महाभारत के आदिपर्व (जतुगृहपर्व) के १५५वें अध्याय के श्लोकों (श्लोक 1 से 22) का क्रमवार संस्कृत श्लोक, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1
मूल: ततो दुर्योधनो राजा सर्वास्तु प्रकृतीः शनैः। अर्थमानप्रदानाभ्यां संजहार सहानुजः। `युयुत्सुमपनीयैकं धार्तराष्ट्रं सहोदरम्।।' (1-155-1) हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात राजा दुर्योधन ने अपने भाइयों के साथ मिलकर, अपने सहोदर भाई युयुत्सु को छोड़कर, धन और मान (सम्मान) प्रदान करके धीरे-धीरे राज्य की सभी प्रकृतियों (अधिकारियों व जनता) को अपने वश में कर लिया। व्याख्या: दुर्योधन ने अपनी कूटनीति के तहत रिश्वत और सम्मान का लालच देकर प्रमुख लोगों को अपनी तरफ मिला लिया। यहाँ 'युयुत्सु को छोड़कर' यह प्रसंग महत्वपूर्ण है, क्योंकि युयुत्सु स्वभाव से धर्मनिष्ठ था और आगे चलकर महाभारत युद्ध में पांडव पक्ष की ओर से लड़ा था।
श्लोक 2
मूल: धृतराष्ट्रप्रयुक्तास्तु केचित्कुशलमन्त्रिणः। कथयाञ्चक्रिरे रम्यं नगरं वारणावतम्।। (1-155-2) हिंदी अनुवाद: उधर धृतराष्ट्र द्वारा नियुक्त किए गए कुछ चतुर मंत्री वारणावत नगर की सुंदरता का गुणगान करने लगे (ताकि पांडव वहाँ जाने के लिए आकर्षित हों)। व्याख्या: पांडवों को बहला-फुसलाकर हस्तिनापुर से दूर भेजने के लिए एक सुनियोजित योजना के तहत वारणावत शहर की भव्यता का झूठा प्रचार किया गया।
श्लोक 3
मूल: अयं समाजः सुमहान्रमणीयतमो भुवि। उपस्थितः पशुपतेर्नगरे वारणावते।। (1-155-3) हिंदी अनुवाद: (वे मंत्री कहते थे)—पशुपति (शिव) के उस वारणावत नगर में पृथ्वी का सबसे बड़ा और अत्यंत रमणीय समाज (उत्सव) उपस्थित होने वाला है। व्याख्या: वारणावत भेजने के षड्यंत्र को छिपाने के लिए वहाँ किसी बड़े मेले या उत्सव का बहाना गढ़ा गया ताकि पांडव खुशी-खुशी वहाँ जाने के लिए तैयार हो जाएं।
श्लोक 4
मूल: सर्वरत्नसमाकीर्णे पुण्यदेशे मनोरमे। इत्येवं धृतराष्ट्रस्य वचनाच्चक्रिरे कथाः।। (1-155-4) हिंदी अनुवाद: वह नगर सभी रत्नों से परिपूर्ण, पवित्र और मन को मोहने वाला एक सुंदर देश है—धृतराष्ट्र की आज्ञा से इस प्रकार की बातें चारों तरफ फैलाई जाने लगीं। व्याख्या: धृतराष्ट्र के इशारे पर यह वातावरण बनाया जा रहा था कि वारणावत कोई साधारण जगह नहीं, बल्कि बहुत ही शानदार और दर्शनीय स्थल है।
श्लोक 5
मूल: कथ्यमाने तथा रम्ये नगरे वारणावते। गमने पाण्डुपुत्राणां जज्ञे तत्र मतिर्नृप।। (1-155-5) हिंदी अनुवाद: हे नृप (जनमेजय)! जब वारणावत नगर की ऐसी प्रशंसा बार-बार की जाने लगी, तब पांडुपुत्रों के मन में भी वहाँ जाने की इच्छा (मति) उत्पन्न हो गई। व्याख्या: लगातार सुनियोजित प्रचार के प्रभाव में आकर पांडव यह समझ बैठे कि शायद सचमुच वहाँ कोई बड़ा उत्सव या आनंद का अवसर है।
श्लोक 6
मूल: यदा त्वमन्यत नृपो जातकौतूहला इति। उवाचैतानेत्य तदा पाण्डवानम्बिकासुतः।। (1-155-6) हिंदी अनुवाद: जब अंबिका के पुत्र (धृतराष्ट्र) ने यह जान लिया कि पांडवों के मन में वारणावत जाने का कुतूहल (उत्सुकता) जागृत हो गया है, तब वे स्वयं उन पांडवों के पास आए और बोले— व्याख्या: अनुकूल अवसर देखकर धृतराष्ट्र ने खुद आगे बढ़कर पांडवों के सामने वारणावत जाने का प्रस्ताव रखा, ताकि किसी को उनके षड्यंत्र पर शक न हो।
श्लोक 7
मूल: `अधीतानि च शास्त्राणि युष्माभिरिह कृत्स्नशः। अस्त्राणि च तथा द्रोणाद्गौतमाच्च शरद्वतः।। (1-155-7) हिंदी अनुवाद: (धृतराष्ट्र ने कहा)—तुम लोगों ने यहाँ आचार्य द्रोण और शारद्वत कृपाचार्य से सभी शास्त्रों और अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा पूरी तरह से प्राप्त कर ली है। व्याख्या: धृतराष्ट्र पांडवों की प्रशंसा करते हुए उन्हें याद दिलाते हैं कि उनकी शिक्षा-दीक्षा अब पूरी हो चुकी है, जिससे उनकी यात्रा का एक तर्क तैयार किया जा सके।
श्लोक 8
मूल: कृतकृत्या भवन्तस्तु सर्वविद्याविशारदाः। सोऽहमेवं गते ताताश्चिन्तयामि समन्ततः। रक्षणे व्यवहारे च राज्यस्य सततं हिते।। (1-155-8) हिंदी अनुवाद: हे तातो! अब तुम सब कृतकृत्य और सभी विद्याओं में विशारद हो चुके हो। ऐसी स्थिति में मैं तुम्हारे राज्य की रक्षा, व्यवहार और हित के विषय में हर तरफ से निरंतर चिंता करता रहता हूँ। व्याख्या: धृतराष्ट्र बड़े स्नेह और हितैषी होने का नाटक करते हुए कहते हैं कि वे उनके भविष्य और राज्य की बेहतरी के लिए सोचते रहते हैं।
श्लोक 9
मूल: ममैते पुरुषा नित्यं कथयन्ति पुनःपुनः। रमणीयतमं लोके नगरं वारणावतम्।। (1-155-9) हिंदी अनुवाद: मेरे ये आदमी मुझे बार-बार यह बताते हैं कि इस संसार में वारणावत नगर सबसे अधिक रमणीय (सुंदर) स्थान है। व्याख्या: धृतराष्ट्र इस यात्रा को अपनी ओर से थोपे गए आदेश के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छी सलाह के रूप में पेश करते हैं।
श्लोक 10
मूल: ते ताता यदि मन्यध्वमुत्सवं वारणावते। सगणाः सान्वयाश्चैव विहरध्वं यथाऽमराः।। (1-155-10) हिंदी अनुवाद: इसलिए हे तातो! यदि तुम उचित समझो, तो अपने मित्रों और परिवार के साथ वारणावत के उस उत्सव में जाकर देवताओं की तरह विहार (आनंद) करो। व्याख्या: धृतराष्ट्र पांडवों को यह सलाह देते हैं कि वे कुछ समय के लिए अपने दल-बल के साथ वारणावत जाकर आनंद मनाएं।
श्लोक 11
मूल: ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि गायनेभ्यश्च सर्वशः। प्रयच्छध्वं यथाकामं देवा इव सुवर्चसः।। (1-155-11) हिंदी अनुवाद: तेजस्वी देवताओं की तरह तुम लोग वहाँ जाकर ब्राह्मणों और गायकों को अपनी इच्छा के अनुसार प्रचुर मात्रा में रत्न और धन दान करो। व्याख्या: पांडवों को दान-पुण्य और उत्सव मनाने के बहाने वारणावत भेजने का ताना-बाना पूरी तरह से राजसी आदर-सत्कार का रूप दिया जा रहा था।
श्लोक 12
मूल: कंचित्कालं विहृत्यैवमनुभूय परां मुदम्। इदं वै हास्तिनपुरं सुखिनः पुनरेष्यथ।। (1-155-12) हिंदी अनुवाद: वहाँ कुछ समय तक विहार करके और परम आनंद का अनुभव करके तुम सब लोग सुखी होकर पुनः इस हस्तिनापुर में लौट आओगे। व्याख्या: धृतराष्ट्र पांडवों को यह झूठा विश्वास दिलाते हैं कि यह केवल एक छोटी सी सैर या छुट्टियाँ बिताने जैसा प्रवास है, जिसके बाद उन्हें वापस हस्तिनापुर लौटना है।
श्लोक 13
मूल: `निवَسध्वं च तत्रैव संरक्षणपरायणाः। वैलक्षण्यं न वै तत्र भविष्यति परंतपाः।।' (1-155-13) हिंदी अनुवाद: हे परंतप (शत्रुसंताप) पांडवों! तुम लोग पूरी तरह सुरक्षित रहकर वहीं निवास करना, वहाँ तुम्हें किसी भी प्रकार की न्यूनता या असुविधा महसूस नहीं होगी। व्याख्या: धृतराष्ट्र अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से पांडवों को पूरी तरह आश्वस्त करने का प्रयास करते हैं ताकि वे बिना किसी संदेह के लाक्षागृह की ओर प्रस्थान कर जाएं।
श्लोक 14
मूल: वैशंपायन उवाच—धृतराष्ट्रस्य तं काममनुबुध्य युधिष्ठिरः। आत्मनश्चासहायत्वं तथेति प्रत्युवाच तम्।। (1-155-14) हिंदी अनुवाद: वैशम्पायन जी ने कहा—धृतराष्ट्र की उस इच्छा को (उनके भीतर छिपे दुराशय को) समझकर तथा अपनी ओर से उस समय खुद को असहाय पाकर युधिष्ठिर ने "तथास्तु (वैसा ही हो)" कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली। व्याख्या: युधिष्ठिर सब कुछ समझ रहे थे कि धृतराष्ट्र के मन में क्या चल रहा है, किंतु उस समय वे राजनीतिक रूप से अकेले और हस्तिनापुर में शक्तिहीन थे, इसलिए उन्होंने विवाद से बचने के लिए धृतराष्ट्र की आज्ञा मान ली।
श्लोक 15, 16, 17
मूल: ततो भीष्मं शान्तनवं विदुरं च महामतिम्। द्रोणं च बाह्लिकं चैव सोमदत्तं च कौरवम्।। कृपमाचार्यपुत्रं च भूरिश्रवसमेव च। मान्यानन्यानमात्यांश्च ब्राह्मणांश्च तपोधनान्।। पुरोहितांश्च पौत्रांश्च गान्धारीं च यशस्विनीम्। `सर्वा मातॄरुपस्पृष्ट्वा विदुरस्य च योषितः।' युधिष्ठिरः शनैर्दीन उवाचेदं वचस्तदा।। (1-155-15 से 17) हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात युधिष्ठिर जी ने शांतनु पुत्र भीष्म, महाज्ञानी विदुर, द्रोणाचार्य, बाह्लीक, कौरव सोमदत्त, कृपाचार्य, अश्वत्थामा (आचार्यपुत्र), भूरिश्रवा, अन्य मान्य मंत्रियों, तपोधन ब्राह्मणों, पुरोहितों, सुहृदों, यशस्विनी गांधारी तथा सभी माताओं और विदुर जी की पत्नी के चरणों का स्पर्श करके, अत्यंत दीन (विनम्र) भाव से धीरे से यह वचन कहा— व्याख्या: प्रस्थान करने से पहले युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर के सभी गुरुओं, बड़ों और माताओं से मिलकर आशीर्वाद लिया, जो उनकी विनम्रता और संस्कारों को दर्शाता है।
श्लोक 18
मूल: रमणीये जनाकीर्णे नगरे वारणावते। सगणास्तत्र यास्यामो धृतराष्ट्रस्य शासनात्।। (1-155-18) हिंदी अनुवाद: (युधिष्ठिर ने कहा)—हम लोग धृतराष्ट्र की आज्ञा से अपने संगियों (परिवार व सेवकों) के साथ उस रमणीय और जनसंकुल वारणावत नगर को जा रहे हैं। व्याख्या: युधिष्ठिर ने बड़ों को अपनी यात्रा की सूचना दी और स्पष्ट किया कि वे राजा की आज्ञा का पालन करते हुए वारणावत जा रहे हैं।
श्लोक 19
मूल: प्रसन्नमनसः सर्वे पुण्या वाचो विमुञ्चत। आशीर्भिर्बृहितानस्मान्न पापं प्रसहिष्यते।। (1-155-19) हिंदी अनुवाद: आप सभी लोग प्रसन्न मन से पवित्र वचन बोलिए (हमें आशीर्वाद दीजिए)। आपकी आशीषों से सुरक्षित हुए हम पर कोई भी पाप (संकट या षड्यंत्र) टिक नहीं पाएगा। व्याख्या: युधिष्ठिर का यह कथन अत्यंत गहरा है—वे जानते हैं कि उनके खिलाफ कोई षड्यंत्र रचा जा रहा है, इसलिए वे बड़ों के सच्चे आशीर्वाद का कवच माँगते हैं ताकि वे हर बुरी नज़र और खतरे से बचे रहें।
श्लोक 20
मूल: वैशंपायन उवाच—एवमुक्तास्तु ते सर्वे पाण्डुपुत्रेण कौरवाः। प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽन्ववर्तन्त पाण्डवान्।। (1-155-20) हिंदी अनुवाद: वैशम्पायन जी ने कहा—पांडुपुत्र युधिष्ठिर द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे सभी कौरव प्रसन्न मुख वाले होकर पांडवों के प्रति सद्भावना प्रकट करने लगे। व्याख्या: युधिष्ठिर के इस विनीत और गंभीर आचरण को देखकर सभा के सभी लोग द्रवीभूत हो गए और उन्होंने पांडवों को स्नेहपूर्ण विदाई दी।
श्लोक 21
मूल: स्वस्त्यस्तु वः पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वशः। मा च वोस्त्वशुभं किंचित्सर्वशः पाण्डुनन्दनाः।। (1-155-21) हिंदी अनुवाद: (सबने कहा)—हे पाण्डुनन्दनों! मार्ग में सभी भूतों (प्राणियों और शक्तियों) से आपकी हमेशा रक्षा हो, आपका कल्याण हो, और आपको किसी भी प्रकार का अशुभ न मिले। व्याख्या: बड़ों और शुभचिंतकों ने पांडवों को रास्ते के लिए मंगलकामनाएं और आशीर्वाद प्रदान किया।
श्लोक 22
मूल: ततः कृतस्वस्त्ययना राज्यलाभाय पार्थिवाः। कृत्वा सर्वाणि कार्याणि प्रययुर्वारणावतम्।। (1-155-22) हिंदी अनुवाद: तदनंतर, स्वस्तिवाचन (मंगल अनुष्ठान) करवाकर और राज्य लाभ (व धर्म रक्षा) के सभी आवश्यक कार्य पूरे करके वे सभी राजकुमार वारणावत के लिए प्रस्थान कर गए। व्याख्या: इस प्रकार सभी औपचारिक और मांगलिक कार्यों को संपन्न करने के बाद पांडवों ने माता कुंती के साथ हस्तिनापुर से वारणावत की ओर अपनी वह ऐतिहासिक यात्रा शुरू की, जिसके आगे लाक्षागृह का षड्यंत्र प्रतीक्षा कर रहा था।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
जतुगृहपर्वणि पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।। 155 ।।
