महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१८०

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 180वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 5 (महर्षि भरद्वाज और द्रोणाचार्य के जन्म की कथा)

श्लोक 1 और 2:

ब्राह्मण उवाच।1-180-1x गङ्गाद्वारं प्रति महान्बभूवर्षिर्महातपाः। भरद्वाजो महाप्राज्ञः सततं संशितव्रतः।।1-180-1a 1-180-1b सोऽभिषेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवागतां सतीम्। ददर्शाप्सरसं तत्र घृताचीमाप्लुतामृषिः।।1-180-2a 1-180-2b

  • हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने कहा— गंगाद्वार (हरिद्वार) के पास महान तपस्वी, महाप्राज्ञ और निरंतर कठोर व्रत का पालन करने वाले भरद्वाज नामक एक महान ऋषि रहते थे। वे एक दिन प्रातःकाल गंगा में स्नान करने के लिए गए। वहाँ उन्होंने अप्सरा घृताची को गंगा में स्नान करते हुए देखा।
  • व्याख्या: द्रोणाचार्य के जन्म की पृष्ठभूमि बताते हुए अतिथि ब्राह्मण भरद्वाज ऋषि के आश्रम और उनकी स्नान-वेला का प्रसंग सुनाता है।

श्लोक 3, 4 और 5:

तस्या वायुर्नदीतीरे वसनं व्यहरत्तदा। अपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे तदा।।1-180-3a 1-180-3b तस्यां संसक्तमनसः कौमारब्रह्मचारिणः। चिरस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे।।1-180-4a 1-180-4b ततः समभवद्द्रोणः कुमारस्तस्य धीमतः। अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः।।1-180-5a 1-180-5b

  • हिन्दी अनुवाद: उस समय तेज वायु के कारण नदी के तट पर रखे उस अप्सरा के वस्त्र उड़ गए। वस्त्रों से रहित हुई उस घृताची को देखकर ऋषि भरद्वाज के मन में काम-भाव उत्पन्न हो गया। आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले उन ऋषि का मन जब उस पर आसक्त हुआ, तब बहुत लंबे समय के बाद उनका वीर्यपात हो गया। उस ऋषि ने उस वीर्य को एक 'द्रोण' (लकड़ी के पात्र/घड़े) में रख लिया। तदनंतर उसी द्रोण से उन धीमान् ऋषि के पुत्र के रूप में 'द्रोण' कुमार का जन्म हुआ। उन द्रोण ने सभी वेदों और वेदांगों का संपूर्ण अध्ययन किया।
  • व्याख्या: द्रोणाचार्य का जन्म स्त्री-गर्भ से नहीं, बल्कि द्रोण (लकड़ी के बर्तन) में ऋषि भरद्वाज के वीर्य से हुआ था, इसीलिए उनका नाम 'द्रोण' पड़ा।

श्लोक 6 से 9 (द्रुपद और द्रोण की मित्रता तथा परशुराम से अस्त्र-विद्या की प्राप्ति)

श्लोक 6 और 7:

भरद्वाजस्य तु सखा पृषतो नाम पार्थिवः। तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत्सुतः।।1-180-6a 1-180-6b स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्षतः। चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः।।1-180-7a 1-180-7b

  • हिन्दी अनुवाद: महर्षि भरद्वाज के पृषत नाम के एक राजा मित्र थे। उन राजा पृषत के भी द्रुपद नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ था। वह क्षत्रियश्रेष्ठ पार्षत (पृषतपुत्र द्रुपद) नित्य महर्षि के आश्रम में आकर द्रोण के साथ खेलता था और उनके साथ ही अध्ययन भी करता था।
  • व्याख्या: बचपन में द्रोण और द्रुपद एक ही आश्रम में साथ-साथ पढ़े थे और दोनों में गहरी मित्रता थी।

श्लोक 8 और 9:

ततस्तु पृषतेऽतीते स राजा द्रुपदोऽभवत्। द्रोणोऽपि रामं शुश्राव दित्सन्तं वसु सर्वशः।।1-180-8a 1-180-8b वनं तु प्रस्थितं रामं भरद्वाजसुतोऽब्रवीत्। आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तम।।1-170-9a 1-180-9b

  • हिन्दी अनुवाद: तत्पश्चात् राजा पृषत के परलोक सिधारने पर वे राजकुमार द्रुपद वहाँ के राजा बन गए। इधर द्रोण ने सुना कि भगवान परशुराम (राम) अपना सारा धन ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान में देने वाले हैं। जब परशुरामजी वन की ओर प्रस्थान करने लगे, तब भरद्वाजपुत्र द्रोण उनके पास गए और बोले— "हे द्विजोत्तम! आप मुझे धन की इच्छा से आया हुआ द्रोण जानिए।"
  • व्याख्या: समय बीतने पर द्रुपद राजा बन गए, और द्रोण अपनी गरीबी दूर करने तथा अस्त्र-विद्या सीखने के लिए परशुरामजी के पास पहुँचे।

श्लोक 10 से 13 (परशुराम से ब्रह्मास्त्र की प्राप्ति)

श्लोक 10, 11 और 12:

राम उवाच।1-180-10x शरीरमात्रमेवाद्य मया समवशेषितम्। अस्त्राणि वा शरीरं वा ब्रह्मन्नेकतमं वृणु।।1-180-10a 1-180-10b द्रोण उवाच।1-180-11x अस्त्राणि चैव सर्वाणि तेषां संहारमेव च। प्रयोगं चैव सर्वेषां दातुमर्हति मे भवान्।।1-170-11a 1-180-11b ब्राह्मण उवाच।1-180-12x तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रददौ भृगुनन्दनः। प्रतिगृह्य तदा द्रोणः कृतकृत्योऽभवत्तदा।।1-170-12a 1-180-12b

  • हिन्दी अनुवाद: परशुराम बोले— "हे ब्राह्मण! अब तो मेरे पास केवल यह शरीर मात्र ही शेष बचा है (मैंने अपना सारा धन दान कर दिया है)। इसलिए हे ब्रह्मन्! तुम मेरे पास से या तो सारे अस्त्र ले लो या मेरा यह शरीर (मुझे युद्ध में हरा दो), इन दोनों में से जो चाहो चुन लो।" द्रोण ने कहा— "आप मुझे समस्त अस्त्र, उनका संहार करने की विधि तथा उन सभी का प्रयोग करना प्रदान करने की कृपा करें।" अतिथि ब्राह्मण ने कहा— 'बहुत ऐसा ही हो' कहकर भृगुनंदन परशुराम ने उन्हें सब कुछ दे दिया। उसे प्राप्त करके द्रोण उस समय कृतकृत्य (सफल) हो गए।
  • व्याख्या: परशुरामजी ने अपना सब कुछ दान कर दिया था, इसलिए उन्होंने अपनी समस्त अस्त्र-विद्या द्रोणाचार्य को सौंप दी।

श्लोक 13:

संप्रहृष्टमना द्रोणो रामात्परमसम्मतम्। ब्रह्मास्त्रं समनुज्ञाप्य नरेष्वभ्यधिकोऽभवत्।।1-180-13a 1-180-13b

  • हिन्दी अनुवाद: परशुरामजी से अत्यंत दुर्लभ और श्रेष्ठ 'ब्रह्मास्त्र' को प्राप्त करके और उसकी पूरी विधि सीखकर प्रहर्षित मन वाले द्रोण मनुष्यों में सबसे बढ़कर (अत्यधिक शक्तिशाली) हो गए।
  • व्याख्या: ब्रह्मास्त्र और तमाम अस्त्र-शस्त्रों की विद्या पाकर द्रोणाचार्य अपने समय के सबसे बड़े धनुर्धर और योद्धा बन गए।

श्लोक 14 से 16 (द्रुपद के पास जाना और द्रुपद द्वारा अपमानित होना)

श्लोक 14 और 15:

ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान्। अब्रवीत्पुरुषव्याघ्रः सखायं विद्धि मामिति।।1-180-14a 1-180-14b द्रुपद उवाच।1-180-15x नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा। नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते।।1-170-15a 1-180-15b

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर प्रतापशाली भारद्वाजपुत्र (द्रोण) ने राजा द्रुपद के पास जाकर कहा— "मित्र! मुझे अपना सखा (मित्र) पहचानो।" (बचपन की मित्रता याद दिलाई)। इस पर राजा द्रुपद ने गर्व से कहा— "न तो कोई अश्रोत्रिय (अनपढ़/अविद्वान) किसी श्रोत्रिय का मित्र हो सकता है, न कोई अरथी किसी रथी का मित्र हो सकता है, और न ही कोई राजा किसी अराजा (साधारण व्यक्ति) का मित्र हो सकता है। पुरानी मित्रता की बात अब यहाँ क्यों करते हो?"
  • व्याख्या: राजा बनने के घमंड में द्रुपद ने अपने बचपन के मित्र द्रोणाचार्य का अपमान किया और कहा कि राजा और एक साधारण ब्राह्मण में मित्रता कैसी।

श्लोक 16:

ब्राह्मण उवाच।1-180-16x स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रति बुद्धिमान्। जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम्।।1-180-16a 1-180-16b

  • हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने आगे कहा— उस बुद्धिमान द्रोण ने मन में पांचाल नरेश (द्रुपद) के प्रति उस अपमान का बदला लेने का निश्चय किया और वे कुरुवंशियों के मुख्य नगर हस्तिनापुर (नागसाह्वय) की ओर चल पड़े।
  • व्याख्या: द्रुपद के इस अपमान से आहत होकर द्रोणाचार्य हस्तिनापुर चले आए जहाँ कौरव और पांडव राजकुमार रहते थे।

श्लोक 17 से 24 (हस्तिनापुर आगमन, पाण्डवों को शिक्षा और द्रुपद पर आक्रमण)

श्लोक 17, 18 और 19:

तस्मै पौत्रान्समादाय वसूनि विविधानि च। प्राप्ताय प्रददौ भीष्मः शिष्यान्द्रोणाय धीमते।।1-180-17a 1-180-17b द्रोणः शिष्यांस्ततः पार्थानिदं वचनमब्रवी्त। समानीय तु ताञ्शिष्यान्द्रुपदस्यासुखाय वै।।1-180-18a 1-180-18b आचार्यवेतनं किंचिद्धृदि Yद्वर्तते मम। कृतास्त्रैस्तत्प्रदेयं स्याttedृतं वदतानघाः। सोऽर्जुनप्रमुखैरुक्तस्तथाऽस्त्विति गुरुस्तदा।।1-180-19a 1-180-19b 1-180-19c

  • हिन्दी अनुवाद: हस्तिनापुर पहुँचने पर बुद्धिमान भीष्म ने अपने पौत्रों (कौरव-पांडवों) को और तरह-तरह के धन को लाकर उन धीमान् द्रोणाचार्य को सौंप दिया और उन्हें अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार किया। तत्पश्चात द्रोण ने अपने उन सभी शिष्यों (पाण्डवों और कौरवों) को पास बुलाया और द्रुपद को कष्ट (असुख) पहुँचाने की मंशा से यह वचन कहा— "हे अनघो! अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा पूरी होने पर मेरे मन में जो आचार्य-वेतन (गुरुदक्षिणा) लेने की इच्छा है, वह तुम सबको पूरी करनी होगी, सच बताओ, क्या तुम ऐसा करोगे?" तब अर्जुन आदि सभी शिष्यों ने गुरु से कहा— "गुरुजी! वैसा ही होगा।"
  • व्याख्या: भीष्म ने पांडव और कौरवों को द्रोण की सेवा में लगा दिया, और द्रोण ने अपनी गुरुदक्षिणा के रूप में द्रुपद को हराने का संकल्प शिष्यों से लिया।

श्लोक 20 और 21:

यदा च पाण्डवाः सर्वे कृतास्त्राः कृतनिश्चयाः। ततो द्रोणोऽब्रवीद्भूयो वेतनार्थमिदं वचः।।1-180-20a 1-180-20b पार्षतो द्रुपदो नाम छत्रवत्यां नरेश्वरः। तस्मादाकृष्य तद्राज्यं मम शीघ्रं प्रदीयताम्।।1-180-21a 1-180-21b

  • हिन्दी अनुवाद: जब सभी पाण्डव और कौरव अस्त्र-विद्या में पूर्ण रूप से निपुण और दृढ़निश्चयी हो गए, तब द्रोण ने अपनी गुरुदक्षिणा (वेतन) के लिए उनसे यह बात फिर से कही— "छत्रवती (अहिच्छत्र) का राजा पार्षतपुत्र द्रुपद नाम का जो नरेश है, उससे उसका वह राज्य छीनकर शीघ्र ही मुझे लाकर दो।"
  • व्याख्या: शिक्षा पूरी होने पर द्रोणाचार्य ने शिष्यों से गुरुदक्षिणा के रूप में राजा द्रुपद को बंदी बनाकर उसका राज्य छीनकर लाने की माँग की।

श्लोक 22 और 23:

`धार्तराष्ट्राश्च ते भीताः पाञ्चालान्पाण्डवादयः। धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः पुनर्द्रोणेन चोदिताः।।1-180-22a 1-180-22b यज्ञसेनेन संगम्य कर्णदुर्योधनादयः। निर्जिताः संन्यवर्तन्त तथा ते क्षत्रियर्षभाः।।'1-180-23a 1-180-23b

  • हिन्दी अनुवाद: द्रोण द्वारा प्रेरित किए जाने पर धार्तराष्ट्र (कौरव), पाण्डव तथा अन्य क्षत्रियश्रेष्ठ शिष्यों ने पाँचाल देश पर आक्रमण कर दिया। कर्ण, दुर्योधन आदि सभी ने यज्ञसेन (द्रुपद) के साथ युद्ध किया और उन्हें पराजित करके वापस लौटे।
  • व्याख्या: कौरवों और पांडवों की संयुक्त सेना ने पांचाल देश पर धावा बोल दिया और राजा द्रुपद की सेना को हरा दिया।

श्लोक 24, 25 और 26:

ततः पाण्डुसुताः पञ्च निर्जित्य द्रुपदं युधि। द्रोणाय दर्शयामासुरुबद्ध्वा ससचिवं तदा।।1-180-24a 1-180-24b `महेन्द्र इव दुर्धर्षो महेन्द्र इव दानवम्। महेन्द्रपुत्रः पाञ्चालं जितवानर्जुनस्तदा।।1-180-25a 1-180-25b तद्दृष्ट्वा तु महावीर्यं फल्गुनस्य महौजसः। व्यस्मयन्त जनाः सर्वे यज्ञसेनस्य बान्धवाः।1-180-26a 1-180-26b

  • हिन्दी अनुवाद: तब पाँचों पाण्डुपुत्रों ने युद्ध में द्रुपद को जीत लिया और उनके मंत्रियों सहित उन्हें रस्सियों से बाँधकर द्रोणाचार्य के सामने लाकर प्रस्तुत कर दिया। देवराज इंद्र के समान दुर्धर्ष और इंद्रपुत्र (अर्जुन) ने दानव की तरह उस समय पांचाल नरेश (द्रुपद) को जीत लिया था। महाबली और तेजवान फल्गुन् (अर्जुन) के उस महापराक्रम को देखकर यज्ञसेन (द्रुपद) के सभी सगे-सम्बन्धी और लोग विस्मित हो गए।
  • व्याख्या: अर्जुन ने युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए राजा द्रुपद को उनके मंत्रियों समेत बंदी बना लिया और द्रोण के समक्ष पेश किया।

श्लोक 27 से 32 (द्रोण और द्रुपद की पुनः मित्रता और अध्याय का समापन)

श्लोक 27 और 28:

द्रोण उवाच।1-180-27x प्रार्थयामि त्वया सख्यं पुनरेव नराधिप। अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति।।1-180-27a 1-180-27b अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन त्वया सह। राजाऽसि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे।।1-180-28a 1-180-28b

  • हिन्दी अनुवाद: द्रोण ने (बन्दी बने द्रुपद से) कहा— "हे नराधिप! मैं तुम्हारे साथ फिर से वही पुरानी मित्रता की प्रार्थना करता हूँ, क्योंकि कोई 'अराजा' (साधारण व्यक्ति) किसी राजा का मित्र नहीं हो सकता (जैसा तुमने पहले कहा था)। इसलिए हे यज्ञसेन! मैंने तुम्हारे साथ राज्य पाने के लिए ही यह युद्ध किया है। अब तुम गंगा (भागीरथी) के दक्षिण कुल (किनारे) के राजा रहो, और मैं उत्तर कुल का राजा हूँ।"
  • व्याख्या: द्रोणाचार्य ने बदला लेने के बाद द्रुपद को आधा राज्य लौटा दिया और कहा कि अब वे दोनों बराबर के राजा हैं, इसलिए उनकी पुरानी मित्रता फिर से बहाल हो सकती है।

श्लोक 29, 30 और 31:

ब्राह्मण उवाच।1-180-29x एवमुक्तो हि पाञ्चाल्यो भारद्वाजेन धीमता। उवाचास्त्रविदां श्रेष्ठं द्रोणं ब्राह्मणसत्तमम्।।1-180-29a 1-180-29b एवं भवतु भद्रं ते भारद्वाज महामते। सख्यं तदेव भवतु शश्वद्यदभिमन्यसे।।1-180-30a 1-180-30b एवमन्योन्यमुक्त्वा तौ कृत्वा सख्यमनुत्तमम्। जग्मतुर्द्रोणपाञ्चाल्यौ यथागतमरिन्दमौ।।1-180-31a 1-180-31b

  • हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने आगे कहा— बुद्धिमान भारद्वाज (द्रोण) द्वारा ऐसा कहे जाने पर पाँचाल नरेश द्रुपद ने अस्त्रविदों में श्रेष्ठ और ब्राह्मणश्रेष्ठ द्रोण से कहा— "हे महामते भारद्वाज! आपका कल्याण हो, ऐसा ही हो। आप जैसा चाहते हैं, हमारी वही पुरानी मित्रता सदा के लिए बनी रहे।" ऐसा एक-दूसरे से कहकर और उत्तम मित्रता स्थापित करके शत्रुता का दमन करने वाले वे दोनों (द्रोण और पांचाल नरेश द्रुपद) अपने-अपने घर चले गए।
  • व्याख्या: द्रोण की इस महान उदारता के कारण द्रुपद का अहंकार टूट गया और दोनों ने अपनी पुरानी मित्रता को स्वीकार कर लिया।

श्लोक 32:

असत्कारः स तु महान्मुहूर्तमपि तस्य तु। नापैति हृदयाद्राज्ञो दुर्मनाः स कृशोऽभवत्।।1-180-32a 1-180-32b

  • हिन्दी अनुवाद: (अतिथि ब्राह्मण ने कहा)— किंतु उस समय सभा में हुए उस महान अपमान और पराजय की वह टीस उस राजा (द्रुपद) के हृदय से एक क्षण के लिए भी नहीं उतरी। वे दुखी मन वाले और भीतर ही भीतर चिंता से कमजोर होने लगे।
  • व्याख्या: यद्यपि मुख से द्रुपद ने मित्रता स्वीकार कर ली थी, किंतु मन में पराजय का अपमान उनके लिए नासूर बन गया था, जिसके समाधान के लिए उन्होंने आगे चलकर यज्ञ करने का निश्चय किया जिससे धृष्टद्युम्न और द्रौपदी उत्पन्न हुए।
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