महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 174वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 3 (माता कुन्ती का प्रश्न और ब्राह्मण का उत्तर)
श्लोक 1:
कुन्त्युवाच। कुतोमूलमिदं दुःखं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः। विदित्वाप्यपकर्षेयं शक्यं चेदपकर्षितुम्।।
- हिन्दी अनुवाद: कुन्ती बोली— "इस दुःख का मूल कारण क्या है, यह मैं तत्त्व से जानना चाहती हूँ। यदि इसे दूर करना संभव हुआ, तो इस बात को जानकर मैं इस दुःख को अवश्य दूर करूँगी।"
- व्याख्या: माता कुन्ती ने ब्राह्मण परिवार की पीड़ा को देखकर उनसे उनके इस भीषण विलाप और संकट का कारण पूछा ताकि वे उसका कोई समाधान निकाल सकें।
श्लोक 2 और 3:
ब्राह्मण उवाच। उपपन्नं सतामेतद्यद्ब्रवीपि तपोधने। न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम्।। `तथापि तत्त्वमाख्यास्ये दुःखस्यैतस्य संभवम्। शक्यं वा यदि वाऽशक्यं शृणु भद्रे यथातथम्।।
- हिन्दी अनुवाद: ब्राह्मण बोला— "हे तपोधने! सज्जन लोगों के लिए यह बात बहुत उचित है जो आप कह रही हैं। किंतु यह दुःख ऐसा है जिसे कोई भी मनुष्य दूर करने में समर्थ नहीं है। फिर भी, इस दुःख के उत्पन्न होने का कारण क्या है, मैं आपको यथातथ्य बताता हूँ। यह कार्य संभव हो या असंभव, हे भद्रे! आप इसे विस्तार से सुनिए।"
- व्याख्या: ब्राह्मण कुन्ती को बताता है कि उनका संकट साधारण नहीं है, बल्कि एक भयानक राक्षस से जुड़ा हुआ है जिसे इंसानों द्वारा हराना असंभव सा प्रतीत होता है।
श्लोक 4 से 9 (बकासुर राक्षस का आतंक और नगर की लाचारी)
श्लोक 4, 5 और 6:
समीपे नगरस्यास्य वको वसति राक्षसः। इतो गव्यूतिमात्रे।ञस्ति यमुनागह्वरे गुहा।। तस्यां घोरः स वसति जिघांसुः पुरुषादकः। बकाभिधानो दुष्टात्मा राक्षसानां कुलाधमः।। ईशो जनपदस्यास्य पुरस्य च महाबलः। पुष्टो मानुषमांसेन दुर्बुद्धिः पुरुषादकः।।
- हिन्दी अनुवाद: "इस नगर के समीप ही बक नामक एक राक्षस रहता है। यहाँ से लगभग दो कोस (एक गव्यूति) की दूरी पर यमुना के एक सघन वन (गह्वर) में उसकी गुफा है। उस भयानक गुफा में मनुष्यों की हत्या करने की इच्छा रखने वाला, नर-भक्षी, बक नाम वाला, दुष्टात्मा और राक्षसों में कुलाधम वह क्रूर राक्षस रहता है। वह महाबली राक्षस इस पूरे जनपद और नगर का (एक प्रकार से) स्वामी बना बैठा है। दुर्बुद्धि और नर-भक्षी वह राक्षस निरंतर मनुष्यों का मांस खाकर पुष्ट हुआ है।"
- व्याख्या: ब्राह्मण एकचक्र नगर के पास रहने वाले बकासुर राक्षस का परिचय देता है जो नर-मांस खाकर शक्तिशाली हो गया है और पूरे इलाके में आतंक मचाए हुए है।
श्लोक 7, 8 और 9:
प्रबलः कामरूपी च राक्षसस्तु महाबलः। तेनोपसृष्टा नगरी वर्षमद्य त्रयोदशम्।। तत्कृते परचक्राच्च भूतेभ्यश्च न नो भयम्। पुरुषादेन रौद्रेण भक्ष्यमाणा दुरात्मना।। अनाथा नगरी नाथं त्रातारं नाधिगच्छति। गुहायां च वसंस्तत्र बाधते सततं जनम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "वह महाबली राक्षस प्रबल और इच्छा अनुसार रूप बदलने वाला (कामरूपी) है। आज तेरह वर्षों से यह नगरी उसके द्वारा प्रताड़ित की जा रही है। उस क्रूर और दुरात्मा नर-भक्षी राक्षस द्वारा खाए जाते रहने के कारण, उसके डर से हमें बाहरी आक्रमणकारियों (परचक्र) या भूतों-प्रेतों का कोई भय नहीं रह गया है (क्योंकि सबसे बड़ा भय वही है)। अनाथ हुई यह नगरी किसी भी रक्षक या त्राता को नहीं पा रही है। वह अपनी गुफा में रहकर निरंतर यहाँ के साधारण जनों को सताता रहता है।"
- व्याख्या: ब्राह्मण बताता है कि बकासुर के आतंक के आगे बाकी सारे भय फीके पड़ गए हैं और पिछले तेरह वर्षों से वह इस नगर के लोगों को लगातार अपना शिकार बना रहा है।
श्लोक 10 से 18 (राक्षस के साथ नगरवासियों का समझौता और भोजन का नियम)
श्लोक 10, 11 और 12:
स्त्रियो बालांश्च वृद्धांश्च यूनश्चापि दुरात्मवान्। अत्र मन्त्रैश्च होमैश्च भोजनैश्च स राक्षसः।। ईडितो द्विजमुख्यैश्च पूजितश्च दुरात्मवान्। यदा च सकलानेवं प्रसूदयति राक्षसः।। अथैनं ब्राह्मणाः सर्वे समये समयोजयन्। मा स्म कामाद्वधी रक्षो दास्यामस्ते सदा वयं।।
- हिन्दी अनुवाद: "वह दुरात्मा स्त्रियों, बालकों, वृद्धों और युवाओं— सबको अपनी इच्छा से मार डालता था। इस संकट से बचने के लिए यहाँ के श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने मंत्रों, होम और विविध भोजनों से उस दुरात्मा राक्षस की स्तुति और पूजा की। जब वह इस प्रकार सबको नष्ट करने लगा, तब यहाँ के सभी ब्राह्मणों ने उसके साथ एक समझौता (समय) कर लिया— 'हे राक्षस! तू अपनी इच्छा से लोगों का वध मत कर, हम तुझे नियमित रूप से भोजन पहुँचाया करेंगे।'"
- व्याख्या: नगर के लोगों और ब्राह्मणों ने नरसंहार रोकने के लिए राक्षस के साथ एक समझौता किया था कि वे रोज या बारी-बारी से उसे मनचाहा भोजन और एक मनुष्य भेजेंगे।
श्लोक 13, 14, 15 और 16:
पर्यायेण यथाकाममिह मांसोदनं प्रभो। अन्नं मांससमायुक्तं तिलचूर्णसमन्वितम्।। सर्पिषा च समायुक्तं व्यञ्जनैश्च समन्वितम्। सूपांस्त्रीन्सतिलान्पिण्डाँल्लाजापूपसुरासवान्।। शृताशृतान्पानकुम्भान्स्थूलमांसं शृताशृतम्। वनमाहिषवाराहभाल्लूकं च शृताशृतम्।। सर्पिःकुम्भांश्च विविधान्दधिकुम्भांस्तथा बहून्। सद्यःसिद्धसमायुक्तं तिलचूर्णैः समाकुलम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे प्रभो! (ब्राह्मणों ने कहा था) हम बारी-बारी से तुम्हारी इच्छा के अनुसार मांसयुक्त भात (मांसोदन), तिलों के चूर्ण से युक्त अन्न, घी और विभिन्न प्रकार के व्यंजनों से युक्त भोजन देंगे। उसमें तीन प्रकार की दालें, तिल के पिंड, लावा, पूप (पुए), सुरा और आसव (मदिरा), पके और कच्चे दोनों प्रकार के पीने योग्य पदार्थों से भरे घड़े, मोटा पक्का व कच्चा मांस, जंगल के भैंसे, सूअर और भालू का मांस (पक्का व कच्चा), तथा घी के विभिन्न प्रकार के घड़े और बहुत से दही के घड़े— जो ताजे बने हों और तिलों के चूर्ण से सजे हों, हम तुम्हें नियमित रूप से देंगे।"
- व्याख्या: समझौते के तहत बकासुर को दिए जाने वाले विशाल और भारी-भरकम भोज्य पदार्थों (अजस्र मांस, मदिरा, घी, दही आदि) की सूची यहाँ दी गई है।
श्लोक 17, 18 और 19:
कुलाच्च पुरुषं चैकं बलीवर्दौ च कालकौ। प्राप्स्यसि त्वमसंक्रुद्धो रक्षोभागं प्रकल्पितम्।। तिष्ठेह समयेऽस्माकमित्ययाचन्त तं द्विजाः। बाढमित्येव तद्रक्षस्तद्वचः प्रत्यगृह्णत।। परचक्राटवीकेभ्यो रक्षणं स करोति च। तस्मिन्भागे सुनिर्दिष्टे स्थितः स समये बली।।
- हिन्दी अनुवाद: "तथा भोजन के साथ-साथ किसी एक कुल से एक मनुष्य और दो काले बैल भी राक्षस के इस निर्धारित भाग में तुम्हें प्राप्त होंगे। तू बिना क्रोध किए हमारे इस समझौते पर स्थिर रह— ऐसा ब्राह्मणों ने उस राक्षस से निवेदन किया। 'बहुत अच्छा' कहकर उस राक्षस ने उनकी उस बात को स्वीकार कर लिया। इसके बाद वह बलवान राक्षस (समझौते के बदले) बाहरी शत्रुओं और अटवी के चोरों से उस नगर की रक्षा भी करता था, और इस प्रकार अपने निश्चित भाग के समझौते पर वह स्थिर रहा।"
- व्याख्या: समझौते के अनुसार भोजन, दो बैल और एक मनुष्य हर बार उस राक्षस को भेजा जाता था, जिसके बदले में वह राक्षस नगर को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षित रखता था।
श्लोक 20 से 31 (पारिवारिक बारी, राजा की उदासीनता और ब्राह्मण का घोर संकट)
श्लोक 20 और 21:
एकैकं चैव पुरुषं संप्रयच्छन्ति वेतनम्। स वारो बहुभिर्वर्षैर्भवत्यसुकरो नरैः।। तद्विमोक्षाय ये केचिद्यतन्ते पुरुषा क्वचित्। सपुत्रदारांस्तान्हत्वा तद्रक्षो भक्षयत्युत।।
- हिन्दी अनुवाद: "इस प्रकार वेतन (नियमित कोटे) के रूप में वे एक-एक मनुष्य को उस राक्षस को सौंपते हैं। बहुत से वर्षों के बीतने पर अब वह बारी (वार) घूम-फिरकर मनुष्यों के लिए अत्यंत कठिनता से आने वाली स्थिति में पहुँच गई है (अर्थात अब हमारी बारी आ गई है)। इस व्यवस्था से मुक्ति पाने के लिए जो कोई भी मनुष्य कभी कोई प्रयास करता है, उस राक्षस ने उसके पुत्र और पत्नी सहित सबको मारकर खा डाला है।"
- व्याख्या: यह क्रूर प्रथा सालों से चल रही थी और अब घूम-फिरकर उस गरीब ब्राह्मण परिवार की ही बारी आ गई थी, जिससे बचने का कोई रास्ता नहीं था।
श्लोक 22, 23 और 24:
वेत्रकीयगृहे राजा नायं नयमिहास्थितः। उपायं तं न कुरुते यत्नादपि स मन्दधीः। अनामयं जनस्यास्य वेन स्यादद्य शाश्वतम्।। एतदर्हा वचं नूनं वसामो दुर्बलस्य ये। विषये नित्यवास्तव्याः कुराजानमुपाश्रिताः।। ब्राह्मणाः कस्य वक्तव्याः कस्य वाच्छन्दचारिणः। गुणैरेते हि वत्स्यन्ति कामगाः पक्षिणो यथा।।
- हिन्दी अनुवाद: "वेत्रकी (राजधानी/नगर) में रहने वाला राजा भी उचित न्याय या नीति पर स्थित नहीं है। वह मंदबुद्धि राजा प्रयत्नपूर्वक भी प्रजा के इस स्थायी कल्याण और उनकी सुरक्षा के लिए कोई उपाय नहीं कर रहा है। हम दुर्बल लोग ही ऐसे कुराजा के आश्रय में रहते हुए उसके राज्य में स्थायी रूप से निवास करते हैं, इसीलिए आज हम इस दशा के योग्य हुए हैं। ब्राह्मण बेचारे किसके कहने में चल सकते हैं और कौन उनकी इच्छा के अनुसार चलने वाला है? वे तो आकाश में अपनी इच्छा से उड़ने वाले पक्षियों की भाँति अपने ही गुणों से जीवन बिताते हैं।"
- व्याख्या: ब्राह्मण स्थानीय राजा की कायरता और लापरवाही को कोसता है जो अपनी प्रजा की रक्षा के लिए कुछ नहीं कर रहा है और वे अनाथों की तरह इस कुशासन में पिस रहे हैं।
श्लोक 25, 26 और 27:
राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम्। `राजन्यसति लोकेऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम्। वयस्य संचयेनास्य ज्ञातीन्पुत्रांश्च तारयेत्।।' विपीरतं मया चेदं त्रयं सर्वमपार्जितम्। तदिमामापदं प्राप्य भृशं तप्यामहे वयम्।। सोऽयमस्माननुप्राप्तो वारः कुलविनाशनः। भोजनं पुरुषश्चैकं प्रदेयं वेतनं मया।।
- हिन्दी अनुवाद: "मनुष्य को सबसे पहले राजा को पाना चाहिए (यानी योग्य शासक होना चाहिए), उसके बाद पत्नी और फिर धन प्राप्त करना चाहिए। इस लोक में यदि राजा ही न हो (या दुष्ट हो), तो फिर पत्नी और धनकहाँ से सुरक्षित रह सकते हैं? राजा की रक्षा से ही मनुष्य अपने सगे-सम्बन्धियों और पुत्रों की रक्षा कर सकता है। किंतु मेरे भाग्य से यह तीनों चीजें इसके विपरीत ही प्राप्त हुईं, और इसी आपत्काल को पाकर आज हम अत्यधिक संताप कर रहे हैं। अब वही हमारे कुल का नाश करने वाला हमारा नंबर (वार) आ पहुँचा है, जिसके तहत मुझे भोजन और एक मनुष्य (अपने परिवार से) वेतन के रूप में उस राक्षस को देना है।"
- व्याख्या: ब्राह्मण राजनीति और गृहस्थी के नियमों का हवाला देते हुए कहता है कि राजा के न होने या अयोग्य होने के कारण ही आज उसके परिवार पर यह कुल-विनाशक संकट आन पड़ा है।
श्लोक 28, 29, 30 और 31:
न च मे विद्यते वित्तं संक्रेतुं पुरुषं क्वचित्। सुहृज्जनं प्रदातुं च न शक्ष्यामि कदाचन।। गतिं चान्यां न पश्यामि तस्मान्मोक्षाय रक्षसः। सोऽहं दुःखार्णवे मग्नो महत्यसुकरे भृशम्।। सहवैतैर्गमिष्यामि बान्धवैरद्य राक्षसम्। ततो नः सहितान्क्षुद्रः सर्वानेवोपभोक्ष्यति।। `दुःखमूलमिदं भद्रे मयोक्तं प्रश्नतोऽनघे।।'
- हिन्दी अनुवाद: "और न तो मेरे पास इतना धन है कि मैं किसी अन्य पुरुष को (बलि के रूप में भेजने के लिए) खरीद सकूँ, और न ही मैं कभी किसी सुहृदजन (मित्र/प्रिय) को राक्षस को सौंपने में समर्थ हूँ। उस राक्षस से मुक्ति पाने का मुझे कोई अन्य उपाय भी नहीं सूझ रहा है। इसलिए मैं अत्यंत कठिन और अगाध दुःख के समुद्र में डूब गया हूँ। अब तो मैं अपने इन सभी बान्धवों (परिवार के सदस्यों) के साथ स्वयं ही आज उस राक्षस के पास जाऊँगा, और वह तुच्छ राक्षस हम सबको एकसाथ ही खा डालेगा। हे भद्रे! हे अनघे! आपके पूछने पर मैंने इस प्रकार अपने इस दुःख का मूल कारण आपको बता दिया है।"
- व्याख्या: ब्राह्मण अपनी विवशता व्यक्त करता है कि उसके पास पैसे नहीं हैं कि वह किसी और को काम पर रखकर भेज सके, और वह अपनों में से किसी एक को भी अलग नहीं कर सकता, इसलिए पूरा परिवार ही राक्षस के पास जाकर अपने प्राण दे देगा।
