महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 176वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 5 (भीमसेन की प्रतिज्ञा और युधिष्ठिर की चिंता)
श्लोक 1:
वैशंपायन उवाच।1-176-1x करिष्य इति भीमेन प्रतिज्ञातेऽथ भारत। आजग्मुस्ते ततः सर्वे भैक्षमादाय पाण्डवाः।।1-176-1a 1-176-1b
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भारत (जनमेजय)! जब भीमसेन द्वारा 'मैं यह कार्य करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर ली गई, तब वे सभी पाण्डव भिक्षा लेकर वहाँ आ पहुँचे।
- व्याख्या: भीम द्वारा राक्षस वध का भार अपने ऊपर लेने के बाद बाकी पांडव भिक्षा माँगकर वापस लौटे।
श्लोक 2 और 3:
`भीमसेनं ततो दृष्ट्वा आपूर्णवदनं तथा। बुबोध धर्मराजस्तु हृषितं भीममच्युतम्।।1-176-2a 1-176-2b तोषस्य कारणं यत्तु मनसाऽचिन्तयद्गुरुः। स समीक्ष्य तदा राजन्योद्धुकामं युधिष्ठिरः।।'1-176-3a 1-176-3b
- हिन्दी अनुवाद: तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भीमसेन के प्रफुल्लित मुख और अच्युत (उत्साही) रूप को देखकर यह जान लिया कि वे बहुत प्रसन्न हैं। हे राजन्! उनके इस संतोष का क्या कारण है, इसका मन ही मन विचार करते हुए और भीम को युद्ध करने के लिए उत्सुक देखकर युधिष्ठिर समझ गए।
- व्याख्या: भीम के चेहरे का उत्साह देखकर युधिष्ठिर भाँप गए कि कुछ विशेष बात है, जिसे जानने के लिए उन्होंने माता कुन्ती से एकांत में बात करने का निर्णय लिया।
श्लोक 4 और 5:
आकारेणैव तं ज्ञात्वा पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः। रहः समुपविश्यैकस्ततः पप्रच्छ मातरम्।।1-176-4a 1-176-4b किं चिकीर्षत्ययं कर्म भीमो भमपराक्रमः। भवत्यनुमते कच्चित्स्वयं वा कर्तुमिच्छति।।1-176-5a 1-176-5b
- हिन्दी अनुवाद: उनके हाव-भाव से ही उस स्थिति को जानकर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर ने एकांत में बैठकर अपनी माता से पूछा— "महापराक्रमी भीमसेन यह कौन सा कार्य करना चाहते हैं? क्या यह आपकी अनुमति से है अथवा वे अपनी इच्छा से ही ऐसा करना चाहते हैं?"
- व्याख्या: युधिष्ठिर को चिंता हुई कि कहीं भीम ने अपनी इच्छा से कोई बड़ा जोखिम तो नहीं उठा लिया है, इसलिए वे माता कुन्ती से इसका सत्य जानने के लिए पूछते हैं।
श्लोक 6 और 7 (कुन्ती का उत्तर)
श्लोक 6:
कुन्त्युवाच।1-176-6x ममैव वचनादेष करिष्यति परन्तपः। ब्राह्मणार्थे महत्कृत्यं मोक्षाय नगरस्य च।।1-176-6a 1-176-6b
- हिन्दी अनुवाद: कुन्ती बोली— "हे परंतप! मेरे ही कहने से यह (भीमसेन) ब्राह्मण के हित के लिए तथा इस नगर को मुक्त कराने के लिए यह महान कार्य करने जा रहा है।"
- व्याख्या: माता कुन्ती स्पष्ट करती हैं कि भीम ने जो निर्णय लिया है, वह उनके स्वयं के आदेश और पूर्ण सहमति से है।
श्लोक 7 (क, ख):
`बकाय कल्पितं पुत्र महान्तं बलिमुत्तमम्। भीमो भुनक्तु सुस्पष्टमप्येकाहं तपःसुतः।।'1-176-7a 1-176-7b
- हिन्दी अनुवाद: "हे पुत्र! तपस्या से उत्पन्न मेरा यह पुत्र भीम बकासुर के लिए कल्पित किए गए उस महान और उत्तम बलि (भोजन और मनुष्य) को आज स्पष्ट रूप से स्वयं ही भोगेगा (अर्थात राक्षस के पास जाएगा)।"
- व्याख्या: कुन्ती युधिष्ठिर को आश्वस्त करती हैं कि भीम उस भोजन और बलि को लेकर राक्षस के पास खुद जा रहे हैं।
श्लोक 8 से 14 (युधिष्ठिर का कुन्ती को समझाना और विलाप करना)
श्लोक 8 और 9:
युधिष्ठिर उवाच।1-176-8x किमिदं साहसं तीक्ष्णं भवत्या दुष्करं कृतम्। परित्यागं हि पुत्रस्य न प्रशंसन्ति साधवः।।1-176-8a 1-176-8b कथं परसुतस्यार्थे स्वसुतं त्यक्तुमिच्छसि। लोकवेदविरुद्धं हि पुत्रत्यागात्कृतं त्वया।।1-176-9a 1-176-9b
- हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर बोले— "माताजी! यह आपने कितना तीव्र और दुष्कर साहस कर डाला है? संसारे के साधु पुरुष कभी भी पुत्र के परित्याग की प्रशंसा नहीं करते। आप किसी अन्य (पराए) के पुत्र (ब्राह्मण) के लिए अपने पुत्र का त्याग करने की इच्छा कैसे कर सकती हैं? आपने पुत्र का त्याग करके यह तो लोक और वेद दोनों के विरुद्ध आचरण किया है।"
- व्याख्या: युधिष्ठिर माता के इस निर्णय से घबरा जाते हैं और इसे अनुचित तथा शास्त्र-विरुद्ध बताते हैं।
श्लोक 10, 11, 12 और 13:
यस्य बाहू समाश्रित्य सुखं सर्वे शयामहे। राज्यं चापहृतं क्षुद्रैराजिहीर्षामहे पुनः।।1-176-10a 1-176-10b यस्य दुर्योधनो वीर्यं चिन्तयन्नमितौजसः। न शेते रजनीः सर्वा दुःखाच्छकुनिना सह।।1-176-11a 1-176-11b यस्य वीरस्य वीर्येण मुक्ता जतुगृहाद्वयम्। अन्य्येभ्यश्चैव पापेभ्यो निहतश्च पुरोचनः।।1-176-12a 1-176-12b यस्य वीर्यं समाश्रित्य वसुपूर्णां वसुन्धराम्। इमां मन्यामहे प्राप्तां निहत्य धृतराष्ट्रजान्।।1-176-13a 1-176-13b
- हिन्दी अनुवाद: "जिनकी भुजाओं का आश्रय लेकर हम सब सुख से सोते हैं और क्षुद्र कौरवों द्वारा छीने गए अपने राज्य को पुनः प्राप्त करना चाहते हैं; अमिताग्नि तेजस्वी दुर्योधन जिनकी वीरता के बारे में सोच-सोचकर शकुनि के साथ अपनी एक भी रात सुख से नहीं सो पाता; जिन वीर के पराक्रम से हम लाक्षागृह और अन्य पापों से मुक्त हुए तथा पुरोचन मारा गया; जिनके बाहुबल का भरोसा करके हम यह मानते हैं कि धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हम इस धन-धान्य से परिपूर्ण पृथ्वी को पुनः प्राप्त कर लेंगे..."
- व्याख्या: युधिष्ठिर भीम के महत्व का बखान करते हुए कहते हैं कि पांडवों की सारी उम्मीदें और भविष्य का राज्य उन्हीं के पराक्रम पर टिका है।
श्लोक 14:
तस्य व्यवसितस्त्यागो बुद्धिमास्थाय कां त्वया। कच्चिन्नु दुःखैर्बुद्धिस्ते विलुप्ता गतचेतसः।।1-176-14a 1-176-14b
- हिन्दी अनुवाद: "...उन्हीं का त्याग करने का निश्चय आपने किस बुद्धि के सहारे कर लिया है? क्या दुःखों के कारण आपकी बुद्धि नष्ट हो गई है और आपकी चेतना मारी गई है?"
- व्याख्या: युधिष्ठिर अत्यधिक दुःखी होकर अपनी माता से प्रश्न करते हैं कि उन्होंने ऐसा निर्णय कैसे ले लिया।
श्लोक 15 से 24 (कुन्ती का युधिष्ठिर को समझाना और भीम की शक्ति का परिचय देना)
श्लोक 15 और 16:
कुन्त्युवाच।1-176-15x युधिष्ठिर न संतापस्त्वया कार्यो वृकोदरे। न चायं बुद्धिदौर्बल्याद्व्यवसायः कृतो मया।।1-176-15a 1-176-15b `न च शोकेन बुद्धिः सा विलुप्ता गतचेकसः।' इह विप्रस्य भवने वयं पुत्र सुखोषिताः। अज्ञाता धार्तराष्ट्राणां सत्कृता वीतमन्यवः।।1-176-16a 1-176-16b 1-176-16c
- हिन्दी अनुवाद: कुन्ती बोली— "हे युधिष्ठिर! तुम्हें वृकोदर (भीम) के लिए तनिक भी संताप नहीं करना चाहिए। मैंने यह निर्णय किसी बुद्धि-दौर्बल्य (मूर्खता) के कारण नहीं लिया है। न ही शोक के कारण मेरी बुद्धि या चेतना भ्रमित हुई है। पुत्र! धार्तराष्ट्रों से अज्ञात रहते हुए, उनके द्वारा सम्मानित और क्रोध-मुक्त होकर हम इस ब्राह्मण के घर में बड़े सुख से रहे हैं।"
- व्याख्या: कुन्ती युधिष्ठिर को शांत करती हैं और समझाती हैं कि उनका यह कदम पूरी तरह सोच-समझकर उठाया गया है।
श्लोक 17 और 18:
तस्य प्रतिक्रिया पार्थ मयेयं प्रसमीक्षिता। एतावानेव पुरुषः कृतं यस्मिन्न नश्यति।।1-176-17a 1-176-17b यावच्च कुर्यादन्योऽस्य कुर्याद्बहुगुमं ततः। `ब्राह्मणार्थे महान्धर्मो जानामीत्थं वृकोदरे।।'1-176-18a 1-176-18b
- हिन्दी अनुवाद: "हे पार्थ! उसी (उपकार) का यह प्रतिदान (प्रतिक्रिया) मैंने अच्छी तरह सोच-विचार कर तय किया है। पुरुष वही है जिसके द्वारा किया गया उपकार नष्ट न हो, बल्कि वह दूसरे के उपकार से कई गुना बढ़कर उसका बदला चुकाए। और ब्राह्मण के हित में तो महान धर्म है, यह बात मैं भीमसेन के संबंध में अच्छी तरह जानती हूँ।"
- व्याख्या: कुन्ती कृतज्ञता के धर्म को समझाती हैं कि संकट के समय ब्राह्मण परिवार ने उन्हें शरण दी थी, इसलिए उनके उपकार का बदला चुकाना उनका कर्तव्य है।
श्लोक 19, 20 और 21:
दृष्ट्वा भीमस्य विक्रान्तं तदा जतुगृहे महत्। हिडिम्बस्य वधाच्चैवं विश्वासो मे वृकोदरे।।1-176-19a 1-176-19b बाह्वोर्बलं हि भीमस्य नागायुतसमं महत्। येन यूयं गजप्रख्या निर्व्यूढा वारणावतात्।।1-176-20a 1-276-20b वृकोदरेण सदृशो बलेनान्यो न विद्यते। यो व्यतीयाद्युधि श्रेष्ठमपि वज्रधरं स्वयम्।।1-176-21a 1-276-21b
- हिन्दी अनुवाद: "लाक्षागृह में भीम के उस महान पराक्रम को देखकर और हिडिम्ब के वध को देखकर मेरा भीमसेन पर अटूट विश्वास है। भीम की दोनों भुजाओं का बल दस हजार हाथियों के बल के समान महान है, जिनके सहारे तुम जैसे गजराज जैसे शूरवीर वारणावत से सुरक्षित बाहर निकाले गए थे। बल में वृकोदर के समान दूसरा कोई वीर इस पृथ्वी पर नहीं है, जो युद्ध में स्वयं वज्रधारी (इंद्र) का भी सामना करने में सक्षम हो।"
- व्याख्या: कुन्ती भीम की असीम शारीरिक शक्ति और उनके द्वारा किए गए पराक्रमों (जैसे लाक्षागृह से निकालना और हिडिम्ब वध) का हवाला देकर युधिष्ठिर का भय दूर करती हैं।
श्लोक 22, 23 और 24:
जातमात्रः पुरा चैव ममाङ्कात्पतितो गिरौ। शरीरगौरवादस्य शिला गात्रैर्विचूर्णिता।।1-176-22a 1-176-22b तदहं प्रज्ञया ज्ञात्वा बलं भीमस्य पाण्डव। प्रतिकार्ये च विप्रस्य ततः कृतवती मतिम्।।1-176-23a 1-176-23b नेदं लोभान्न चाज्ञानान्न च मोहाद्विनिश्चितम्। बुद्धिपूर्वं तु धर्मस्य व्यवसायः कृतो मया।।1-176-24a 1-176-24b
- हिन्दी अनुवाद: "जन्म लेते ही पर्वत पर जब यह मेरी गोद से नीचे गिरा था, तो इसके शरीर के भारीपन के कारण इसके अंगों से टकराकर नीचे की विशाल शिला चूर-चूर हो गई थी। हे पाण्डव! भीम के इस बल को अपनी बुद्धि से अच्छी तरह जानकर ही मैंने इस ब्राह्मण के संकट का प्रतिकार करने का यह निश्चय किया है। मैंने यह निर्णय किसी लोभ, अज्ञान या मोहवश नहीं लिया है, बल्कि पूरी बुद्धि और धर्म को ध्यान में रखकर ही यह व्यवसाय (निश्चय) किया है।"
- व्याख्या: कुन्ती भीम के बचपन का एक संस्मरण सुनाती हैं कि कैसे जन्म के तुरंत बाद उनके वजन से पत्थर टूट गया था, जिससे उनकी असाधारण शक्ति सिद्ध होती है।
श्लोक 25 से 30 (धर्म का पालन और महर्षि व्यास का उपदेश)
श्लोक 25 और 26:
अर्थौ द्वावपि निष्पन्नौ युधिष्ठिर भविष्यतः। प्रतीकारश्च वासस्य धर्मश्च चरितो महान्।।1-176-25a 1-176-25b यो ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुर्यादर्थेषु कर्हिचित्। क्षत्रियः स शुभाँल्लोकानाप्नुयादिति मे मतिः।।1-176-26a 1-176-26b
- हिन्दी अनुवाद: "हे युधिष्ठिर! इससे हमारे दोहरे उद्देश्य (अर्थ) सिद्ध होंगे— एक तो हमारे यहाँ रहने के उपकार का बदला चुक जाएगा, और दूसरा महान धर्म का आचरण होगा। जो क्षत्रिय किसी भी प्रकार से ब्राह्मण की सहायता करता है, वह उत्तम लोकों को प्राप्त होता है— ऐसा मेरा मत है।"
- व्याख्या: कुन्ती समझाती हैं कि इस कार्य से शरण देने वाले ब्राह्मण का ऋण भी उतरेगा और सबसे बड़ा क्षत्रिय धर्म भी निभाया जाएगा।
श्लोक 27, 28 और 29:
क्षत्रियस्यैव कुर्वाणः क्षत्रियो वधमोक्षणम्। विपुलां कीर्तिमाप्नोति लोकेऽस्मिंश्च परत्र च।।1-176-27a 1-176-27b वैश्यस्यार्थे च साहाय्यं कुर्वाणः क्षत्रियो भुवि। स सर्वेष्वपि लोकेषु प्रजा रञ्जयते ध्रुवम्।।1-176-28a 1-176-28b शूद्रं तु मोचयेद्राजा शरणार्थिनमागतम्। प्राप्नोतीह कुले जन्म सद्द्रव्ये राजपूजिते।।1-176-29a 1-176-29b
- हिन्दी अनुवाद: "यदि कोई क्षत्रिय किसी क्षत्रिय की ही वध से रक्षा करे, तो वह इस लोक और परलोक में विपुल कीर्ति प्राप्त करता है। पृथ्वी पर जो क्षत्रिय किसी वैश्य की सहायता करता है, वह निश्चित ही सभी लोकों में प्रजा को प्रसन्न करने वाला होता है। और जो राजा शरण में आए हुए किसी शूद्र की भी रक्षा करता है, वह इस पृथ्वी पर राजपूजित उत्तम कुल में जन्म प्राप्त करता है।"
- व्याख्या: कुन्ती विभिन्न वर्णों की रक्षा करने के धर्म और उसके पुण्यों का विस्तार से वर्णन करती हैं।
श्लोक 30:
एवं मां भगवान्व्यासः पुरा पौरवनन्दन। प्रोवाचासुकरप्रज्ञस्तस्मादेवं चिकीर्षितम्।।1-176-30a 1-176-30b
- हिन्दी अनुवाद: "हे पौरवनंदन! पूर्वकाल में महाप्राज्ञ भगवान व्यासजी ने मुझे इसी प्रकार उपदेश दिया था, इसीलिए मैंने ऐसा करने का निश्चय किया है।"
- व्याख्या: माता कुन्ती बताती हैं कि उनका यह विचार और मार्गदर्शन स्वयं महर्षि व्यास का दिया हुआ है, इसलिए इसमें कोई शंका या भय नहीं होना चाहिए।
