महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 175वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 3 (माता कुन्ती का आश्वासन और अपने पुत्र को भेजने का प्रस्ताव)
श्लोक 1:
कुन्त्युवाच। न विषादस्त्वया कार्यो भयादस्मात्कथंचन। उपायः परिदृष्टोऽत्र तस्मान्मोक्षाय रक्षसः।।
- हिन्दी अनुवाद: कुन्ती बोली— "आपको इस भय से किसी भी प्रकार का विषाद (शोक) नहीं करना चाहिए। इस राक्षस से मुक्ति पाने का एक उपाय मेरी दृष्टि में आ गया है।"
- व्याख्या: माता कुन्ती उस ब्राह्मण की गहरी निराशा को देखकर उसे ढांढस बंधाती हैं और कहती हैं कि इस समस्या का समाधान उनके पास है।
श्लोक 2 (क, ख, ग):
`नैव स्वयं सपुत्रस्य गमनं तत्र रोचये।' एकस्तव सुतो बालः कन्या चैका तपस्विनी। न चैतयोस्तथा पत्न्या गमनं तव रोचये।।
- हिन्दी अनुवाद: "मैं यह बिल्कुल उचित नहीं समझती कि आप अपने पुत्र के साथ स्वयं वहाँ (राक्षस के पास) जाएँ। आपका एक छोटा बालक है और एक ही तपस्विनी कन्या है। इसी प्रकार मैं यह भी नहीं चाहती कि आपकी पत्नी वहाँ जाए।"
- व्याख्या: कुन्ती जी कहती हैं कि परिवार के किसी भी मुख्य सदस्य को बलि के रूप में जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे सब इस परिवार के आधार हैं।
श्लोक 3:
मम पञ्च सुता ब्रह्मंस्तेषामekो गमिष्यति। त्वदर्थं बलिमादाय तस्य पापस्य रक्षसः।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे ब्रह्मन्! मेरे पाँच पुत्र हैं। आपके लिए उन पाँचों में से एक पुत्र उस पापी राक्षस का भोजन (बलि) लेकर वहाँ जाएगा।"
- व्याख्या: माता कुन्ती उदारता और कृतज्ञता की मिसाल पेश करते हुए कहती हैं कि उनके पाँच पुत्र हैं, जिनमें से एक को वे इस संकट से उबारने के लिए उस राक्षस के पास भेज देंगी।
श्लोक 4 से 12 (ब्राह्मण का आपत्ति जताना और अतिथि-धर्म का तर्क)
श्लोक 4:
ब्राह्मण उवाच। नाहमेतत्करिष्यामि जीवितार्थी कथंचन। ब्राह्मणस्यातिथेश्चैव स्वार्थे प्राणान्वियोजयन्।।
- हिन्दी अनुवाद: ब्राह्मण बोला— "अपने स्वार्थ के लिए किसी ब्राह्मण और अतिथि के प्राणों को संकट में डालकर, मैं जीवित रहने की इच्छा से ऐसा घोर पाप कभी नहीं करूँगा।"
- व्याख्या: अतिथि के रूप में शरण में आए परिवार के पुत्र की बलि देकर अपनी जान बचाने को ब्राह्मण एक महापाप मानता है।
श्लोक 5:
न त्वेतदकुलीनासु नाधर्मिष्ठासु विद्यते। यद्ब्राह्ममार्थं विसृजेदात्मानमपि चात्मजम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "जो कुलीन या अधर्मी लोग नहीं होते (अर्थात जो उच्च कुल और धर्म के मार्ग पर चलने वाले हैं), वे कभी भी ब्राह्मण के हित के लिए अपने प्राणों या अपने पुत्र का त्याग नहीं कर सकते (यानी मैं ऐसा अधर्म नहीं कर सकता)।"
- व्याख्या: ब्राह्मण कहता है कि वह किसी अन्य के घर के बेटे को मौत के मुँह में धकेलकर अपने प्राण नहीं बचाएगा, क्योंकि यह धर्म के विरुद्ध है।
श्लोक 6:
आत्मनस्तु वधः श्रेयो बोद्धव्यमिति रोचते। ब्रहम्वध्याऽऽत्मवध्या वा श्रेयानात्मवधो मम।।
- हिन्दी अनुवाद: "मुझे तो यही अच्छा लगता है और यही समझना चाहिए कि इसके बजाय मेरा अपना वध हो जाना ही श्रेयस्कर है। ब्रह्महत्या या आत्महत्या (अपनी बलि)— इन दोनों में से मेरा खुद का मारा जाना ही अधिक श्रेष्ठ है।"
- व्याख्या: ब्राह्मण के लिए किसी अतिथि के पुत्र की बलि देना ब्रह्महत्या के समान है, जिससे अच्छा वह स्वयं मरना समझता है।
श्लोक 7:
ब्रह्मवध्या परं पापं निष्कृतिर्नात्र विद्यते। अबुद्धिपूर्वं कृत्वापि प्रत्यवायो हि विद्यते।।
- हिन्दी अनुवाद: "ब्रह्महत्या सबसे बड़ा पाप है, जिसकी इस संसार में कोई निष्कृति (प्रायश्चित्त) नहीं है। यदि यह अनजाने में भी हो जाए, तो भी इसका भयंकर दोष (प्रत्यवाय) लगता ही है।"
- व्याख्या: वह ब्रह्महत्या के पाप की भीषणता का वर्णन करता है जिससे मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है।
श्लोक 8:
न त्वहं वधमाकाङ्क्षे स्वयमेवात्मनः शुभे। परैः कृते वधे पापं न किंचिन्मयि विद्यते।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे भद्रे! मैं स्वयं अपनी इच्छा से अपनी आत्महत्या की कामना नहीं करता, क्योंकि दूसरों (राक्षस) द्वारा वध किए जाने पर मुझ पर कोई पाप नहीं लगेगा।"
- व्याख्या: वह स्पष्ट करता है कि वह खुद आत्महत्या नहीं कर रहा है, बल्कि राक्षस के हाथों मारे जाने की बात कह रहा है।
श्लोक 9:
अभिसंधौ कृते तस्मिन्ब्राह्मणस्य वधे मया। निष्कृतिं न प्रपश्यामि नृशंसं क्षुद्रमेव च।।
- हिन्दी अनुवाद: "यदि मैं किसी ब्राह्मण (अतिथि पुत्र) की हत्या का षड्यंत्र रचूँ या उसे जानबूझकर सौंपूँ, तो मैं उसकी कोई निष्कृति (शुद्धि) नहीं देखता, यह अत्यंत क्रूर और नीच कृत्य होगा।"
- व्याख्या: अतिथि के रूप में रह रहे पांडवों में से किसी की बलि देने को वह सबसे बड़ा नीच कर्म मानता है।
श्लोक 10:
आगतस्य गृहं त्यागस्तथैव शरणार्थिनः। याचमानस्य च वधो नृशंसो गर्हितो बुधैः।।
- हिन्दी अनुवाद: "घर आए हुए शरणार्थी का त्याग करना, तथा याचना करने वाले या आश्रित की रक्षा न करके उसका वध होने देना— यह विद्वानों द्वारा अत्यंत क्रूर और निंदित माना गया है।"
- व्याख्या: शरण में आए अतिथियों की रक्षा करना गृहस्थ का सबसे बड़ा धर्म है, इसके विपरीत जाना पाप है।
श्लोक 11:
कुर्यान्न निन्दितं कर्म न नृशंसं कथंचन। इति पूर्वे महात्मान आपद्धर्मविदो विदुः।।
- हिन्दी अनुवाद: "मनुष्य को कभी भी कोई निंदित या क्रूर कर्म नहीं करना चाहिए— ऐसा आपदा के धर्म (आपद्धर्म) को जानने वाले पूर्ववर्ती महात्माओं ने कहा है।"
- व्याख्या: संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, नीति और धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, यही शास्त्रों का मत है।
श्लोक 12:
श्रेयांस्तु सहदारस्य विनाशोऽद्य मव स्वयम्। ब्राह्मणस्य वधं नाहमनुमंस्ये कदाचन।।
- हिन्दी अनुवाद: "इससे तो यही श्रेष्ठ है कि आज पत्नी सहित हम सबका स्वयं ही विनाश हो जाए, किंतु मैं किसी भी स्थिति में एक ब्राह्मण (अतिथि) के वध का अनुमोदन कभी नहीं करूँगा।"
- व्याख्या: ब्राह्मण अपनी बात पर अडिग रहता है कि वह अपने पूरे परिवार सहित मरना पसंद करेगा, पर अतिथि के पुत्र को बलि के रूप में भेजने की अनुमति नहीं देगा।
श्लोक 13 से 18 (कुन्ती का दृढ़ विश्वास और भीमसेन को भेजने की सहमति)
श्लोक 13:
कुन्त्युवाच। ममाप्येषा मतिर्ब्रह्मन्विप्रा रक्ष्या इति स्थिरा। न चाप्यनिष्टः पुत्रो मे यदि पुत्रशतं भवेत्।।
- हिन्दी अनुवाद: कुन्ती बोली— "हे ब्रह्मन्! मेरी भी यही अटल मति है कि ब्राह्मणों की रक्षा की जानी चाहिए। और यदि मेरे सौ पुत्र भी हों, तो भी मेरा कोई पुत्र मेरे लिए अप्रिय (बेकार) नहीं है।"
- व्याख्या: कुन्ती स्पष्ट करती है कि वह भी ब्राह्मणों के महत्त्व को समझती है और अपने पुत्रों से उतना ही प्रेम करती है जितना कोई माता करती है।
श्लोक 14 और 15:
न चासौ राक्षसः शक्तो मम पुत्रविनाशने। वीर्यमन्मन्त्रसिद्धश्च तेजस्वी च सुतो मम।। राक्षसाय च तत्सर्वं प्रापयिष्यति भोजनम्। मोक्षयिष्यति चात्मानमिति मे निश्चिता मतिः।।
- हिन्दी अनुवाद: "किंतु वह राक्षस मेरे पुत्र का विनाश करने में बिल्कुल समर्थ नहीं है, क्योंकि मेरा वह पुत्र महान वीर, मंत्रों से सिद्ध (अस्त्र-शस्त्रों में कुशल) और अत्यधिक तेजस्वी है। वह राक्षस के लिए सारा भोजन ले जाकर उसे सौंप देगा और स्वयं को भी उस राक्षस के चंगुल से सुरक्षित बचाकर ले आएगा— ऐसा मेरा दृढ़निश्चय है।"
- व्याख्या: कुन्ती अपने पुत्र भीमसेन की असीम शक्ति और पराक्रम से भली-भांति परिचित हैं, इसलिए उन्हें पूर्ण विश्वास है कि भीम का बाल भी बांका नहीं होगा।
श्लोक 16:
समागताश्च वीरेण दृष्टपूर्वाश्च राक्षसाः। बलवन्तो महाकाया निहताश्चाप्यनेकशः।।
- हिन्दी अनुवाद: "इस वीर (मेरे पुत्र) ने इसके पहले भी कई बलवान और महाकाय राक्षसों के पास जाकर उनका सामना किया है और ऐसे कई राक्षसों को मार गिराया है।"
- व्याख्या: कुन्ती हिडिम्ब वध का स्मरण करते हुए बताती हैं कि उनके पुत्र के लिए एक राक्षस का वध करना कोई कठिन काम नहीं है।
श्लोक 17 और 18:
न त्विदं केषुचिद्ब्रह्मान्व्याहर्तव्यं कथंचन। विद्यार्थिनो हि मे पुत्रान्विप्रकुर्युः कुतूहलात्।। गुरुणा चाननुज्ञातो ग्राहयेद्यः सुतो मम। न स कुर्यात्तथा कार्यं विद्ययेति सतां मतम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे ब्रह्मन्! किंतु इस बात को किसी के सामने प्रकट नहीं करना चाहिए (किसी से मत कहिएगा), क्योंकि विद्या सीखने के समय जिज्ञासावश लोग मेरे पुत्रों के बारे में अनर्थ कर सकते हैं। और गुरु की आज्ञा के बिना जो मेरा पुत्र अपनी इस विद्या (शक्ति) का प्रदर्शन करे, वह उस विद्या से वैसा कार्य नहीं कर सकता— ऐसा सत्पुरुषों का मत है।"
- व्याख्या: कुन्ती गोपनीयता बरतने को कहती हैं ताकि उनके अज्ञातवास और पांडवों की असली पहचान का किसी को पता न चले।
श्लोक 19 और 20 (ब्राह्मण की संतुष्टि और भीमसेन को कार्यभार सौंपना)
श्लोक 19:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्तु पृथया स विप्रो भार्यया सह। हृतः संपूजयामास तद्वाक्यममृतोपमम्।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— पृथा (कुन्ती) द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस ब्राह्मण ने अपनी पत्नी के साथ अत्यंत प्रसन्न होकर उनके उस अमृत के समान मधुर वचन का आदर और सत्कार किया।
- व्याख्या: कुन्ती की बातों से ब्राह्मण और उसकी पत्नी को भारी राहत मिली और वे समझ गए कि यह कोई साधारण कुल नहीं है।
श्लोक 20:
ततः कुन्ती च विप्रश्च सहितावनिलात्मजम्। तमब्रूतां कुरुष्वेति स तथेत्यब्रवीच्च तौ।।
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर कुन्ती और उस ब्राह्मण ने मिलकर वायुपुत्र (भीमसेन) से कहा— "तुम यह कार्य करो।" तब भीमसेन ने उन दोनों से कहा— "बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा।"
- व्याख्या: माता कुन्ती की आज्ञा और ब्राह्मण की सहमति पाकर भीमसेन ने बकासुर राक्षस का वध करने का यह कार्यर्षर्ष स्वीकार कर लिया।
