इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि चतुःपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

 महाभारत के आदिपर्व (जतुगृहपर्व) के १५४वें अध्याय के श्लोकों (श्लोक 1 से 40) का क्रमवार संस्कृत श्लोक, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 1

मूल: कणिकस्य मतं श्रुत्वा कार्त्स्न्येन भरतर्षभ। दुर्योधनश्च कर्णश्च शकुनिश्चापि सौबलः। दुशासनचतुर्थास्ते मन्त्रयामासुरेकदा।। (1-154-1) हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ (जनमेजय)! कणिक के उस कुटिल मत को पूरी तरह से सुनने के बाद, एक बार दुर्योधन, कर्ण, सौबल शकुनी और चौथा दुशासन—इन चारों ने मिलकर एक गुप्त मंत्रणा की। व्याख्या: कणिक के क्रूर और यथार्थवादी राजनीतिक उपदेशों का सीधा प्रभाव दुर्योधन और उसके सहयोगियों पर पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने पांडवों के विनाश के लिए षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया। 

श्लोक 2

मूल: ते कौरव्यमनुज्ञाप्य धृतराष्ट्रं नराधिपम्। दहने तु सपुत्रायाः कुन्त्या बुद्धिमकारयन्।। (1-154-2) हिंदी अनुवाद: उन सबने कौरवराज धृतराष्ट्र से अनुमति लेकर माता कुंती सहित सभी पांडवों को लाक्षागृह (जतुगृह) में जलाकर मार डालने की योजना (बुद्धि) बनाई। व्याख्या: धृतराष्ट्र की परोक्ष सहमति और मोह का लाभ उठाकर इन चारों ने पांडवों को रास्ते से हटाने के लिए जतुगृह (लाक्षागृह) के षड्यंत्र का ताना-बाना बुना।

श्लोक 3

मूल: तेषामिङ्गितभावज्ञो विदुरस्तत्त्वदर्शिवान्। आकारण च तं मन्त्रं बुबुधे दुष्टचेतसाम्।। (1-154-3) हिंदी अनुवाद: उन दुष्ट चित्त वाले पुरुषों के हाव-भाव और संकेतों (इङ्गितान) को जानने वाले तथा तत्वदर्शी विदुर जी ने उनके उस गुप्त षड्यंत्र को उनके आकारों (चेहरे व आचरण) से भांप लिया। व्याख्या: विदुर जी अत्यधिक बुद्धिमान और दूरदर्शी थे; दुर्योधन आदि भले ही अपनी योजना को गुप्त रखना चाहते थे, किंतु उनके बदले हुए व्यवहार से विदुर जी समझ गए कि कुछ भयानक षड्यंत्र चल रहा है।

श्लोक 4

मूल: ततो विदितवेद्यात्मा पाण्डवानां हिते रतः। पलायने मतिं चक्रे कुन्त्याः पुत्रैः सहानघः।। (1-154-4) हिंदी अनुवाद: तब सब कुछ जान लेने वाले तथा पांडवों के हित में सदा तत्पर रहने वाले निष्पाप विदुर जी ने कुंती के पुत्रों (पांडवों) को वहाँ से सुरक्षित भगाने (पलायन) का विचार पक्का किया। व्याख्या: विदुर जी ने यह जान लिया कि कुरुक्षेत्र के इन दुष्टों के बीच पांडवों का रहना अब सुरक्षित नहीं है, इसलिए उन्होंने उनकी जान बचाने की कूटनीति रची।

श्लोक 5

मूल: ततो वातसहां नावं यन्त्रयुक्तां पताकिनीम्। ऊर्मिक्षमां दृढां कृत्वा कुन्तीमिदमुवाच ह।। (1-154-5) हिंदी अनुवाद: तब उन्होंने हवा के झोंके को सहने वाली, यंत्रों से युक्त, पताकाओं से सुसज्जित, लहरों के वेग को सहन करने में समर्थ और अत्यंत दृढ़ एक नाव तैयार करवाई और कुंती से यह वचन कहा— व्याख्या: विदुर जी ने पूरी पूर्व-तैयारी के साथ गंगा नदी पार करने के लिए एक विशेष और सुरक्षित नौका की व्यवस्था की, जिससे पांडव रात के समय गुप्त रूप से भाग सकें।

श्लोक 6

मूल: एष जातः कुलस्यास्य कीर्तिवंशप्रणाशनः। धृतराष्ट्रः परीतात्मा धर्मं त्यजति शाश्वतम्।। (1-154-6) हिंदी अनुवाद: यह धृतराष्ट्र मोह से घिरा हुआ (परीतात्मा) ऐसा व्यक्ति बन गया है जो इस कुल की कीर्ति और वंश का नाश करने वाला है तथा सनातन धर्म का त्याग कर रहा है। व्याख्या: विदुर जी कुंती को स्पष्ट बताते हैं कि धृतराष्ट्र अपने पुत्रमोह के कारण कुलधर्म और न्याय को भूल चुका है, इसलिए अब यहाँ रुकना आत्मघात होगा।

श्लोक 7

मूल: इयं वारिपथे युक्ता तरङ्गपवनक्षमा। नौर्यया मृत्युपाशात्त्वं सपुत्रा मोक्ष्यसे शुभे।। (1-154-7) हिंदी अनुवाद: हे भद्रे (कुंती)! यह नाव जलमार्ग के लिए उपयुक्त है और तरंगों तथा वायु के वेग को सहने में सक्षम है। इसके द्वारा तुम अपने पुत्रों सहित इस मृत्युपाश (लाक्षागृह के षड्यंत्र) से मुक्त हो जाओगी। व्याख्या: विदुर जी ने कुंती को आश्वस्त किया कि इस नाव के माध्यम से वे सभी घातकों के चंगुल से बचकर सुरक्षित स्थान पर पहुँच सकते हैं।

श्लोक 8

मूल: तच्छ्रुत्वा व्यथिता कुन्ती पुत्रैः सह यशस्विनी। नावमारुह्य गङ्गायां प्रययौ भरतर्षभ।। (1-154-8) हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ! उस बात को सुनकर यशस्विनी कुंती अपने पुत्रों के साथ अत्यंत व्यथित हुई, और फिर उस नाव पर सवार होकर गंगा नदी के मार्ग से आगे प्रस्थान कर गईं। व्याख्या: संकट की इस घड़ी में कुंती ने विदुर जी के निर्देशों का पालन किया और अपने पुत्रों (पांडवों) के साथ लाक्षागृह के भयानक षड्यंत्र से पहले ही गुप्त रूप से नदी मार्ग से प्रस्थान कर दिया।

श्लोक 9

मूल: ततो विदुरवाक्येन नावं विक्षिप्य पाण्डवाः। धनं चादाय तैर्दत्तमरिष्टं प्राविशन्वनम्।। (1-154-9) हिंदी अनुवाद: तब विदुर जी के वचनों के अनुसार पांडवों ने नाव को आगे बढ़ाया, उनके द्वारा दिया गया धन लेकर और किसी भी प्रकार के अरिष्ट (संकट) से बचते हुए वे वन में प्रवेश कर गए। व्याख्या: पांडवों ने विदुर जी की सहायता से न केवल अपनी जान बचाई, बल्कि संकट काल के लिए आवश्यक संसाधन व धन लेकर सुरक्षित रूप से घने जंगलों में शरण ली।

श्लोक 10

मूल: निषादी पञ्चपुत्रा तु जातेषु तत्र वेश्मनि। कारणाभ्यागता दग्धा सह पुत्रैरनागसा।। (1-154-10) हिंदी अनुवाद: उस लाक्षागृह के भवन में किसी कारणवश आई हुई एक निषाद की स्त्री (भीलनी) अपने पाँच पुत्रों सहित वहाँ सो रही थी, और वे सभी निर्दोष (अनागस) लोग उस आग में जलकर मर गए। व्याख्या: कथा के अनुसार, दुर्योधन के आदमियों द्वारा जब लाक्षागृह में आग लगाई गई, तब पांडव तो पहले ही निकल चुके थे, किंतु वहाँ अनजाने में ठहरी हुई एक निषाद स्त्री और उसके पाँच पुत्र जलकर भस्म हो गए, जिससे दुनिया को पांडवों के मरने का भ्रम हुआ।

श्लोक 11

मूल: स च म्लेच्छाधमः पापो दग्धस्तत्र पुरोचनः। वञ्चिताश्च दुरात्मानो धार्तराष्ट्राः सहानुगाः।। (1-154-11) हिंदी अनुवाद: और वह नीच तथा पापी म्लेच्छ पुरोचन (जो लाक्षागृह का रचनाकार और षड्यंत्रकारी था) भी उसी आग में जलकर मर गया। इस प्रकार अपने सहयोगियों सहित वे दुरात्मा धार्तराष्ट्र (दुर्योधन आदि) पूरी तरह ठगे गए (वंचित रह गए)। व्याख्या: नियति का ऐसा चक्र चला कि जो पुरोचन पांडवों को जलाने के लिए षड्यंत्र कर रहा था, वह स्वयं उसी आग की चपेट में आकर मारा गया, और दुर्योधन का षड्यंत्र अंततः असफल हो गया।

श्लोक 12

मूल: अविज्ञाता महात्मनो जनानामक्षतास्तथा। जनन्या सह कौन्तेया मुक्ता विदुरमन्त्रिताः।। (1-154-12) हिंदी अनुवाद: विदुर जी की मंत्रणा (योजना) के कारण महात्मा कौन्तेय (पांडव) अपनी माता के साथ जनता की नजरों से अनजान (अविज्ञात) और पूरी तरह सुरक्षित (अक्षत) बच निकले। व्याख्या: विदुर जी की बुद्धि और समय पर दी गई चेतावनी के कारण पांडव बिना किसी क्षति के गुप्त रूप से बच निकलने में सफल रहे।

श्लोक 13

मूल: ततस्तस्मिन्पुरे लोका नगरे वारणावते। दृष्ट्वा जतुगृहं दग्धमन्वशोचन्त दुःखिताः।। (1-154-13) हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात वारणावत नगर के लोगों ने उस जतुगृह (लाक्षागृह) को पूरी तरह जला हुआ देखकर अत्यंत दुखी होकर शोक व्यक्त किया। व्याख्या: वारणावत की आम जनता इस बात से अनजान थी कि पांडव बच चुके हैं; उन्हें यही लगा कि कुंती और पांडव जलकर मर गए हैं, जिससे पूरे नगर में शोक छा गया।

श्लोक 14

मूल: प्रेषयामासू राजानं यथावृत्तं निवेदितुम्। संवृस्ते महान्कामः पाण्डवान्दग्धवानसि।। (1-154-14) हिंदी अनुवाद: उन्होंने राजा (धृतराष्ट्र) के पास यह समाचार भेजने के लिए दूत भेजे और कहा—आपकी बड़ी मनोकामना पूरी हुई है (क्योंकि) आपने पांडवों को जलवा दिया है। व्याख्या: वारणावत के लोगों ने हस्तिनापुर संदेश भेजा कि लाक्षागृह जल चुका है और पांडव उसमें मारे जा चुके हैं।

श्लोक 15

मूल: सकामो भव कौरव्य भुङ्क्ष्व राज्यं सपुत्रकः। तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रस्तु सहपुत्रेण शोचयन्।। (1-154-15) हिंदी अनुवाद: हे कौरव्य! अब आप अपनी इच्छाओं को पूर्ण मानकर अपने पुत्रों सहित इस राज्य का उपभोग कीजिए। उस बात को सुनकर धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र (दुर्योधन) के साथ (ऊपर से) शोक का नाटक किया— व्याख्या: धृतराष्ट्र यद्यपि अंदर से पुत्रमोह में इस परिणाम से संतुष्ट थे, किंतु दुनिया को दिखाने के लिए उन्होंने शोक व्यक्त करने का ढोंग किया।

श्लोक 16

मूल: प्रेतकार्याणि च तथा चकार सह बान्धवैः। पाण्डवानां तथा क्षत्ता भीष्मश्च कुरुसत्तमः।। (1-154-16) हिंदी अनुवाद: और फिर अपने बंधु-बांधवों के साथ मिलकर पांडवों के प्रेतकार्य (श्राद्ध व अंतिम संस्कार संबंधी अनुष्ठान) संपन्न किए। विदुर (क्षत्ता) तथा कुरुश्रेष्ठ भीष्म जी ने भी— व्याख्या: चूंकि सभी को पांडवों के जलकर मरने का भ्रम हो चुका था, इसलिए राजकुल के नियमानुसार भीष्म, विदुर और धृतराष्ट्र ने उनके शोक में पारंपरिक प्रेतक्रियाएं पूरी कीं।

श्लोक 17

मूल: जनमेजय उवाच—पुनर्विस्तरशः श्रोतुमिच्छामि द्विजसत्तम। दाहं जतुगृहस्यैव पाण्डवानां च मोक्षणम्।। (1-154-17) हिंदी अनुवाद: जनमेजय ने कहा—हे द्विजसत्तम (वैशम्पायन जी)! मैं जतुगृह के जलने की घटना और पांडवों के (वहाँ से) मोक्ष (बचाव) की पूरी कथा विस्तार से दोबारा सुनना चाहता हूँ। व्याख्या: राजा जनमेजय की जिज्ञासा इस ऐतिहासिक और रोमांचक प्रसंग को और अधिक बारीकी से जानने की है, जिसके उत्तर में वैशम्पायन जी आगे का विवरण देते हैं।

श्लोक 18

मूल: सुनृशंसमिदं कर्म तेषां क्रूरोपसंहितम्। कीर्तयस्व यथावृत्तं परं कौतूहलं मम।। (1-154-18) हिंदी अनुवाद: उनका यह कर्म अत्यंत निशंस (क्रूर) और क्रूरता से भरा हुआ था। जैसी घटना घटी थी, उसे विस्तार से कहिए, इसे सुनने के लिए मेरे मन में अत्यधिक कौतूहल है। व्याख्या: जनमेजय कौरवों के इस जघन्य षड्यंत्र और पांडवों के miraculously बच निकलने के घटनाक्रम को विस्तार से जानने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

श्लोक 19

मूल: वैशंपायन उवाच—शृणु विस्तरशो राजन्वदतो मे परन्तप। दाहं जतुगृहस्यैतत्पाण्डवानां च मोक्षणम्।। (1-154-19) हिंदी अनुवाद: वैशम्पायन जी ने कहा—हे परन्तप राजा! जतुगृह के जलने और पांडवों के मोक्ष की इस कथा को मैं जैसा कह रहा हूँ, उसे विस्तार से सुनो। व्याख्या: वैशम्पायन जी राजा जनमेजय के अनुरोध पर लाक्षागृह कांड की पूरी पृष्ठभूमि और उसके रहस्यों का विस्तार से वर्णन आरंभ करते हैं।

श्लोक 20

मूल: ततो दुर्योधनो राजा धृतराष्ट्रमभाषत। पाण्डवेभ्यो भयं नः स्यात्तान्विवासयतां भवान्। निपुणेनाभ्युपायेन नगरं वारणावतम्।। (1-154-20) हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात राजा दुर्योधन ने धृतराष्ट्र से कहा—पांडवों से हमें हमेशा भय बना रहेगा, इसलिए आप किसी निपुण (चतुर) उपाय से उन्हें वारणावत नगर में वसाने के लिए भेज दीजिए (प्रवासित कर दीजिए)। व्याख्या: यह उस पुरानी घटना का फ्लैशबैक या विस्तार है जहाँ दुर्योधन ने पहली बार धृतराष्ट्र के सामने पांडवों को वारणावत भेजने का प्रस्ताव रखा था ताकि उन्हें रास्ते से हटाया जा सके।

श्लोक 21

मूल: धृतराष्ट्रस्तु पुत्रेण श्रुत्वा वचनमीरितम्। मुहूर्तमिव संचिन्त्य दुर्योधनमथाब्रवीत्।। (1-154-21) हिंदी अनुवाद: पुत्र दुर्योधन के द्वारा कहे गए उस वचन को सुनकर धृतराष्ट्र ने एक मुहूर्त तक विचार किया और तब दुर्योधन से यह बात कही— व्याख्या: धृतराष्ट्र अच्छी तरह जानते थे कि पांडव धर्मनिष्ठ और लोकप्रिय हैं, इसलिए उन्हें अचानक हटाना आसान नहीं था। वे दुर्योधन की बात पर गहराई से सोचते हैं।

श्लोक 22

मूल: धर्मनित्यः सदा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः। सर्वेषु ज्ञातिषु तथा मयि t्वासीद्विशेषतः।। (1-154-22) हिंदी अनुवाद: (धृतराष्ट्र ने कहा)—पांडु हमेशा धर्मनिष्ठ और धर्मपरायण थे। वे सभी सगे-सम्बन्धियों (ज्ञातिषु) में और विशेष रूप से मुझमें बहुत अधिक प्रेम व आदर रखते थे। व्याख्या: धृतराष्ट्र अपने भाई पांडु के गुणों और उनके प्रति पांडु के प्रेम को याद करते हुए दुर्योधन को उनके अतीत के अच्छे आचरण का स्मरण कराते हैं।

श्लोक 23

मूल: नासौ किंचिद्विजानाति भोजनादिचिकीर्षितम्। निवेदयति नित्यं हि मम राज्यं धृतव्रतः।। (1-154-23) हिंदी अनुवाद: वे (युधिष्ठिर या पांडव पक्ष) कभी भी भोजन आदि के छद्म या छल को नहीं जानते; वे व्रत के धनी हैं और हमेशा मेरे प्रति निष्ठावान रहकर मेरे ही राज्य की बात करते हैं। व्याख्या: धृतराष्ट्र स्वीकार करते हैं कि पांडव सरल स्वभाव के और धर्म का पालन करने वाले हैं, वे कभी हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति कुटिलता नहीं रखते।

श्लोक 24

मूल: तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपरायणः। गुणवान्लोकविख्यातः पौरवाणां सुसंमतः।। (1-154-24) हिंदी अनुवाद: उनके पुत्र (युधिष्ठिर) भी पांडु की ही तरह धर्मपरायण, गुणी, संसार में विख्यात और कुरुवंशियों (पौरवों) को अत्यंत प्रिय हैं। व्याख्या: युधिष्ठिर की लोकप्रियता और सद्गुणों का हवाला देते हुए धृतराष्ट्र समझाते हैं कि ऐसे प्रिय राजकुमार के विरुद्ध अचानक कदम उठाना कठिन है।

श्लोक 25

मूल: स कथं शक्यतेऽस्माभिरपाकर्तुं बलादितः। पितृपैतामाहाद्राज्यात्ससहायो विशेषतः।। (1-154-25) हिंदी अनुवाद: ऐसे में, विशेषकर अपने सहायकों के साथ रहने वाले उन्हें, हम पिता-परदादा के इस राज्य से बलपूर्वक कैसे बाहर निकाल सकते हैं? व्याख्या: धृतराष्ट्र के मन में यह व्यावहारिक चिंता थी कि पांडवों और उनके समर्थकों की ताकत को नजरअंदाज करके उन्हें सीधे तौर पर बेदखल करना आसान नहीं होगा।

श्लोक 26

मूल: भृता हि पाण्डुनाऽमात्या बलं च सततं भृतम्। भृताः पुत्राश्च पौत्राश्च तेषामपि विशेषतः।। (1-154-26) हिंदी अनुवाद: पांडु ने मंत्रियों का भरण-पोषण किया था, उनकी सेना हमेशा संचित और संतुष्ट रही है, तथा उनके पुत्रों और पौत्रों ने भी विशेष रूप से प्रजा व सेवकों का भरण-पोषण किया है। व्याख्या: पांडवों का प्रशासनिक और सैन्य समर्थन बहुत मजबूत था, क्योंकि वे और उनके पिता हमेशा राज्य के लोगों का खयाल रखते थे।

श्लोक 27

मूल: ते पुरा सत्कृतास्तात पाण्डुना नागरा जनाः। कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सबान्धवान्।। (1-154-27) हिंदी अनुवाद: हे तात! नगर के जो लोग पहले पांडु द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं, वे युधिष्ठिर के हित के लिए क्या हम सबको और हमारे बंधु-बांधवों को मार नहीं डालेंगे? व्याख्या: धृतराष्ट्र दुर्योधन को चेताते हैं कि हस्तिनापुर की जनता और अधिकारी पांडवों से अत्यधिक प्रेम करते हैं, यदि उनके साथ अन्याय किया गया तो जनता विद्रोह कर सकती है।

श्लोक 28

मूल: दुर्योधन उवाच—एवमेतन्मया तात भावितं दोषमात्मनि। दृष्ट्वा प्रकृतयः सर्वा अर्थमानेन पूजिताः।। (1-154-28) हिंदी अनुवाद: दुर्योधन ने कहा—हे तात! जो दोष (भय) आपने अपने मन में सोचा है, वह सब मैंने भी विचार लिया है। मैंने धन और सम्मान से राज्य की सभी प्रकृतियों (जनता व अधिकारियों) को पहले ही संतुष्ट और पूजित कर लिया है। व्याख्या: दुर्योधन अपनी कुटिल राजनीति का परिचय देते हुए कहता है कि उसने कूटनीति के सहारे राज्य के प्रमुख लोगों और अधिकारियों को पहले ही अपने पक्ष में मिला लिया है, इसलिए जनता के विद्रोह का अब कोई खतरा नहीं है।

श्लोक 29

मूल: ध्रुवमस्मत्सहायास्ते भविष्यन्ति प्रधानतः। अर्थवर्गः सहामात्यो मत्संस्थोऽद्य महीपते।। (1-154-29) हिंदी.," अनुवाद: वे मुख्य रूप से निश्चित रूप से हमारे ही सहायक बनेंगे। हे महीपते! राज्य का अर्थतंत्र (खजाना) और मंत्रिपरिषद आज पूरी तरह से मेरे नियंत्रण (संस्थ) में है। व्याख्या: दुर्योधन ने अपने धन के प्रभाव और प्रशासनिक पकड़ के बल पर धृतराष्ट्र के मन का यह संदेह दूर करना चाहा कि जनता पांडवों का साथ देगी।

श्लोक 30

मूल: स भवान्पाण्डवानाशु विवासयितुमर्हति। मृदुनैवाभ्युपायेन नगरं वारणावतम्।। (1-154-30) हिंदी अनुवाद: इसलिए आप ही पांडवों को किसी कोमल (छलपूर्ण किंतु शांत) उपाय से शीघ्र ही वारणावत नगर के लिए प्रवासित (विवासित) कर दीजिए। व्याख्या: दुर्योधन धृतराष्ट्र से आग्रह करता है कि सीधे बल प्रयोग के बजाय एक आदरपूर्ण दिखावा करके पांडवों को वारणावत भेज दिया जाए ताकि आगे का षड्यंत्र आसानी से रचा जा सके।

श्लोक 31

मूल: यदा प्रतिष्ठितं राज्यं मयि राजन्भविष्यति। तदा कुन्ती सहापत्या पुनरेष्यति भारत।। (1-154-31) हिंदी अनुवाद: हे राजन्! जब यह राज्य पूरी तरह मुझमें प्रतिष्ठित (सुरक्षित) हो जाएगा, तब माता कुंती अपने बच्चों के साथ वापस लौट आएगी। व्याख्या: दुर्योधन धृतराष्ट्र को झूठा आश्वासन देता है कि यह केवल एक अस्थायी प्रवास है, बाद में सब ठीक हो जाएगा, जिसका उद्देश्य केवल धृतराष्ट्र के नैतिक संकोच को तोड़ना था।

श्लोक 32

मूल: धृतराष्ट्र उवाच—दुर्योधन ममाप्येतद्धृदि संपरिवर्तते। अभिप्रायस्य पापत्वान्नैवं तु विवृणोम्यहम्।। (1-154-32) हिंदी अनुवाद: धृतराष्ट्र ने कहा—हे दुर्योधन! यही बात मेरे हृदय में भी घूम रही है, किंतु मेरा अभिप्राय पापी (छलपूर्ण) होने के कारण मैं इसे खुलकर प्रकट नहीं कर पा रहा हूँ। व्याख्या: धृतराष्ट्र की दुविधा यहाँ पूरी तरह उजागर होती है—वे पुत्रमोह में दुर्योधन के पाप से सहमत तो हैं, किंतु अपने नैतिक पतन के डर से उसे खुलकर स्वीकारने में झिझकते हैं।

श्लोक 33

मूल: न च भीष्मो न च द्रोणो न च क्षत्ता न गौतमः। विवास्यमानान्कौन्तेयाननुमंस्यन्ति कर्हिचित्।। (1-154-33) हिंदी अनुवाद: न तो भीष्म जी, न द्रोणाचार्य, न विदुर (क्षत्ता) और न ही कृपादृष्टि वाले गौतम (कृपाचार्य)—इनमें से कोई भी कौन्तेय पांडवों को वारणावत भेजे जाने की कभी भी अनुमति नहीं देगा। व्याख्या: धृतराष्ट्र जानते थे कि राज्य के बुजुर्ग और नीतिवान मार्गदर्शक (भीष्म, द्रोण, विदुर, कृप) कभी भी पांडवों के साथ इस प्रकार के अन्याय या निर्वासन का समर्थन नहीं करेंगे।

श्लोक 34

मूल: समा हि कौरवेयाणां वयं ते चैव पुत्रक। नैते विषममिच्छेयुर्धर्मयुक्ता मनस्विनः।। (1-154-34) हिंदी अनुवाद: हे पुत्र! कुरुवंश के हम लोग और वे (पांडव) सब समान हैं। ये धर्मयुक्त और मनस्वी लोग कभी भी किसी का अहित (विषम) नहीं चाहेंगे। व्याख्या: धृतराष्ट्र स्वीकार करते हैं कि पांडव और उनके पुत्र कौरव पक्ष के ही अंग हैं और वे सब धर्म के मार्ग पर चलने वाले हैं, इसलिए उनके विरुद्ध षड्यंत्र करना कठिन है।

श्लोक 35

मूल: ते वयं कौरवेयाणामेतेषां च महात्मनाम्। कथं न वध्यतां तात गच्छाम जगतस्तथा।। (1-154-35) हिंदी अनुवाद: ऐसी स्थिति में, हम इन कौरवों और उन महात्मा पांडवों के वध (अन्याय) के मार्ग पर कैसे जा सकते हैं और संसार में अपनी क्या गति करेंगे? व्याख्या: धृतराष्ट्र के भीतर का राजा और नैतिक विवेक थोड़ी देर के लिए जागता है और वह सोचता है कि यदि ऐसा अन्याय हुआ तो समाज और इतिहास में उनकी क्या प्रतिष्ठा रह जाएगी।

श्लोक 36

मूल: दुर्योधन उवाच—मध्यस्थः सततं भीष्मो द्रोणपुत्रो मयि स्थितः। यतः पुत्रस्ततो द्रोणो भविता नात्र संशयः।। (1-154-36) हिंदी अनुवाद: दुर्योधन ने कहा—भीष्म जी हमेशा तटस्थ रहेंगे, द्रोणाचार्य के पुत्र (अश्वत्थामा) पूरी तरह मेरे पक्ष में हैं, और जहाँ उनका पुत्र है, वहीं द्रोणाचार्य भी होंगे—इसमें कोई संदेह नहीं है। व्याख्या: दुर्योधन धृतराष्ट्र के सभी संशयों को एक-एक करके काटता है। उसका तर्क है कि भीष्म तटस्थ रहेंगे और द्रोणाचार्य अपने पुत्र मोह के कारण खुलकर पांडवों का पक्ष नहीं ले पाएंगे।

श्लोक 37

मूल: कृपः शारद्वतश्चैव यत एतौ ततो भवेत्। द्रोणं च भागिनेयं च न स त्यक्ष्यति कर्हिचित्।। (1-154-37) हिंदी अनुवाद: शारद्वत कृपाचार्य भी जिधर ये दोनों होंगे, उधर ही रहेंगे; और वे अपने भांजे (अश्वत्थामा) तथा द्रोण को कभी भी नहीं छोड़ेंगे। व्याख्या: दुर्योधन राजनीति की चाल चलते हुए यह समझाता है कि राज्य के प्रमुख सेनापति और शिक्षकगण या तो तटस्थ रहेंगे या पारिवारिक व व्यक्तिगत संबंधों के कारण उसके पक्ष को चुनौती नहीं देंगे।

श्लोक 38

मूल: क्षत्ताऽर्थबद्धस्त्वस्माकं प्रच्छन्नं संयतः परैः। न चैकः स समर्थोऽस्मान्पाण्डवार्थेऽधिबाधितुम्।। (1-154-38) हिंदी अनुवाद: विदुर (क्षत्ता) यद्यपि ऊपर से हमारे साथ जुड़े हैं, किंतु वे भीतर से शत्रुओं (पांडवों) से मिले हुए हैं; फिर भी वे अकेले हम सबको पांडवों के लिए परेशान करने में समर्थ नहीं हैं। व्याख्या: दुर्योधन विदुर जी की निष्ठा पर सवाल उठाते हुए कहता है कि भले ही विदुर पांडو-प्रेमी हों, किंतु वे अकेले उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

श्लोक 39

मूल: सुविस्रब्धः पाण्डुपुत्रान्सह मात्रा प्रवासय। वारणावतमद्यैव यथा यान्ति यथा कुरु।। (1-154-39) हिंदी अनुवाद: इसलिए आप पूरी तरह आश्वस्त होकर माता सहित पांडुपुत्रों को आज ही वारणावत के लिए प्रवासित कर दीजिए, ताकि वे वैसे ही चले जाएँ जैसे कुरुवंश के नियम हैं। व्याख्या: दुर्योधन अपनी जिद पर अड़ा रहता है और धृतराष्ट्र पर दबाव बनाता है कि वे किसी भी तरह पांडवों को वारणावत भेज दें।

श्लोक 40

मूल: विनिद्रकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम्। शोकपावकमुद्भूतं कर्मणैतेन नाशय।। (1-154-40) हिंदी अनुवाद: (मेरे) हृदय में नींद उड़ा देने वाला जो भयंकर काँटे के समान शल्य चुभा हुआ है, तथा जो शोक रूपी अग्नि उत्पन्न हो रही है, उसे इस कर्म के द्वारा नष्ट कर दीजिए। व्याख्या: दुर्योधन अपनी ईर्ष्या और महत्त्वाकांक्षा की आग को व्यक्त करते हुए धृतराष्ट्र से कहता है कि पांडवों की उपस्थिति उसके सीने में कांटे की तरह चुभ रही है, और उन्हें वारणावत भेजकर ही उसकी यह बेचैनी मिट सकती है।

 

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