महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 179वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 6 (पाण्डवों का एकचक्र नगर में निवास और अतिथि ब्राह्मण का आगमन)
श्लोक 1:
जनमेजय उवाच।1-179-1x ते तथा पुरुषव्याघ्रा निहत्य बकराक्षसम्। अत ऊर्ध्वं ततो ब्रह्मन्किमकुर्वत पाण्डवाः।।1-179-1a 1-179-1b
- हिन्दी अनुवाद: राजा जनमेजय ने पूछा— हे ब्रह्मन्! उन पुरुषश्रेष्ठ पाण्डवों ने बक राक्षस को मारकर इसके बाद आगे क्या किया?
- व्याख्या: जनमेजय आगे की कथा जानने के लिए प्रश्न करते हैं कि बकासुर वध के उपरांत पाण्डवों कीचर्या एकचक्र नगर में कैसी रही।
श्लोक 2 और 3:
वैशंपायन उवाच।1-179-2x तत्रैव न्यवसन्राजन्निहत्य बकराक्षसम्। अधीयानाः परं ब्रह्म ब्राह्मणस्य निवेशने।।1-179-2a 1-179-2b ततः कतिपयाहस्य ब्राह्मणः संशितव्रतः। प्रतिश्रयार्थी तद्वेश्म ब्राह्मणस्याजगाम ह।।1-179-3a 1-179-3b
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे राजन्! बक राक्षस को मारकर पाण्डव उसी ब्राह्मण के घर में रहकर परब्रह्म (वेद-वेदांत) का अध्ययन करते हुए वहीं निवास करते रहे। इसके बाद कुछ ही दिनों के बाद व्रत का पालन करने वाला एक अन्य ब्राह्मण (अतिथि) आश्रय (रहने का स्थान) की इच्छा से उस ब्राह्मण के घर आया।
- व्याख्या: बकासुर के वध के बाद भी पाण्डव साधारण विद्यार्थियों की तरह उसी ब्राह्मण के घर पर रहकर अपनी विद्या और अध्ययन में लीन रहे। तभी वहाँ एक नया अतिथि ब्राह्मण आश्रय की खोज में आया।
श्लोक 4, 5 और 6:
स म्यक् पूजयित्वा तं विप्रं विप्रर्षभस्तदा। ददौ प्रतिश्रयं तस्मै सदा सर्वातिथिव्रतः।।1-179-4a 1-179-4b ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सह कुन्त्या नरर्षभाः। उपाससाञ्चक्रिरे विप्रं कथयन्तं कथाः शुभाः।।1-179-5a 1-179-5b कथयामास देशांश्च तीर्थानि सरितस्तथा। राजश्च विविधाश्चर्यान्देशांश्चैव पुराणि च।।1-179-6a 1-179-6b
- हिन्दी अनुवाद: सर्वदा अतिथियों की सेवा का व्रत रखने वाले उन विप्रश्रेष्ठ (मेजबान ब्राह्मण) ने उस आए हुए विप्र की भली-भांति पूजा करके उसे आश्रय (ठहरने का स्थान) प्रदान किया। तदनंतर माता कुन्ती के साथ उन सभी नरश्रेष्ठ पाण्डवों ने उस अतिथि ब्राह्मण को घेरकर बैठ (उपासना) गए, जो सुंदर कथाएँ कह रहे थे। वह ब्राह्मण विभिन्न देशों, तीर्थों, नदियों, राजाओं के आश्चर्यजनक वृत्तांतों, तथा विभिन्न देशों और नगरों की कथाएँ सुना रहा था।
- व्याख्या: अतिथि ब्राह्मण के आने से पाण्डवों को देश-दुनिया की यात्राओं, तीर्थों और राजाओं के बारे में ज्ञानवर्धक कथाएँ सुनने का अवसर मिला, जिसमें वे रुचि लेने लगे।
श्लोक 7 से 9 (द्रौपदी के स्वयंवर और पांचाल देश की कथा का आरंभ)
श्लोक 7 और 8:
स तत्राकथयद्विप्रः कथान्ते जनमेजय। पञ्चालेष्वद्भुताकारं याज्ञसेन्याः स्वयंवरम्।।1-179-7a 1-179-7b धृष्टद्युम्नस्य चोत्पत्तिमुत्पत्तिं च शिखण्डिनः। अयोनिजत्वं कृष्णाया द्रुपदस्य महामखे।।1-179-8a 1-179-8b
- हिन्दी अनुवाद: हे जनमेजय! कथा के अंत में उस ब्राह्मण ने वहाँ पञ्चाल देश में होने वाले याज्ञसेनी (द्रौपदी) के अद्भुत स्वयंवर का प्रसंग सुनाया। इसके साथ ही उसने धृष्टद्युम्न की उत्पत्ति, शिखण्डी की उत्पत्ति, तथा राजा द्रुपद के महान यज्ञ (महामख) में कृष्णा (द्रौपदी) के अयोनिज (बिना माता के गर्भ से उत्पन्न) होने का चमत्कारपूर्ण वर्णन किया।
- व्याख्या: अतिथि ब्राह्मण ने कथा के दौरान पांचाल देश में राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर और धृष्टद्युम्न-द्रौपदी के यज्ञ-कुंड से प्रकट होने की अद्भुत कहानी सुनाई।
श्लोक 9:
तदद्भुततमं श्रुत्वा लोके तस्य महात्मनः। विस्तरेणैव पप्रच्छुः कथां ते पुरुषर्षभाः।।1-179-9a 1-179-9b
- हिन्दी अनुवाद: लोक में महात्मा द्रुपद और उनकी संतान से जुड़ी उस अत्यंत अद्भुत कथा को सुनकर, उन पुरुषश्रेष्ठ पाण्डवों ने उस कथा को विस्तार से पूछना शुरू किया।
- व्याख्या: द्रौपदी के स्वयंवर और उनके जन्म का रहस्य सुनकर पाण्डवों की जिज्ञासा बढ़ गई और उन्होंने अतिथि ब्राह्मण से इस बारे में विस्तार से बताने का अनुरोध किया।
श्लोक 10 से 12 (पाण्डवों के प्रश्न और अध्याय का समापन)
श्लोक 10 और 11 (क, ख, ग):
पाण्डवा ऊचुः।1-179-10x कथं द्रुपदपुत्रस्य धृष्टद्युम्नस्य पावकात्। वेदीमध्याच्च कृष्णायाः संभवः कथमद्भुतः।।1-179-10a 1-179-10b कथं द्रोणान्महेष्वासात्सर्वाण्यस्त्राण्यशिक्षत। `धृष्टद्युम्नो महेष्वासः कथं द्रोणस्य मृत्युदः।' कथं विप्र सखायौ तौ भिन्नौ कस्य कृतेन वा।।1-179-11a 1-179-11b 1-179-11c
- हिन्दी अनुवाद: पाण्डवों ने पूछा— "हे विप्र! द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न का अग्नि से और कृष्णा (द्रौपदी) का यज्ञवेदी के मध्य से वह अद्भुत जन्म किस प्रकार हुआ? महाबली धनुर्धर धृष्टद्युम्न ने महान अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा आचार्य द्रोण से कैसे प्राप्त की, और वही धृष्टद्युम्न आगे चलकर द्रोण की मृत्यु का कारण कैसे बनेगा? हे विप्र! वे दोनों पहले मित्र थे, फिर किस कारण से और किसके लिए उनमें शत्रुता या अलगाव हो गया?"
- व्याख्या: पाण्डवों ने धृष्टद्युम्न और द्रौपदी के जन्म, द्रोणाचार्य से उनकी शिक्षा, और द्रोण के साथ उनके बैर के कारणों के बारे में गहराई से प्रश्न किए।
श्लोक 12:
वैशंपायन उवाच।1-179-12x एवं तैश्चोदितो राजन्स विप्रः पुरुषर्षभैः। कथयामास तत्सर्वं द्रौपदीसंभवं तदा।।1-179-12a 1-179-12b
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे राजन्! उन पुरुषश्रेष्ठ पाण्डवों द्वारा इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर उस ब्राह्मण ने द्रौपदी और धृष्टद्युम्न के जन्म से जुड़ी वह सारी कथा विस्तार से कह सुनाई।
- व्याख्या: अतिथि ब्राह्मण ने पाण्डवों के जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों का उत्तर देते हुए द्रौपदी और धृष्टद्युम्न के प्राकट्य की पूरी कथा सुनाई। इसी के साथ यह अध्याय पूर्ण होता है।
