महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 181वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 7 (राजा द्रुपद का शोक, द्रोण से बदला लेने की इच्छा और याज-उपयाज ऋषियों की खोज)
श्लोक 1, 2 और 3:
ब्राह्मण उवाच।1-181-1x अमर्षी द्रुपदो राजा कर्मसिद्धान्द्विजर्षभान्। अन्विच्छन्परिचक्राम ब्राह्मणावसथान्बहून्।।1-181-1a 1-181-1b पुत्रजन्म परीप्सन्वै शोकोपहतचेतनः। `द्रोणेन वैरं द्रुपदो न सुष्वाप स्मरन्सदा।' नास्ति श्रेष्ठमपत्यं म इति नित्यमचिन्तयत्।।1-181-2a 1-181-2b 1-181-2c जातान्पुत्रान्स निर्वेदाद्धिग्बन्धूनिति चाब्रवीत्। निःश्वासपरमश्चासीद्द्रोणं प्रतिचिकीर्षया।।1-181-3a 1-181-3b
- हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने कहा— द्रोणाचार्य से पराजित और अपमानित होने के कारण अमर्षी (क्रोधी) राजा द्रुपद कर्मसिद्ध (याज्ञिक) ब्राह्मण-श्रेष्ठों को खोजते हुए अनेक ब्राह्मणों के आश्रमों (निवासों) में घूमने लगे। पुत्र प्राप्ति की इच्छा से उनका चित्त शोक से आहत था। "द्रोण के साथ मेरा वैर है"— इस बात को वे सदा स्मरण करते हुए कभी चैन से नहीं सोते थे और हमेशा यही सोचते थे कि "मेरे पास ऐसा कोई श्रेष्ठ पुत्र नहीं है (जो द्रोण का वध कर सके)।" अपने पहले से उत्पन्न हुए पुत्रों के प्रति खिन्न होकर वे कहते थे— "ऐसे बन्धुओं को धिक्कार है!" द्रोण से बदला (प्रतिकार) लेने की इच्छा से वे निरंतर लंबी साँसें ही छोड़ते रहते थे।
- व्याख्या: द्रोणाचार्य से मिले अपमान और पराजय की टीस राजा द्रुपद को चैन नहीं लेने देती थी। वे एक ऐसे शक्तिशाली पुत्र की कामना कर रहे थे जो द्रोण का वध कर सके।
श्लोक 4, 5, 6 और 7:
प्रभावं विनयं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि च। क्षात्रेण च बलेनास्य चिन्तयन्नाध्यगच्छत।।1-181-4a 1-181-4b प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत। अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन्।।1-181-5a 1-181-5b ब्राह्मणावसथं पुम्यमाससाद महीपतिः। तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रती द्विजः।।1-181-6a 1-181-6b अधीयानौ महाभागौ सोऽपश्यत्संशितव्रतौ। याजोपयाजौ ब्रह्मर्षी शाम्यन्तौ परमेष्ठिनौ।।1-181-7a 1-181-7b
- हिन्दी अनुवाद: द्रोण का प्रभाव, उनका विनय, उनकी शिक्षा, उनके चरित्र तथा उनके क्षात्र बल का विचार करते हुए नृपश्रेष्ठ द्रुपद को कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। हे भारत! प्रतिशोध लेने के लिए निरंतर यत्न करने पर भी जब उन्हें कोई मार्ग नहीं मिला, तब वे घूमते-घूमते कल्माषी (गंगाजी की एक धारा) के पास गंगातट पर पहुँचे। वहाँ उस महीपति (द्रुपद) ने एक पवित्र ब्राह्मण-आवास को देखा, जहाँ कोई भी स्नातक (बिना पढ़ा) या व्रतरहित द्विज नहीं था। वहाँ उन्होंने दो महाभा भाग्यशाली, संशितव्रती (कठोर व्रती) ब्रह्मर्षि भाइयों— याज और उपयाज को देखा, जो वेदों का अध्ययन कर रहे थे और शांत एवं ब्रह्मतेज से संपन्न थे।
- व्याख्या: द्रुपद प्रतिशोध का उपाय ढूँढते-ढूँढते गंगा तट पर पहुँचे जहाँ उन्हें याज और उपयाज नामक दो प्रख्यात ब्रह्मर्षि भाई मिल गए।
श्लोक 8 से 14 (याज और उपयाज की प्राप्ति और द्रुपद का उपयाज की सेवा करना)
श्लोक 8, 9 और 10:
संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ। तारणेयौ युक्तरूपौ ब्राह्मणावृषिसत्तमौ।।1-181-8a 1-181-8b स तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः। बुद्ध्वा बलं तयोस्तत्र कनीयांसमुपह्वरे।।1-171-9a 1-181-9b प्रपेदे च्छन्दयन्कामैरुपयाजं धृतव्रतम्। पादशुश्रूषणे युक्तः प्रियवाक्सर्वकामदः।।1-181-10a 1-181-10b
- हिन्दी अनुवाद: वे दोनों ऋषि संहिता के अध्ययन में संलग्न थे, गोत्र से काश्यप थे, तारणेय (तरण गोत्रीय) थे, और ऋषियों में श्रेष्ठ तथा सुंदर रूप वाले थे। द्रुपद ने अलस्यहीन होकर अपनी सभी कामनाओं (समृद्धि) के साथ उन दोनों को आमंत्रित किया। वहाँ उन दोनों के बल (प्रभाव) को समझकर, उन्होंने उन दोनों में से छोटे (उपयाज) को एकांत में चुन लिया। अपनी वाणी की मधुरता, सेवा-भाव और सभी इच्छाओं को पूरा करने की क्षमता के साथ, उन्होंने व्रतधारी उपयाज के चरणों की सेवा में लगकर उन्हें प्रसन्न करना शुरू किया।
- व्याख्या: द्रुपद ने दोनों भाइयों के प्रभाव को भाँपकर छोटे भाई उपयाज की सेवा करना शुरू कर दिया ताकि वे उनके माध्यम से यज्ञ करा सकें।
श्लोक 11, 12, 13 और 14:
अर्चयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच सः। येन मे कर्मणा ब्रह्मन्पुत्रः स्याद्द्रोणमृत्यवे।।1-181-11a 1-181-11b `अर्जुनस्य भवेद्भार्या भवेद्या वरवर्णिनी।' उपयाज कृते तस्मिन् गवां दाताऽस्मि तेऽर्बुदं।।1-171-12a 1-181-12b यद्वा तेऽन्यद्द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रियं भवेत्। सर्वं तत्ते प्रदाताऽहं न हि मेऽत्रास्ति संशयः।।1-181-13a 1-181-13b इत्युक्तो नाहमित्येवं तमृषिः प्रत्यभाषत। आराधयिष्यन्द्रुपदः स तं पर्यचरत्पुनः।।1-181-14a 1-181-14b
- हिन्दी अनुवाद: यथान्याय उपयाज की पूजा करके राजा द्रुपद ने उनसे कहा— "हे ब्रह्मन्! आप ऐसा कोई कर्म (यज्ञ) करें जिससे द्रोण की मृत्यु का कारण बनने वाला मेरा एक पुत्र हो, (और एक ऐसी सुंदर कन्या हो जो अर्जुन की पत्नी बने)। हे उपयाज! यदि आप यह यज्ञ कर देंगे, तो मैं आपको एक अर्बुद (दस करोड़) गायें दान दूँगा। इसके अलावा हे द्विजश्रेष्ठ! आपके मन को जो भी अन्य वस्तु अतिप्रिय हो, वह सब मैं आपको दे दूंगा, इसमें मेरे मन में कोई संशय नहीं है।" उनके ऐसा कहने पर उस ऋषि (उपयाज) ने उत्तर दिया— "मैं ऐसा नहीं करूँगा।" तब भी द्रुपद उनकी आराधना करते हुए उनकी सेवा में लगे रहे।
- व्याख्या: द्रुपद ने उपयाज से द्रोण का वध करने वाले पुत्र और अर्जुन की पत्नी बनने वाली कन्या को उत्पन्न करने वाला यज्ञ कराने का अनुरोध किया, जिसे उपयाज ने पहले मना कर दिया, पर द्रुपद ने सेवा जारी रखी।
श्लोक 15 से 21 (उपयाज का अपने बड़े भाई याज के पास भेजना)
श्लोक 15, 16, 17 और 18:
ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं स द्विजोत्तमः। उपयाजोऽब्रवीत्काले राजन्मधुरया गिरा।।1-181-15a 1-181-15b ज्येष्ठो भ्राता ममागृह्माद्विचरन् गहने वने। अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम्।।1-181-16a 1-181-16b तदपश्यमहं भ्रातुरसाम्प्रतमनुव्रजन्। विमर्शं संकरादाने नायं कुर्यात्कदाचन।।1-181-17a 1-17-17b दृष्ट्वा फलस्य नापश्यद्दोषान्पापानुबन्धकान्। विविनक्ति न शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत्।।1-181-18a 1-181-18b
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर एक वर्ष बीत जाने पर उस द्विजोत्तम उपयाज ने समय आने पर राजा द्रुपद से मधुर वाणी में कहा— "मेरे बड़े भाई (याज) ने एक बार सघन वन में विचरते हुए अशुद्ध (अपरिज्ञात शौच) भूमि पर गिरे हुए एक फल को उठा लिया था। उनके पीछे-पीछे चलते हुए मैंने उनके इस अनुचित आचरण को देखा था। वस्तुतः भिक्षा या दान लेने में इस प्रकार का संकर (दोष) उन्हें कभी नहीं करना चाहिए था। फल लेने में छिपे हुए उन पाप-संबंधित दोषों को उन्होंने नहीं देखा; जो व्यक्ति इस प्रकार शुद्धता (शौच) का विवेक नहीं रखता, वह अन्य मामलों में कैसा होगा?"
- व्याख्या: एक साल की सेवा के बाद उपयाज ने द्रुपद को अपने बड़े भाई याज के पास जाने की सलाह दी और एक छोटी सी घटना का हवाला दिया जो उनके भाई की एक कमजोरी को दर्शाती थी।
श्लोक 19, 20 और 21:
संहिताध्ययनं कुर्वन्वसन्गुरुकुले च यः। भैक्षमुत्सृष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म च यदा तदा।।1-181-19a 1-181-19b कीर्तयन्गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः। ततं वै फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा।।1-181-20a 1-181-20b तं वै गच्छस्व नृपते स त्वां संयाजयिष्यति। जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन्।।1-181-21a 1-181-21b
- हिन्दी अनुवाद: "गुरुकुल में निवास करते हुए जो संहिता का अध्ययन कर रहा हो और दूसरों द्वारा छोड़े गए भिक्षा के अन्न को जो बार-बार खाता हो, तथा बार-बार अन्नों के गुणों का बखान करते हुए जो तनिक भी लज्जा (घृणा) न करे— तर्क-दृष्टि से मैं अपने उन बड़े भाई को धन की इच्छा रखने वाला (फलार्थी) मानता हूँ। हे नृपते! तुम उन्ही के पास जाओ, वे ही तुम्हारा वह यज्ञ संपन्न कराएँगे।" उपयाज की यह बात सुनकर राजा द्रुपद ने मन ही मन विचार किया (और याज के पास जाने का निश्चय किया)।
- व्याख्या: उपयाज ने बताया कि उनके बड़े भाई याज धन के प्रति अधिक आकर्षित रहते हैं, इसलिए द्रुपद की लालसा और धन के प्रलोभन को वे आसानी से पूरा कर सकते हैं। अतः द्रुपद को याज के पास जाना चाहिए।
श्लोक 22 से 36 (द्रुपद का याज ऋषि के पास जाना और यज्ञ की तैयारी)
श्लोक 22, 23, 24 और 25:
उपयाजवचः श्रुत्वा याजस्याश्रममभ्यगात्। अभिसम्पूज्य पूजार्हमथ याजमुवाच ह।।1-181-22a 1-181-22b अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो। द्रोणवैराभिसन्तप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि।।1-181-23a 1-181-23b स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाप्यनुत्तमः। तस्माद्द्रोणः पराजैष्ट मां वै स सखिविग्रहे।।1-181-24a 1-181-24b क्षत्रियो नास्ति तस्यास्यां पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः। कौरवाचायर्मुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः।।1-181-25a 1-181-25b
- हिन्दी अनुवाद: उपयाज के वचनों को सुनकर द्रुपद महर्षि याज के आश्रम में गए। पूजा के योग्य उन याज ऋषि की भली-भांति पूजा करके राजा ने उनसे कहा— "हे विभो! मैं आपको अठारह हजार (या आठ हजार/अयुत) गायें दूँगा, आप मुझे यज्ञ कराइए। द्रोण के वैर से संतप्त मेरे हृदय को आपको शांत करना चाहिए। ब्रह्मवेत्ताओं में वे श्रेष्ठ हैं और ब्रह्मास्त्र में भी अनुत्तम हैं, इसलिए मित्रता के झगड़े में द्रोण ने मुझे पराजित कर दिया था। कौरवों के आचार्य और मुख्य विद्वान उस बुद्धिमान भारद्वाज (द्रोण) के समान इस पृथ्वी पर क्षत्रियों में कोई भी अग्रणी (श्रेष्ठ) वीर नहीं है।"
- व्याख्या: द्रुपद ने याज ऋषि के पास जाकर अपनी पीड़ा बताई कि कैसे द्रोण ने उन्हें हराया है, और यज्ञ कराने के बदले उन्हें भारी गो-धन देने का वचन दिया।
श्लोक 26, 27, 28 और 29:
द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च। षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यते परमं महत्।।1-181-26a 1-181-26b स हि ब्राह्मणवेषेण क्षात्रं वेगमशंसयम्। प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः।।1-181-27a 1-181-27b क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः। तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रधृष्यं नरैर्भुवि।।1-181-28a 1-181-28b ब्राह्मं सन्धारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः। समेत्य स दहत्याजौ क्षात्रधर्मपुरःसरः।।1-181-29a 1-181-29b
- हिन्दी अनुवाद: "द्रोण के बाणों के समूह प्राणियों के शरीरों को हरने वाले हैं, और उनका धनुष भी छह रति (बहुत बड़ा) का अत्यंत महान दिखाई देता है। वे महामना भारद्वाज श्रेष्ठ धनुर्धर हैं, जो ब्राह्मण के वेश में रहते हुए भी क्षात्र-वेग को निश्चित रूप से नष्ट कर देते हैं। वे क्षत्रियों के संहार के लिए भगवान परशुराम (जामदग्न्य) की तरह ही इस पृथ्वी पर स्थित हैं। उनका अस्त्र-बल अत्यंत घोर है और इस पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा अपराजेय है। वे प्रज्वलित अग्नि के समान ब्रह्मतेज को धारण करते हुए युद्ध के मैदान में क्षात्र-धर्म के साथ आगे बढ़कर सब कुछ भस्म कर देते हैं।"
- व्याख्या: द्रुपद द्रोणाचार्य की अजेय शक्ति, उनके विशाल धनुष और उनके ब्रह्मतेज का भयानक वर्णन याज ऋषि के सामने करते हैं।
श्लोक 30, 31, 32 और 33:
ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्मं तेजो विशिष्यते। सोऽहं क्षात्राद्बलाद्धीनो ब्राह्मं तेजः प्रपेदिवान्।।1-181-30a 1-181-30b द्रोणाद्विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम्। द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम्।।1-181-31a 1-181-31b तत्कर्म कुरु मे याज वितराम्यर्बुदं गवाम्। तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत्।।1-181-32a 1-181-32b गुर्वर्थ इति chcकाममुपयाजमचोदयत्। याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा च सः।।1-181-33a 1-181-33b
- हिन्दी अनुवाद: "ब्रह्म और क्षत्र में जब तुलना की जाती है, तब ब्रह्मतेज ही श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिए मैं अपने क्षात्र-बल से हीन होकर अब ब्रह्मतेज का आश्रय ले रहा हूँ। द्रोण से भी बढ़कर आप जैसे ब्रह्मवित्तम (ब्रह्मज्ञानी) की शरण में आकर, मैं युद्ध में अजेय और द्रोण का अंत करने वाले पुत्र को प्राप्त करना चाहता हूँ। हे याज! आप मेरे लिए वह यज्ञ कीजिए, मैं आपको अर्बुद (अरबों/करोड़) गायें दूँगा।" 'तथास्तु' (बहुत अच्छा) कहकर याज ने यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी। अपने गुरु (या भाई उपयाज) के प्रयोजन के लिए उन्होंने अनिच्छा से ही सही, उपयाज को इसमें शामिल किया। इस प्रकार याज ने द्रोण के विनाश के लिए यज्ञ करने की प्रतिज्ञा कर ली।
- व्याख्या: याज ऋषि ने द्रुपद की बात मान ली और उपयाज को भी साथ लेकर द्रोण के विनाशक पुत्र को उत्पन्न करने के लिए महायज्ञ का अनुष्ठान आरंभ कर दिया।
श्लोक 34, 35 और 36:
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः। आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै।।1-181-34a 1-181-34b स च पुत्रो महावीर्यो महातेजा महाबलः। इष्यते यद्विधो राजन्भविता ते तथाविधः।।1-181-35a 1-181-35b भारद्वाजस्य हन्तारं सोऽभिसन्धाय भूपतिः। आजह्वे तत्तथा सर्वं द्रुपदः कर्मसिद्धये।।1-181-36a 1-181-36b
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर महातपस्वी उपयाज ने उस राजा के लिए पुत्र-फल की प्राप्ति हेतु उस वैतान (वैदिक) यज्ञ के कर्म को संपन्न कराया। उपयाज ने कहा— "हे राजन्! जैसा महावीर्य, महातेजी और महाबली पुत्र आप चाहते हैं, वह वैसा ही होगा।" भारद्वाज (द्रोण) का वध करने वाले पुत्र की कामना को मन में रखकर भूपति द्रुपद ने उस यज्ञ की सिद्धि के लिए सभी आवश्यक सामग्रियाँ जुटाईं।
- व्याख्या: यज्ञ की विधिवत शुरुआत हुई और ऋषियों ने संकल्प लिया कि राजा द्रुपद को उनकी इच्छा के अनुसार द्रोण का वध करने वाला तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा।
श्लोक 37 से 44 (धृष्टद्युम्न का यज्ञकुंड से प्रकट होना)
श्लोक 37, 38 और 39:
याजस्तु हवनस्यान्ते देवीमाज्ञापयत्तदा। प्रेहि मां राज्ञि पृषति मिथुनं त्वामुपस्थितम्।।1-181-37a 1-181-37b राज्ञ्युवाच।1-181-38x अवलिप्तं मुखं ब्रह्मन्दिव्यान्गन्धान्बिभर्मि च। सूतार्थे नोपलब्धाऽस्मि तिष्ठ याज मम प्रिये।।1-181-38a 1-181-38b याज उवाच।1-181-39x याजेन श्रपितं हव्यमुपयाजाभिमन्त्रितम्। कथं कामं न सन्दध्यात्सा त्वं विप्रेहि तिष्ठ वा।।1-181-39a 1-181-39b
- हिन्दी अनुवाद: यज्ञ के हवन की समाप्ति पर याज ने रानी पृषती को बुलाया और आज्ञा दी— "हे राज्ञि पृषति! मेरे पास आओ, तुम्हारे लिए यह यज्ञीय मिथुन (पुत्र-पुत्री) तैयार उपस्थित है।" रानी ने कहा— "हे ब्रह्मन्! मेरा मुख (शरीर) अभी अवलिप्त (अवैदिक अवस्था/मलिन) है और मैंने दिव्य गंध धारण कर रखी है (मैं ऋतुकाल या पवित्र अवस्था में नहीं हूँ)। अभी मैं इस कार्य के लिए तैयार नहीं हूँ, हे याज! मेरी प्रिय रानी (या मुझे) थोड़ी देर ठहरने दें।" याज ने कहा— "याज द्वारा पकाया गया और उपयाज द्वारा अभिमंत्रित किया गया यह हव्य (यज्ञीय प्रसाद) अपनी इच्छा को निष्फल कैसे कर सकता है? इसलिए तुम चाहे आओ या मत आओ (यह कार्य होकर रहेगा)।"
- व्याख्या: जब यज्ञ पूरा हुआ, तो रानी पृषती को तुरंत बुलाया गया, किंतु रानी के तैयार न होने पर भी यज्ञ के मंत्रों के प्रभाव से प्रक्रिया आगे बढ़ी।
श्लोक 40, 41 और 42:
ब्राह्मण उवाच।1-181-40x एवमुक्त्वा तु याजेन हुते हविषि संस्कृते। उत्तस्थौ पावकात्तस्मात्कुमारो देवसन्निभिः।।1-181-40a 1-181-40b ज्वालावर्णो घोररूपः किरीटी वर्म चोत्तमम्। बिभ्रत्सखङ्गः सशरो धनुष्मान्विनदन्मुहुः।।1-181-41a 1-181-41b सोऽध्यारोदद्रथवरं तेन च प्रययौ तदा। ततः प्रणेदुः पञ्चालाः प्रहृष्टाः साधुसाध्विति।।1-181-42a 1-181-42b
- हिन्दी अनुवाद: अतिथि ब्राह्मण ने कहा— याज द्वारा ऐसा कहकर उस संस्कारित हविष्य की आहुति देने पर, उस अग्नि-कुंड से देवताओं के समान कांतिवान एक बालक प्रकट हुआ। वह अग्नि की ज्वाला के वर्ण जैसा, घोर रूप वाला, सिर पर मुकुट (किरीट), उत्तम कवच धारण किए हुए, तलवार, बाण और धनुष से लैस होकर बार-बार गर्जना करता हुआ प्रकट हुआ। वह तुरंत एक श्रेष्ठ रथ पर सवार हो गया और उसके साथ आगे बढ़ा। उसे देखकर सभी पांचालवासी अत्यंत प्रसन्न होकर 'साधु! साधु!' (बहुत अच्छा!) कहकर जयकार करने लगे।
- व्याख्या: यज्ञ की अग्नि से सीधे अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, कवच धारी और गर्जना करने वाला महातेजस्वी बालक (धृष्टद्युम्न) प्रकट हुआ।
श्लोक 43 और 44:
हर्षाविष्टांस्ततश्चैतान्नेयं सेहे वसुन्धरा। भयपहो राजपुत्रः पञ्चालानां यशस्करः।।1-181-43a 1-181-43b राज्ञः शोकापहो जात एष द्रोणवधाय वै। इत्युवाच महद्भूतमदृश्यं खेचरं तदा।।1-181-44a 1-181-44b
- हिन्दी अनुवाद: हर्ष से भरे हुए उन पांचालवासियों के उस समूह के भार को उस समय पृथ्वी भी नहीं सह पा रही थी (अर्थात भारी उत्सव था)। वह भय का नाश करने वाला, पांचालों का यश बढ़ाने वाला और राजा द्रुपद के शोक को दूर करने वाला राजपुत्र द्रोण के वध के लिए ही उत्पन्न हुआ है— ऐसा आकाश में अदृश्य रहने वाले किसी महान भूत (आकाशवाणी) ने उस समय कहा।
- व्याख्या: धृष्टद्युम्न के प्रकट होने पर आकाशवाणी हुई कि यह बालक राजा द्रुपद का शोक मिटाने और द्रोणाचार्य का वध करने के लिए ही जन्मा है।
श्लोक 45 से 53 (द्रौपदी का यज्ञवेदी से प्रकट होना और आकाशवाणी)
श्लोक 45, 46 और 47:
कुमारी चापि पाञ्चाली वेदीमध्यात्समुत्थिता। सुभगा दर्शनीयाङ्गी स्वसितायतलोचना।।1-181-45a 1-181-45b श्यामा पद्मपलाशाक्षी नीलकुञ्चितमूर्धजा। ताम्रतुङ्गनखी सुभ्रूश्चारुपीनपयोधरा।।1-181-46a 1-181-46b मानुषं विग्रहं कृत्वा साक्षादमरवर्णिनी। नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात्प्रधावति।।1-171-47a 1-181-47b
- हिन्दी अनुवाद: उसी यज्ञवेदी के मध्य से एक सुंदर कन्या भी प्रकट हुई। वह अत्यंत सौभाग्यशालिनी, दर्शनीय अंगों वाली, सुंदर काले और बड़े नेत्रों वाली थी। उसका वर्ण श्यामल, आँखें कमल के पत्ते जैसी बड़ी, बाल नीले और घुंघराले, नख तांबे जैसे लाल और उभरे हुए, भौंहें सुंदर और स्तन उन्नत थे। वह मानो साक्षात अप्सरा (अमरवर्णिनी) थी जिसने मनुष्य का शरीर धारण कर लिया हो। उसके शरीर से नीले कमल के फूल जैसी सुगंध एक कोस दूर तक महकती रहती थी।
- व्याख्या: धृष्टद्युम्न के बाद यज्ञवेदी से साक्षात सौंदर्य की देवी जैसी अलौकिक सुगंध वाली द्रौपदी (कृष्णा) प्रकट हुईं।
श्लोक 48, 49, 50 और 51:
या बिभर्ति परं रूपं यस्या नास्त्युपमा भुवि। देवदानवयक्षाणामीप्सितां देवरूपिणीम्।।1-181-48a 1-181-48b `सदृशी पाण्डुपुत्रस्य अर्जुनस्येति भारत। ऊचुः प्रहृष्टमनसो राजभक्तिपुरस्कृताः।।'1-181-49a 1-181-49b तां चापि जातां सुश्रोणीं वागुवाचाशरीरिणी। सर्वयोषिद्वरा कृष्णा निनीषुः क्षत्रियान्क्षयम्।।1-181-50a 1-181-50b सुरकार्यमियं काले करिष्यति सुमध्यमा। अस्या हेतोः कौरवाणां महदुत्पत्स्यते भयम्।।1-181-51a 1-181-51b
- हिन्दी अनुवाद: जो परम रूप धारण करती है, जिसकी इस पृथ्वी पर कोई उपमा नहीं है, और जो देव, दानव तथा यक्षों द्वारा भी वांछित देवरूपिणी है। हे भारत! राजा की भक्ति से प्रेरित होकर प्रहृष्ट मन वाले लोग कहने लगे— "यह पांडुपुत्र अर्जुन के ही योग्य है।" उस सुंदर कटिप्रदेश वाली कृष्णा के प्रकट होने पर आकाशवाणी (अशरीरी वाणी) हुई— "सभी स्त्रियों में श्रेष्ठ यह कृष्णा क्षत्रियों के विनाश का कारण बनेगी। यह सुमध्यमा (सुंदर अंगों वाली) उचित समय पर देवताओं का कार्य (भार कम करना) करेगी। इसी के कारण कौरवों को महान भय उत्पन्न होगा।"
- व्याख्या: द्रौपदी के प्रकट होते ही लोगों ने उन्हें अर्जुन के योग्य बताया, और आकाशवाणी हुई कि इन्हीं के कारण कौरवों का विनाश और क्षत्रियों का संहार होगा।
श्लोक 52 और 53:
तच्छ्रुत्वा सर्वपञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत्। न चैतान्हर्षसम्पूर्णानियं सेहे वसुन्धरा।।1-181-52a 1-181-52b `पाञ्चालराजस्तां दृष्ट्वा हर्षादश्रूण्यवर्तयत्। परिष्वज्य च तां कृष्णां स्नुषा पाण्डोरिति ब्रुवन्। अङ्कमारोप्य पाञ्चालीं राजा हर्षमवाप सः।।'1-181-53a 1-181-18b 1-181-18c
- हिन्दी अनुवाद: उस आकाशवाणी को सुनकर सभी पांचालवासी सिंह की तरह गर्जना करने लगे, और उनके उस हर्ष से परिपूर्ण उल्लास को पृथ्वी भी थाम नहीं पा रही थी। पांचालराज द्रुपद ने उन्हें देखकर हर्ष के आँसू बहाए, उस कृष्णा को गले से लगाया और "यह पांडु की पुत्रवधू बनेगी" ऐसा कहते हुए उस पांचालकन्या को अपनी गोद में बिठाकर राजा ने अपार हर्ष प्राप्त किया।
- व्याख्या: द्रुपद अपनी पुत्री द्रौपदी को गोद में लेकर बहुत प्रसन्न हुए और समझ गए कि यह पांडवों की ही पत्नी बनेगी।
श्लोक 54 से 60 (नामकरण, द्रोणाचार्य द्वारा शिक्षा देना और अध्याय का समापन)
श्लोक 54, 55 और 56:
तौ दृष्ट्वा पार्षती याजं प्रपेदे वै सुतार्थिनी। न वै मदन्यां जननीं जानीयातामिमाविति।।1-181-54a 1-181-54b तथेत्युवाच तां याजो राज्ञः प्रियचिकीर्षया। तयोश्च नामनी चक्रुर्द्विजाः सम्पूर्णमानसाः।।1-181-55a 1-181-55b धृष्टत्वादत्यमर्षित्वाद्द्युम्नाद्युत्संभवादपि। धृष्टद्युम्नः कुमारोऽयं द्रुपदस्य भवत्विति।।1-181-56a 1-181-56b
- हिन्दी अनुवाद: उन दोनों (बालक-बालिका) को देखकर संतान की इच्छा रखने वाली रानी पृषती ने याज ऋषि से कहा— "ये दोनों मेरे अलावा किसी अन्य को अपनी माता न मानें (ऐसा आशीर्वाद दें)।" राजा का प्रिय करने की इच्छा से याज ने 'तथास्तु' कहा। पूर्ण मन वाले विद्वान ब्राह्मणों ने उन दोनों के नामकरण किए। (चूँकि वह बालक) अत्यंत धृष्टता (साहस), अत्यधिक अमर्ष (क्रोध/तेज) तथा द्युम्न (कान्ति/तेज) से उत्पन्न हुआ था, इसलिए इस कुमार का नाम 'धृष्टद्युम्न' हो— ऐसा नाम रखा गया।
- व्याख्या: रानी पृषती के अनुरोध पर याज ऋषि ने वरदान दिया कि वे दोनों उन्हीं की संतान माने जाएँगे, और बालक का नाम 'धृष्टद्युम्न' (साहस और तेज का प्रतीक) रखा गया।
श्लोक 57, 58, 59 और 60:
कृष्णेत्येवाब्रुवकन्कृष्णां कृष्णा।ञभूत्सा हि वर्णतः। तथा तन्मिथुनं जज्ञे द्रुपदस्य महामखे।।1-181-57a 1-181-57b `वैदिकाध्ययने पारं धृष्टद्युम्नो गतः परम्।।' धृष्टद्युम्नं तु पाञ्चाल्यमानीय स्वं निवेशनम्। उपाकरोदस्त्रहेतोर्भारद्वाजः प्रतापवान्।।1-181-59a 1-181-59b अमोक्षणीयं दैवं हि भावि मत्वा महामतिः। तथा तत्कृतवान्द्रोण आत्मकीर्त्यनुरक्षणात्।।1-181-60a 1-181-60b
- हिन्दी अनुवाद: और अपने वर्ण (श्याम रंग) के कारण उस कन्या को सब लोग 'कृष्णा' कहने लगे। इस प्रकार द्रुपद के उस महान यज्ञ में यह जोड़ा (धृष्टद्युम्न और द्रौपदी) उत्पन्न हुआ। (धृष्टद्युम्न वैदिक अध्ययन में भी पारंगत हो गए)। इसके बाद प्रतापवान भारद्वाज (द्रोण) ने यह जानते हुए भी कि यह वही है जो आगे चलकर मेरा वध करेगा, अपनी कीर्ति की रक्षा के लिए उस पांचालकुमार धृष्टद्युम्न को अपने घर लाकर अस्त्र-विद्या की शिक्षा दी, क्योंकि वे महामति द्रोण यह अच्छी तरह जानते थे कि दैव (नियत) को टाला नहीं जा सकता।
- व्याख्या: द्रोणाचार्य को पहले से पता था कि धृष्टद्युम्न उनका वध करने के लिए जन्मा है, फिर भी अपने गुरु-धर्म और कीर्ति की रक्षा के लिए उन्होंने स्वयं धृष्टद्युम्न को अपनी समस्त अस्त्र-विद्या सिखाई। इसी के साथ यह अध्याय पूर्ण होता है।
