श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (संभवपर्व) के अंतिम यानी १५३वें अध्याय (कुछ संस्करणों में इसे सभापर्व का प्रसंग भी माना जाता है, किंतु मूलतः यह आदिपर्व के अंतर्गत आता है) के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है।

भाग-1: धृतराष्ट्र और दुर्योधन का संताप तथा मंत्री कणिक का आगमन (श्लोक 1 से 35)

श्लोक 1 (1-153-1)

मूल: श्रुत्वा पाण्डुसुतान्वीरान्बलोद्रिक्तान्महौजसः। धृतराष्ट्रो महीपालश्चिन्तामगमदातुरः।। हिंदी अनुवाद: राजा धृतराष्ट्र ने पाण्डु के पुत्रों (पाण्डवों) को वीर, बल से उन्मत्त और अत्यधिक तेजस्वी हुआ सुनकर, अत्यंत आर्त (दुःखी) होकर चिंता करना शुरू कर दिया। व्याख्या: युधिष्ठिर की राजसूय यज्ञ में वैभव और विजय देखकर धृतराष्ट्र ईर्ष्या और भय से भर गए थे। उन्हें पांडवों की बढ़ती हुई शक्ति अपनी और अपने पुत्रों की सत्ता के लिए खतरे के रूप में दिखाई दे रही थी।

श्लोक 2 (1-153-2)

मूल: तत आहूय मन्त्रज्ञं राजशास्त्रार्थवित्तमम्। कणिकं मन्त्रिणां श्रेष्ठं धृतराष्ट्रऽब्रवीद्वचः।। हिंदी अनुवाद: इसके बाद राजा धृतराष्ट्र ने मर्मज्ञ, राजनीति शास्त्र के मर्म को अच्छी तरह जानने वाले और मंत्रियों में श्रेष्ठ कणिक को बुलाकर ये वचन कहे। व्याख्या: धृतराष्ट्र ने अपनी आंतरिक असुरक्षा को मिटाने के लिए एक ऐसे कुटिल और चतुर राजनीतिज्ञ (कणिक) की शरण ली, जो साम, दाम, दंड, भेद की कठोर नीतियों को जानने वाला था।

श्लोक 3 (1-153-3)

मूल: उत्सक्ताः पाण्डवा नित्यं तेभ्योऽसूये द्विजोत्तम। तत्र मे निश्चिततमं सन्धिविग्रहकारणम्। कणिक त्वं ममाचक्ष्व करिष्ये वचनं तव।।

 

हिंदी अनुवाद: (धृतराष्ट्र ने कहा) हे द्विजोत्तम कणिक! पाण्डव नित्य ही प्रफुल्लित (उन्नत) हो रहे हैं और मैं उनसे ईर्ष्या करता हूँ। संधि और विग्रह (युद्ध) के कारणों में से मेरे लिए क्या करना उचित है, यह आप निश्चित रूप से मुझे बताइए। मैं आपके वचनों का पालन करूँगा।

 

व्याख्या: यहाँ धृतराष्ट्र अपनी दुर्बलता और पांडवों के प्रति द्वेष को खुलकर स्वीकार करते हैं और राजनीति के अमूर्त सिद्धांतों के बजाय व्यावहारिक और आक्रामक सलाह मांगते हैं।

श्लोक 4 (1-153-4)

मूल: दुर्योधनोऽथ शकुनिः कर्णदुःशासनावपि। कणिकं ह्युपसंगृह्य मन्त्रिणं सौबलस्य च।।

 

हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुःशासन—इन सबने मिलकर मंत्री कणिक और सौबल (शकुनि) को अपने पास बुलाया।

 

व्याख्या: कौरव शिविर के मुख्य षड्यंत्रकारी (दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुःशासन) भी धृतराष्ट्र की ही तरह पांडवों से भयभीत और द्वेष से भरे हुए थे।

श्लोक 5 (1-153-5)

मूल: पप्रच्छुर्भरतश्रेष्ठ पाण्डवान्प्रति नैकधा। प्रबुद्धाः पाण्डवा नित्यं सर्वे तेभysसामहे।।

 

हिंदी अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! उन्होंने पांडवों के संबंध में अनेक प्रकार से पूछा (और कहा कि) पांडव निरंतर आगे बढ़ रहे हैं और हम सब उनसे भयभीत रहते हैं।

 

व्याख्या: कौरवों की यह स्वीकारोक्ति उनके भीतर छिपे उस हीन भावना और भय को दर्शाती है जो पांडवों की योग्यता और प्रतिष्ठा के कारण उत्पन्न हुई थी।

श्लोक 6 (1-153-6)

मूल: अनूनं सर्वपक्षाणां यद्भवेत्क्षेमकारकम्। भारद्वाज तदाचक्ष्व करिष्यामः कथं वयम्।।

 

हिंदी अनुवाद: हे भारद्वाज (कणिक)! जिससे हमारे सभी पक्षों का पूरी तरह कल्याण हो सके, वह उपाय हमें बताइए। हम वैसा ही करेंगे।

 

व्याख्या: कौरव यह जानना चाहते थे कि वे पांडवों से बचने या उन्हें नष्ट करने के लिए कौन सा अचूक मार्ग अपनाएं।

श्लोक 7 (1-153-7)

मूल: स प्रसन्नमनास्तेन परिपृष्टो द्विजोत्तमः। उवाच वचनं तीक्ष्णं राजशास्त्रार्थदर्शनम्।।

 

हिंदी अनुवाद: उनके इस प्रकार पूछने पर, उन ब्राह्मण श्रेष्ठ (कणिक) ने प्रसन्नमन होकर राजशास्त्र के अर्थ को दर्शाने वाले तीखे (कठोर) वचन कहे।

 

व्याख्या: कणिक ने कूटनीति का ऐसा क्रूर और यथार्थवादी पाठ पढ़ाया जो नैतिकता से परे केवल स्वार्थ और शत्रुनाश पर आधारित था।

श्लोक 8 (1-153-8)

मूल: शृणु राजन्निदं तत्र प्रोच्यमानं मयानघ। न मेऽभ्यसूया कर्तव्या श्रुत्वैतत्कुरुसत्तम।।

 

हिंदी अनुवाद: कणिक ने कहा—हे अनघ (पापरहित) कुरुसत्तम राजा! मेरे द्वारा कहे जाने वाले इस रहस्य को सुनो। इसे सुनकर मुझपर कोई दोष (असूया) मत करना।

 

व्याख्या: कणिक पहले ही चेतावनी दे रहे हैं कि राजनीति की बातें सुनने में क्रूर या अनैतिक लग सकती हैं, किंतु राजा के लिए वही हितकर होती हैं।

श्लोक 9 (1-153-9)

मूल: नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः। अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी स्यात्परेषां विवरानुगः।।

 

हिंदी अनुवाद: राजा को हमेशा दंड (शक्ति) उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए, अपना पुरुषार्थ प्रकट करते रहना चाहिए, स्वयं को सुरक्षित (छिद्ररहित) रखना चाहिए, दूसरों के छिद्रों (कमियों) को देखना चाहिए और उनके कमजोर बिंदुओं का अनुसरण करना चाहिए।

 

व्याख्या: यह पूर्णतः यथार्थवादी राज्यसत्ता का सिद्धांत है, जहाँ शासक को हमेशा सतर्क, शक्तिशाली और शत्रु की कमजोरी ताकने वाला होना चाहिए।

श्लोक 10 (1-153-10)

मूल: नित्यमुद्यतदण्डाद्धि भृशमुद्विजते जनः। तस्मात्सर्वाणि कार्याणि दण्डेनैव विधारयेत्।।

 

हिंदी अनुवाद: निरंतर दंड के लिए उद्यत (तैयार) रहने वाले राजा से लोग बहुत भयभीत रहते हैं। इसीलिए राजा को अपने सभी कार्य दंड (शक्ति और अनुशासन) के द्वारा ही साधने चाहिए।

 

व्याख्या: कणिक का मानना था कि राज्य में शासन भय और शक्ति के बिना संभव नहीं है; लोग अनुशासन तभी मानते हैं जब शासक का दंड का भय सिर पर हो।

श्लोक 11 (1-153-11)

मूल: नास्य च्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेण परमन्वियात्। गूहेत्कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद्विवरमात्मनः।।

 

हिंदी अनुवाद: शत्रु आपकी किसी कमजोरी (छिद्र) को न देख पाए, और आप शत्रु की कमजोरी का लाभ उठाकर उसपर वार करें। जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को छुपा लेता है, उसी प्रकार राजा को अपनी कमजोरियों को छुपाकर अपनी रक्षा करनी चाहिए।

 

व्याख्या: कछुए का उदाहरण देते हुए आत्म-सुरक्षा और गोपनीयता का कूटनीतिक पाठ पढ़ाया गया है।

श्लोक 12 (1-153-12)

मूल: नित्यं च ब्राह्मणाः पूज्या नृपेण हितमिच्छता। सृष्टो नृपो हि विप्राणां पालने दुष्टनिग्रहे।।

 

हिंदी अनुवाद: अपना हित चाहने वाले राजा को नित्य ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। राजा की सृष्टि (उत्पत्ति) ब्राह्मणों की रक्षा और दुष्टों के निग्रह (दमन) के लिए ही हुई है।

 

व्याख्या: राजा का मूल कर्तव्य समाज में व्यवस्था बनाए रखना, विद्वानों/ब्राह्मणों का सम्मान करना और असामाजिक तत्वों का दमन करना है।

श्लोक 13 (1-153-13)

मूल: उभाब्यां वर्धते धर्मो धर्मवृद्ध्या जितावुभौ। लोकश्चायं परश्चैव ततो धर्मं समाचरेत्।।

 

हिंदी अनुवाद: इन दोनों (प्रजापालन और दुष्टनिग्रह) से धर्म बढ़ता है। धर्म की वृद्धि से इस लोक और परलोक दोनों को जीत लिया जाता है, इसलिए राजा को सदा धर्म का आचरण करना चाहिए।

 

व्याख्या: नीति और धर्म का समन्वय ही राज्य की दीर्घायु का आधार है, हालांकि आगे कणिक राजनीति की कुटिल चालों का भी वर्णन करेंगे।

श्लोक 14 (1-153-14)

मूल: कृतापराधं पुरुषं दृष्ट्वा यः क्षमते नृपः। तेनावमानमाप्नोति पापं चेह परत्र च।।

 

हिंदी अनुवाद: अपराध करने वाले व्यक्ति को देखकर जो राजा क्षमा कर देता है, वह अपमानित होता है तथा इस लोक और परलोक दोनों में पाप का भागी बनता है।

 

व्याख्या: राजनीति में अत्यधिक क्षमादान को दुर्बलता माना जाता है। अपराधी को दंड न देना समाज में अराजकता फैलाता है।

श्लोक 15 (1-153-15)

मूल: यो विभूतिमवाप्योच्चै राज्ञो विकुरुतेऽधमः। तमानयित्वा हत्वा च दद्याद्धीनाय तद्धनम्।।

 

हिंदी अनुवाद: जो कोई नीच मनुष्य उच्च वैभव पाकर राजा के विरुद्ध आचरण (विद्रोह) करे, उसे पकड़कर मार डाले और उसकी सारी संपत्ति किसी हीन (जरूरतमंद या निष्ठावान) व्यक्ति को दे दे।

 

व्याख्या: राज्य के विरुद्धद्रोह करने वालों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी न बरतने का कड़ा निर्देश यहाँ दिया गया है।

श्लोक 16 (1-153-16)

मूल: नो चेद्धुरि नियुक्ता ये स्थास्यन्ति वशमात्मनः। राजा नियुञ्ज्यात्पुरुषानाप्तान्धर्मार्थकोविदान्।।

 

हिंदी अनुवाद: यदि शासन के उत्तरदायित्व में नियुक्त लोग अपने वश में न रहें (आज्ञा का पालन न करें), तो राजा को चाहिए कि वह अपने अत्यंत आश्वस्त (विश्वसनीय), धर्म और अर्थ के मर्मज्ञ पुरुषों को उन पदों पर नियुक्त करे।

 

व्याख्या: प्रशासनिक नियंत्रण और निष्ठावान अधिकारियों की महत्ता पर बल दिया गया है।

श्लोक 17 और 18 (1-153-17 व 18)

मूल: ये नियुक्तास्तथा केचिद्राष्ट्रं वा यदि वा पुरम्। ग्रामं जनपदं वापि बाधेयुर्यदि वा न वा।। परीक्षणार्थं विसृजेदानतांश्छन्नरूपिणः। परीक्षण पापकं जह्याद्धनमादाय सर्वशः।।

 

हिंदी अनुवाद: राष्ट्र, नगर, ग्राम या जनपद में जो भी अधिकारी नियुक्त किए गए हैं, वे जनता को कष्ट दे रहे हैं या नहीं—इसकी परीक्षा के लिए राजा को अपने गुप्तचरों (छद्मवेशधारी आन्तों) को भेजना चाहिए। जाँच करने पर यदि कोई पापी (भ्रष्ट या अत्याचारी) सिद्ध हो, तो उसका सारा धन छीनकर उसे दंडित करे (पद से हटाए)।

 

व्याख्या: गुप्तचर व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता के जरिए भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की प्राचीन भारतीय राज्यकला का यह उत्कृष्ट उदाहरण है।

श्लोक 19 (1-153-19)

​मूल: नासम्यक्कृत्यकारी स्यादुपक्रम्य कदाचन। कणको ह्यपि दुश्छिन्न आस्रावं जनयेच्चिरम्।।

हिंदी अनुवाद: किसी भी कार्य या शत्रु के दमन का आरंभ करके उसे कभी भी अधूरा (असम्यक्) नहीं छोड़ना चाहिए। जिस प्रकार बुरी तरह से काटा गया काँटा लंबे समय तक घाव और पीड़ा उत्पन्न करता रहता है, उसी प्रकार अधूरा छोड़ा गया शत्रु भयंकर कष्ट देता है।

व्याख्या: अधूरी कार्रवाई हमेशा खतरनाक होती है। यदि आप किसी विरोधी या समस्या का समाधान कर रहे हैं, तो उसे जड़ से समाप्त करें, अन्यथा वह भविष्य में और अधिक गंभीर रूप धारण कर लेगा।

​श्लोक 20 (1-153-20)

​मूल: वधमेव प्रशंसन्ति शत्रूणामपकारिणाम्।
 सुविदीर्णं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम्।।

हिंदी अनुवाद: अपकार (हानि) करने वाले शत्रुओं का वध ही सबसे उत्तम माना गया है। (इसके अतिरिक्त) अच्छी प्रकार से देश को विदीर्ण करना (भेदना), पराक्रम दिखाना, युद्ध करना और आवश्यकता पड़ने पर कुशलता से भाग जाना—ये सब रणनीतियाँ हैं।

व्याख्या: कूटनीति और युद्ध कला में केवल नैतिक बंधनों में बंधे रहने के बजाय व्यावहारिक विजय को प्राथमिकता दी जाती है। शत्रु यदि आक्रामक है तो उसका वध ही उचित है।

महाभारत के आदिपर्व (संभवपर्व) के १५३वें अध्याय के श्लोकों (श्लोक 21 से 70) का क्रमवार संस्कृत श्लोक, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 21

मूल: आपद्यापदि काले कुर्वीत न विचारयेत्। नावज्ञेयो रिपुस्तात दुर्बलोऽपि कथं चन।। (1-153-21)

 

हिंदी अनुवाद: संकट के समय तुरंत (बिना किसी अधिक विचार के) उचित कर्तव्य का पालन करना चाहिए। हे तात! शत्रु चाहे कितना भी दुर्बल क्यों न हो, उसकी कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

 

व्याख्या: आपातकाल या विपत्ति के समय दुविधा में समय गंवाने के बजाय त्वरित और निर्णायक कदम उठाने चाहिए। साथ ही, छोटे से छोटे शत्रु को भी कमजोर मानकर नजरअंदाज करना भविष्य के लिए घातक हो सकता है।

श्लोक 22

मूल: अल्पोऽप्यग्निर्वनं कृत्स्नं दहत्याश्रयसंश्रयात्। अन्धः स्यादन्धवेलायां बाधिर्यमपि चाश्रयेत्।। (1-153-22)

 

हिंदी अनुवाद: जिस प्रकार थोड़ी सी आग भी हवा और ईंधन (आश्रय) पाकर पूरे जंगल को जला देती है, उसी प्रकार दुर्बल शत्रु भी अवसर पाकर भयंकर बन जाता है। (आवश्यकता पड़ने पर) उपयुक्त समय आने पर अंधे की तरह या बहरे का स्वाँग भी भर लेना चाहिए।

 

व्याख्या: कूटनीति में समय के अनुकूल ढलना जरूरी है। जैसे एक छोटी चिंगारी सब कुछ भस्म कर सकती है, वैसे ही विरोधी को बढ़ने न दें। आवश्यकतानुसार अपनी समझ या क्षमता को छिपाकर मौन या अनजान बन रहना ही बुद्धिमत्ता है।

श्लोक 23

मूल: कुर्यात्तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम्। सान्त्वादिभिरुपायैस्तु हन्याच्छत्रुं वशे स्थितं।। (1-153-23)

 

हिंदी अनुवाद: (यदि विषम परिस्थिति हो तो) घास का धनुष बना ले, हिरण के बच्चे की तरह छिपकर शयन करे, और साम आदि उपायों से शत्रु को अपने वश में करके उसका नाश करे।

 

व्याख्या: विषम परिस्थितियों में उपलब्ध साधनों से ही काम चलाना चाहिए और अत्यंत सतर्कता व गोपनीयता (मृग की तरह छिपकर) बरतते हुए कूटनीतिक तरीकों से शत्रु को परास्त करना चाहिए।

श्लोक 24

मूल: दया न तस्मिन्कर्तव्या शरणागत इत्युत। निरुद्विग्नो हि भवति न हताज्जायते भयम्।। (1-153-24)

 

हिंदी अनुवाद: शत्रु यदि शरण में भी आ जाए, तब भी उसपर दया नहीं करनी चाहिए। शत्रु के मारे जाने पर ही मनुष्य पूरी तरह चिंतामुक्त होता है, क्योंकि जीवित शत्रु से हमेशा भय बना रहता है।

 

व्याख्या: राजनीति का यह अत्यंत कठोर यथार्थ है। जीवित विरोधी कभी भी पुनर्जीवित होकर प्रहार कर सकता है, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से शत्रु का पूर्ण उन्मूलन ही एकमात्र मार्ग माना गया है।

श्लोक 25

मूल: हन्यादमित्रं दानेन तथा पूर्वापकारिणम्। हन्यात्त्रीन्पञ्च सप्तेति परपक्षस्य सर्वशः।। (1-153-25)

 

हिंदी अनुवाद: दान (लोभ) के द्वारा अथवा अन्य उपायों से अपने अमित्र (शत्रु) तथा पहले हानि पहुँचाने वाले का नाश करे। विरोधी पक्ष के तीन, पाँच या सात—जितने भी प्रमुख लोग हों, उन सबको पूरी तरह समाप्त कर दे।

 

व्याख्या: शत्रु पक्ष के मुख्य समर्थकों, रणनीतिकारों और नेतृत्वकर्ताओं को चुन-चुनकर नेस्तनाबूद करने की नीति यहाँ बताई गई है, ताकि विरोधी पक्ष की रीढ़ टूट जाए।

श्लोक 26

मूल: मूलमेवादितश्छिन्द्यात्परपक्षस्य नित्यशः। ततः सहायांस्तत्पक्षान्सर्वांश्च तदनन्तरम्।। (1-153-26)

 

हिंदी अनुवाद: विरोधी पक्ष के मूल (मुख्य नेता या जड़) को हमेशा सबसे पहले काट डालना चाहिए। उसके बाद उसके सहायकों और उसके पूरे पक्ष के लोगों का क्रमशः दमन करना चाहिए।

 

व्याख्या: किसी भी विरोध को कुचलने का सबसे प्रभावी तरीका उसकी जड़ (प्रमुख संचालक) पर प्रहार करना है। मुख्य नेतृत्व के समाप्त होने पर पूरा विरोधी दल स्वतः बिखर जाता है।

श्लोक 27

मूल: छिन्नमूले ह्यधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः। कथं नु शाखास्तिष्ठेरंश्छिन्नमूले वनस्पतौ।। (1-153-27)

 

हिंदी अनुवाद: मूल (आधार) और अधिष्ठान के कट जाने पर उस पर आश्रित रहने वाले सभी लोग स्वतः नष्ट हो जाते हैं। जब वृक्ष की जड़ ही कट जाए, तो उसकी शाखाएँ कैसे टिकी रह सकती हैं?

 

व्याख्या: यहाँ वृक्ष और उसकी जड़ों का बहुत सुंदर उदाहरण देकर यह समझाया गया है कि मुख्य शत्रु के नष्ट होने पर उसके चाटुकार और अनुयायी बिना किसी बड़े संघर्ष के स्वतः समाप्त हो जाते हैं।

श्लोक 28

मूल: एकाग्रः स्यादविवृतो नित्यं विवरदर्शकः। राजन्नित्यं सपत्नेषु नित्योद्विग्नः समाचरेत्।। (1-153-28)

 

हिंदी अनुवाद: हे राजन्! राजा को हमेशा एकाग्रचित्त रहना चाहिए, अपने रहस्यों को प्रकट नहीं करना चाहिए, निरंतर शत्रुओं की कमजोरियों (छिद्रों) को देखते रहना चाहिए और शत्रुओं के प्रति हमेशा सतर्क व आशंकित रहकर आचरण करना चाहिए।

 

व्याख्या: एक सफल शासक के मानसिक अनुशासन का यह वर्णन है। उसे कभी भी लापरवाह नहीं होना चाहिए और हर पल यह ध्यान रखना चाहिए कि विरोधी पक्ष कहाँ चूक रहा है।

श्लोक 29

मूल: अग्न्याधानेन यज्ञेन काषायेण जटाजिनैः। लोकान्विश्वासयित्वैव ततो लुम्पेद्यथा वृकः।। (1-153-29)

 

हिंदी अनुवाद: अग्निहोत्र, यज्ञ, काषाय (गेरुआ) वस्त्र, जटा और मृगछाल धारण करके लोगों को पूरी तरह विश्वास में ले ले (धार्मिक होने का ढोंग करे), और उसके बाद भेड़िए की तरह (अचानक) प्रहार करके सब कुछ लूट ले।

 

व्याख्या: यह राजनीति की सबसे कुटिल चालों में गिनी जाती है, जहाँ पवित्रता और धर्म का आवरण ओढ़कर लोगों का विश्वास जीता जाता है और अवसर मिलते ही क्रूरता से अपने स्वार्थ को साधा जाता है।

श्लोक 30

मूल: अङ्कुशं शोचमित्याहुरर्थानामुपधारणे। आनाम्य फलितां शाखां पक्वं पक्वं प्रशातयेत्।। (1-153-30)

 

हिंदी अनुवाद: धन और संसाधनों के संचय में 'शोच' (पवित्रता, सावधानी या नियंत्रण) को ही अंकुश कहा गया है। जिस प्रकार फल से लदी हुई शाखा को झुकाकर एक-एक करके पक्के फलों को तोड़ा जाता है, उसी प्रकार नीतिपूर्वक कार्य करना चाहिए।

 

व्याख्या: जिस प्रकार माली पेड़ को नुकसान पहुँचाए बिना पके हुए फलों को चुनता है, उसी प्रकार राजा को भी धैर्य और विवेक के साथ अपने लक्ष्यों और शत्रुओं का एक-एक करके निपटारा करना चाहिए।

श्लोक 31

मूल: फलार्थोऽयं समारम्भो लोके पुंसां विपश्चिताम्। वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत्कालस्य पर्ययः।। (1-153-31)

 

हिंदी अनुवाद: इस संसार में विद्वान पुरुषों के द्वारा किए जाने वाले सभी आरंभ (प्रयास) फल (लाभ) की प्राप्ति के लिए ही होते हैं। इसलिए जब तक उचित समय न आ जाए, तब तक शत्रु को भी अपने कंधे पर ढोना चाहिए (अर्थात सहन करना चाहिए)।

 

व्याख्या: बुद्धिमानी इसी में है कि जब तक आपकी स्थिति मजबूत न हो और सही समय न आ जाए, तब तक शत्रु के प्रति सहनशीलता या अनुकूलता का दिखावा करना पड़े तो करें, क्योंकि अंतिम उद्देश्य विजय प्राप्त करना है।

श्लोक 32

मूल: ततः प्रत्यागते काले भिन्द्याद्धृटमिवाश्मनि। अमित्री न विमोक्तव्यः कृपणं बह्वपि ब्रुवन्।। (1-153-32)

 

हिंदी अनुवाद: इसके बाद, जब सही समय आ जाए, तब शत्रु को पत्थर पर मटके (घड़े) की तरह फोड़ देना चाहिए (नष्ट कर देना चाहिए)। शत्रु चाहे दीन-हीन होकर बहुत सी दयनीय बातें क्यों न कहे, उसे कभी भी जीवित नहीं छोड़ना चाहिए।

 

व्याख्या: कणिक का यह यथार्थवादी संदेश है कि शत्रु जब कमजोर अवस्था में दया की भीख मांगे, तब भी उसकी बातों में आकर उसे जीवनदान न दें, अन्यथा वह मौका पाकर दोबारा आप पर ही प्रहार करेगा।

श्लोक 33

मूल: कृपा न तस्मिन्कर्तव्या हन्यादेवापकारिणम्। हन्यादमित्रं सान्त्वेन तथा दानेन वा पुनः।। (1-153-33)

 

हिंदी अनुवाद: उस पर कभी भी दया नहीं करनी चाहिए, अपकार (हानि) करने वाले शत्रु को मार ही डालना चाहिए। शत्रु को साम (संतुष्ट करने) से अथवा दान (लोभ) देकर अपने वश में कर ले।

 

व्याख्या: शत्रु से निपटने के लिए विभिन्न कूटनीतिक उपायों का सहारा लेने और अंततः उसे प्रभावहीन या समाप्त करने की नीति पर यहाँ जोर दिया गया है।

श्लोक 34

मूल: तथैव भेददण्डाभ्यां सर्वोपायैः प्रशातयेत्। धृतराष्ट्र उवाच—कथं सान्त्वेन दानेन भेदैर्दण्डेन वा पुनः।। (1-153-34)

 

हिंदी अनुवाद: तथा भेद और दंड आदि सभी उपायों से उसका शमन (विनाश) कर दे। तब धृतराष्ट्र ने पूछा—हे कणिक! साम, दान, भेद या दंड के द्वारा शत्रु को किस प्रकार मारा जा सकता है?

 

व्याख्या: यहाँ कणिक की नीति का एक चरण पूरा होता है और धृतराष्ट्र जिज्ञासावश यह पूछते हैं कि इन चारों कूटनीतिक उपायों का प्रायोगिक उपयोग कैसे किया जाए।

श्लोक 35

मूल: अमित्रः शक्यते हन्तुं तन्मे ब्रूहि यथातथम्। कणिक उवाच—शृणु राजन्यथा वृत्तं वने निवसतः पुरा।। (1-153-35)

 

हिंदी अनुवाद: (धृतराष्ट्र ने कहा) शत्रु को किस प्रकार मारा जा सकता है, वह मुझे ठीक-ठीक बताइए। कणिक ने कहा—हे राजन्! प्राचीन काल में वन में निवास करने वाले (सियार आदि की) जैसी घटना घटी थी, उसे सुनो।

 

व्याख्या: धृतराष्ट्र के इस प्रश्न के उत्तर में कणिक राजनीति को स्पष्ट करने के लिए एक प्रसिद्ध कथा (सियार और अन्य पशुओं की कथा) सुनाते हैं।

श्लोक 36

मूल: जम्बुकस्य महाराज नीतिशास्त्रार्थदर्शिनः। अथ कश्चित्कृतप्रज्ञः शृगालः स्वार्थपण्डितः।। (1-153-36)

 

हिंदी अनुवाद: हे महाराज! नीतिशास्त्र के अर्थ को देखने वाले (जानने वाले) जम्बुक (सियार) की जैसी कथा है, उसे सुनो। एक बार कोई कुशाग्र बुद्धि (कृतप्रज्ञ) और अपने स्वार्थ को साधने में पंडित (चतुर) एक सियार था।

 

व्याख्या: कथा के माध्यम से यह समझाया जा रहा है कि कैसे एक कमजोर किंतु अत्यधिक चालाक प्राणी (सियार) अपनी कूटनीति से ताकतवर जीवों को भी आपस में लड़ाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है।

श्लोक 37

मूल: सखिभिर्न्यवसत्सार्धं व्याघ्राखुवृकबभ्रुभिः। तेऽपश्यन्विपिने तस्मिन्बलिनं मृगयूथपम्।। (1-153-37)

 

हिंदी अनुवाद: वह सियार बाघ, चूहे (मूषक), भेड़िए और नेवले (बभ्रु) इन मित्रों के साथ निवास करता था। उन्होंने उस वन में एक बलवान मृग (हिरणों के यूथ के स्वामी) को देखा।

 

व्याख्या: सियार के मित्र विभिन्न स्वभाव और बल वाले जीव थे। उन्होंने वन में एक शक्तिशाली हिरण को देखा जिसे वे मारना चाहते थे, किंतु अकेले कोई भी समर्थ नहीं था।

श्लोक 38

मूल: अशक्ता ग्रहणे तस्य ततो मन्त्रममन्त्रयन्। जम्बुक उवाच—असकृद्यतितो ह्येष हन्तुं व्याघ्र वने त्वया।। (1-153-38) हिंदी अनुवाद: उसे पकड़ने में असमर्थ होने पर उन सबने मिलकर एक मंत्रणा (षड्यंत्र) की। सियार ने कहा—हे बाघ! तुमने इस हिरण को वने में मारने के लिए अनेक बार प्रयत्न किया है। व्याख्या: जब सभी बलवान जीव मिलकर भी उस हिरण को नहीं पकड़ पाए, तब कूटनीतिज्ञ सियार ने अपनी बुद्धि से चाल चलने का प्रस्ताव रखा।

श्लोक 39

मूल: युवा वै जवसंपन्नो बुद्धिशाली न शक्यते। मूषिकोऽस्य शयानस्य चरणौ भक्षयत्वयम्।। (1-153-39) हिंदी अनुवाद: यह (हिरण) युवा है, वेगवान (तेज दौड़ने वाला) है और बुद्धिसाली है, इसलिए यह साधारण बल से पकड़ा नहीं जा सकता। (इसके लिए उपाय यह है कि) यह जब सो रहा हो, तब यह चूहा इसके दोनों चरणों (पैरों) को कुतर दे। व्याख्या: सियार ने हिरण की शारीरिक क्षमता और गति को भांपते हुए उसकी कमजोरी पर वार करने की कूटनीति सुझाई कि सोते समय उसके पैरों को नुकसान पहुँचाया जाए।

श्लोक 40

मूल: अथैनं भक्षितैः पादैर्व्याघ्रो गृह्णातु वै ततः। ततो वै भक्षयिष्यामः सर्वे मुदितमानसाः।। (1-153-40) हिंदी अनुवाद: और फिर जब इसके पैर कुतरे जा चुके हों, तब हे बाघ! तुम इसे पकड़ लेना। उसके बाद हम सब मिलकर आनंदित मन से इसका मांस भक्षण करेंगे। व्याख्या: यह सामूहिक षड्यंत्र की वह चाल थी जहाँ हर एक की विशेषता (चूहे की कुतरने की क्षमता और बाघ के बल) का उपयोग करके साझा लक्ष्य प्राप्त करने की योजना बनाई गई।

श्लोक 41

मूल: जम्बुकस्य तु तद्वाक्यं तथा चक्रः समाहिताः। मूषिकाभक्षितैः पादैर्मृगं व्याघ्रोऽवधीत्तदा।। (1-153-41) हिंदी अनुवाद: सियार की उस बात को उन सबने मिलकर वैसा ही किया। चूहे द्वारा पैर कुतरे जाने पर बाघ ने तब उस मृग का वध कर दिया। व्याख्या: सियार की कूटनीतिक योजना सफल हुई और चूहे के सहयोग से घायल हुए हिरण को बाघ ने आसानी से मार गिराया।

श्लोक 42

मूल: दृष्ट्वैवाचेष्टमानं तु भूमौ मृगकलेवरम्। स्नात्वाऽऽगच्छत भद्रं वोरक्षामीत्याह जम्बुकः।। (1-153-42) हिंदी अनुवाद: भूमि पर मृग के शरीर को अचेष्ट (मृत) पड़ा हुआ देखकर सियार ने कहा—तुम सब स्नान करके आओ, तुम्हारा कल्याण हो, तब तक मैं इसकी रक्षा करता हूँ। व्याख्या: यहाँ सियार ने अपनी धूर्तता का अगला चरण शुरू किया। उसने सबको स्नान करने भेज दिया ताकि वह अकेले ही भोजन पर नियंत्रण की पृष्ठभूमि तैयार कर सके।

श्लोक 43

मूल: शृगालवचनात्तेऽपि गताः सर्वे नदीं ततः। स चिन्तापरमो भूत्वा तस्थौ तत्रैव जम्बुकः।। (1-153-43) हिंदी अनुवाद: शियार के वचनों से वे सब लोग नदी पर स्नान करने चले गए। और वह सियार अत्यंत चिंता में डूबा हुआ वहीं खड़ा रहा। व्याख्या: सियार ने नाटक करते हुए खुद को चिंतित दिखाया ताकि बाकी साथी उसकी मंशा पर शक न करें और वह अपनी अगली चाल चल सके।

श्लोक 44

मूल: अथाजगाम पूर्वं तु स्नात्वा व्याघ्रो महाबलः। ददर्श जम्बुकं चैव चिन्ताकुलितमानसम्।। (1-153-44) हिंदी अनुवाद: इसके बाद सबसे पहले स्नान करके महाबलवान बाघ वहाँ वापस आया। उसने सियार को अत्यंत चिंताकुल मन से बैठे हुए देखा। व्याख्या: बाघ के आते ही सियार ने अपने मानसिक चक्रव्यूह का पहला मोहरा चला, जिससे बाघ के मन में संदेह और अहंकार को भड़काया जा सके।

श्लोक 45

मूल: व्याघ्र उवाच—किं शोचसि महाप्राज्ञ त्वं नो बुद्धिमतां वरः। अशित्वा पिशितान्यद्य विहरिष्यामहे वयम्।। (1-153-45) हिंदी अनुवाद: बाघ ने कहा—हे महाप्राज्ञ! तुम हम सब में बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हो, फिर किस बात का शोक कर रहे हो? आज हम इन मांसों को खाकर विहार (आनंद) करेंगे। व्याख्या: बाघ सियार की बुद्धिमत्ता का सम्मान करता था और सामान्य रूप से भोजन करने के लिए उत्सुक था, किंतु सियार की कूटनीति कुछ और ही थी।

श्लोक 46

मूल: जम्बुक उवाच—शृणु मे त्वं महाबाहो यद्वाक्यं मूषिकोऽब्रवीत्। धिग्बलं मृगराजस्य मयाद्यायं मृगो हतः।। (1-153-46) हिंदी अनुवाद: सियार ने कहा—हे महाबाहो! चूहे ने जो बात कही है, उसे तुम मेरे मुख से सुनो। (चूहे ने गर्व से कहा है कि)—धिक्कार है मृगराज (बाघ) के बल को! आज इस हिरण को तो मैंने ही मारा है। व्याख्या: सियार ने बाघ के अहंकार को चोट पहुँचाने के लिए झूठी बात गढ़ी कि चूहा उसके बल को नीचा दिखा रहा है और कह रहा है कि शिकार उसने किया है।

श्लोक 47

मूल: मद्बाहुबलमाश्रित्य तृप्तिमद्य गमिष्यति। तस्यैवं गर्जितं श्रुत्वा ततो भक्ष्यं न रोचये।। (1-153-47) हिंदी अनुवाद: यह मेरे ही बाहुबल का आश्रय लेकर आज तृप्ति को प्राप्त होगा। चूहे की इस प्रकार की गर्जना को सुनकर मुझे यह भोजन अच्छा नहीं लग रहा है। व्याख्या: सियार ने बाघ के भीतर यह भावना भर दी कि एक छोटा सा चूहा उसके पराक्रम का अपमान कर रहा है और इस झूठे अपमानबोध से बाघ क्रोधित हो गया।

श्लोक 48

मूल: व्याघ्र उवाच—ब्रवीति यदि स ह्येवं काले ह्यस्मि प्रबोधितः। स्वबाहुबलमाश्रित्य हनिष्येऽहं वनेचरान्।। (1-153-48) हिंदी अनुवाद: बाघ ने कहा—यदि वह ऐसा कहता है, तो आज सही समय पर मेरी आँखें खुल गई हैं। अब मैं अपने ही बाहुबल के भरोसे वन के सभी जीवों को मारूँगा। व्याख्या: सियार की कूटनीतिक चाल काम कर गई; बाघ अपने अहंकार और क्रोध में आकर उस मृत शिकार को छोड़े बिना ही वहाँ से गुस्से में आगे निकल गया।

श्लोक 49

मूल: खादिष्ये तत्र मांसानि इत्युक्त्वा प्रस्थितोवनम्। एतस्मिन्नेव काले तु मूषिकोऽप्याजगाम ह।। (1-153-49) हिंदी अनुवाद: "मैं तो वन में जाकर (स्वयं शिकार करके) ही मांस खाऊँगा"—यह कहकर बाघ वन की ओर प्रस्थान कर गया। इसी समय वहाँ वह चूहा भी आ पहुँचा। व्याख्या: बाघ के जाने के बाद सियार ने तुरंत अपनी अगली चाल के तहत चूहे को निशाना बनाया ताकि उसे भी भयभीत करके भगाया जा सके।

श्लोक 50

मूल: तमागतमभिप्रेक्ष्य शृगालोऽप्यब्रवीद्वचः। शृणु मूषिक भद्रं ते नकुलो यदिहाब्रवीत्।। (1-153-50) हिंदी अनुवाद: उसे आया हुआ देखकर सियार ने वचन कहा—हे मूषिक! तुम्हारा कल्याण हो, सुनो, नेवले ने यहाँ क्या कहा है। व्याख्या: सियार अब चूहे को डराने के लिए नेवले का भय दिखाने की नई कूटनीतिक चाल चलता है।

श्लोक 51

मूल: मृगमांसं न खादेयं गरमेतन्न रोचते। मूषिकं भक्षयिष्यामि तद्भवाननुमन्यताम्।। (1-153-51) हिंदी अनुवाद: (नेवले ने कहा है कि) मैं इस हिरण का मांस नहीं खाऊँगा, मुझे यह जहर के समान (अप्रिय) प्रतीत होता है। मैं तो इस चूहे को ही खाऊँगा, इस बात की आप अनुमति दीजिए। व्याख्या: सियार ने चूहे को भ्रमित और भयभीत करने के लिए झूठ बोला कि नेवला हिरण के बजाय सीधे चूहे को ही अपना शिकार बनाना चाहता है।

श्लोक 52

मूल: तच्छ्रुत्वा मूषिको वाक्यं संत्रस्तः प्रगतो बिलम्। ततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृपः।। (1-153-52) हिंदी अनुवाद: चूहा उस बात को सुनकर अत्यंत भयभीत हो गया और अपने बिल में घुस गया। इसके बाद, स्नान करके वह भेड़िया (वृक) वहाँ आ पहुँचा। व्याख्या: सियार की बात सुनकर चूहा अपनी जान बचाकर वहाँ से भाग गया। अब बाघ और चूहे दोनों को भगाने के बाद सियार ने भेड़िए के लिए नया षड्यंत्र रचा।

श्लोक 53

मूल: तमागतमिदं वाक्यमब्रवीज्जम्बुकस्तदा। मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति।। (1-153-53) हिंदी अनुवाद: आए हुए उस भेड़िए से सियार ने तब यह वचन कहा—मृगराज (बाघ) बहुत अधिक क्रोधित है, तुम्हारे लिए यह स्थिति अच्छी नहीं होगी। व्याख्या: सियार ने भेड़िए को यह कहकर डराना चाहा कि बाघ उससे भयंकर रूप से नाराज है और उसका हनन करना चाहता है।

श्लोक 54

मूल: सकलत्रस्त्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम्। एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः।। (1-153-54) हिंदी अनुवाद: वह संपूर्ण भय से युक्त होकर इधर ही आ रहा है, अब इसके बाद जो उचित हो वह करो। सियार द्वारा इस प्रकार प्रेरित किए जाने पर वह भेड़िया— व्याख्या: भेड़िए के मन में बाघ के प्रति तीव्र भय उत्पन्न कर दिया गया ताकि वह भी बिना भोजन किए तुरंत वहाँ से भागने के लिए विवश हो जाए।

श्लोक 55

मूल: ततोऽवलुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः। एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्याजगाम ह।। (1-153-55) हिंदी अनुवाद: मांस खाने वाला वह भेड़िया (डर के मारे) वहाँ से तुरंत भाग खड़ा हुआ। इसी समय वहाँ वह नेवला (नकुल) भी आ पहुँचा। व्याख्या: बाघ, चूहा और भेड़िया—तीनों सियार की कूटनीतिक चालों और भय के कारण वहाँ से जा चुके थे। अब केवल नेवला बचा था।

श्लोक 56

मूल: तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको वने। स्वबाहुबलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः।। (1-153-56) हिंदी अनुवाद: हे महाराज! वन में सियार ने उस नेवले से कहा—वे सब (बाघ आदि) अपने बाहुबल का अहंकार करते हुए पराजित होकर अन्यत्र चले गए हैं। व्याख्या: सियार ने नेवले के सामने यह झूठा प्रभाव जमाया कि अन्य सभी शक्तिशाली जीव उसकी शक्ति के आगे टिक नहीं पाए और डरकर भाग गए।

श्लोक 57

मूल: मम दत्वा नियुद्धं त्वं भुङ्क्ष्व मांसं यथेप्सितम्। नकुल उवाच—मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः।। (1-153-57) हिंदी अनुवाद: तुम मेरे साथ द्वंद्वयुद्ध (मुकाबला) करके, मुझे जीतकर अपनी इच्छा के अनुसार इस मांस को भोगो। नेवले ने कहा—मृगराज (बाघ), भेड़िया और बुद्धिमान चूहा भी— व्याख्या: सियार ने नेवले को युद्ध की चुनौती दी, जिसपर नेवले ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सियार की असाधारण क्षमता का मूल्यांकन किया।

श्लोक 58

मूल: निर्जिता यत्त्वया वीरास्तस्माद्वीरतरो भवान्। न त्वयाप्युत्सहे योद्धुमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत्।। (1-153-58) हिंदी अनुवाद: जिन वीर (बाघ आदि) को तुमने पराजित कर दिया है, उनसे भी बढ़कर वीर तुम हो। इसलिए मैं तुम्हारे साथ युद्ध करने का साहस नहीं कर सकता—यह कहकर वह नेवला भी वहाँ से चला गया। व्याख्या: सियार की कूटनीतिक चाल और मानसिक धोखे के आगे नेवला भी भ्रमित हो गया और बिना लड़े ही वहाँ से प्रस्थान कर गया।

श्लोक 59

मूल: कणिक उवाच—एवं तेषु प्रयातेषु जम्बुको हृष्टमानसः। खादति स्म तदा मांसमेकः सन्मन्त्रनिश्चयात्। एवं समाचरन्नित्यं सुखमेधेत भूपतिः।। (1-153-59) हिंदी अनुवाद: कणिक ने कहा—इस प्रकार उन सबके चले जाने पर वह सियार प्रसन्नमन होकर, अपनी मंत्र-निश्चय (कूटनीति) के बल पर अकेला ही उस सारे मांस को खाने लगा। इस प्रकार आचरण करने वाला राजा हमेशा सुखपूर्वक समृद्ध होता है। व्याख्या: इस पूरी कथा का निष्कर्ष यह है कि एक कमजोर और बुद्धिमान शासक (सियार) अपनी कूटनीति, भेद-नीति और मनोवैज्ञानिक दबाव के सहारे शक्तिशाली सहयोगियों को आपस में लड़ाकर या डराकर भगा देता है और संपूर्ण राज्य (संसाधनों) का अकेले उपभोग करता है। राजा को भी शत्रुओं के बीच फूट डालकर अपना हित साधना चाहिए।

श्लोक 60

मूल: भयेन भेदयेद्भीरुं शूरमञ्जलिकर्मणा। लुब्धमर्थप्रदानेन समं न्यूनं तथौजसा।। (1-153-60) हिंदी अनुवाद: डरपोक मनुष्य को भय दिखाकर, शूरवीर को हाथ जोड़कर (सम्मान देकर), लोभी को धन देकर, तथा अपने समान या कम बल वाले को अपने पराक्रम (तेज) से वश में करना चाहिए। व्याख्या: यह राजनीति का अत्यंत महत्वपूर्ण व्यावहारिक सूत्र है। समाज या शत्रुओं में अलग-अलग स्वभाव के व्यक्तियों (भीरु, शूर, लुब्ध) को नियंत्रित करने की अलग-अलग रणनीतियाँ होती हैं।

श्लोक 61

मूल: एवं ते कथितं राजन् शृणु चाप्यपरं तथा।। (1-153-61) हिंदी अनुवाद: हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे यह नीति कह दी, अब इसके अलावा दूसरी नीति भी सुनो। व्याख्या: कणिक धृतराष्ट्र को आगे और भी अधिक सूक्ष्म तथा कठोर राजनीतिक व व्यावहारिक नियमों को समझाने के लिए अगली कड़ी शुरू करते हैं।

श्लोक 62

मूल: पुत्रः सखा वा भ्राता वा पिता वा यदि वा गुरुः। रिपुस्यानेषु वर्तन्तो हन्तव्या भूतिमिच्छता।। (1-153-62) हिंदी अनुवाद: अपना कल्याण (भूति) चाहने वाले मनुष्य को पुत्र, मित्र, भाई, पिता अथवा गुरु—कोई भी क्यों न हो, यदि वह शत्रु के स्थान पर (शत्रु जैसा आचरण करने वाला) आ जाए, तो उसका हनन (निग्रह) कर देना चाहिए। व्याख्या: राजधर्म और सत्ता की राजनीति में व्यक्तिगत संबंध गौण हो जाते हैं। यदि कोई अपना ही व्यक्ति राज्य या राजा के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण आचरण करे, तो उसे क्षमा नहीं किया जा सकता।

श्लोक 63

मूल: शपथेनाप्यरिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः। विषेण मायया वापि नोपेक्षेते कथंचन। उभौ चेत्संशयोपेतौ श्रद्धवांस्तत्र वर्धते।। (1-153-63) हिंदी अनुवाद: शपथ (कसमें) खाकर, धन देकर, विष से अथवा माया (छल) से भी शत्रु का नाश कर दे; उसकी कभी भी उपेक्षा न करे। यदि दोनों ही ओर संशय की स्थिति हो, तो श्रद्धावान (सावधानी रखने वाला) ही आगे बढ़ता है। व्याख्या: शत्रु के विनाश के लिए साम-دام-दंड-भेद के सभी साधनों (चाहे वह छल हो या जहर) का प्रयोग करने की अनुमति राजनीति के इस कठोर पाठ में दी गई है।

श्लोक 64

मूल: गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथं प्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम्।। (1-153-64) हिंदी अनुवाद: गुरु यदि अतिगर्वी (अवलिप्त) हो जाए, कर्तव्य और अकर्तव्य को न समझे तथा गलत मार्ग (उत्पथ) पर चलने लगे, तो उसका भी शासन (दंड या नियंत्रण) करना न्यायसंगत होता है। व्याख्या: न्याय और व्यवस्था सर्वोपरि है। पद या संबंध कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि कोई मार्ग से भटककर अनर्थ करे, तो उसे रोकना या दंडित करना राजा का कर्तव्य है।

श्लोक 65

मूल: क्रुद्धोऽपक्रुद्धरूपः स्यात्स्मितपूर्वाभिभाषिता। न चैनं क्रोधसंदीप्तं विद्यात्कश्चित्कथंचन। न चाप्यन्यमपध्वंसेत्कदाचित्कोपसंयुतः।। (1-153-65) हिंदी अनुवाद: क्रोधित होने पर भी मनुष्य को अक्रोधित (शांत) दिखाई देना चाहिए और मुख पर मुस्कान के साथ बात करनी चाहिए। कोई भी यह न जान पाए कि आप अंदर से क्रोध की आग में जल रहे हैं। कभी भी क्रोध के आवेश में आकर किसी अन्य का अपमान या पतन न करें। व्याख्या: आत्म-नियंत्रण और कूटनीतिक मुखौटे का यह उत्कृष्ट उदाहरण है। एक चतुर राजनेता कभी भी अपने गुस्से या आंतरिक भावनाओं को अपने चेहरे या शब्दों से जाहिर नहीं होने देता।

श्लोक 66

मूल: प्रहरिष्यन्प्रियं ब्रूयात्प्रहरन्नपि भारत। प्रहृत्य च प्रियं ब्रूयाच्छोचन्निव रुदन्निव।। (1-153-66) हिंदी अनुवाद: हे भारत! प्रहार (वार) करने वाला व्यक्ति भी प्रेमपूर्ण वचन बोले, प्रहार करते समय भी मीठा बोले, और प्रहार करने के पश्चात भी ऐसा दिखाए मानो वह शोक कर रहा हो या रो रहा हो। व्याख्या: यह राजनीति का अत्यंत क्रूर किंतु व्यावहारिक छद्म है, जहाँ भीतर से शत्रुता साधते हुए ऊपर से सांत्वना और प्रेम का दिखावा किया जाता है ताकि शत्रु को आपकी नीयत पर शक न हो।

श्लोक 67

मूल: आश्वासयेच्चापि परं सान्त्वधर्मार्थवृत्तिभिः। अथ तं प्रहरेत्काले तथा विचलितं पथि।। (1-153-67) हिंदी अनुवाद: सांत्वना, धर्म और अर्थयुक्त वचनों से दूसरे (शत्रु) को पूरी तरह आश्वस्त कर दे, और फिर उचित समय आने पर जब वह मार्ग से विचलित (लापरवाह) हो, तब उसपर प्रहार करे। व्याख्या: पहले शत्रु का विश्वास जीतना और जब वह पूरी तरह निश्चिंत हो जाए, तब सही अवसर देखकर उसपर घातक वार करना—यही कणिक की नीति का मूलमंत्र है।

श्लोक 68

मूल: अपि घोरापराधस्य धर्ममाश्रित्य तिष्ठतः। स हि प्रच्छाद्यते दोषः शैलो मेघैरिवासितैः।। (1-153-68) हिंदी अनुवाद: भयानक अपराध करने वाला व्यक्ति भी यदि धर्म का आश्रय लेकर खड़ा हो जाए, तो उसके दोष वैसे ही छिप जाते हैं जैसे काले बादलों से पर्वत ढंक जाता है। व्याख्या: धर्म या धार्मिकता का आवरण कई बार बड़े से बड़े पापी या अपराधी के कृत्यों पर पर्दा डाल देता है, और लोग उसके बाहरी रूप से भ्रमित हो जाते हैं।

श्लोक 69

मूल: यः स्यादनुप्राप्तवधस्तस्यागारं प्रदीपयेत्। अधनान्नास्तिकांश्चोरान्विषकर्मसु योजयेत्।। (1-153-69) हिंदी अनुवाद: वध के योग्य (मृत्युदंड पाने वाले या खतरनाक) शत्रु का घर जला देना चाहिए। निर्धन, नास्तिक और चोरों को विष प्रयोग आदि गुप्त कार्यों (विषकर्मों) मेंियोजित करना चाहिए। व्याख्या: राज्य की सुरक्षा और असामाजिक तत्वों के दमन या उपयोग के संबंध में यह अतिवादी नीति है, जिसमें कठिन परिस्थितियों में गुप्त और कठोर उपायों का सहारा लेने की बात कही गई है।

श्लोक 70

मूल: प्रत्युत्थानासनाद्येन संप्रदानेन केनचित्। अतिविश्रब्धघाती स्यात्तीक्ष्णंदष्ट्रो निमग्नकः।। (1-153-70) हिंदी अनुवाद: खड़े होकर स्वागत करने, बैठने का आसन देने अथवा किसी भी प्रकार के उपहार (संप्रदान) देने के बहाने से शत्रु का विश्वास जीत ले, और फिर अत्यधिक विश्वास पैदा करके घात लगाकर वार करने वाले (अतिविश्रब्धघाती) तथा गहरे में वार करने वाले तीखे दांतों वाले सर्प के समान बन जाए। व्याख्या: आतिथ्य और सम्मान का दिखावा करके जब शत्रु आप पर पूरी तरह आँख मूंदकर विश्वास करने लगे, तब उस विश्वास का लाभ उठाकर उसे समाप्त करने की परम कुटिल नीति यहाँ समझाई गई है।

महाभारत के आदिपर्व (संभवपर्व) के १५३वें अध्याय के श्लोकों (श्लोक 71 से 111) का क्रमवार संस्कृत श्लोक, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 71

मूल: अशङ्कितेभ्यः शङ्केत शङ्कितेभ्यश्च सर्वशः। अशङ्क्याद्भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति।। (1-153-71) हिंदी अनुवाद: जहाँ किसी प्रकार की आशंका न हो, वहाँ भी शंका करनी चाहिए और जिन पर पहले से शंका हो, उनसे तो हर प्रकार से सावधान रहना चाहिए। जिस दिशा से भय की कोई उम्मीद न हो, वहाँ से उत्पन्न हुआ भय मनुष्य को जड़ से उखाड़कर नष्ट कर देता है। व्याख्या: कूटनीति में सुरक्षा का यह सबसे कड़ा नियम है। राजा या सतर्क मनुष्य को कभी भी पूरी तरह आश्वस्त होकर लापरवाह नहीं होना चाहिए, क्योंकि सबसे बड़ा आघात अक्सर वहीं से होता है जहाँ से उसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं होती।

श्लोक 72

मूल: न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्। विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति।। (1-153-72) हिंदी अनुवाद: जो अविश्वसनीय (शत्रु या अजनबी) है, उस पर कभी विश्वास न करे; और जो विश्वासी प्रतीत होता है, उस पर भी अत्यधिक (अंधा) विश्वास न करे। अत्यधिक विश्वास से उत्पन्न होने वाला भय मनुष्य की जड़ों तक को काट डालता है। व्याख्या: अति-विश्वास (blind trust) राजनीति और जीवन दोनों में पतन का कारण बनता है। हर व्यक्ति के साथ एक निश्चित व्यावहारिक दूरी और सावधानी बनाए रखना आवश्यक है।

श्लोक 73

मूल: चारः सुविहितः कार्य आत्मनश्च परस्य वा। पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रेषु योजयेत्।। (1-153-73) हिंदी अनुवाद: अपनी और दूसरों की स्थिति जानने के लिए गुप्तचरों (चारों) की अच्छी प्रकार से व्यवस्था करनी चाहिए। पाखंडियों, तपस्वियों आदि को शत्रु के राष्ट्र में गुप्तचर के रूप में नियुक्त करना चाहिए। व्याख्या: राज्य संचालन में जासूसी तंत्र की अनिवार्यता पर जोर देते हुए कहा गया है कि साधु, संन्यासी या विभिन्न वेषधारी लोग सरलता से शत्रु राज्य में भेद ले सकते हैं, इसलिए ऐसे लोगों का गुप्तचर के रूप में उपयोग करना चाहिए।

श्लोक 74

मूल: उद्यानेषु विहारेषु देवतायतनेषु च। पानागारेषु रथ्यासु सर्वतीर्थेषु चाप्यथ।। (1-153-74) हिंदी अनुवाद: उद्यानों (बागों), विहार स्थलों, देवालयों (मंदिरों), मदिरालयों (पानागारों), राजमार्गो (रथ्या) तथा सभी तीर्थ स्थानों पर— व्याख्या: गुप्तचरों को जनता के बीच सूचनाएँ एकत्र करने के लिए उन सार्वजनिक स्थानों पर तैनात रहना चाहिए जहाँ लोगों का सबसे अधिक जमावड़ा होता है।

श्लोक 75

मूल: चत्वरेषु च कूपेषु पर्वतेषु वनेषु च। समवायेषु सर्वेषु सरित्सु च विचारयेत्।। (1-153-75) हिंदी अनुवाद: चौराहों, कुओं, पर्वतों, वनों, सभी प्रकार की सभाओं तथा नदियों के तटों पर गुप्तचरों के माध्यम से राज्य की गतिविधियों की खोज-खबर लेते रहना चाहिए। व्याख्या: राज्य की हर छोटी-बड़ी गतिविधि और जनता की नब्ज़ टटोलने के लिए चौरस्ता, जल स्रोतों और सभाओं जैसे प्रमुख स्थानों पर पैनी नजर रखना गुप्तचर व्यवस्था का मुख्य अंग है।

श्लोक 76

मूल: वाचा भृशं विनीतः स्याद्धृदयेन तथा क्षुरः। स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात्सृष्टो रौद्रस्य कर्मणः।। (1-153-76) हिंदी अनुवाद: वाणी से अत्यंत विनीत (नम्र) होना चाहिए, किंतु हृदय से तलवार (या उस्तरे) के समान पैना और कठोर होना चाहिए। मुख पर हमेशा मुस्कान के साथ बात करनी चाहिए, भले ही आप भयंकर (क्रूर) कर्म करने के लिए ही क्यों न रचे गए हों। व्याख्या: यह कूटनीतिक चरित्र का सबसे उत्तम विवरण है—ऊपर से अत्यंत सरल, सौम्य और मधुर दिखना, किंतु भीतर से पूरी तरह दृढ़, लक्ष्योमुखी और कठोर रहना।

श्लोक 77

मूल: अञ्जलिः शपथः सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम्। आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता।। (1-153-77) हिंदी अनुवाद: हाथ जोड़ना (प्रणाम करना), शपथ खाना, सांत्वना देना, सिर झुकाकर चरण वंदना करना और लंबी आशाएँ (विश्वास) बंधाना—अपनी ऐश्वर्य-वृद्धि (भूति) चाहने वाले मनुष्य को आवश्यकता पड़ने पर ये सभी उपाय करने चाहिए। व्याख्या: सफलता और प्रभुत्व पाने के लिए अहंकार को त्यागकर हर प्रकार का नम्रतापूर्ण अभिनय (चाहे हाथ जोड़ना हो या चरण छूना) करने में संकोच नहीं करना चाहिए, यदि वह आपके उद्देश्य की पूर्ति करता हो।

श्लोक 78

मूल: सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान्स्याद्दुरारुहः। आमः स्यात्पक्वसङ्काशो नच जीर्येत कर्हिचित्।। (1-153-78) हिंदी अनुवाद: वृक्ष की तरह ऐसा आचरण करे जो देखने में खूब पुष्पित (आकर्षक) लगे किंतु उसमें फल न हो (यानी शुरुआत में सिर्फ दिखावा हो), या फिर यदि फलवान हो तो ऐसा हो जिस पर चढ़ना असंभव हो (दुर्लभ हो)। कच्चा होने पर भी पके हुए के समान दिखाई दे, और कभी भी (शत्रुओं द्वारा) आसानी से पचने (हारने) योग्य न बने। व्याख्या: यहाँ मनुष्य को अपनी क्षमताओं और रणनीतियों को इस प्रकार छिपाने की सलाह दी गई है कि शत्रु कभी भी उसका सही आकलन न कर सके और उसे आसानी से अपने वश में न कर पाए।

श्लोक 79

मूल: त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा ह्यनुबन्धास्तथैव च। अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडास्तु परिवर्जयेत्।। (1-153-79) हिंदी अनुवाद: धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों (त्रिवर्ग) में तीन प्रकार की पीड़ाएँ और उनके परिणाम (अनुबंध) होते हैं। उनके शुभ परिणामों (अनुबंधों) को तो ग्रहण करना चाहिए, किंतु पीड़ा देने वाले तत्वों का परित्याग कर देना चाहिए। व्याख्या: जीवन के पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम) को साधते समय उन कर्मों और परिणामों को अपनाना चाहिए जो कल्याणकारी हों, और जिनसे भारी कष्ट या पतन की आशंका हो, उनसे दूर रहना चाहिए।

श्लोक 80

मूल: धर्मं विचरतः पीडा सापि द्वाभ्यां नियच्छति। अर्थं चाप्यर्थलुब्धस्य कामं चातिप्रवर्तिनः।। (1-153-80) हिंदी अनुवाद: धर्म का आचरण करने वाले को भी यदि कोई पीड़ा होती है, तो वह धन के प्रति अतिलोभी (अर्थलुब्ध) और काम में अत्यधिक आसक्त (अतिप्रवर्ती) होने वाले इन दोनों प्रकार के दोषों के कारण नियंत्रित या बाधित होती है। व्याख्या: अत्यधिक लोभ और वासना ही मनुष्य के जीवन में सभी नैतिक और व्यावहारिक संकटों की जड़ हैं, जो उसके धर्म और प्रगति के मार्ग में बाधा बनते हैं।

श्लोक 81

मूल: अगर्वितात्मा युक्तश्च सान्त्वयुक्तोऽनसूयिता। अवेक्षितार्थः शुद्धात्मा मन्त्रयीत द्विजैः सहा।। (1-153-81) हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य अहंकारहीन, संयमी, सांत्वना देने वाला, ईर्ष्या-रहित (अनसूयु), विषयों को भली-भांति देखने वाला और शुद्ध अंतःकरण वाला हो, उसे ही विद्वान ब्राह्मणों (मंत्रियों/सलाहकारों) के साथ मंत्रणा करनी चाहिए। व्याख्या: राज्य की गुप्त मंत्रणा और नीति-निर्धारण के लिए योग्य, निष्पक्ष और उच्च चरित्र वाले सलाहकारों का चयन करना आवश्यक है।

श्लोक 82

मूल: कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च। उद्धरेद्दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत्।। (1-153-82) हिंदी अनुवाद: चाहे कोमल (मृदु) कर्म से हो अथवा कठोर (दारुण) कर्म से—जिस किसी भी उपाय से हो, मनुष्य को अपने दीन (संकटग्रस्त) स्वरूप को उबारना चाहिए और समर्थ होने पर धर्म का आचरण करना चाहिए। व्याख्या: संकट के समय अपनी रक्षा और उद्धार के लिए कोमलता या कठोरता—जो भी साधन आवश्यक हो, उसका प्रयोग करना चाहिए। पहले स्वयं को संकट से मुक्त करना ही सर्वोच्च प्राथमिकता है।

श्लोक 83

मूल: न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति। संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति।। (1-153-83) हिंदी अनुवाद: जोखिम या संकट (संशय) मोल लिए बिना मनुष्य कभी भी कल्याण या महान सफलता को प्राप्त नहीं कर सकता। हाँ, जोखिम उठाकर यदि वह जीवित बच जाता है, तभी वह कल्याण को देखता है। व्याख्या: बड़ी सफलताओं के लिए जीवन में आंशिक जोखिम या कड़े फैसले लेने ही पड़ते हैं, बिना खतरे के बड़ी मंजिल हासिल नहीं होती।

श्लोक 84

मूल: यस्य बुद्धिः परिभवेत्तमतीतेन सान्त्वयेत्। अनागतेन दुर्बुद्धिं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम्।। (1-153-84) हिंदी अनुवाद: जिसकी बुद्धि पराभूत (कमजोर या भ्रमित) हो चुकी हो, उसे अतीत (पुरानी बातों या उदाहरणों) से संतुष्ट करना चाहिए; दुर्बुद्धि (मूर्ख) को भविष्य (आने वाले परिणामों के भय) से और पंडित (विद्वान) को वर्तमान (प्रत्युत्पन्न मति व तर्कों) से समझाना चाहिए। व्याख्या: अलग-अलग मानसिकता के लोगों को प्रभावित या नियंत्रित करने की अलग-अलग मनोवैज्ञानिक पद्धतियाँ होती हैं—हर व्यक्ति को उसकी समझ के अनुसार ही डील करना चाहिए।

श्लोक 85

मूल: योऽरिणा सह सन्धाय शयीत कृतकृत्यवत्। स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते।। (1-153-85) हिंदी अनुवाद: जो व्यक्ति शत्रु के साथ संधि (समझौता) करके ऐसे निश्चिंत होकर सोता है मानो उसने अपना सारा काम पूरा कर लिया हो, वह वृक्ष के ऊँचे अग्रभाग पर सोने वाले व्यक्ति की तरह नीचे गिरकर ही जगता है। व्याख्या: शत्रु पर कभी भी आँख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। संधि करने के बाद भी उसकी गतिविधियों के प्रति हमेशा सतर्क रहना अनिवार्य है, अन्यथा विनाश तय है।

श्लोक 86

मूल: मन्त्रसंवरणे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता। आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः।। (1-153-86) हिंदी अनुवाद: ईर्ष्या-रहित होकर हमेशा अपने मंत्र (गोपनीय योजना) को सुरक्षित रखने का प्रयत्न करना चाहिए। गुप्तचरों द्वारा संरक्षित होने पर भी अपने आंतरिक भावों (आकार) की रक्षा करनी चाहिए। व्याख्या: योजना की गोपनीयता ही सफलता की कुंजी है। आपकी देहभाषा या चेहरे के हाव-भाव (आकार) से भी आपकी गुप्त योजना लीक नहीं होनी चाहिए।

श्लोक 87

मूल: न रात्रौ मन्त्रयेद्विद्वान्न च कैश्चिदुपासितः। प्रासादाग्रे शिलाग्रे वा विशाले विजनेपि वा।। (1-153-87) हिंदी अनुवाद: विद्वान पुरुष को रात्रि के समय, अथवा बहुत से लोगों से घिरे होने पर, या राजमहल के ऊँचे शिखर पर, चट्टान के अग्रभाग पर, अथवा किसी विशाल और बिल्कुल सुनसान स्थान पर (बिना पुख्ता सुरक्षा के) मंत्रणा नहीं करनी चाहिए। व्याख्या: गोपनीय चर्चाओं के स्थान और समय का चुनाव अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए ताकि शत्रु या जासूसों की नजरों से बचा जा सके।

श्लोक 88

मूल: समन्तात्तत्र पश्यद्भिः सहाप्तैरेव मन्त्रयेत्। नैव संवेशयेत्तत्र मन्त्रवेश्मनि शारिकाम्।। (1-153-88) हिंदी अनुवाद: चारों ओर निगरानी रखने वाले और पूरी तरह अपने विश्वसनीय (आप्त) लोगों के साथ ही मंत्रणा करनी चाहिए। उस मंत्रणा कक्ष में भूलकर भी किसी सारिका (तोता-मैना जैसे नकलची पक्षी) को प्रवेश न करने दें। व्याख्या: मंत्रणा स्थल पर केवल पूर्ण विश्वासपात्र व्यक्ति होने चाहिए। यहाँ तक कि पक्षियों (जैसे तोता-मैना) को भी वहाँ नहीं रखना चाहिए जो इंसानी आवाज की नकल कर सकते हैं और राज खोल सकते हैं।

श्लोक 89

मूल: शुकान्वा शारिका वापि बालमूर्खजडानपि। प्रविष्टानपि निर्वास्य मन्त्रयेद्धार्मिकैर्द्विजैः।। (1-153-89) हिंदी अनुवाद: तोता हो या मैना, अथवा कोई बालक, मूर्ख या जड़ (असमझ) व्यक्ति—यदि वे वहाँ प्रवेश कर भी गए हों, तो उन्हें बाहर निकालकर ही धार्मिक और विद्वान ब्राह्मणों (सलाहकारों) के साथ मंत्रणा करनी चाहिए। व्याख्या: गोपनीयता में जरा सी भी चूक भारी पड़ सकती है, इसलिए अयोग्य या नासमझ जीवों व व्यक्तियों को मंत्रणा कक्ष से पूरी तरह दूर रखना चाहिए।

श्लोक 90

मूल: नीतिज्ञैर्न्यायशास्त्रज्ञैरितिहासे सुनिष्ठितैः। रक्षां मन्त्रस्य निश्छिद्रां मन्त्रान्ते निश्चयेत्स्वयम्।। (1-153-90) हिंदी अनुवाद: नीतिज्ञ, न्यायशास्त्र के ज्ञाता और इतिहास में पूरी तरह निष्णात (निपुण) विद्वानों के साथ चर्चा करके, मंत्र की छिद्रहीन (अभेद्य) सुरक्षा सुनिश्चित करने के पश्चात अंत में राजा स्वयं उसका निश्चय करे। व्याख्या: विशेषज्ञों से सलाह लेने के बाद भी अंतिम निर्णय और उसकी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी शासक की अपनी होती है।

श्लोक 91

मूल: वीरोपवर्णितात्तस्माद्धर्मार्थाभ्यामथात्मना। एकाकेन वाथ विप्रेण ज्ञातबुद्धिर्विनिश्चयेत्।। (1-153-91) हिंदी अनुवाद: वीरों द्वारा वर्णित उस नीति को धर्म और अर्थ के अनुसार भली-भांति समझकर, स्वयं अकेले ही अथवा किसी एक ज्ञानी ब्राह्मण (मंत्री) के साथ विचार करके उसकी बुद्धि का निश्चय करे। व्याख्या: अत्यधिक लोगों से मंत्रणा करने पर भेद खुलने का डर रहता है, इसलिए अति-गोपनीय मामलों में या तो स्वयं निर्णय लें या केवल एक अत्यंत विश्वसनीय व ज्ञानी सलाहकार से परामर्श करें।

श्लोक 92

मूल: तृतीयेन न चान्येन व्रजेन्निश्चयमात्मवान्। षट्कर्णश्छिद्यते मन्त्र इति नीतिषु पठ्यते।। (1-153-92) हिंदी अनुवाद: समझदार व्यक्ति को तीसरे या अन्य किसी व्यक्ति को शामिल करके गुप्त बात का निश्चय नहीं करना चाहिए। नीतिशास्त्रों में यह कहा गया है कि जो बात तीन कानों (यानी तीन लोगों) तक पहुँच जाती है, वह मंत्र सुरक्षित नहीं रहता (फूट जाता है)। व्याख्या: "षट्कर्णो भिद्यते मन्त्रः" कूटनीति का प्रसिद्ध सूत्र है—दो लोगों के बीच की बात गुप्त रहती है, लेकिन जैसे ही वह तीसरे व्यक्ति तक जाती है, वह रहस्य नहीं रहती।

श्लोक 93

मूल: निःसृतो नाशयेन्मन्त्रो हस्तप्राप्तामपि श्रियम्। स्वमतं च परेषां च विचार्य च पुनःपुनः। गुणवद्वाक्यमादद्यान्नैव तृप्येद्विचक्षणः।। (1-153-93) हिंदी अनुवाद: यदि गुप्त मंत्रणा बाहर निकल (लीक हो) जाए, तो वह हाथ में आई हुई लक्ष्मी (राज्य और वैभव) को भी नष्ट कर देती है। इसलिए चतुर मनुष्य को अपने और दूसरों के मतों पर बार-बार विचार करके श्रेष्ठ वचनों (गुणकारी सुझावों) को ग्रहण करना चाहिए और ज्ञान प्राप्ति में कभी संतुष्ट (अहंकारी) नहीं होना चाहिए। व्याख्या: योजना की लीक होने से सर्वनाश हो जाता है। अतः निरंतर विवेक का प्रयोग करते हुए श्रेष्ठ नीतियों को अपनाना चाहिए और सीखने की प्रवृत्ति हमेशा बनाए रखनी चाहिए।

श्लोक 94

मूल: नाच्छित्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम्। नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम्।। (1-153-94) हिंदी अनुवाद: जिस प्रकार एक मछुआरा मछलियों का वध किए बिना बड़ी संपत्ति (मछलियाँ) प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार शत्रुओं के मर्मस्थानों को कुचले बिना और कठोर कर्म किए बिना कोई भी मनुष्य महान ऐश्वर्य को प्राप्त नहीं कर सकता। व्याख्या: सत्ता और बड़ी सफलताओं के मार्ग में कठोर और आक्रामक निर्णय अनिवार्य रूप से लेने पड़ते हैं; कोमलता से हर जगह विजय नहीं मिलती।

श्लोक 95

मूल: कर्शितं व्याधितं क्लिन्नमपानीयमघासकम्। परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेर्बलम्।। (1-153-95) हिंदी अनुवाद: शत्रु की सेना या बल जब दुर्बल हो, रोगग्रस्त हो, थका हुआ हो, जल और अन्न से रहित हो, अथवा जो पूरी तरह निश्चिंत (लापरवाह) और सुस्त हो—ऐसे समय में शत्रु बल पर आक्रमण करना चाहिए। व्याख्या: युद्ध या आक्रमण का सबसे उपयुक्त समय वही होता है जब शत्रु सबसे अधिक कमजोर, असहाय या लापरवाह अवस्था में हो।

श्लोक 96

मूल: नार्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति सङ्गतम्। तस्मात्सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत्।। (1-153-96) हिंदी अनुवाद: कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति अपना काम निकल जाने के बाद उस व्यक्ति के पास दोबारा नहीं आता (यानी स्वार्थ सिद्ध होने के बाद संबंध टूट जाते हैं)। इसलिए अपने सभी साध्य कार्यों को इस प्रकार पूरा करवाओ कि काम पूरा होने पर भी कुछ अंश (अधिकार या नियंत्रण) शेष रहे। व्याख्या: व्यावहारिक राजनीति का यह एक बड़ा सूत्र है कि दूसरों से काम लेते समय उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र न करें, बल्कि अपना नियंत्रण या आवश्यकता का भाव थोड़ा बनाए रखें ताकि वे दोबारा जरूरत पड़ने पर आपके अधीन रहें।

श्लोक 97

मूल: संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योऽनसूयता। उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता।। (1-153-97) हिंदी अनुवाद: ईर्ष्या-रहित होकर (दूसरों की प्रगति से बिना जले) अपने दल का संग्रह (संगठन) करने में तथा आवश्यकता पड़ने पर युद्ध (विग्रह) करने में पूरा प्रयत्न करना चाहिए। अपनी उन्नति (भूति) चाहने वाले को हमेशा उच्च उत्साह बनाए रखना चाहिए। व्याख्या: संगठन को मजबूत करने और समय आने पर संघर्ष करने के लिए कभी भी हीनभावना या सुस्ती नहीं रखनी चाहिए; उच्च मनोबल और उत्साह ही सफलता की कुंजी है।

श्लोक 98

मूल: नास्य कृत्यानि बुध्येरन्मित्राणि रिपवस्तथा। आरब्धान्येव पश्येरन्सुपर्यवसितान्यपि।। (1-153-98) हिंदी अनुवाद: आपके गुप्त कार्य या योजनाएँ ऐसी होनी चाहिए कि जिन्हें न तो आपके मित्र जान सकें और न ही शत्रु। उन्हें आपकी योजनाएँ तभी पता चलें जब वे आरंभ हो चुकी हों या सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी हों। व्याख्या: कार्य की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि प्लानिंग गुप्त रखी जाए और दुनिया को सीधे परिणाम (रिजल्ट) देखने को मिलें।

श्लोक 99

मूल: भीतवत्संविधातव्यं यावद्भयमनागतम्। आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत्।। (1-153-99) हिंदी अनुवाद: जब तक संकट या भय दूर हो (आया न हो), तब तक डरपोक की तरह (अत्यंत सावधानी और सुरक्षा के साथ) प्रबंध करना चाहिए; किंतु जब भय सामने आ जाए, तब निडर होकर (शूरवीर की तरह) शत्रु पर प्रहार करना चाहिए। व्याख्या: संकट आने से पहले अत्यधिक सावधानी और एहतियात बरतनी चाहिए, किंतु जब युद्ध या संकट प्रत्यक्ष सामने आ जाए, तब घबराने के बजाय पूरी निर्भयता से मुकाबला करना चाहिए।

श्लोक 100

मूल: दैवेनोपहतं शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः। स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा।। (1-153-100) हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य दैववशात् (भाग्य से या परिस्थितियों के कारण) पहले से ही नष्ट या पराजित हो चुके शत्रु पर दया करके उसकी सहायता करता है, वह ऐसे मृत्यु को गले लगाता है जैसे अश्वतरी (खच्चर) गर्भ धारण करके अपनी मृत्यु को आमंत्रित करती है। व्याख्या: यहाँ खच्चर की उत्पत्ति से जुड़ी पौराणिक/प्राकृतिक मान्यता का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि हारे हुए या खतरनाक शत्रु को पुनर्जीवित होने का अवसर देना अपने ही विनाश को बुलावा देना है।

श्लोक 101

मूल: अनागतं हि बुध्येत यच्च कार्यं पुरः स्थितम्। न तु बुद्धिक्षयात्किंचिदतिक्रामेत्प्रयोजनम्।। (1-153-101) हिंदी अनुवाद: भविष्य में आने वाले और सामने उपस्थित होने वाले सभी कार्यों को पहले से ही समझ लेना चाहिए। बुद्धिमत्ता की कमी के कारण कभी भी अपने किसी भी प्रयोजन (लक्ष्य) को हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। व्याख्या: दूरदर्शिता ही एक सफल शासक की पहचान है। हर परिस्थिति का पूर्व-आकलन करके ही अपने रणनीतिक कदम उठाने चाहिए।

श्लोक 102

मूल: उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता। विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः। नैःश्रेयसौ तु तौ ज्ञेयौ देशकालाविति स्थितिः।। (1-153-102) हिंदी अनुवाद: अपनी उन्नति चाहने वाले को यत्नपूर्वक उत्साह बनाए रखना चाहिए। देश (स्थान), काल (समय), दैव (परिस्थिति) तथा धर्म आदि तीनों का विभाग करके समझना चाहिए। इनमें 'देश' और 'काल' को ही परम कल्याणकारी (निश्चायक) माना गया है, यही राजनीति की स्थिति है। व्याख्या: किसी भी नीति की सफलता पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस स्थान (देश) और किस समय (काल) पर लागू किया जा रहा है। सही देश-काल का ज्ञान ही विजय दिलाता है।

श्लोक 103

मूल: तालवत्कुरुते मूलं बालः शत्रुरुपेक्षितः। गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः क्षिप्रं संजायते महान्।। (1-153-103) हिंदी अनुवाद: उपेक्षित किया गया छोटा शत्रु ताड़ के वृक्ष की तरह अपनी जड़ें बहुत गहरी कर लेता है, और जंगल में छोड़ी गई आग की तरह बहुत कम समय में विकराल रूप धारण कर लेता है। व्याख्या: छोटी से छोटी समस्या या विरोधी को कभी भी अनसुना या नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय पाकर वह अत्यंत खतरनाक रूप ले सकता है।

श्लोक 104

मूल: अग्निस्तोकमिवात्मानं सन्धुक्षयति यो नरः। स वर्धमानो ग्रसते महान्तमपि संचयम्।। (1-153-104) हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य थोड़ी सी अग्नि (शत्रु या संकट) को अपने भीतर सुलगने देता है (बढ़ने का मौका देता है), वह बढ़ता हुआ शत्रु एक दिन उसके महान संचय और साम्राज्य को भी पूरी तरह ग्रास लेता है (नष्ट कर देता है)। व्याख्या: छोटी चिंगारी या मामूली खतरे को शुरुआत में ही समाप्त न करने पर वह धीरे-धीरे पूरे जीवन और संपत्ति को राख कर देता है।

श्लोक 105

मूल: आदावेव ददानीति प्रियं ब्रूयान्निरर्थकम्।। (1-153-105) हिंदी अनुवाद: (शत्रु या याचक से) पहले ही "मैं तुम्हें देता हूँ" ऐसा कहकर निरर्थक ही प्रिय वचन बोलता रहे (यानी उसे झूठी उम्मीद या दिलासा देकर शांत रखे)। व्याख्या: शत्रु को तत्काल आक्रामक होने से रोकने के लिए मीठी बातों और देने का आश्वासन देकर उसे उलझाए रखने की कूटनीति यहाँ बताई गई है।

श्लोक 106

मूल: आशां कालवतीं कुर्यात्कालं विघ्नेन योजयेत्। विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं वाऽपि हेतुतः।। (1-153-106) हिंदी अनुवाद: (किसी काम को टालने के लिए) उसकी प्राप्ति की आशा को लंबे समय (काल) के साथ जोड़ दे, उस काल को किसी न किसी विघ्न (बाधा) से जोड़ दे, उस विघ्न का कोई तात्कालिक निमित्त (कारण) बता दे, और उस निमित्त का कोई उचित हेतु प्रस्तुत कर दे। व्याख्या: राजनीति और कूटनीति में किसी काम को टालने या शत्रु को लटकाए रखने के लिए तर्कों, बाधाओं और कारणों की ऐसी श्रृंखला बनाई जाती है कि विरोधी उलझकर रह जाए।

श्लोक 107

मूल: क्षुरो भूत्वा हरेत्प्राणान्निशितः कालसाधनः। प्रतिच्छन्नो लोमहारी द्विषतां परिकर्तनः।। (1-153-107) हिंदी अनुवाद: (राजा या नीतिज्ञ को चाहिए कि वह) पैनी धार वाले उस्तरे (क्षुर) की तरह बनकर शत्रुओं के प्राणों का हरण करे। वह काल के समान साधन बने, छिपा हुआ (प्रतिच्छन्न) रहे, रोंगटे खड़े कर देने वाला हो और शत्रुओं का पूरी तरह संहार करने वाला हो। व्याख्या: यह कणिक की नीति का अत्यंत उग्र और अंतिम संदेश है—शत्रु के लिए अदृश्य रहते हुए अत्यंत घातक और निर्णायक प्रहार करना।

श्लोक 108

मूल: पाण्डवेषु यथान्यायमन्येषु च कुरूद्वह। वर्तमानो न मज्जेस्त्वं तथा कृत्यं समाचर।। (1-153-108) हिंदी अनुवाद: हे कुरूद्वह (धृतराष्ट्र)! पांडवों के साथ और अन्य लोगों के साथ न्यायपूर्वक आचरण करते हुए तुम ऐसे बनो कि तुम्हारा पतन (मज्जन) न हो, और तदनुसार ही अपने कृत्यों को संपादित करो। व्याख्या: कणिक धृतराष्ट्र को परोक्ष रूप से सलाह देते हैं कि वे राजनीति के इन कठोर नियमों को ध्यान में रखते हुए पांडवों और अन्य के साथ ऐसा व्यवहार करें जिससे उनका अपना राज्य सुरक्षित रहे।

श्लोक 109

मूल: सर्वकल्याणसंपन्नो विशिष्ट इति निश्चयः। तस्मात्त्वं पाण्डुपुत्रेभ्यो रक्षात्मानं नराधिप।। (1-153-109) हिंदी अनुवाद: (पांडव) सभी प्रकार के कल्याण और गुणों से संपन्न हैं तथा वे हर प्रकार से विशिष्ट हैं—ऐसा निश्चित है। इसलिए हे नराधिप (धृतराष्ट्र)! तुम पांडुपुत्रों से अपनी (और अपने पुत्रों की) रक्षा करो। व्याख्या: कणिक अंत में धृतराष्ट्र को चेताते हैं कि पांडवों की बढ़ती शक्ति और योग्यता उनके लिए चुनौती है, इसलिए उन्हें पूरी तरह सतर्क रहकर अपनी सुरक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 110

मूल: भ्रातृव्या बलवन्तस्ते पाण्डुपुत्रा नराधिप। पश्चात्तापो यथा न स्याaddTaska नीतिर्विधीयताम्।। (1-110) (1-153-110) हिंदी अनुवाद: हे नराधिप! तुम्हारे ये चचेरे भाई (भ्रातृव्य) पांडुपुत्र अत्यंत बलवान हैं। भविष्य में तुम्हें कोई पश्चात्ताप न हो, इसके लिए अभी से उचित नीति का निर्धारण करो। व्याख्या: यह इस पूरे अध्याय का केंद्रीय राजनीतिक संदेश है, जिसे सुनकर धृतराष्ट्र के मन में पांडवों के प्रति संदेह और भय की भावना गहरी होती चली जाती है, जो आगे चलकर महाभारत के युद्ध की नींव बनती है।

श्लोक 111

मूल: वैशंपायन उवाच—एवमुक्त्वा संप्रतस्थे कणिकः स्वगृहं ततः। धृतराष्ट्रोऽपि कौरव्यः शोकार्तः समपद्यत।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।। (1-153-111) हिंदी अनुवाद: वैशम्पायन जी ने कहा—ऐसा कहकर कणिक वहाँ से अपने घर चले गए और कौरव राज धृतराष्ट्र भी गहरी चिंता तथा शोक से आकुल हो गए। इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत संभवपर्व में १५३वाँ अध्याय समाप्त हुआ। व्याख्या: कणिक अपनी कुटिल नीतियाँ धृतराष्ट्र को समझाकर विदा हो जाते हैं, किंतु उनके इन उपदेशों का प्रभाव धृतराष्ट्र के चित्त पर ऐसा पड़ता है कि वे आंतरिक शंका और मोह के सागर में डूब जाते हैं।

 ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि

संभवपर्वणि त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।। 153 ।।

।। समाप्तं च संभवपर्व ।।

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