः — नारद; ब्रह्मनन्दनः — ब्रह्मा के पुत्र; ऐन्द्रम् लोकम् गतः — इंद्रलोक में गए; राजन् — हे राजन्!; द्रष्टुम् — देखने; च एव — और; पुरन्दरम् — इंद्र को।

भावार्थ — हे राजन्! एक बार ब्रह्मा के पुत्र द्विजश्रेष्ठ नारद इंद्र को देखने इंद्रलोक में गए।

व्याख्या — 'विष्णुरुवाच' से कथा का दृष्टिकोण बदल जाता है—अब वक्ता स्वयं विष्णु हैं और 'राजन्' संबोधन उनके श्रोता की ओर संकेत करता है; अर्थात् सुकर्मा के कथन के भीतर विष्णु का यह कथन उद्धृत है। नारद का आगमन पुराण में सदैव कथा-संचालन का साधन होता है—वे देवताओं के दूत भी हैं और सूचना-वाहक भी।

 

श्लोक १७

सहस्राक्षस्ततोपश्यद्धुताशनसमप्रभम् ।

देवो विप्रं समायांतं सर्वज्ञं ज्ञानपंडितम् ॥१७॥

 

शब्दार्थ — सहस्राक्षः — हज़ार नेत्रों वाले इंद्र; ततः अपश्यत् — तब देखा; हुताशनसमप्रभम् — अग्नि के समान तेज वाले; देवः — देवता; विप्रम् — ब्राह्मण को; समायान्तम् — आते हुए; सर्वज्ञम् — सर्वज्ञ; ज्ञानपण्डितम् — ज्ञान में पंडित।

भावार्थ — हज़ार नेत्रों वाले इंद्र ने अग्नि-तुल्य तेजस्वी, सर्वज्ञ और ज्ञान-पंडित ब्राह्मण नारद को आते देखा।

व्याख्या — 'हुताशनसमप्रभम्' उपमा नारद के तेज को दिखाती है—ब्रह्मचर्य और ज्ञान से उत्पन्न तेज, जिसके सामने इंद्र की सामर्थ्य भी छोटी लगती है। 'सर्वज्ञ' और 'ज्ञानपंडित' विशेषण आगे के प्रश्नोत्तर को अर्थ देते हैं: जो सर्वज्ञ है, वही तीनों लोकों का समाचार इंद्र को दे सकता है।

 

श्लोक १८

पूजितं मधुपर्काद्यैर्भक्त्या नमितकंधरः ।

निवेश्य चासने पुण्ये पप्रच्छ मुनिपुंगवम् ॥१८॥

 

शब्दार्थ — पूजितम् — पूजित, सत्कृत; मधुपर्काद्यैः — मधुपर्क आदि से; भक्त्या — भक्ति से; नमितकन्धरः — झुके हुए गले वाला, प्रणाम करता हुआ; निवेश्य — बैठाकर; आसने पुण्ये — पवित्र आसन पर; पप्रच्छ — पूछा; मुनिपुङ्गवम् — मुनिश्रेष्ठ से।

भावार्थ — इंद्र ने नारद का मधुपर्क आदि से भक्तिपूर्वक स्वागत किया, उन्हें पवित्र आसन पर बैठाया और प्रणाम करके मुनिश्रेष्ठ से पूछा।

व्याख्या — मधुपर्क अतिथि-सत्कार का सर्वोच्च रूप है—मधु, दही, घी आदि मिलाकर दिया जाने वाला स्वागत-द्रव्य। इंद्र के 'नमितकंधर' होने से दिखता है कि देवराज भी ब्रह्मज्ञानी के सामने विनम्र हैं। यह सत्कार-वर्णन केवल शिष्टाचार नहीं—यह बताता है कि आगे जो भय इंद्र प्रकट करेंगे, वह नारद के वचन पर विश्वास के कारण है।

 

श्लोक १९

इंद्र उवाच—

कस्मादागमनं तेद्य किमर्थमिह चागतः ।

किं ते हि सुप्रियं विप्र करोम्यद्य महामुने ॥१९॥

 

शब्दार्थ — कस्मात् — किस कारण; आगमनम् ते अद्य — आज आपका आगमन; किमर्थम् — किस प्रयोजन से; इह च आगतः — यहाँ आए; किम् ते हि सुप्रियम् — आपका जो प्रिय हो; विप्र — हे विप्र; करोमि अद्य — आज करूँ; महामुने — हे महामुनि।

भावार्थ — हे महामुनि! आज आपका आगमन किस कारण से हुआ, किस प्रयोजन से आप यहाँ आए? हे विप्र! आपका जो प्रिय हो, वह आज मैं करूँ।

व्याख्या — इंद्र का प्रश्न तीन भागों में है—आगमन का कारण, उसका प्रयोजन और उसकी पूर्ति। 'किं ते सुप्रियं करोमि' वाक्य अतिथि-सेवा का शास्त्रीय सूत्र है: पहले कारण पूछो, फिर सेवा का प्रस्ताव दो। यही विनम्रता आगे के उत्तर को संवाद बनाती है, अन्यथा नारद का समाचार आदेश जैसा लगता।

 

श्लोक २०

नारद उवाच—

देवराज कृतं सर्वं भक्त्या यच्च प्रभाषितम् ।

संतुष्टोस्मि महाप्राज्ञ प्रश्नोत्तरं वदाम्यहम् ॥२०॥

 

शब्दार्थ — देवराज — हे देवराज; कृतम् सर्वम् — सब कुछ किया गया; भक्त्या — भक्ति से; यत् च प्रभाषितम् — जो कहा गया; सन्तुष्टः अस्मि — मैं संतुष्ट हूँ; महाप्राज्ञ — हे महाप्राज्ञ; प्रश्नोत्तरम् — प्रश्न का उत्तर; वदामि अहम् — मैं कहता हूँ।

भावार्थ — हे देवराज! जो आपने भक्ति से कहा, वह सब हो गया—मैं संतुष्ट हूँ; अब आपके प्रश्न का उत्तर कहता हूँ।

व्याख्या — नारद पहले सत्कार की सराहना करते हैं, फिर उत्तर देते हैं—यह संवाद-शिष्टाचार है। 'सन्तुष्टोऽस्मि' कहकर वे इंद्र को आश्वस्त करते हैं कि उत्तर कठोर होने पर भी वह शत्रुता से नहीं, संतोष से आ रहा है। आगे जो समाचार इंद्र के लिए भय का कारण बनेगा, उसकी निर्मलता यहीं सुनिश्चित कर दी जाती है।

 

श्लोक २१

महीलोकात्सुसंप्राप्तः सांप्रतं तव मंदिरम् ।

त्वामन्वेष्टुं समायातो दृष्ट्वा नाहुषमेव च ॥२१॥

 

शब्दार्थ — महीलोकात् — पृथ्वीलोक से; सुसंप्राप्तः — भलीभाँति आया हुआ; सांप्रतम् — अभी; तव मन्दिरम् — तुम्हारे महल को; त्वाम् अन्वेष्टुम् — तुम्हें खोजने; समायातः — आया हूँ; दृष्ट्वा — देखकर; नाहुषम् एव च — नहुष-संबंधी (ययाति) को भी।

भावार्थ — मैं पृथ्वीलोक से चलकर अभी तुम्हारे महल में आया हूँ; तुम्हें खोजने आया था और रास्ते में नहुष-पुत्र को भी देख आया हूँ।

व्याख्या — 'नाहुष' शब्द यहाँ ययाति के लिए आया है—यही शब्द आगे इंद्र के भय को जन्म देगा। नारद का कथन सरल है, पर उसमें सूचना का भार है: वे पृथ्वी से आए हैं, इसलिए पृथ्वी का हाल उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। यह 'दूत-प्रसंग' आगे की सारी घटनाओं का संधि-बिंदु है।

 

श्लोक २२

इंद्र उवाच—

सत्यधर्मेण को राजा प्रजाः पालयते सदा ।

सर्वधर्मसमायुक्तः श्रुतवाञ्ज्ञानवान्गुणी ॥२२॥

 

शब्दार्थ — सत्यधर्मेण — सत्य-धर्म से; कः राजा — कौन राजा; प्रजाः पालयते सदा — प्रजा का सदा पालन करता है; सर्वधर्मसमायुक्तः — सब धर्मों से युक्त; श्रुतवान् — विद्या जानने वाला; ज्ञानवान् — ज्ञानवान; गुणी — गुणी।

भावार्थ — पृथ्वी पर वह कौन राजा है जो सत्य-धर्म से सदा प्रजा का पालन करता है, सब धर्मों से युक्त, विद्या और ज्ञान से संपन्न तथा गुणी है?

व्याख्या — इंद्र का प्रश्न आदर्श राजा की छह कसौटियाँ गिनाता है—सत्यधर्म, प्रजापालन, सर्वधर्म, विद्या, ज्ञान और गुण। ध्यान दें कि वे यह नहीं पूछ रहे कि 'कौन शक्तिशाली है', बल्कि यह पूछ रहे हैं कि 'कौन धर्मी है'—क्योंकि इंद्रपद का योग्यता-मापदंड धर्म ही है।

 

श्लोक २३

पृथिव्यामस्ति को राजा वेदज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।

ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो यज्वा दाता सुभक्तिमान् ॥२३॥

 

शब्दार्थ — पृथिव्याम् — पृथ्वी पर; अस्ति कः राजा — कोई राजा है क्या; वेदज्ञः — वेद जानने वाला; ब्राह्मणप्रियः — ब्राह्मणों का प्रिय; ब्रह्मण्यः — ब्राह्मण-हितकारी; वेदवित् — वेद का ज्ञाता; शूरः — वीर; यज्वा — यज्ञ करने वाला; दाता — दानी; सुभक्तिमान् — भक्तियुक्त।

भावार्थ — पृथ्वी पर क्या कोई ऐसा राजा है जो वेदज्ञ, ब्राह्मणप्रिय, ब्रह्मण्य, वेदवित्, वीर, यज्ञशील, दानी और भक्तियुक्त हो?

व्याख्या — विशेषणों की सूची और लंबी हो जाती है—अब वेदज्ञता, ब्रह्मण्यता, वीरता, यज्ञशीलता, दानशीलता और भक्ति जुड़ती हैं। 'ब्रह्मण्य' का अर्थ है ब्राह्मण-संरक्षक, पर पक्षपाती नहीं—यह भेद राजनीतिक चेतना दर्शाता है। प्रश्नों का क्रम यह भी दिखाता है कि इंद्र ययाति की चर्चा पहले से सुन चुके हैं और उसकी योग्यता जाँच रहे हैं।

 

श्लोक २४

नारद उवाच—

एभिर्गुणैस्तु संयुक्तो नहुषस्यात्मजो बली ।

यस्य सत्येन वीर्येण सर्वे लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥२४॥

 

शब्दार्थ — एभिः गुणैः तु संयुक्तः — इन गुणों से युक्त; नहुषस्य आत्मजः — नहुष का पुत्र; बली — बलवान; यस्य सत्येन वीर्येण — जिसके सत्य और वीर्य से; सर्वे लोकाः — सब लोक; प्रतिष्ठिताः — प्रतिष्ठित हैं।

भावार्थ — इन सब गुणों से युक्त नहुष का पुत्र बलवान है—जिसके सत्य और वीर्य से सब लोक प्रतिष्ठित हैं।

व्याख्या — नारद उत्तर को सत्य और वीर्य पर टिका देते हैं—ययाति के कारण लोक व्यवस्थित हैं। यह प्रशंसा साधारण नहीं, क्योंकि इंद्र का पद भी सत्य-वीर्य से ही सुरक्षित माना जाता है; अर्थात् पुत्र उसी मापदंड पर खरा उतरता है जिस पर पिता बैठा है। यहीं से इंद्र के मन में भय का बीज पड़ता है।

 

श्लोक २५

भवादृशो हि भूर्लोके ययातिर्नहुषात्मजः ।

भवान्स्वर्गे स चैवास्ति भूतले भूतिवर्धनः ॥२५॥

 

शब्दार्थ — भवादृशः हि — आपके समान ही; भूर्लोके — पृथ्वीलोक में; ययातिः नहुषात्मजः — नहुष-पुत्र ययाति; भवान् स्वर्गे — आप स्वर्ग में; सः च एव अस्ति भूतले — और वह पृथ्वी पर है; भूतिवर्धनः — समृद्धि बढ़ाने वाला।

भावार्थ — पृथ्वीलोक में आपके समान ही नहुष-पुत्र ययाति है—आप स्वर्ग में हैं और वह पृथ्वी पर, समृद्धि बढ़ाने वाला।

व्याख्या — 'भवादृशः' उपमा सबसे भारी पड़ती है—नारद ययाति को इंद्र के बराबर रख देते हैं, केवल लोक का भेद रह जाता है। इंद्र के लिए यह प्रशंसा भी है और चेतावनी भी: जो मेरे समान है, वह मेरे पद का दावेदार भी हो सकता है। कथा की तीव्रता यहीं से आरंभ होती है।

 

श्लोक २६

पितुः श्रेष्ठो महाराज ह्यश्वमेधशतं तथा ।

वाजपेयशतं चक्रे ययातिः पृथिवीपतिः ॥२६॥

 

शब्दार्थ — पितुः श्रेष्ठः — पिता से भी श्रेष्ठ; महाराज — हे महाराज; हि — तो; अश्वमेधशतम् — सौ अश्वमेध; तथा — वैसे ही; वाजपेयशतम् — सौ वाजपेय; चक्रे — किए; ययातिः पृथिवीपतिः — पृथ्वीपति ययाति।

भावार्थ — हे महाराज! वह पृथ्वीपति ययाति पिता से भी श्रेष्ठ है—उसने सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ किए।

व्याख्या — 'पितुः श्रेष्ठः' पद तुलना को स्पष्ट कर देता है—पुत्र पिता से आगे निकल गया। यह पुण्य-संपत्ति की पुनरावृत्ति है (देखिए श्लोक ५), पर अब यह नहुष के लिए नहीं, ययाति के लिए कही जा रही है। इंद्र के भय का दूसरा कारण यही है: पिता ने इन्हीं यज्ञों से इंद्रपद पाया था, और पुत्र ने उससे भी अधिक किए हैं।

 

श्लोक २७

दत्तान्यनेकरूपाणि दानानि तेन भक्तितः ।

गवां लक्षसहस्राणि गवां कोटिशतानि च ॥२७॥

 

शब्दार्थ — दत्तानि — दिए गए; अनेकरूपाणि — अनेक प्रकार के; दानानि — दान; तेन भक्तितः — उसने भक्तिपूर्वक; गवाम् लक्षसहस्राणि — लाखों गायें; गवाम् कोटिशतानि च — और करोड़ों गायें।

भावार्थ — उसने भक्तिपूर्वक अनेक प्रकार के दान दिए—लाखों और करोड़ों गायें दान कीं।

व्याख्या — गोदान पुराण-काल में सर्वश्रेष्ठ दान माना जाता है, क्योंकि गाय जीवन-आधार है। 'लक्षसहस्र' और 'कोटिशत' जैसी संख्याएँ अलौकिकता के सूचक हैं, ऐतिहासिक गणना के नहीं। यज्ञ और दान का साथ आना बताता है कि ययाति का पुण्य केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं—वह जन-कल्याण तक पहुँचता है।

 

श्लोक २८

कोटिहोमांश्चकाराथ लक्षहोमांस्तथैव च ।

भूमिदानादि दानानि ब्राह्मणेभ्योददाच्च यः ॥२८॥

 

शब्दार्थ — कोटिहोमान् — करोड़ होम; चकार — किए; अथ — तथा; लक्षहोमान् — लाख होम; तथैव च — वैसे ही; भूमिदानादि दानानि — भूमिदान आदि दान; ब्राह्मणेभ्यः अददात् — ब्राह्मणों को दिए; च यः — जिसने।

भावार्थ — उसने करोड़ों और लाखों होम किए तथा भूमिदान आदि दान ब्राह्मणों को दिए।

व्याख्या — होम-संख्या का बढ़ता क्रम यज्ञ-परंपरा की विशालता दिखाता है; भूमिदान को अलग से गिनाया जाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि भूमि स्थायी संपत्ति है—उसका दान सबसे कठिन और सबसे फलदायी माना जाता है। यह सूची पाठक के मन में ययाति की पुण्य-संपत्ति को बढ़ा देती है, जिससे आगे का भय और गिरावट दोनों तीव्र होते हैं।

 

श्लोक २९

सर्वं येन स्वरूपं हि धर्मस्य परिपालितम् ।

एवं गुणैः समायुक्तो ययातिर्नहुषात्मजः ॥२९॥

 

शब्दार्थ — सर्वम् येन — जिसने सब; स्वरूपम् हि — स्वरूप को ही; धर्मस्य — धर्म का; परिपालितम् — भलीभाँति पाला; एवम् गुणैः समायुक्तः — इस प्रकार गुणों से युक्त।

भावार्थ — जिसने धर्म के सब स्वरूपों का भलीभाँति पालन किया—इस प्रकार गुणों से युक्त (वह ययाति)।

व्याख्या — 'धर्मस्य स्वरूपं परिपालितम्' अर्थात् उसने धर्म के किसी एक अंग को नहीं, पूरे शरीर को पाला—सत्य, दान, यज्ञ, प्रजापालन, ब्रह्मण्यता, सब। यह वाक्य इंद्र के पिछले प्रश्नों का सीधा उत्तर है: जो सब धर्मों से युक्त है, वही ययाति है। अब नारद का उत्तर पूरा होता है और इंद्र का भय आरंभ।

 

श्लोक ३०

वर्षाणां तु सहस्राणि अशीतिर्नृपसत्तमः ।

राज्यं चकार सत्येन यथा दिवि भवानिह ॥३०॥

 

शब्दार्थ — वर्षाणाम् तु सहस्राणि अशीतिः — अस्सी हज़ार वर्ष; नृपसत्तमः — नृपश्रेष्ठ; राज्यम् चकार — राज्य किया; सत्येन — सत्य से; यथा दिवि भवान् इह — जैसे स्वर्ग में आप, वैसे यहाँ।

भावार्थ — वह नृपश्रेष्ठ अस्सी हज़ार वर्ष तक सत्य से ऐसे राज्य करता रहा जैसे स्वर्ग में आप राज्य करते हैं।

व्याख्या — 'यथा दिवि भवान् इह'—स्वर्ग के शासन और पृथ्वी के शासन को एक सीध में रख दिया गया। यह उपमा इंद्र के लिए असह्य है, क्योंकि इसका अर्थ यह है कि पृथ्वी पर वही व्यवस्था चल रही है जो स्वर्ग में इंद्र चलाता है—पद दो, पर शासन एक। यहीं से इंद्र का निर्णय आकार लेता है।

 

श्लोक ३१

सुकर्मोवाच—

एवमाकर्ण्य देवेंद्रो नारदात्स मुनीश्वरात् ।

समालोच्य स मेधावी संभीतो धर्मपालनात् ॥३१॥

 

शब्दार्थ — एवम् आकर्ण्य — ऐसा सुनकर; देवेन्द्रः — इंद्र; नारदात् मुनीश्वरात् — मुनिश्रेष्ठ नारद से; समालोच्य — विचार करके; सः मेधावी — वह बुद्धिमान; सम्भीतः — भयभीत; धर्मपालनात् — धर्म-पालन के कारण।

भावार्थ — मुनिश्रेष्ठ नारद से यह सुनकर बुद्धिमान इंद्र विचार करके भयभीत हो गया—ययाति के धर्म-पालन के कारण।

व्याख्या — 'धर्मपालनात्' यहाँ कारण बताता है—भय ययाति की शक्ति से नहीं, उसके धर्म से है। यह पुराण की गहरी राजनीतिक अंतर्दृष्टि है: पद का असली खतरा बल नहीं, धर्म है, क्योंकि पद धर्म के आधार पर ही मिलता है। 'समालोच्य' कहकर सूत बताता है कि इंद्र का भय विचारपूर्वक है, आवेगजनित नहीं।

 

श्लोक ३२

शतयज्ञप्रभावेण नहुषो हि पुरा मम ।

एंद्रं पदं गतो वीरो देवराजोभवत्पुरा ॥३२॥

 

शब्दार्थ — शतयज्ञप्रभावेण — सौ यज्ञों के प्रभाव से; नहुषः हि पुरा — नहुष ने पहले; मम — मेरा; ऐन्द्रम् पदम् — इंद्र-पद; गतः वीरः — प्राप्त किया, वह वीर; देवराजः अभवत् पुरा — पहले देवराज बना।

भावार्थ — पहले नहुष सौ यज्ञों के प्रभाव से मेरा इंद्रपद प्राप्त करके देवराज बन गया था।

व्याख्या — यहाँ इंद्र अपने अनुभव से चेतावनी देते हैं—मेरा पद पहले भी जा चुका है, और जाने वाला कोई और नहीं, इसी ययाति का पिता था। 'मम' पद पद के प्रति मोह भी दिखाता है और भय की सच्चाई भी। कथा में यह पंक्ति ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देती है, जिससे वर्तमान भय तर्कसंगत लगने लगता है।

 

श्लोक ३३

शची बुद्धिप्रभावेण पदभ्रष्टो व्यजायत ।

तादृशोयं महाराजः पितुस्तुल्यपराक्रमः ॥३३॥

 

शब्दार्थ — शचीबुद्धिप्रभावेण — शची की बुद्धि के प्रभाव से; पदभ्रष्टः व्यजायत — पद से भ्रष्ट हो गया; तादृशः अयम् — ऐसा यह; महाराजः — महाराज; पितुः तुल्यपराक्रमः — पिता के समान पराक्रम वाला।

भावार्थ — शची की बुद्धि के प्रभाव से वह पद से भ्रष्ट हुआ था; और यह महाराज तो पिता के समान ही पराक्रमी है।

व्याख्या — यह पंक्ति नहुष-पतन की प्रसिद्ध कथा की ओर संकेत करती है—शची के प्रति मोह और उसके कारण शाप से नहुष इंद्रपद से गिरा। इंद्र का तर्क यह है: जो पिता बुद्धि से गिरा, उसका पुत्र यदि पिता से बढ़कर पराक्रमी है तो पद का दावा और प्रबल होगा। यहाँ इंद्र का भय केवल राजनीतिक नहीं, आत्म-संरक्षण का है।

 

श्लोक ३४

प्राप्स्यते नात्र संदेहः पदमैंद्रं न संशयः ।

येन केनाप्युपायेन तं भूषं दिवमानये ॥३४॥

 

शब्दार्थ — प्राप्स्यते — वह प्राप्त करेगा; न अत्र संदेहः — इसमें संदेह नहीं; पदम् ऐन्द्रम् — इंद्र-पद; न संशयः — संशय नहीं; येन केन अपि उपायेन — किसी भी उपाय से; तम् भूपम् — उस राजा को (पाठ में 'भूषं'); दिवम् आनये — स्वर्ग में ले आऊँ।

भावार्थ — वह इंद्रपद को प्राप्त करेगा—इसमें संदेह नहीं; इसलिए किसी भी उपाय से मैं उस राजा को स्वर्ग में ले आऊँ।

व्याख्या — 'येन केनापि उपायेन' पद इंद्र के भय की सीमा दिखाता है—जब पद जाता दिखे तो उपाय का विवेक छूट जाता है। ध्यान दें कि इंद्र का समाधान बुरा नहीं—वे ययाति को स्वर्ग बुलाकर पद का सहभागी बना देते हैं; पर प्रेरणा भय है, उदारता नहीं। 'भूषं' पाठ 'भूपं' (राजा) का स्पष्ट पाठांतर है।

 

श्लोक ३५

इत्येवं चिंतयामास तस्माद्भीतः सुरेश्वरः ।

भूपालस्य नृपश्रेष्ठ ययातेः सुमहद्भयात् ॥३५॥

 

शब्दार्थ — इति एवम् चिन्तयामास — इस प्रकार विचार किया; तस्मात् भीतः — उससे भयभीत; सुरेश्वरः — देवों का स्वामी; भूपालस्य — राजा के; नृपश्रेष्ठ — हे नृपश्रेष्ठ; ययातेः सुमहत् भयात् — ययाति के अत्यधिक भय से।

भावार्थ — हे नृपश्रेष्ठ! देवेश्वर इंद्र ययाति के अत्यधिक भय से इस प्रकार विचार करने लगा।

व्याख्या — 'सुमहद्भयात्' पद इंद्र की स्थिति स्पष्ट कर देता है—वह भय अकारण नहीं, नारद के प्रत्यक्ष वर्णन पर आधारित है। यहाँ पुराण की एक सूक्ष्म बात उभरती है: पुण्य-शक्ति के सामने देवता भी असुरक्षित अनुभव करते हैं, क्योंकि देवत्व स्वयं पुण्य-फल है, स्थायी पद नहीं।

 

श्लोक ३६

तमानेतुं ततो दूतं प्रेषयामास देवराट् ।

नहुषस्य विमानं तु सर्वकामसमन्वितम् ॥३६॥

 

शब्दार्थ — तम् आनेतुम् — उसे लाने के लिए; ततः — तब; दूतम् — दूत; प्रेषयामास — भेजा; देवराट् — देवराज; नहुषस्य विमानम् — नहुष का विमान; तु — तो; सर्वकामसमन्वितम् — सब कामनाओं से युक्त।

भावार्थ — तब देवराज ने उसे लाने के लिए दूत भेजा—नहुष का वह विमान, जो सब कामनाओं से संपन्न था।

व्याख्या — विमान नहुष का ही भेजा गया—यह विवरण सांकेतिक है: जिस पद से पिता गिरा था, उसी पद का वाहन पुत्र को बुलाने जाता है। 'सर्वकामसमन्वित' विमान स्वर्ग-सुख का प्रतीक है और साथ ही प्रलोभन भी—इंद्र जानते हैं कि भय की अपेक्षा प्रलोभन अधिक प्रभावी होता है।

 

श्लोक ३७

सारथिं मातलिं नाम विमानेन समन्वितम् ।

गतो हि मातलिस्तत्र यत्रास्ते नहुषात्मजः ॥३७॥

 

शब्दार्थ — सारथिम् मातलिं नाम — मातलि नाम का सारथी; विमानेन समन्वितम् — विमान के साथ; गतः हि — गया; मातलिः तत्र — मातलि वहाँ; यत्र आस्ते नहुषात्मजः — जहाँ नहुष का पुत्र है।

भावार्थ — मातलि नामक सारथी उस विमान के साथ वहाँ गया जहाँ नहुष-पुत्र ययाति था।

व्याख्या — मातलि इंद्र का सारथी है—अर्थात् देवराज ने अपना सबसे विश्वसनीय व्यक्ति भेजा। आगे मातलि ही ययाति का वार्ताकार और शास्त्र-वक्ता दोनों बनेगा; अध्याय का दार्शनिक भाग इसी संवाद से बनेगा, जिसमें शरीर, आत्मा, जरा और मृत्यु पर चर्चा होगी।

 

श्लोक ३८

प्रहितः सुरराजेन समानेतुं महामतिम् ।

सभायां वर्त्तमानस्तु यथा इंद्र प्रःशोभते ॥३८॥

 

शब्दार्थ — प्रहितः — भेजा गया; सुरराजेन — इंद्र के द्वारा; समानेतुम् — लाने के लिए; महामतिम् — महामति को; सभायाम् वर्तमानः तु — सभा में विराजमान; यथा इन्द्रः प्रःशोभते — जैसे इंद्र शोभित होता है।

भावार्थ — इंद्र ने उसे लाने के लिए भेजा; उस समय ययाति अपनी सभा में ऐसे शोभित हो रहा था जैसे इंद्र (अपनी सभा में)।

व्याख्या — सभा का दृश्य महत्वपूर्ण है—ययाति राजसभा में बैठा है और उसकी शोभा इंद्र की शोभा से तुलनीय है। यह उपमा श्लोक ३० की पुनरावृत्ति है और दिखाती है कि पृथ्वी पर इंद्र-तुल्य शासन का चित्र केवल प्रशंसा नहीं, स्थिति का वर्णन है।

 

श्लोक ३९

तथा ययातिर्धर्मात्मा स्वसभायां विराजते ।

तमुवाच महात्मानं राजानं सत्यभूषणम् ॥३९॥

 

शब्दार्थ — तथा — वैसे ही; ययातिः धर्मात्मा — धर्मात्मा ययाति; स्वसभायाम् विराजते — अपनी सभा में विराजमान है; तम् उवाच — उससे कहा; महात्मानम् — महात्मा से; राजानम् — राजा से; सत्यभूषणम् — सत्य से भूषित।

भावार्थ — धर्मात्मा ययाति अपनी सभा में वैसे ही विराजमान था; सत्य से भूषित उस महात्मा राजा से (मातलि ने) कहा।

व्याख्या — 'सत्यभूषणम्' विशेषण ययाति का आभूषण बताता है—उसका भूषण स्वर्ण नहीं, सत्य है; और यही आगे के संवाद में उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनेगा, जहाँ वह मातलि से प्रश्न पूछकर सत्य का अनुसंधान करेगा।

 

श्लोक ४०

सारथिर्देवराजस्य शृणु राजन्वचो मम ।

प्रहितो देवराजेन सकाशं तव सांप्रतम् ॥४०॥

 

शब्दार्थ — सारथिः देवराजस्य — देवराज का सारथी; शृणु राजन् वचः मम — हे राजन्, मेरा वचन सुनो; प्रहितः देवराजेन — देवराज ने भेजा है; सकाशम् तव सांप्रतम् — अभी तुम्हारे पास।

भावार्थ — हे राजन्! देवराज का सारथी (मैं) कहता हूँ—मेरी बात सुनो; देवराज ने मुझे अभी तुम्हारे पास भेजा है।

व्याख्या — दूत-धर्म के अनुसार मातलि पहले अपनी पहचान और प्रेषक बताता है, फिर संदेश। यह क्रम शिष्टाचार भी है और राजनीति भी—संदेश का भार प्रेषक के अधिकार से आता है। 'शृणु' से आरंभ करना बताता है कि आगे कही बात अनुरोध नहीं, ऐसा निमंत्रण है जिसे अस्वीकार करना कठिन है।

 

श्लोक ४१

यद्ब्रूते देवराजस्तु तत्सर्वं सुमनाः कुरु ।

आगंतव्यं त्वया देव एंद्रं लोकं हि नान्यथा ॥४१॥

 

शब्दार्थ — यत् ब्रूते देवराजः तु — जो देवराज कहते हैं; तत् सर्वम् सुमनाः कुरु — वह सब प्रसन्न मन से करो; आगन्तव्यम् त्वया — तुम्हें आना चाहिए; देवम् ऐन्द्रम् लोकम् — दिव्य इंद्रलोक में; हि न अन्यथा — और अन्यथा नहीं।

भावार्थ — देवराज जो कहते हैं, वह सब प्रसन्नता से करो—तुम्हें दिव्य इंद्रलोक में आना ही होगा, अन्यथा नहीं।

व्याख्या — 'नान्यथा' पद निमंत्रण को आदेश के निकट ले जाता है—यह अनुरोध का विनम्र आवरण है। 'सुमनाः' कहकर मातलि ययाति को मन से सहमत होने का परामर्श देता है, क्योंकि बाध्यता में आया हुआ भी अप्रसन्न मन से आए तो स्वर्ग-सुख का फल नहीं मिलता।

 

श्लोक ४२

पुत्रे राज्यं विसृज्यैव कृत्वा चांतेष्टिमुत्तमाम् ।

इलो राजा महातेजा वसते नहुषात्मज ॥४२॥

 

शब्दार्थ — पुत्रे राज्यम् विसृज्य एव — पुत्र को राज्य सौंपकर; कृत्वा च अन्तेष्टिम् उत्तमाम् — और उत्तम अंतेष्टि करके; इलः राजा महातेजाः — महातेजस्वी राजा इल; वसते नहुषात्मज — नहुष-पुत्र (के पास) रहते हैं।

भावार्थ — पुत्र को राज्य सौंपकर और उत्तम अंतेष्टि करके (तुम आओ)—महातेजस्वी राजा इल नहुष-पुत्र के पास (स्वर्ग में) रहते हैं।

व्याख्या — 'अन्तेष्टि' का अर्थ यहाँ जीवन के अंत में किया जाने वाला यज्ञ या यज्ञ-चक्र का समापन है—अर्थात् गृहस्थ-जीवन को विधिपूर्वक पूरा करके ही स्वर्ग जाना चाहिए। मातलि ययाति के सामने स्वर्ग में पहले से रहने वाले राजाओं की सूची रखना शुरू करता है, जिससे निमंत्रण 'अपरिचित स्थान' का भय दूर कर दे।

 

श्लोक ४३

पुरूरवा महावीर्यो विप्रचित्तिर्महामनाः ।

शिबिर्वसति तत्रैव मनुरिक्ष्वाकु भूपतिः ॥४३॥

 

शब्दार्थ — पुरूरवाः महावीर्यः — महावीर्य पुरूरवा; विप्रचित्तिः महामनाः — महामनस्वी विप्रचित्ति; शिबिः वसति तत्र एव — शिबि वहीं रहते हैं; मनुः इक्ष्वाकु भूपतिः — मनु और इक्ष्वाकु राजा।

भावार्थ — महावीर्य पुरूरवा, महामनस्वी विप्रचित्ति, शिबि, मनु तथा इक्ष्वाकु राजा वहीं (स्वर्ग में) रहते हैं।

व्याख्या — यह नामावली पुराण-पाठक के लिए परिचित पात्रों की है—पुरूरवा (चंद्रवंशी), शिबि (दानवीर), मनु और इक्ष्वाकु (सूर्यवंश के आदि राजा)। सूची में भिन्न वंशों के राजाओं का साथ आना बताता है कि स्वर्ग में वंश नहीं, पुण्य गिना जाता है। ययाति के लिए यह सांत्वना है कि वहाँ वह अकेला नहीं होगा।

 

श्लोक ४४

सगरो नाम मेधावी नहुषश्च पिता तव ।

ऋतवीर्यः कृतज्ञश्च शंतनुश्च महामनाः ॥४४॥

 

शब्दार्थ — सगरः नाम मेधावी — मेधावी सगर; नहुषः च पिता तव — और तुम्हारे पिता नहुष; ऋतवीर्यः कृतज्ञः च — ऋतवीर्य और कृतज्ञ; शंतनुः च महामनाः — और महामनस्वी शंतनु।

भावार्थ — मेधावी सगर, तुम्हारे पिता नहुष, ऋतवीर्य, कृतज्ञ तथा महामनस्वी शंतनु (वहाँ रहते हैं)।

व्याख्या — सूची में पिता नहुष का नाम आना ययाति के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है—पिता के पास जाना पुत्र के लिए स्वर्ग का सबसे प्रबल कारण। 'कृतज्ञ' विशेषण यहाँ विशेष अर्थ रखता है, क्योंकि पूरा अध्याय कृतज्ञता के धर्म पर ही चल रहा है।

 

श्लोक ४५

भरतो युवनाश्वश्च कार्तवीर्यो नरेश्वरः ।

यज्ञानाहृत्य बहुधा मोदंते दिवि भूभृतः ॥४५॥

 

शब्दार्थ — भरतः युवनाश्वः च — भरत और युवनाश्व; कार्तवीर्यः नरेश्वरः — नरेश्वर कार्तवीर्य; यज्ञान् आहृत्य बहुधा — अनेक यज्ञ करके; मोदन्ते दिवि भूभृतः — स्वर्ग में आनंदित होते हैं, वे राजा।

भावार्थ — भरत, युवनाश्व और नरेश्वर कार्तवीर्य—ये राजा अनेक यज्ञ करके स्वर्ग में आनंदित हो रहे हैं।

व्याख्या — 'यज्ञानाहृत्य' अर्थात् यज्ञों को संपन्न करके—स्वर्ग-सुख का आधार यज्ञ ही बताया गया है। कार्तवीर्य अर्जुन का उल्लेख महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह सहस्रबाहु पराक्रमी राजा माना जाता है; सूची में वीर और दानी दोनों प्रकार के राजा हैं, जिससे यह संदेश जाता है कि स्वर्ग का द्वार किसी एक मार्ग से नहीं खुलता।

 

श्लोक ४६

अन्ये चैव तु राजानो यज्ञकर्मसु तत्पराः ।

सर्वे ते दिवि चेंद्रेण मोदंते स्वेन कर्मणा ॥४६॥

 

शब्दार्थ — अन्ये च एव तु राजानः — और भी राजा; यज्ञकर्मसु तत्पराः — यज्ञ-कर्म में तत्पर; सर्वे ते दिवि — वे सब स्वर्ग में; इन्द्रेण — इंद्र के साथ; मोदन्ते स्वेन कर्मणा — अपने कर्म से आनंदित होते हैं।

भावार्थ — और भी जो राजा यज्ञ-कर्म में तत्पर थे, वे सब स्वर्ग में इंद्र के साथ अपने कर्म के फल से आनंदित होते हैं।

व्याख्या — 'स्वेन कर्मणा' पद पूरे प्रसंग का सार है—स्वर्ग का सुख उपहार नहीं, अपने कर्म का फल है; और इंद्र के साथ बैठना उस फल का सम्मान। इस वाक्य से मातलि ययाति को यह भी सूचित करता है कि स्वर्ग में पद नहीं, सहचर्य मिलेगा—अर्थात् वह इंद्र के सिंहासन का दावा नहीं करेगा।

 

श्लोक ४७

त्वं पुनः सर्वधर्मज्ञः सर्वधर्मेषु संस्थितः ।

शक्रेण सह मोदस्व स्वर्गलोके महीपते ॥४७॥

 

शब्दार्थ — त्वम् पुनः — तुम तो; सर्वधर्मज्ञः — सर्वधर्मज्ञ हो; सर्वधर्मेषु संस्थितः — सब धर्मों में स्थित; शक्रेण सह मोदस्व — इंद्र के साथ आनंद करो; स्वर्गलोके महीपते — स्वर्गलोक में, हे महीपते।

भावार्थ — तुम तो सर्वधर्मज्ञ और सब धर्मों में स्थित हो—हे महीपते, इंद्र के साथ स्वर्गलोक में आनंद करो।

व्याख्या — 'त्वं पुनः' से मातलि ययाति को सूची से अलग करता है—वे सब यज्ञ-फल से स्वर्ग पहुँचे, पर ययाति तो सर्वधर्मज्ञ है; अर्थात् उसका स्थान उनसे ऊँचा होगा। यह प्रलोभन का चरम है, और ठीक यहीं ययाति पहला प्रश्न पूछता है—स्वर्ग जाने का आधार क्या है। कथा का स्वर यहाँ उपदेश से संवाद की ओर मुड़ जाता है।

 

श्लोक ४८

ययातिरुवाच—

किं मया तत्कृतं कर्म येन मय्यर्थिता तव ।

इंद्रस्य देवराजस्य तत्सर्वं मे वदस्व च ॥४८॥

 

शब्दार्थ — किम् मया तत् कृतम् कर्म — मैंने वह कौन-सा कर्म किया; येन मयि अर्थिता तव — जिससे मुझमें तुम्हारी यह अभिलाषा/प्रार्थना हुई; इन्द्रस्य देवराजस्य — इंद्र, देवराज की (ओर से); तत् सर्वम् मे वदस्व च — वह सब मुझे बताओ।

भावार्थ — मैंने ऐसा कौन-सा कर्म किया जिससे देवराज इंद्र की ओर से तुम्हारी मुझमें यह प्रार्थना हुई? वह सब मुझे बताओ।

व्याख्या — यह प्रश्न अहंकार का नहीं, विवेक का है—ययाति जानना चाहता है कि किस कर्म के कारण उसे बुलाया जा रहा है। यह प्रश्न आगे के पूरे संवाद का द्वार खोलता है: कर्म, शरीर, आत्मा और जरा—सब इसी एक जिज्ञासा से निकलेंगे। पुराण की शैली में यही क्षण है जब कथा शास्त्र बन जाती है।

 

श्लोक ४९

मातलिरुवाच—

यदशीतिसहस्राणि वर्षाणां हि त्वया नृप ।

दानपुण्यादिकं कर्म यज्ञैस्तु परिसाधितम् ॥४९॥

 

शब्दार्थ — यत् — जो; अशीतिसहस्राणि वर्षाणाम् हि — अस्सी हज़ार वर्षों तक; त्वया नृप — तुमने, हे राजन्; दानपुण्यादिकम् कर्म — दान-पुण्य आदि कर्म; यज्ञैः तु परिसाधितम् — यज्ञों से भलीभाँति साधा।

भावार्थ — हे राजन्! तुमने अस्सी हज़ार वर्षों तक जो दान-पुण्य आदि कर्म यज्ञों के द्वारा भलीभाँति संपन्न किए, (उसी के कारण)।

व्याख्या — मातलि उत्तर को संख्या से जोड़ता है—अस्सी हज़ार वर्ष का सतत यज्ञ-दान-पुण्य। 'परिसाधितम्' कहकर वह बताता है कि कर्म अधूरा नहीं, विधिपूर्वक पूरा हुआ है; अधूरे कर्म का फल नहीं मिलता, यह शास्त्रीय नियम यहीं सन्निहित है। यही संख्या श्लोक १० और ३० में भी आई थी—अब वही इंद्र के भय का आधार बन गई है।

 

श्लोक ५०

दिवं गच्छ महाराज कर्मणा स्वेन भूपते ।

सखित्वं देवराजेन कुरु गच्छ सुरालयम् ॥५०॥

 

शब्दार्थ — दिवम् गच्छ — स्वर्ग जाओ; महाराज — हे महाराज; कर्मणा स्वेन — अपने कर्म से; भूपते — हे भूपते; सखित्वम् देवराजेन कुरु — देवराज से सख्य करो; गच्छ सुरालयम् — सुरालय को जाओ।

भावार्थ — हे महाराज! अपने कर्म के बल पर स्वर्ग जाओ; हे भूपते, देवराज से मित्रता करो और सुरालय को जाओ।

व्याख्या — 'कर्मणा स्वेन' पद बार-बार आकर स्पष्ट करता है कि स्वर्ग-यात्रा किसी की कृपा नहीं, अपने कर्म का फल है; इंद्र का निमंत्रण केवल सुविधा है। 'सखित्वम्' शब्द श्लोक ४६ के 'इन्द्रेण सह मोदस्व' को दोहराता है—ययाति को मित्र का स्थान मिल रहा है, पद का नहीं।

 

श्लोक ५१

पंचात्मकं शरीरं च भूमौ त्यज महामते ।

दिव्यरूपं समास्थाय भुंक्ष्व भोगान्मनोनुगान् ॥५१॥

 

शब्दार्थ — पञ्चात्मकम् शरीरम् च — पाँच तत्वों से बना शरीर; भूमौ त्यज — पृथ्वी पर छोड़ दो; महामते — हे महामते; दिव्यरूपम् समास्थाय — दिव्य रूप धारण करके; भुङ्क्ष्व भोगान् मनोनुगान् — मन के अनुसार भोग भोगो।

भावार्थ — हे महामते! यह पाँच तत्वों से बना शरीर पृथ्वी पर छोड़कर दिव्य रूप धारण करो और मनोनुकूल भोग भोगो।

व्याख्या — यहीं से अध्याय का दार्शनिक भाग आरंभ होता है। 'पञ्चात्मक' शरीर अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से बना देह—यह सांख्य और आयुर्वेद की मान्यता है। मातलि कहता है कि स्वर्ग जाने के लिए यह स्थूल देह छोड़नी होगी और दिव्य देह धारण करनी होगी; यही बात ययाति के अगले प्रश्नों का बीज बनती है—जिस देह से पुण्य कमाया, उसे छोड़कर जाना कैसे उचित है?

 

श्लोक ५२

यथायथा कृता भूमौ यज्ञा दानं तपश्च ते ।

तथातथा स्वर्गभोगाः प्रार्थयंते नरेश्वर ॥५२॥

 

शब्दार्थ — यथा यथा कृताः भूमौ — जैसे-जैसे पृथ्वी पर किए गए; यज्ञाः दानम् तपः च ते — तुम्हारे यज्ञ, दान और तप; तथा तथा स्वर्गभोगाः — वैसे-वैसे स्वर्ग के भोग; प्रार्थयन्ते नरेश्वर — प्राप्त होते हैं, हे नरेश्वर।

भावार्थ — हे नरेश्वर! पृथ्वी पर तुमने जैसे-जैसे यज्ञ, दान और तप किए, वैसे-वैसे ही स्वर्ग के भोग तुम्हारे लिए प्राप्त होते हैं।

व्याख्या — 'यथा यथा... तथा तथा' रचना कर्म-फल की समानुपातिकता बताती है—भोग कर्म के अनुरूप ढलते हैं, इसलिए स्वर्ग में भी तरतम भेद है। यह सूत्र आगे जरा-वर्णन में भी दोहराया जाएगा: पुण्य जरा को रोकता है, पाप उसे बढ़ाता है। अर्थात् शरीर और भोग, दोनों कर्म के अधीन हैं।

 

श्लोक ५३

ययातिरुवाच—

येन कायेन सिध्येत सुकृतं दुष्कृतं भुवि ।

मातले तत्कथं त्यक्त्वा गच्छेल्लोकमुपार्जितम् ॥५३॥

 

शब्दार्थ — येन कायेन — जिस शरीर से; सिध्येत — सिद्ध होता है; सुकृतम् दुष्कृतम् — पुण्य और पाप; भुवि — पृथ्वी पर; मातले — हे मातले; तत् कथम् त्यक्त्वा — उसे कैसे छोड़कर; गच्छेत् लोकम् उपार्जितम् — अर्जित लोक में जाए।

भावार्थ — हे मातले! पृथ्वी पर पुण्य और पाप जिस शरीर से अर्जित होते हैं, उसे छोड़कर मनुष्य अर्जित लोक में कैसे जा सकता है?

व्याख्या — यह अध्याय का सबसे तीखा प्रश्न है—साधन और फल के बीच की कड़ी टूटने का प्रश्न। यदि पुण्य इसी देह से कमाया गया, तो उसका फल भी इसी देह से भोगा जाना चाहिए; देह छोड़कर जाने पर न्याय कहाँ रहा? ययाति का यह प्रश्न केवल कौतूहल नहीं, न्याय-चिंता है—और पुराण यहीं से आत्मा, देह और कर्म के संबंध की व्याख्या शुरू करता है।

 

श्लोक ५४

मातलिरुवाच—

यत्रैवोपार्जितं कायं पंचात्मकमिदं नृप ।

तत्तत्रैव परित्यज्य दिव्येनैव व्रजंति तम् ॥५४॥

 

शब्दार्थ — यत्र एव उपार्जितम् — जहाँ ही अर्जित किया गया; कायम् पञ्चात्मकम् इदम् — यह पाँच तत्वों वाला शरीर; नृप — हे राजन्; तत् तत्र एव परित्यज्य — उसे वहीं छोड़कर; दिव्येन एव व्रजन्ति तम् — दिव्य (शरीर) से ही वे उस (लोक) को जाते हैं।

भावार्थ — हे राजन्! यह पाँच तत्वों वाला शरीर जहाँ अर्जित हुआ, वहीं उसे छोड़कर जीव दिव्य शरीर से उस लोक में जाता है।

व्याख्या — मातलि का उत्तर है—देह पृथ्वी की है, इसलिए पृथ्वी पर ही रह जाती है; जीव दिव्य देह धारण करके जाता है। यह स्थूल और सूक्ष्म शरीर का भेद है, जो भारतीय दर्शन में सर्वत्र मिलता है: स्थूल देह तत्वों में विलीन होती है, सूक्ष्म देह कर्म-संस्कार लेकर चलती है। यह उत्तर ययाति के प्रश्न को पूरी तरह नहीं मिटाता, इसलिए आगे और प्रश्न आते हैं।

 

श्लोक ५५

इतरे मानवाः सर्वे पापपुण्यप्रसाधकाः ।

तेऽपि कायं परित्यज्य अधऊर्ध्वं व्रजंति वै ॥५५॥

 

शब्दार्थ — इतरे मानवाः सर्वे — शेष सब मनुष्य; पापपुण्यप्रसाधकाः — पाप-पुण्य को साधने वाले; ते अपि — वे भी; कायम् परित्यज्य — शरीर छोड़कर; अधः ऊर्ध्वम् व्रजन्ति वै — नीचे या ऊपर जाते हैं।

भावार्थ — शेष सब मनुष्य, जो पाप-पुण्य साधते हैं, वे भी शरीर छोड़कर नीचे या ऊपर जाते हैं।

व्याख्या — 'अध ऊर्ध्वम्'—यही कर्म-सिद्धांत का संक्षिप्त रूप है: गति दो दिशाओं में होती है, ऊर्ध्वगामी पुण्य से और अधोगामी पाप से। मातलि यह बताता है कि ययाति का प्रश्न केवल राजाओं का नहीं, सब प्राणियों का सामान्य नियम है—इसलिए उत्तर भी सामान्य ही होगा।

 

श्लोक ५६

ययातिरुवाच—

पंचात्मकेन कायेन सुकृतं दुष्कृतं नराः ।

उत्पाद्यैव प्रयांत्येव अधऊर्ध्वं तु मातले ॥५६॥

 

शब्दार्थ — पञ्चात्मकेन कायेन — पाँच तत्वों वाले शरीर से; सुकृतम् दुष्कृतम् — पुण्य और पाप; नराः उत्पाद्य एव — मनुष्य उत्पन्न करके ही; प्रयान्ति एव — चले जाते हैं; अधः ऊर्ध्वम् तु — नीचे या ऊपर; मातले — हे मातले।

भावार्थ — हे मातले! मनुष्य पाँच तत्वों वाले इसी शरीर से पुण्य-पाप उत्पन्न करके नीचे या ऊपर चले जाते हैं।

व्याख्या — ययाति मातलि की बात स्वीकार करके उसे और कसता है—यदि कर्म इसी देह से बनते हैं, तो देह छोड़ने का अर्थ कर्म के आधार को छोड़ना है। यह पुनरुक्ति जानबूझकर है: पूछने वाला उत्तर से संतुष्ट नहीं, वह विरोध को स्पष्ट कर रहा है। इसी तर्क-शैली से अध्याय आगे शरीर-विज्ञान की ओर बढ़ता है।

 

श्लोक ५७

को विशेषो हि धर्मज्ञ भूमौ कायं परित्यजेत् ।

पापपुण्यप्रभावाद्वै कायस्य पतनं भवेत् ॥५७॥

 

शब्दार्थ — कः विशेषः हि — क्या विशेषता है; धर्मज्ञ — हे धर्मज्ञ; भूमौ कायम् परित्यजेत् — पृथ्वी पर शरीर छोड़ा जाए; पापपुण्यप्रभावात् वै — पाप-पुण्य के प्रभाव से ही; कायस्य पतनम् भवेत् — शरीर का पतन होता है।

भावार्थ — हे धर्मज्ञ! तब क्या विशेष रह जाता है—शरीर तो पृथ्वी पर ही छूटता है और पाप-पुण्य के प्रभाव से ही शरीर का पतन होता है।

व्याख्या — यहाँ ययाति एक सूक्ष्म बात कहता है—शरीर का गिरना स्वयं पाप-पुण्य का फल है, इसलिए शरीर-त्याग को कर्म से अलग नहीं देखा जा सकता। उसका आग्रह यह है कि देह और कर्म एक ही तंत्र के अंग हैं; देह को केवल 'छोड़ी जाने वाली वस्तु' मानना कर्म-सिद्धांत को हल्का कर देता है।

 

श्लोक ५८

दृष्टांतो दृश्यते सूत प्रत्यक्षं मर्त्यमंडले ।

विशेषं नैव पश्यामि पापपुण्यस्य चाधिकम् ॥५८॥

 

शब्दार्थ — दृष्टान्तः दृश्यते — दृष्टांत दिखता है; सूत — हे सूत; प्रत्यक्षम् मर्त्यमण्डले — मर्त्यलोक में प्रत्यक्ष; विशेषम् न एव पश्यामि — मैं कोई विशेष नहीं देखता; पापपुण्यस्य च अधिकम् — पाप-पुण्य का अधिक भेद।

भावार्थ — हे सूत! मर्त्यलोक में प्रत्यक्ष दृष्टांत दिखता है—मैं पाप और पुण्य में कोई विशेष भेद नहीं देखता।

व्याख्या — 'सूत' संबोधन से पता चलता है कि यहाँ मातलि को सूत (वक्ता/वर्णनकर्ता) कहा गया है, या यह पाठ-परंपरा का चिह्न है। ययाति का कथन पुराण की दृष्टि से चौंकाने वाला है—वह लोक-अनुभव से कहता है कि पापी सुखी और पुण्यवान दुखी दिखते हैं। यह 'कर्म-फल में विलंब' की प्रसिद्ध समस्या है, जिसका उत्तर आगे जरा-वर्णन और परलोक-व्यवस्था से दिया जाएगा।

 

श्लोक ५९

सत्यधर्मादिकं कर्म येन कायेन मानवः ।

समर्जयति वै मर्त्यस्तं कस्माद्विप्रसर्जयेत् ॥५९॥

 

शब्दार्थ — सत्यधर्मादिकम् कर्म — सत्य-धर्म आदि कर्म; येन कायेन — जिस शरीर से; मानवः समर्जयति — मनुष्य अर्जित करता है; वै मर्त्यः — वह मर्त्य; तम् कस्मात् विप्रसर्जयेत् — उसे क्यों छोड़ दे?

भावार्थ — मनुष्य जिस शरीर से सत्य-धर्म आदि कर्म अर्जित करता है, उस शरीर को वह क्यों त्याग दे?

व्याख्या — 'विप्रसर्जयेत्' अर्थात् प्रसर्जयेत्—छोड़ देना। ययाति का तर्क यहाँ चरम पर है: जो शरीर धर्म-अर्जन का साधन है, उसे त्यागना साधन को ही नष्ट करना है। यह प्रश्न भौतिक नहीं, नैतिक है—वह शरीर के प्रति मोह नहीं, कृतज्ञता व्यक्त कर रहा है। आगे मातलि इसी बिंदु पर उत्तर देगा कि शरीर साधन है, साध्य नहीं।

 

श्लोक ६०

आत्मा कायश्च द्वावेतौ मित्ररूपावुभावपि ।

कायं मित्रं परित्यज्य आत्मा याति सुनिश्चितः ॥६०॥

 

शब्दार्थ — आत्मा कायः च द्वौ एतौ — आत्मा और शरीर, ये दो; मित्ररूपौ उभौ अपि — दोनों मित्र के रूप में; कायम् मित्रम् परित्यज्य — मित्र-रूप शरीर को छोड़कर; आत्मा याति सुनिश्चितः — आत्मा निश्चित रूप से जाता है।

भावार्थ — आत्मा और शरीर—ये दोनों मित्र के समान हैं; मित्र-रूप शरीर को छोड़कर आत्मा निश्चित रूप से चला जाता है।

व्याख्या — 'मित्ररूपौ' उपमा सुंदर है—शरीर सहचर है, स्वामी नहीं; जैसे मित्र यात्रा में साथ चलता है और मार्ग बदलने पर अलग हो जाता है। पर ययाति इस उपमा को उलटकर प्रयोग करता है: मित्र को छोड़कर जाना मित्रता नहीं, विश्वासघात है। यही तर्क आगे मातलि के उत्तर को जन्म देगा, जहाँ वह कहेगा कि आत्मा और देह का संबंध मित्रता भी नहीं, केवल संयोग है।

 

श्लोक ६१

मातलिरुवाच—

सत्यमुक्तं त्वया राजन्कायं त्यक्त्वा प्रयाति सः ।

संबंधो नास्ति तेनापि समं कायेन चात्मनः ॥६१॥

 

शब्दार्थ — सत्यम् उक्तम् त्वया — तुमने सत्य कहा; राजन् — हे राजन्; कायम् त्यक्त्वा प्रयाति सः — वह (आत्मा) शरीर छोड़कर जाता है; सम्बन्धः न अस्ति — संबंध नहीं है; तेन अपि समम् — उसके भी साथ; कायेन च आत्मनः — आत्मा का शरीर के साथ।

भावार्थ — हे राजन्! तुमने सत्य कहा—आत्मा शरीर छोड़कर जाता है; पर आत्मा का शरीर के साथ कोई वास्तविक संबंध नहीं है।

व्याख्या — मातलि पहले ययाति के कथन को सत्य कहकर स्वीकारता है—यह संवाद-शैली का सौंदर्य है, विरोध से पहले सहमति। फिर वह मूल बात कहता है: आत्मा और देह का संबंध नित्य नहीं, केवल आगंतुक है। यह सांख्य-वेदांत का प्रसिद्ध सिद्धांत है—देह 'अनात्मा' है, आत्मा उससे भिन्न और स्वतंत्र है।

 

श्लोक ६२

यस्मात्पंचत्वरूपोऽयं संधिजर्जरितः सदा ।

जरया पीड्यमानस्तु व्याधिभिर्दूषितः सदा ॥६२॥

 

शब्दार्थ — यस्मात् — क्योंकि; पञ्चत्वरूपः अयम् — यह पाँच तत्वों के रूप वाला है; संधिजर्जरितः सदा — संधियों में सदा जीर्ण होता रहता है; जरया पीड्यमानः तु — जरा से पीड़ित; व्याधिभिः दूषितः सदा — रोगों से सदा दूषित।

भावार्थ — क्योंकि यह शरीर पाँच तत्वों का बना है, संधियों में सदा जीर्ण होता रहता है, जरा से पीड़ित और रोगों से सदा दूषित रहता है।

व्याख्या — 'संधिजर्जरित' पद शरीर-विज्ञान की सूक्ष्म दृष्टि दिखाता है—क्षय जोड़ों से आरंभ होता है। मातलि तीन कारण गिनाता है: तात्विक (पाँच भूतों से बना होना), कालिक (जरा) और रोगजन्य (व्याधि)। अर्थ यह है कि शरीर का क्षय आकस्मिक नहीं, उसकी संरचना में ही लिखा हुआ है—इसीलिए उसे छोड़ना स्वाभाविक है, विश्वासघात नहीं।

 

श्लोक ६३

जरादोषैः प्रभग्नोऽसौ अत्र स्थातुं स नेच्छति ।

आकुलव्याकुलो भूत्वा जीवस्त्यक्त्वा प्रयाति सः ॥६३॥

 

शब्दार्थ — जरादोषैः प्रभग्नः असौ — जरा के दोषों से टूटा हुआ यह (शरीर); अत्र स्थातुम् न इच्छति — यहाँ रहना नहीं चाहता; आकुलव्याकुलः भूत्वा — अत्यंत व्याकुल होकर; जीवः त्यक्त्वा प्रयाति सः — जीव उसे छोड़कर चला जाता है।

भावार्थ — जरा के दोषों से टूटा हुआ यह शरीर यहाँ रहना नहीं चाहता; अत्यंत व्याकुल होकर जीव उसे छोड़कर चला जाता है।

व्याख्या — यहाँ निर्णय शरीर का दिखाया गया है—'अत्र स्थातुं नेच्छति'; अर्थात् त्याग बलपूर्वक नहीं, शरीर की असमर्थता से होता है। 'आकुलव्याकुल' पद मृत्यु-काल की मनोदशा का सजीव चित्र है। इस प्रकार मातलि ययाति के 'विश्वासघात' वाले आरोप का उत्तर देता है: जो साथी स्वयं चलने से इनकार कर दे, उसे छोड़ने में दोष नहीं।

 

श्लोक ६४

सत्येन धर्मपुण्यैश्च दानैर्नियमसंयमैः ।

अश्वमेधादिभिर्यज्ञैस्तीर्थैः संयमनैस्तथा ॥६४॥

 

शब्दार्थ — सत्येन — सत्य से; धर्मपुण्यैः च — धर्म और पुण्य से; दानैः — दानों से; नियमसंयमैः — नियम और संयम से; अश्वमेधादिभिः यज्ञैः — अश्वमेध आदि यज्ञों से; तीर्थैः — तीर्थों से; संयमनैः तथा — और संयमों से।

भावार्थ — सत्य, धर्म-पुण्य, दान, नियम-संयम, अश्वमेध आदि यज्ञ, तीर्थ और व्रत-संयम—(इन सबसे)।

व्याख्या — यह सूची जरा-वर्णन का पुण्य-पक्ष है, जिसका वाक्य अगले श्लोक में पूरा होगा। ध्यान दें कि यहाँ सत्य सबसे पहले आता है और तीर्थ-यज्ञ बाद में—अर्थात् बाह्य कर्म से पहले आंतरिक गुण। यह सूची पिछले अध्याय की उस मान्यता से जुड़ती है जहाँ माता-पिता की सेवा को ही सब तीर्थों का सार कहा गया था।

 

श्लोक ६५

सुपुण्यैः सुकृतैश्चान्यैर्जरा नैव प्रधार्यते ।

पातकैश्च महाराज द्रवते कायमेव सा ॥६५॥

 

शब्दार्थ — सुपुण्यैः सुकृतैः च अन्यैः — और श्रेष्ठ पुण्य तथा सुकृतों से; जरा न एव प्रधार्यते — जरा रोकी नहीं जा सकती; पातकैः च महाराज — और पापों से; द्रवते कायम् एव सा — वह (जरा) शरीर पर ही बरसती है।

भावार्थ — हे महाराज! श्रेष्ठ पुण्य और सुकृतों से भी जरा रोकी नहीं जा सकती, और पापों से वह शरीर पर और बरस पड़ती है।

व्याख्या — यह श्लोक पूरे जरा-प्रकरण का सूत्र है—पुण्य जरा को रोक नहीं सकता, केवल उसे सहने योग्य बनाता है; पाप उसे तेज़ कर देता है। 'द्रवते' क्रिया उपमा देती है—जरा द्रव की तरह शरीर पर बहती है, सूखी नहीं जाती। यह स्पष्ट करता है कि पुण्य का काम जरा हटाना नहीं, उसके बाद की गति सुधारना है—अर्थात् पुण्य का फल परलोक में मिलेगा।

 

श्लोक ६६

ययातिरुवाच—

कस्माज्जरा समुत्पन्ना कस्मात्कायं प्रपीडयेत् ।

मम विस्तरतस्त्वं च वक्तुमर्हसि सत्तम ॥६६॥

 

शब्दार्थ — कस्मात् जरा समुत्पन्ना — जरा किस कारण से उत्पन्न हुई; कस्मात् कायम् प्रपीडयेत् — किस कारण वह शरीर को पीड़ित करती है; मम विस्तरतः त्वम् च — मुझे विस्तार से तुम; वक्तुम् अर्हसि — कहने योग्य हो; सत्तम — हे सत्तम।

भावार्थ — हे सत्तम! जरा किस कारण से उत्पन्न होती है और किस कारण शरीर को पीड़ित करती है—यह तुम मुझे विस्तार से बताओ।

व्याख्या — अब ययाति का प्रश्न शरीर-त्याग से आगे बढ़कर जरा के कारण तक जाता है—यह 'कारण की खोज' की अंतिम सीढ़ी है। पुराण की शिक्षण-पद्धति में यही क्रम है: घटना, फिर नियम, फिर कारण। आगे मातलि का उत्तर रस-रक्त-वीर्य की श्रृंखला से जरा की उत्पत्ति समझाएगा, जो पुराण-कालीन शरीर-विज्ञान है।

 

श्लोक ६७

मातलिरुवाच—

हंत ते वर्णयिष्यामि जरायाः परिकारणम् ।

यस्माच्चेयं समुद्भूता कायमध्ये नृपोत्तम ॥६७॥

 

शब्दार्थ — हन्त — अहो, हाँ; ते वर्णयिष्यामि — तुम्हें वर्णन करूँगा; जरायाः परिकारणम् — जरा का कारण; यस्मात् च इयम् समुद्भूता — जिससे यह उत्पन्न हुई; कायमध्ये — शरीर के भीतर; नृपोत्तम — हे नृपोत्तम।

भावार्थ — हाँ, हे नृपोत्तम! मैं तुम्हें जरा का कारण बताता हूँ—जिससे यह शरीर के भीतर उत्पन्न हुई है।

व्याख्या — 'हन्त' उत्साह-वाचक है—वक्ता कठिन विषय में प्रवेश कर रहा है। 'कायमध्ये' पद कहता है कि जरा बाहर से नहीं आती, वह शरीर के भीतर ही बनती है; यही आगे की पूरी व्याख्या का सूत्र है—बाह्य कारण नहीं, आंतरिक प्रक्रिया।

 

श्लोक ६८

पंचभूतात्मकः कायो विषयैः पंचभिः श्रितः ।

यदात्मा त्यजते राजन्स कायः परिधक्ष्यते ॥६८॥

 

शब्दार्थ — पञ्चभूतात्मकः कायः — पाँच भूतों से बना शरीर; विषयैः पञ्चभिः श्रितः — पाँच विषयों से आश्रित; यदा आत्मा त्यजते — जब आत्मा छोड़ देता है; राजन् — हे राजन्; सः कायः परिधक्ष्यते — वह शरीर जलने लगता है।

भावार्थ — हे राजन्! पाँच भूतों से बना और पाँच विषयों में रमने वाला यह शरीर जब आत्मा छोड़ देता है, तब जलने लगता है।

व्याख्या — यहाँ जरा का मूल कारण मिलता है—आत्मा का चला जाना। जीवन-उष्णता आत्मा के संयोग से है; संयोग टूटते ही देह में अपघटन की आग लगती है। पुराण की यह दृष्टि आधुनिक समझ से इस अर्थ में मेल खाती है कि मृत्यु के बाद शरीर में रासायनिक अपघटन होता है; पर आगे की श्रृंखला (धुआँ, मेघ, वर्षा, अन्न, शुक्र, देह) पुराण-कालीन सृष्टि-चक्र की कल्पना है, आधुनिक जीव-विज्ञान नहीं।

 

श्लोक ६९

वह्निना दीप्यमानस्तु सरसो ज्वलते नृप ।

तस्माद्विजायते धूमो धूमान्मेघाश्च जज्ञिरे ॥६९॥

 

शब्दार्थ — वह्निना दीप्यमानः तु — अग्नि से जलता हुआ; सरसः ज्वलते — रस सहित जलता है; नृप — हे राजन्; तस्मात् विजायते धूमः — उससे धुआँ उत्पन्न होता है; धूमात् मेघाः च जज्ञिरे — धुएँ से मेघ उत्पन्न हुए।

भावार्थ — हे राजन्! वह रस-युक्त शरीर अग्नि से जलता है, उससे धुआँ उत्पन्न होता है और धुएँ से मेघ बनते हैं।

व्याख्या — यहाँ से सूक्ष्म से स्थूल की ओर सृष्टि-क्रम आरंभ होता है—अग्नि, धुआँ, मेघ, जल, पृथ्वी। यह वैदिक-पौराणिक पंच-भूत-चक्र है, जिसमें मृत्यु के बाद देह के तत्व लौटकर फिर सृष्टि में लग जाते हैं। दृष्टि यह है कि मृत्यु अंत नहीं, तत्वों का चक्र-परिवर्तन है।

 

श्लोक ७०

मेघादापः प्रवर्तंते अद्भ्यः पृथ्वी प्रकल्पते ।

जलमायाति साध्वी सा यथा नारी रजस्वला ॥७०॥

 

शब्दार्थ — मेघात् आपः प्रवर्तन्ते — मेघ से जल प्रवाहित होता है; अद्भ्यः पृथ्वी प्रकल्पते — जल से पृथ्वी बनती है; जलम् आयाति साध्वी सा — वह जल साध्वी की भाँति आता है; यथा नारी रजस्वला — जैसे रजस्वला स्त्री।

भावार्थ — मेघ से जल बरसता है, जल से पृथ्वी बनती है; वह जल ऐसे आता है जैसे रजस्वला स्त्री (गर्भधारण के योग्य होकर)।

व्याख्या — 'रजस्वला' उपमा का आशय यह है कि वर्षा-जल पृथ्वी को उर्वर बनाता है, जैसे रजस्वला स्त्री गर्भधारण की क्षमता प्राप्त करती है—अर्थात् सृष्टि का अगला चरण आरंभ होता है। यह उपमा उस युग की कृषि-चेतना से आई है, जिसमें वर्षा और उर्वरता एक ही तंत्र के दो अंग माने जाते थे।

 

श्लोक ७१

तस्मात्प्रजायते गंधो गंधाद्रसो नृपोत्तम ।

रसात्प्रभवते चान्नमन्नाच्छुक्रं न संशयः ॥७१॥

 

शब्दार्थ — तस्मात् प्रजायते गन्धः — उससे गंध उत्पन्न होती है; गन्धात् रसः — गंध से रस; नृपोत्तम — हे नृपोत्तम; रसात् प्रभवते च अन्नम् — रस से अन्न उत्पन्न होता है; अन्नात् शुक्रम् न संशयः — अन्न से शुक्र, इसमें संशय नहीं।

भावार्थ — हे नृपोत्तम! उससे गंध, गंध से रस, रस से अन्न और अन्न से निःसंदेह शुक्र उत्पन्न होता है।

व्याख्या — यह श्रृंखला आयुर्वेद की परंपरागत मान्यता पर आधारित है—भोजन से रस, रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र। आधुनिक जीव-विज्ञान इन रूपांतरणों को इस रूप में नहीं स्वीकारता; इसे उस युग की शरीर-दृष्टि के रूप में पढ़ना चाहिए, चिकित्सा-निर्देश के रूप में नहीं।

 

श्लोक ७२

शुक्राद्धि जायते कायः कुरूपः काय एव च ।

यथा पृथ्वी सृजेद्गंधान्रसैश्चरति भूतले ॥७२॥

 

शब्दार्थ — शुक्रात् हि जायते कायः — शुक्र से ही शरीर उत्पन्न होता है; कुरूपः कायः एव च — और कुरूप शरीर भी (उसी से); यथा पृथ्वी सृजेत् गन्धान् — जैसे पृथ्वी गंधों को उत्पन्न करती है; रसैः चरति भूतले — रसों के साथ पृथ्वी पर चलती-फिरती है।

भावार्थ — शुक्र से ही शरीर बनता है, कुरूप शरीर भी उसी से; जैसे पृथ्वी गंधों को उत्पन्न करती है और रसों के साथ पृथ्वी पर विचरती है।

व्याख्या — 'कुरूपः काय एव च' पद सूक्ष्म है—शुक्र से सुंदर ही नहीं, कुरूप देह भी बनती है; अर्थात् देह का रूप-गुण शुक्र पर निर्भर है। पृथ्वी की उपमा से यह जोड़ा गया है कि जैसे भूमि में गंध और रस स्थायी रहते हैं, वैसे ही देह में शुक्र-आधारित रस स्थायी रहता है।

 

श्लोक ७३

तथा कायश्चरेन्नित्यं रसाधारो हि सर्वशः ।

गंधश्च जायते तस्माद्गंधाद्रसो भवेत्पुनः ॥७३॥

 

शब्दार्थ — तथा कायः चरेत् नित्यम् — वैसे ही शरीर सदा चलता है; रसाधारः हि सर्वशः — वह सर्वथा रस का आधार है; गन्धः च जायते तस्मात् — उससे गंध उत्पन्न होती है; गन्धात् रसः भवेत् पुनः — गंध से फिर रस होता है।

भावार्थ — वैसे ही यह शरीर सदा गतिशील रहता है और सर्वथा रस पर टिका है; उससे गंध उत्पन्न होती है और गंध से फिर रस बनता है।

व्याख्या — 'रसाधारः' पद शरीर-विज्ञान का सार है—शरीर रस का भंडार और रस का वाहक दोनों। गंध-रस का चक्र बताता है कि पुराण-चिंतन में शरीर एक बंद पात्र नहीं, बल्कि तत्वों का निरंतर आदान-प्रदान करने वाला यंत्र है। इसी चक्र-दृष्टि से आगे काम, जरा और मृत्यु की व्याख्या होगी।

 

श्लोक ७४

तस्माज्जज्ञे महावह्निर्दृष्टांतं पश्य भूपते ।

यथा काष्ठाद्भवेद्वह्निः पुनः काष्ठं प्रकाशयेत् ॥७४॥

 

शब्दार्थ — तस्मात् जज्ञे महावह्निः — उससे महावह्नि उत्पन्न हुई; दृष्टान्तम् पश्य भूपते — हे भूपते, दृष्टांत देखो; यथा काष्ठात् भवेत् वह्निः — जैसे काष्ठ से अग्नि उत्पन्न होती है; पुनः काष्ठम् प्रकाशयेत् — और फिर काष्ठ को ही जलाती है।

भावार्थ — हे भूपते! उससे महावह्नि उत्पन्न हुई—दृष्टांत देखो: जैसे काष्ठ से अग्नि पैदा होती है और फिर काष्ठ को ही जलाती है।

व्याख्या — काष्ठ और अग्नि का दृष्टांत शरीर-अग्नि के लिए उत्तम है—जड़ से उत्पन्न अग्नि जड़ को ही भस्म करती है। यही 'महावह्नि' यानी जठराग्नि है, जो शरीर को पोषती भी है और अंत में उसी को खा जाती है। दृष्टांत का दूसरा पहलू भी है: काष्ठ और अग्नि भिन्न वस्तुएँ हैं, फिर भी एक ही स्थान में रहती हैं—जैसे देह और देहाग्नि।

 

श्लोक ७५

कायमध्ये रसादग्निस्तद्वदेव प्रजायते ।

तत्र संचरते नित्यं कायं पुष्णाति भूपते ॥७५॥

 

शब्दार्थ — कायमध्ये रसात् अग्निः — शरीर के भीतर रस से अग्नि; तद्वत् एव प्रजायते — उसी प्रकार उत्पन्न होती है; तत्र संचरते नित्यम् — वहाँ सदा विचरती है; कायम् पुष्णाति भूपते — शरीर का पोषण करती है, हे भूपते।

भावार्थ — हे भूपते! शरीर के भीतर रस से अग्नि उसी प्रकार उत्पन्न होती है; वह वहाँ सदा विचरती है और शरीर का पोषण करती है।

व्याख्या — यहाँ शरीर-अग्नि का कार्य स्पष्ट किया जाता है—पोषण और संचार। 'पुष्णाति' क्रिया बताती है कि अग्नि शत्रु नहीं, सेवक है; पर वही अग्नि अधिक बल पाकर संहारक बन जाती है—यही आगे के श्लोकों का क्रम है।

 

श्लोक ७६

यावद्रसस्य चाधिक्यं तावज्जीवः प्रशांतिमान् ।

चरित्वा तादृशं वह्निः क्षुधारूपेण वर्तते ॥७६॥

 

शब्दार्थ — यावत् रसस्य च आधिक्यम् — जब तक रस की अधिकता है; तावत् जीवः प्रशान्तिमान् — तब तक जीव शांत रहता है; चरित्वा तादृशम् — वैसा आचरण करके; वह्निः क्षुधारूपेण वर्तते — अग्नि क्षुधा के रूप में रहती है।

भावार्थ — जब तक रस की अधिकता रहती है, तब तक जीव शांत रहता है; उसके बाद वही अग्नि क्षुधा का रूप धारण कर लेती है।

व्याख्या — यह पंक्ति रस-अग्नि-क्षुधा की तीन स्थितियाँ बताती है: रस अधिक तो शांति, रस घटे तो क्षुधा। आयुर्वेद में इसे जठराग्नि के प्रकारों (सम, विषम, तीक्ष्ण, मंद) के रूप में विस्तार मिलता है; यहाँ केवल मूल सिद्धांत कहा गया है—भूख रस के घटने का संकेत है और भोजन उसकी पूर्ति।

 

श्लोक ७७

अन्नमिच्छत्यसौ तीव्रः पयसा च समन्वितम् ।

प्रदानं लभते चान्नमुदकं चापि भूपते ॥७७॥

 

शब्दार्थ — अन्नम् इच्छति असौ तीव्रः — वह तीव्र अग्नि अन्न चाहती है; पयसा च समन्वितम् — दूध के साथ; प्रदानम् लभते च अन्नम् — भोजन मिलता है; उदकम् च अपि भूपते — और जल भी, हे भूपते।

भावार्थ — वह तीव्र अग्नि दूध के साथ अन्न चाहती है; और हे भूपते, उसे अन्न तथा जल प्राप्त हो जाते हैं।

व्याख्या — क्षुधा का वर्णन यहाँ इच्छा-क्रम में बदल जाता है—पहले अन्न, फिर पय (दूध), फिर जल। यह आयुर्वेदिक आहार-दृष्टि है, जिसमें रस और पय रस-वर्धक माने जाते हैं। श्लोक का शेष भाग अगले श्लोक में बताएगा कि जब अग्नि को अन्न न मिले तो वह शरीर के रक्त-वीर्य को ही खाने लगती है।

 

श्लोक ७८

शोणितं चरते वह्निस्तद्वद्वीर्यं न संशयः ।

यक्ष्मरोगो भवेत्तस्मात्सर्वकायप्रणाशकः ॥७८॥

 

शब्दार्थ — शोणितम् चरते वह्निः — वह अग्नि रक्त में विचरती है; तद्वत् वीर्यम् न संशयः — वैसे ही वीर्य में, संशय नहीं; यक्ष्मरोगः भवेत् तस्मात् — उससे यक्ष्मा (क्षय) रोग हो जाता है; सर्वकायप्रणाशकः — सारे शरीर का नाश करने वाला।

भावार्थ — वह अग्नि रक्त और वीर्य में विचरती है—इसमें संशय नहीं; उससे सारे शरीर का नाश करने वाला यक्ष्मा रोग हो जाता है।

व्याख्या — यक्ष्मा (तपेदिक/क्षय) का वर्णन यहाँ अग्नि के दोष से जोड़ा गया है—जब पोषण न मिले तो शरीर-अग्नि धातुओं को खाने लगती है और क्षय होता है। आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान यक्ष्मा को संक्रामक जीवाणु-जनित रोग मानता है, पर पुराण-काल में इसे धातु-क्षय का रोग माना जाता था; दोनों दृष्टियाँ लक्षणों के स्तर पर एक ही परिणाम देखती हैं—शरीर का क्रमशः क्षय।

 

श्लोक ७९

रसाधिक्यं भवेद्राजन्नथ वह्निः प्रशाम्यति ।

रसेन पीड्यमानस्तु ज्वररूपोभिजायते ॥७९॥

 

शब्दार्थ — रसाधिक्यम् भवेत् राजन् — हे राजन्, रस की अधिकता हो जाए; अथ वह्निः प्रशाम्यति — तब अग्नि शांत हो जाती है; रसेन पीड्यमानः तु — रस से पीड़ित होकर; ज्वररूपः अभिजायते — ज्वर का रूप धारण करती है।

भावार्थ — हे राजन्! जब रस अधिक हो जाता है, तब अग्नि शांत हो जाती है; और रस से पीड़ित होकर वह ज्वर का रूप धारण कर लेती है।

व्याख्या — यहाँ विपरीत स्थिति आती है—रस की कमी से क्षय, अधिकता से ज्वर; अर्थात् स्वास्थ्य दोनों छोरों पर खतरे में है। 'रसेन पीड्यमानः' पद बताता है कि रोग केवल कमी से नहीं, अतिरेक से भी होता है—यह आयुर्वेद का मूल संतुलन-सिद्धांत है।

 

श्लोक ८०

ग्रीवा पृष्ठं कटिं पायुं सर्वास्वेव तु संधिषु ।

आरुध्य तिष्ठते वह्निः काये वह्निः प्रवर्तते ॥८०॥

 

शब्दार्थ — ग्रीवा — गर्दन; पृष्ठम् — पीठ; कटिम् — कमर; पायुम् — गुदा; सर्वासु एव तु सन्धिषु — सब संधियों में; आरुध्य तिष्ठते वह्निः — अग्नि चढ़कर स्थित होती है; काये वह्निः प्रवर्तते — शरीर में अग्नि प्रवृत्त होती है।

भावार्थ — वह अग्नि गर्दन, पीठ, कमर, गुदा—सब संधियों में चढ़कर स्थित हो जाती है; शरीर में अग्नि प्रवृत्त होती है।

व्याख्या — संधियों का क्रम शरीर-विज्ञान की दृष्टि से सार्थक है—ये वे स्थान हैं जहाँ वायु और अग्नि का संचय होता है और जिन्हें आयुर्वेद में मर्म के निकट माना जाता है। 'आरुध्य तिष्ठते' क्रिया अग्नि को स्थिर रूप में दिखाती है—वह केवल घूमती नहीं, किसी स्थान पर डेरा डाल देती है; और यही डेरा आगे बल और काम का केंद्र बनेगा।

 

श्लोक ८१

तस्याऽधिक्यं चरेन्नित्यं कायं पुष्णाति सर्वतः ।

रसस्तु बंधमायाति बलरूपो भवेत्तदा ॥८१॥

 

शब्दार्थ — तस्य अधिक्यम् चरेत् नित्यम् — उसकी अधिकता सदा विचरती है; कायम् पुष्णाति सर्वतः — शरीर का सब ओर पोषण करती है; रसः तु बन्धम् आयाति — रस बंध को प्राप्त होता है; बलरूपः भवेत् तदा — तब वह बल का रूप हो जाता है।

भावार्थ — उस अग्नि की अधिकता सदा विचरती है और शरीर का सब प्रकार पोषण करती है; तब रस बंधन को प्राप्त होकर बल का रूप बन जाता है।

व्याख्या — यहाँ अग्नि का सृजनात्मक चरम मिलता है—अग्नि रस को बाँधती है और बल बनाती है। 'बन्धमायाति' पद महत्वपूर्ण है: बिना बंधे रस व्यर्थ बह जाता है, बंधने पर वह शक्ति बनता है। अर्थात् शरीर-अग्नि केवल भक्षक नहीं, संचयकर्ता भी है—और इसी संचय से आगे काम जन्म लेगा।

 

श्लोक ८२

अतिरिक्तो बलेनैव वीर्यान्मर्माणि चालयेत् ।

तेनैव जायते कामः शल्यरूपो भवेन्नृप ॥८२॥

 

शब्दार्थ — अतिरिक्तः बलेन एव — बल के कारण अतिरिक्त होकर; वीर्यात् मर्माणि चालयेत् — वीर्य से मर्मों को हिलाता है; तेन एव जायते कामः — उसी से काम उत्पन्न होता है; शल्यरूपः भवेत् नृप — वह शल्य (काँटे) का रूप हो जाता है, हे राजन्।

भावार्थ — हे राजन्! बल से अतिरिक्त होकर वह वीर्य से मर्मों को हिलाता है; उसी से काम उत्पन्न होता है, जो शल्य—काँटे—का रूप धारण कर लेता है।

व्याख्या — 'शल्यरूप' उपमा पूरे प्रकरण का सार है—काम शरीर में धँसा हुआ काँटा है, जो बल बढ़ने के साथ और गहरा बैठता है। यहाँ पुराण शरीर-विज्ञान से नैतिक विश्लेषण की ओर मुड़ता है: वही अग्नि जो बल बनाती थी, अतिरेक में कामाग्नि बनकर बल को ही नष्ट करती है।

 

श्लोक ८३

सकामाग्निः समाख्यातो बलनाशकरो नृप ।

मैथुनस्य प्रसंगेन विनाशत्वं कलेवरे ॥८३॥

 

शब्दार्थ — सकामाग्निः समाख्यातः — वह कामाग्नि कहलाती है; बलनाशकरः नृप — बल का नाश करने वाली, हे राजन्; मैथुनस्य प्रसंगेन — मैथुन के प्रसंग से; विनाशत्वम् कलेवरे — शरीर में विनाश होता है।

भावार्थ — हे राजन्! वही कामाग्नि कहलाती है, जो बल का नाश करने वाली है; मैथुन के प्रसंग से शरीर में विनाश होने लगता है।

व्याख्या — यहाँ से वर्णन काम और उसके परिणामों की ओर जाता है; ध्यान रखें कि पुराण यहाँ ब्रह्मचर्य-पक्ष से बोल रहा है, इसलिए वीर्य-क्षय को सीधे बल-क्षय से जोड़ता है। आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान यह दावा उसी रूप में नहीं करता; इसे उस युग की संयम-केंद्रित जीवन-दृष्टि के रूप में पढ़ना चाहिए।

 

श्लोक ८४

नारीं च संश्रयेत्प्राणी पीडितः कामवह्निना ।

मैथुनस्य प्रसंगेन मूर्छितः कामकर्शितः ॥८४॥

 

शब्दार्थ — नारीम् च संश्रयेत् प्राणी — प्राणी स्त्री का आश्रय लेता है; पीडितः कामवह्निना — कामाग्नि से पीड़ित होकर; मैथुनस्य प्रसंगेन — मैथुन के प्रसंग से; मूर्छितः कामकर्शितः — मूर्च्छित और काम से कृश होकर।

भावार्थ — कामाग्नि से पीड़ित प्राणी स्त्री का आश्रय लेता है; मैथुन के प्रसंग से मूर्च्छित और काम से क्षीण हो जाता है।

व्याख्या — 'मूर्छित' और 'कर्शित'—दो क्रियाएँ मिलकर काम की दो अवस्थाएँ दिखाती हैं: तीव्र आवेग और उसके बाद की शिथिलता। पुराण यहाँ नैतिक उपदेश से पहले शारीरिक प्रक्रिया का वर्णन करता है, क्योंकि उसकी दृष्टि में काम केवल पाप नहीं, शरीर-अग्नि का विकार भी है—और विकार का इलाज संयम है।

 

श्लोक ८५

तेजोहीनो भवेत्कायो बलहानिश्च जायते ।

बलहीनो यदा स्याद्वै दुर्बलो वह्निनेरितः ॥८५॥

 

शब्दार्थ — तेजोहीनः भवेत् कायः — शरीर तेज से हीन हो जाता है; बलहानिः च जायते — बल की हानि होती है; बलहीनः यदा स्यात् वै — जब बलहीन हो जाता है; दुर्बलः वह्निना ईरितः — दुर्बल, अग्नि से प्रेरित।

भावार्थ — शरीर तेज-हीन हो जाता है और बल की हानि होती है; जब वह बलहीन हो जाता है, तब अग्नि से प्रेरित होकर दुर्बल रहता है।

व्याख्या — यहाँ क्रम उलट जाता है—पहले अग्नि शरीर को पोषती थी, अब वही दुर्बल शरीर पर हावी हो जाती है। 'ईरित' क्रिया बताती है कि अब प्रेरक शरीर नहीं, अग्नि है; अर्थात् जीवन-शक्ति का नियंत्रण हाथ से निकल जाता है। यही स्थिति आगे शोणित-शुक्र-क्षय और वायु-प्रकोप तक ले जाती है।

 

श्लोक ८६

स वह्निः प्रचरेत्काये शोणितं शुक्रमेव च ।

शुक्रशोणितयोर्नाशाच्छून्यदेहोभिजायते ॥८६॥

 

शब्दार्थ — सः वह्निः प्रचरेत् काये — वह अग्नि शरीर में विचरती है; शोणितम् शुक्रम् एव च — रक्त और शुक्र में; शुक्रशोणितयोः नाशात् — शुक्र और रक्त के नाश से; शून्यदेहः अभिजायते — शून्य (रिक्त) देह हो जाती है।

भावार्थ — वह अग्नि शरीर में रक्त और शुक्र में विचरण करती है; शुक्र और रक्त के नाश से देह शून्य—रिक्त—हो जाती है।

व्याख्या — 'शून्यदेह' पद बल-क्षय की अंतिम अवस्था है—देह रहती है, पर उसमें धातु नहीं बचती। आयुर्वेद में शुक्र और रक्त को जीवन की दो मूल धातुएँ माना गया है; दोनों का क्षय होने पर देह 'शून्य' कहलाती है, अर्थात् जीवन-सामर्थ्य से रिक्त।

 

श्लोक ८७

अतीव जायते वायुः प्रचंडो दारुणाकृतिः ।

विवर्णो दुःखसंतप्तः शून्यबुद्धिस्ततो भवेत् ॥८७॥

 

शब्दार्थ — अतीव जायते वायुः — अत्यधिक वायु उत्पन्न होती है; प्रचण्डः दारुणाकृतिः — प्रचंड और भयानक आकृति वाली; विवर्णः दुःखसंतप्तः — विवर्ण और दुःख से संतप्त; शून्यबुद्धिः ततः भवेत् — तब शून्यबुद्धि हो जाता है।

भावार्थ — अत्यंत प्रचंड और भयानक वायु उत्पन्न होती है; मनुष्य विवर्ण, दुःख से संतप्त और शून्यबुद्धि हो जाता है।

व्याख्या — रक्त-शुक्र के क्षय के बाद वायु का प्रकोप आता है—यह आयुर्वेद की वात-प्रधान अवस्था है, जिसमें वर्ण, बल और मन तीनों क्षीण होते हैं। 'शून्यबुद्धि' पद दिखाता है कि यहाँ वर्णन केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी है—शरीर का क्षय मन को भी खाली कर देता है।

 

श्लोक ८८

दृष्टा श्रुता तु या नारी तच्चित्तो भ्रमते सदा ।

तृप्तिर्न जायते काये लोलुपे चित्तवर्त्मनि ॥८८॥

 

शब्दार्थ — दृष्टा श्रुता तु या नारी — जो स्त्री देखी या सुनी गई हो; तत्चित्तः भ्रमते सदा — उसी में चित्त लगाकर सदा भ्रमता है; तृप्तिः न जायते — तृप्ति नहीं होती; काये लोलुपे चित्तवर्त्मनि — जब काया लोलुप और चित्त का मार्ग चंचल हो।

भावार्थ — जो स्त्री देखी या सुनी जाती है, उसी में चित्त लगाकर वह सदा भ्रमता रहता है; तृप्ति नहीं मिलती, क्योंकि काया लोलुप और चित्त चंचल हो जाता है।

व्याख्या — यह पंक्ति काम-चक्र की मनोवैज्ञानिक व्याख्या है—इच्छा का विषय बदलता रहता है, तृप्ति कभी नहीं आती। 'लोलुप' और 'चित्तवर्त्मनि' पद बताते हैं कि समस्या विषय में नहीं, चित्त की लोलुपता में है; इसीलिए काम का अंत संतोष से नहीं, क्षय से होता है।

 

श्लोक ८९

विरूपश्च सुरूपश्च ध्यानान्मध्ये प्रजायते ।

बलहीनो यदा कामी मांसशोणितसंक्षयात् ॥८९॥

 

शब्दार्थ — विरूपः च सुरूपः च — कुरूप और सुरूप (भाव); ध्यानात् मध्ये प्रजायते — ध्यान से बीच में उत्पन्न होते हैं; बलहीनः यदा कामी — जब कामी बलहीन हो जाता है; मांसशोणितसंक्षयात् — मांस और रक्त के क्षय से।

भावार्थ — कुरूप और सुरूप (भाव) ध्यान से उत्पन्न होते हैं; जब कामी मांस और रक्त के क्षय से बलहीन हो जाता है।

व्याख्या — यह श्लोक कठिन पाठ है, पर आशय यह लगता है—कामी का ध्यान जिस ओर जाता है, उसी आकृति में वह रमने लगता है; कुरूप-सुरूप का भेद भी उसके ध्यान की उपज बन जाता है। शेष पंक्ति बताती है कि यह सब मांस-रक्त के क्षय और बल-हानि की स्थिति में होता है—अर्थात् काम की तीव्रता शरीर की दुर्बलता के साथ बढ़ती है।

 

श्लोक ९०

पलितं जायते काये नाशिते कामवह्निना ।

तस्मात्संजायते कामी वृद्धो भूत्वा दिनेदिने ॥९०॥

 

शब्दार्थ — पलितम् जायते काये — शरीर में पलित (सफेद बाल) आ जाते हैं; नाशिते कामवह्निना — कामाग्नि से नष्ट होने पर; तस्मात् संजायते कामी वृद्धः — इससे वह कामी वृद्ध हो जाता है; भूत्वा दिने दिने — दिन-प्रतिदिन।

भावार्थ — कामाग्नि से शरीर के नष्ट होने पर पलित आ जाते हैं; इससे वह कामी दिन-प्रतिदिन वृद्ध होता जाता है।

व्याख्या — पलित को यहाँ जरा का प्रत्यक्ष चिह्न कहा गया है और उसका कारण कामाग्नि बताया गया है—अर्थात् शरीर-क्षय केवल काल से नहीं, असंयम से भी होता है। 'दिने दिने' पद क्रमिकता दिखाता है—वृद्धत्व एक झटके में नहीं, रोज़ थोड़ा-थोड़ा आता है।

 

श्लोक ९१

सुरते चिंतते नारीं यथा वार्द्धुषिको नरः ।

तथातथा भवेद्धानिस्तेजसोऽस्य नरेश्वर ॥९१॥

 

शब्दार्थ — सुरते चिन्तते नारीम् — मैथुन में स्त्री का चिंतन करता है; यथा वार्द्धुषिकः नरः — जैसे ब्याजखोर (साहूकार) मनुष्य; तथा तथा भवेत् हानिः — वैसे-वैसे हानि होती है; तेजसः अस्य नरेश्वर — उसके तेज की, हे नरेश्वर।

भावार्थ — हे नरेश्वर! जैसे साहूकार धन की गणना में लगा रहता है, वैसे ही वह मैथुन में स्त्री का चिंतन करता है; और जैसे-जैसे यह चिंतन बढ़ता है, वैसे-वैसे उसके तेज की हानि होती जाती है।

व्याख्या — 'वार्द्धुषिक' (ब्याज पर धन देने वाला) की उपमा कठोर है—साहूकार हर समय लाभ की गणना करता है और कभी संतुष्ट नहीं होता; कामी की स्थिति भी वही है। उपमा का दूसरा पहलू यह है कि साहूकार जितना ब्याज लेता है उतना उसका धन बढ़ता है, पर यहाँ उलटा है—जितना चिंतन, उतनी हानि; अर्थात् काम व्यापार नहीं, घाटा है।

 

श्लोक ९२

तस्मात्प्रजायते कायो नाशरूपं समृच्छति ।

अग्निः प्रजायते भूयो जरारूपो न संशयः ॥९२॥

 

शब्दार्थ — तस्मात् प्रजायते कायः — इससे शरीर उत्पन्न होता है; नाशरूपम् समृच्छति — नाश के रूप को प्राप्त होता है; अग्निः प्रजायते भूयः — अग्नि फिर उत्पन्न होती है; जरारूपः न संशयः — जरा का रूप धारण करके, संशय नहीं।

भावार्थ — इससे शरीर नाश के रूप को प्राप्त हो जाता है; और फिर वह अग्नि जरा का रूप धारण करके उत्पन्न होती है—इसमें संशय नहीं।

व्याख्या — यहाँ चक्र पूरा होता है—जो अग्नि रस से उत्पन्न हुई थी, वही अंत में जरा बनकर शरीर को नष्ट करती है। 'भूयः' पद पुनरावृत्ति दिखाता है: यह अग्नि हर जन्म में वही भूमिका निभाती है। इस प्रकार जरा कोई बाहरी शक्ति नहीं, शरीर की अपनी प्रक्रिया का अंतिम रूप है।

 

श्लोक ९३

प्राणिनां क्षयरूपेण ज्वरो भवति दारुणः ।

स्थावरा जंगमाः सर्वे ज्वरेण परिपीडिताः ॥९३॥

 

शब्दार्थ — प्राणिनाम् क्षयरूपेण — प्राणियों के क्षय के रूप में; ज्वरः भवति दारुणः — भयानक ज्वर होता है; स्थावराः जंगमाः सर्वे — सब स्थावर और जंगम; ज्वरेण परिपीडिताः — ज्वर से पीड़ित।

भावार्थ — प्राणियों के क्षय के रूप में भयानक ज्वर उत्पन्न होता है; सब स्थावर और जंगम प्राणी ज्वर से पीड़ित होते हैं।

व्याख्या — जरा अब 'ज्वर' का रूप लेती है—अर्थात् वही क्षय-प्रक्रिया तीव्र रोग के रूप में प्रकट होती है। 'स्थावर जंगम' का प्रयोग दिखाता है कि यह नियम केवल मनुष्य का नहीं, सब प्राणियों का है; वृक्ष से लेकर मनुष्य तक सब जरा-ज्वर के अधीन हैं। यह पूरे जरा-प्रकरण का व्यापक निष्कर्ष है।

 

श्लोक ९४

नाशमायांति ते सर्वे बहुपीडा प्रपीडिताः ।

एतत्ते सर्वमाख्यातमन्यत्किं ते वदाम्यहम् ॥९४॥

 

शब्दार्थ — नाशम् आयान्ति ते सर्वे — वे सब नाश को प्राप्त होते हैं; बहुपीडा प्रपीडिताः — अनेक पीड़ाओं से पीड़ित; एतत् ते सर्वम् आख्यातम् — यह सब तुम्हें कह दिया; अन्यत् किम् ते वदामि अहम् — और क्या मैं तुम्हें कहूँ?

भावार्थ — वे सब अनेक पीड़ाओं से पीड़ित होकर नाश को प्राप्त होते हैं; यह सब तुम्हें कह दिया—अब और क्या कहूँ?

व्याख्या — 'एतत् सर्वमाख्यातम्' कहकर मातलि अपना उत्तर समाप्त करता है और 'अन्यत् किं वदामि' से श्रोता को प्रश्न का अवसर देता है। यह वाक्य-शैली पुराण-संवाद की विशेषता है—वक्ता जानबूझकर द्वार खुला छोड़ता है, जिससे श्रोता अगला प्रश्न पूछ सके।

 

श्लोक ९५

एवमुक्तो महाराजो मातलिं वाक्यमब्रवीत् ॥९५॥

 

शब्दार्थ — एवम् उक्तः — इस प्रकार कहा गया; महाराजः — महाराज; मातलिम् वाक्यम् अब्रवीत् — मातलि से वचन कहने लगे।

भावार्थ — इस प्रकार (मातलि के) कहने पर महाराज ययाति मातलि से बोले।

व्याख्या — यह अध्याय का अंतिम श्लोक है और केवल 'कहने लगे' तक आता है—ययाति का उत्तर अगले अध्याय में आरंभ होता है। अतः अध्याय यहाँ अधूरे वाक्य पर समाप्त होता है; यह मूल पाठ की विशेषता है, त्रुटि नहीं—पुराण-ग्रंथों में अध्याय-विभाजन प्रायः संवाद के बीच में ही हो जाता है, जिससे पाठक अगले अध्याय की ओर खिंचा चला जाए।

 

अध्याय-समापन (पुष्पिका)

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखंडे वेनोपाख्याने

मातापितृतीर्थमाहात्म्ये चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥६४॥

शब्दार्थ — इति — इस प्रकार; श्रीपद्मपुराणे — श्री पद्मपुराण में; भूमिखण्डे — भूमिखण्ड में; वेनोपाख्याने — वेन-उपाख्यान में; मातापितृतीर्थमाहात्म्ये — माता-पिता के तीर्थ की महिमा के प्रसंग में; चतुःषष्टितमः अध्यायः — चौंसठवाँ अध्याय; ६४ — उसका क्रमांक।

भावार्थ — इस प्रकार श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड में, वेन-उपाख्यान के अंतर्गत, माता-पिता के तीर्थ की महिमा बताने वाला चौंसठवाँ अध्याय समाप्त होता है।

व्याख्या — पुष्पिका ग्रंथ, खण्ड, उपाख्यान और प्रसंग—चारों की पहचान देकर पाठ की प्रामाणिकता स्थापित करती है। यह भी दिखाती है कि नहुष-ययाति की यह कथा भी 'मातापितृतीर्थ-माहात्म्य' के अंतर्गत ही आती है: ययाति पिता के पुण्य-पथ पर चला और उसका यश तीनों लोकों में फैला, जबकि पिता नहुष पुण्य के शिखर से गिरा—पितृ-मर्यादा और पितृ-प्रसाद दोनों का उदाहरण इसी कथा में है।

अध्याय का समग्र सार

पहला सूत्र कर्म का है: पद, सुख और गति—तीनों पुण्य के फल हैं, उपहार नहीं। नहुष सौ यज्ञों से इंद्रपद पाया और शची के प्रति मोह से उसे खो दिया; ययाति ने वही पुण्य-पथ अपने पिता से भी आगे बढ़ाकर चला, इसलिए इंद्र स्वयं भयभीत हुए और उसे स्वर्ग बुलाने के लिए मातलि को भेजा। पुराण यहाँ यह भी दिखाता है कि पुण्य-शक्ति के सामने देवता भी असुरक्षित हैं, क्योंकि देवत्व भी कर्म-फल है।

दूसरा सूत्र संवाद का है: ययाति निमंत्रण स्वीकार नहीं करता, वह पहले पूछता है—मैंने कौन-सा कर्म किया, और जिस शरीर से पुण्य कमाया उसे छोड़कर जाना कैसे उचित है। यह प्रश्न अहंकार का नहीं, न्याय की चिंता का है, और इसी से अध्याय शरीर-विज्ञान में बदल जाता है। मातलि का उत्तर है कि देह पाँच तत्वों की बनी है, संधियों से जीर्ण होती है, जरा और रोगों से दूषित रहती है; जब वह स्वयं रहना नहीं चाहती, तब आत्मा का उसे छोड़ना विश्वासघात नहीं, स्वाभाविक गति है।

तीसरा सूत्र जरा का है: शरीर-अग्नि रस से उत्पन्न होती है, रस से बल बनाती है, अतिरेक में कामाग्नि बनकर बल को नष्ट करती है, फिर वायु का प्रकोप, धातुओं का क्षय, पलित, वृद्धत्व और अंत में ज्वर-रूप में जरा। मातलि का निष्कर्ष यह है कि सत्य, दान, यज्ञ, तीर्थ और संयम से जरा रोकी नहीं जाती—पाप उसे बढ़ा देते हैं, पुण्य उसे सहने योग्य बनाता है; अर्थात् पुण्य का फल शरीर में नहीं, परलोक में है।

व्यावहारिक शिक्षा यह निकलती है कि संयम शरीर और चरित्र दोनों की रक्षा करता है, और कृतज्ञता—पिता के पुण्य को पहचानना और उससे आगे बढ़ना—वंश की सच्ची निरंतरता है। अध्याय अधूरे वाक्य पर समाप्त होता है: ययाति मातलि से कुछ कहने लगे हैं, और उत्तर अगले अध्याय में आता है।

श्री पद्मपुराण

भूमिखण्ड  •  वेनोपाख्यान

मातापितृतीर्थ-माहात्म्य

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः (अध्याय ६५)

 

देह और पृथ्वी: ययाति-मातलि संवाद

श्लोक १–९  •  शब्दार्थ, भावार्थ एवं व्याख्या

 

अध्याय-परिचय

यह अध्याय पिछले अध्याय के अंतिम श्लोक से सीधे जुड़ता है। वहाँ 'एवमुक्तो महाराजो मातलिं वाक्यमब्रवीत्' कहकर कथा रुक गई थी; यहाँ ययाति का वही वाक्य पूरा होता है और उनका पहला प्रश्न सामने आता है—धर्म का रक्षक शरीर आत्मा के साथ स्वर्ग क्यों नहीं जाता? मातलि का उत्तर इस पूरे अध्याय का शरीर है।

अध्याय छोटा है—केवल नौ श्लोक—पर तर्क में सघन। मातलि पहले सिद्धांत देता है (पाँच भूतों का आत्मा से कोई वास्तविक संयोग नहीं), फिर एक लंबी उपमा चलाता है: जैसे रस से भीगी पृथ्वी मृदु होकर चींटियों-चूहों से छिद्रित होती है और उसमें बाँबियाँ तथा उभार उठते हैं, वैसे ही देह में गण्डमाला, विचर्चिका और गुल्म उठते हैं। अंत में निष्कर्ष: देह का पार्थिव भाग पृथ्वी पर ही रह जाता है, वह स्वर्ग नहीं जाती।

पाठ-संबंध में दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली, श्लोक १ का 'नाकमेष' संधि-रूप है और संस्करणों में इसका भेद मिलता है; आशय स्पष्ट है—देह स्वर्ग नहीं जाती। दूसरी, श्लोक ९ केवल आधा है—अध्याय अपूर्ण वाक्य पर समाप्त होता है और अगला अध्याय उसी धारा को आगे बढ़ाता है, जैसा पिछले अध्याय में भी हुआ था।

प्रत्येक श्लोक के नीचे तीन खंड हैं—शब्दार्थ (पदों का अर्थ), भावार्थ (श्लोक का सीधा आशय) और व्याख्या (भाव का विस्तार और संदर्भ)।

श्लोक १

ययातिरुवाच—

धर्मस्य रक्षकः कायो मातले चात्मना सह ।

नाकमेष न प्रयाति तन्मे त्वं कारणं वद ॥१॥

 

शब्दार्थ — धर्मस्य रक्षकः — धर्म का रक्षक; कायः — शरीर; मातले — हे मातले; च आत्मना सह — और आत्मा के साथ; नाकम् — स्वर्ग को; एष न प्रयाति — यह नहीं जाता; तत् मे — उसका मुझे; त्वम् कारणम् वद — तुम कारण बताओ।

भावार्थ — हे मातले! धर्म का रक्षक यह शरीर आत्मा के साथ स्वर्ग नहीं जाता—इसका कारण मुझे बताओ।

व्याख्या — पिछले अध्याय के अंतिम श्लोक में ययाति 'बोलने लगे' थे; यहाँ उनका वही वाक्य पूरा होता है—इसलिए दोनों अध्याय एक ही वाक्य-धारा के दो हिस्से हैं। प्रश्न सूक्ष्म है: यदि शरीर धर्म का रक्षक है और आत्मा उसके साथ रहती है, तो धर्म का फल भोगने के समय वह साथ क्यों नहीं जाता? 'नाक' शब्द वैदिक भाषा में स्वर्ग का पर्याय है। मूल पाठ में 'नाकमेष' एक संधि-रूप है, जिसे कुछ संस्करण 'नाकमेष न प्रयाति' और कुछ 'नाकमेष प्रयाति' पढ़ते हैं; आशय दोनों में एक ही है—देह स्वर्ग नहीं जाती।

 

श्लोक २

मातलिरुवाच—

पंचानामपि भूतानां संगतिर्नास्ति भूपते ।

आत्मना सह वर्तंते संगत्या नैव पंच ते ॥२॥

 

शब्दार्थ — पञ्चानाम् अपि भूतानाम् — पाँचों भूतों की; संगतिः न अस्ति — (आत्मा के साथ) वास्तविक संगति नहीं है; भूपते — हे भूपते; आत्मना सह वर्तन्ते — वे आत्मा के साथ रहते हैं; संगत्या न एव — केवल संपर्क से, वास्तविक संयोग से नहीं; पञ्च ते — वे पाँच।

भावार्थ — हे भूपते! पाँचों भूतों का आत्मा के साथ कोई वास्तविक संगति-संबंध नहीं है; वे आत्मा के साथ केवल संपर्क से रहते हैं, वास्तविक संयोग से नहीं।

व्याख्या — यह श्लोक पिछले अध्याय के श्लोक ६१ का विस्तार है, जहाँ मातलि ने कहा था कि आत्मा का शरीर के साथ संबंध नहीं है। यहाँ वही बात सांख्य की भाषा में कही जाती है: पाँच भूत आत्मा में समवेत नहीं, केवल संयुक्त हैं—जैसे यात्री और सराय। इसलिए देह का साथ न जाना आत्मा की कोई हानि नहीं, केवल संपर्क का टूट जाना है।

 

श्लोक ३

सर्वेषां तत्र संघातः कायग्रामे प्रवर्तते ।

जरया पीडिताः सर्वे स्वंस्वं स्थानं प्रयांति ते ॥३॥

 

शब्दार्थ — सर्वेषाम् — सब (भूतों) का; तत्र — वहाँ; संघातः — समूह, ढेर; कायग्रामे — शरीर-रूपी गाँव में; प्रवर्तते — प्रवृत्त होता है; जरया पीडिताः — जरा से पीड़ित; सर्वे — सब; स्वं स्वं स्थानम् — अपने-अपने स्थान को; प्रयान्ति ते — वे जाते हैं।

भावार्थ — उन सब भूतों का समूह शरीर-रूपी गाँव में बसता है; जरा से पीड़ित होकर वे सब अपने-अपने स्थान को लौट जाते हैं।

व्याख्या — 'कायग्राम' उपमा इस अध्याय की सबसे सुंदर रचना है—शरीर एक गाँव है जिसमें पाँच भूत बसेरा लगाए रहते हैं, और जरा आने पर वे अपने-अपने घर लौट जाते हैं: पृथ्वी मिट्टी में, जल जल में, तेज ऊष्मा में, वायु हवा में और आकाश अवकाश में। यह 'गाँव' शब्द आगे की सारी उपमाओं की भूमिका बनाता है—चींटियाँ, चूहे, बाँबियाँ और उभार, सब इसी गाँव के दृश्य हैं।

 

श्लोक ४

यथा रसाधिका पृथ्वी महाराज प्रकल्पिता ।

रसैः क्लिन्ना ततः पृथ्वी मृदुत्वं याति भूपते ॥४॥

 

शब्दार्थ — यथा — जैसे; रसाधिका पृथ्वी — रस (नमी) से भरी पृथ्वी; महाराज — हे महाराज; प्रकल्पिता — मानी गई है; रसैः क्लिन्ना — रसों से भीगी हुई; ततः — तब; पृथ्वी मृदुत्वम् याति — पृथ्वी मृदु, नरम हो जाती है; भूपते — हे भूपते।

भावार्थ — हे महाराज! जैसे रस (नमी) से भरी पृथ्वी कही जाती है—रसों से भीगकर पृथ्वी मृदु हो जाती है।

व्याख्या — यहाँ उपमा आरंभ होती है जो अध्याय का केंद्र है: देह की तुलना पृथ्वी से। शरीर का 'पार्थिव भाग' अर्थात् ठोस भाग—मांस, अस्थि, मज्जा। जैसे अधिक नमी वाली मिट्टी नरम होकर दीमक और चूहों के लिए सरल हो जाती है, वैसे ही देह भी रस-बहुल और शिथिल होकर विकारों के लिए सरल बन जाती है। उपमा का आशय यह नहीं कि देह मिट्टी है, बल्कि यह कि दोनों की गति एक ही है—बनना, गलना और लौट जाना।

 

श्लोक ५

भिद्यते पिपीलिकाभिर्मूषिकाभिस्तथैव च ।

छिद्राण्येव प्रजायंते वल्मीकाश्च महोदराः ॥५॥

 

शब्दार्थ — भिद्यते — छिद्रित की जाती है; पिपीलिकाभिः — चींटियों से; मूषिकाभिः तथैव च — और चूहों से भी; छिद्राणि एव प्रजायन्ते — छिद्र उत्पन्न हो जाते हैं; वल्मीकाः च — बाँबियाँ (दीमक के ढेर); महोदराः — बड़े उभार।

भावार्थ — वह पृथ्वी चींटियों और चूहों से छिद्रित हो जाती है; उसमें छिद्र, बाँबियाँ और बड़े-बड़े उभार बन जाते हैं।

व्याख्या — मिट्टी की यह दशा देह की दशा का पूर्वाभास है। 'महोदर' का प्रयोग यहाँ भूमि के उभार के लिए हुआ है, पर शब्द का सामान्य अर्थ 'बड़ा उदर' भी है—और देह-वर्णन में दोनों अर्थ साथ चलते हैं, क्योंकि शरीर में भी गाँठें और सूजन ऐसे ही उभार बनाती हैं। उपमा का बल इसी दोहरे अर्थ में है।

 

श्लोक ६

तद्वत्काये प्रजायंते गंडमाला विचार्चिकाः ।

कृमिभिर्भिद्यमानश्च काय एष नरोत्तम ॥६॥

 

शब्दार्थ — तद्वत् — उसी प्रकार; काये — शरीर में; प्रजायन्ते — उत्पन्न होते हैं; गण्डमालाः — गले की ग्रंथियों की सूजन (गाँठों की माला); विचर्चिकाः — त्वचा के पपड़ीदार ददोरे, व्रण; कृमिभिः भिद्यमानः च — कीड़ों से छिद्रित होता हुआ; कायः एषः — यह शरीर; नरोत्तम — हे नरोत्तम।

भावार्थ — उसी प्रकार शरीर में गण्डमाला और विचर्चिका उत्पन्न होती हैं, और यह शरीर कीड़ों से छिद्रित होता रहता है।

व्याख्या — यहाँ तीन विकार नाम से आते हैं: गण्डमाला अर्थात् गले और ग्रंथियों की गाँठों की माला, विचर्चिका अर्थात् त्वचा पर पपड़ी, दरार और स्राव वाला विकार, और कृमि-भेदन अर्थात् कीटों से शरीर का छिद्रित होना। आधुनिक चिकित्सा इनके कारण अलग बताती है—गण्डमाला प्रायः जीवाणु-संक्रमण से ग्रंथियों की सूजन (तपेदिक भी एक कारण), विचर्चिका जैसे विकार त्वचा के संक्रमण या शोथ से, और कीट-परजीवी बाहर से आते हैं, देह में अपने आप पैदा नहीं होते। पर मूल अवलोकन आज भी वैसा ही है: देह में गाँठें उठती हैं, त्वचा फटती-सड़ती है, और शरीर परजीवियों का आश्रय बन जाता है।

 

श्लोक ७

गुल्मास्तत्र प्रजायंते सद्यः पीडाकरास्तदा ।

एभिर्दोषैः समायुक्तः कायोयं नहुषात्मज ।

कथं प्राणसमायोगाद्दिवं याति नरेश्वर ॥७॥

 

शब्दार्थ — गुल्माः — गुल्म (पेट के पिंड, गाँठें); तत्र प्रजायन्ते — वहाँ उत्पन्न होते हैं; सद्यः पीडाकराः तदा — उस समय तुरंत पीड़ा करने वाले; एभिः दोषैः समायुक्तः — इन दोषों से युक्त; कायः अयम् — यह शरीर; नहुषात्मज — हे नहुष-नंदन; कथम् प्राणसमायोगात् — प्राण के संयोग से कैसे; दिवम् याति — स्वर्ग जाता है; नरेश्वर — हे नरेश्वर।

भावार्थ — हे नहुष-नंदन! वहाँ तुरंत पीड़ा देने वाले गुल्म उत्पन्न होते हैं; इन दोषों से युक्त यह शरीर प्राण के संयोग से स्वर्ग कैसे जा सकता है?

व्याख्या — 'गुल्म' आयुर्वेद का एक स्वतंत्र रोग-नाम है—पेट में बनने वाला पिंड या गाँठ, जिसका आधुनिक समकक्ष उदर-पिंड, ट्यूमर या आंत का अवरोध माना जा सकता है; शब्द का मूल अर्थ 'गेंद/गाँठ' है। मातलि का तर्क यह है कि जो देह स्वयं निरंतर रोग-ग्रस्त और क्षयशील है, वह अपने गुण से स्वर्ग नहीं जा सकती; 'प्राणसमायोग' अर्थात् प्राण का संबंध ही उसका एकमात्र आधार है, और वही टूटते ही शेष क्या बचता है।

 

श्लोक ८

काये पार्थिवभागोऽयं समानार्थं प्रतिष्ठितः ।

न कायः स्वर्गमायाति यथा पृथ्वी तथास्थितः ॥८॥

 

शब्दार्थ — काये — शरीर में; पार्थिवभागः अयम् — यह पार्थिव (मृत्तिका-संबंधी) भाग; समानार्थम् — उसी (पृथ्वी के) प्रयोजन के लिए; प्रतिष्ठितः — स्थित है; न कायः स्वर्गम् आयाति — शरीर स्वर्ग नहीं जाता; यथा पृथ्वी तथा स्थितः — जैसी पृथ्वी है, वैसा ही स्थित रहता है।

भावार्थ — शरीर का जो पार्थिव भाग है वह पृथ्वी के ही प्रयोजन के लिए स्थित है; शरीर स्वर्ग नहीं जाता—वह जैसी पृथ्वी है, वैसा ही रह जाता है।

व्याख्या — यह श्लोक पूरे प्रकरण का निष्कर्ष है—देह का ठोस भाग पृथ्वी का ही अंश है और पृथ्वी पर ही रह जाता है; इसलिए 'शरीर स्वर्ग जाता है' कहना उसके स्वभाव के ही विरुद्ध है। यह वही उत्तर है जो पिछले अध्याय में अधूरा रह गया था: पुण्य का फल आत्मा भोगती है, देह नहीं। और यह उत्तर ययाति के पहले प्रश्न—'जिस देह से पुण्य कमाया उसे छोड़कर जाना कैसे उचित है'—का अंतिम समाधान भी है।

 

श्लोक ९

एतत्ते सर्वमाख्यातं दोषौघैः पार्थिवस्य यः ॥९॥

 

शब्दार्थ — एतत् ते सर्वम् आख्यातम् — यह सब तुम्हें कह दिया गया; दोषौघैः — दोषों के समूह से; पार्थिवस्य — पार्थिव (देह) के; यः — जो।

भावार्थ — पार्थिव देह के दोष-समूह के विषय में यह सब तुम्हें कह दिया गया।

व्याख्या — यह श्लोक आधा है—वाक्य अपूर्ण रह जाता है और अध्याय वहीं समाप्त हो जाता है, ठीक जैसे पिछला अध्याय ययाति के प्रश्न पर समाप्त हुआ था। पुराण-पाठ में यह सामान्य है: अध्याय-विभाजन संवाद के बीच पड़ता है और अगला अध्याय वहीं से उठाता है। 'दोषौघ' शब्द पूरे अध्याय का सार है—देह दोषों का समूह है, इसीलिए वह साथ नहीं जा सकती।

 

अध्याय-समापन (पुष्पिका)

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखंडे वेनोपाख्याने मातापितृतीर्थ-

माहात्म्ये पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥६५॥

शब्दार्थ — इति — इस प्रकार; श्रीपद्मपुराणे — श्री पद्मपुराण में; भूमिखण्डे — भूमिखण्ड में; वेनोपाख्याने — वेन-उपाख्यान में; मातापितृतीर्थमाहात्म्ये — माता-पिता के तीर्थ की महिमा के प्रसंग में; पञ्चषष्टितमः अध्यायः — पैंसठवाँ अध्याय; ६५ — उसका क्रमांक।

भावार्थ — इस प्रकार श्री पद्मपुराण के भूमिखण्ड में, वेन-उपाख्यान के अंतर्गत, माता-पिता के तीर्थ की महिमा बताने वाला पैंसठवाँ अध्याय समाप्त होता है।

व्याख्या — यह पुष्पिका ग्रंथ, खण्ड, उपाख्यान और प्रसंग की पहचान देकर पाठ को प्रमाणित करती है। ध्यान देने योग्य है कि ययाति-मातलि का यह शरीर-चिंतन भी 'मातापितृतीर्थ-माहात्म्य' के अंतर्गत ही आता है—क्योंकि पिता नहुष के पुण्य-पाप और पुत्र ययाति की गति, दोनों इसी प्रसंग के भीतर कही जा रही हैं।

अध्याय का सार

ययाति का प्रश्न न्याय का है: धर्म जिस देह से कमाया गया, उसका फल भोगने के समय वही देह क्यों नहीं जाती? मातलि का उत्तर तीन सीढ़ियों में है। पहली, देह और आत्मा का संबंध नित्य नहीं—पाँच भूत आत्मा के साथ केवल संपर्क में रहते हैं, समवेत नहीं। दूसरी, देह पाँच भूतों का संघात है, और जरा आने पर हर भूत अपने स्थान को लौट जाता है; 'कायग्राम' अर्थात् शरीर-गाँव में बसे ये पाँचों यात्री हैं। तीसरी, देह का पार्थिव भाग पृथ्वी का ही अंश है, इसलिए वह पृथ्वी पर ही रहता है—स्वर्ग आत्मा जाती है, देह नहीं।

उपमा का केंद्र यह है कि देह भी मिट्टी की तरह बनती, गलती और लौट जाती है: रस से भीगकर मृदु होती है, कीटों से छिद्रित होती है, गाँठें और उभार उठाती है। यह वर्णन निराशावाद नहीं, विवेक है—इसका प्रयोजन यह दिखाना है कि जो वस्तु स्वयं इतनी अस्थिर है, उस पर 'मैं' और 'मेरा' का अधिकार जमाना व्यर्थ है। यही अध्याय का नैतिक निष्कर्ष है।

पुराण और आधुनिक विज्ञान: एक संक्षिप्त तुलना

यहाँ की उपमा का ढाँचा आधुनिक समझ से मेल खाता है। देह का खनिज भाग वस्तुतः मिट्टी के ही तत्वों से बना है—कैल्शियम, फॉस्फेट, लोहा आदि—और मृत्यु के बाद वे मिट्टी में ही लौटते हैं। मिट्टी में नमी और सूक्ष्मजीव ही उसे 'मृदु' और सड़ने योग्य बनाते हैं; चींटी, दीमक और चूहे सचमुच छिद्र और ढेर बनाते हैं। अंतर यह है कि आधुनिक विज्ञान इन्हें रूपक के बजाय प्रक्रिया के रूप में बताता है।

दूसरी ओर, श्लोक ६-७ के विकारों के नाम आज भी पहचाने जाते हैं, पर उनके कारण बदल गए हैं: गण्डमाला अर्थात् ग्रंथियों की सूजन—प्रायः जीवाणु या तपेदिक के संक्रमण से; विचर्चिका जैसे त्वचा-विकार—संक्रमण या शोथ से; गुल्म—उदर का पिंड या अवरोध। 'देह में अपने आप कृमि उत्पन्न होते हैं' वाला भाग आधुनिक चिकित्सा नहीं मानती—परजीवी बाहर से आते हैं। इसलिए यहाँ भी वही विभाजन लागू है जो पिछले अध्याय में कहा गया था: अवलोकन प्रायः सही, कारण की व्याख्या उस युग की। और देह के अनित्य होने का नैतिक निष्कर्ष किसी भी शरीर-विज्ञान से न तो सिद्ध होता है, न खंडित।