महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७७

महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७७

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत बकवधपर्व के 177वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 3 (युधिष्ठिर की स्वीकृति और गोपनीयता का निर्देश)

श्लोक 1 और 2:

युधिष्ठिर उवाच।1-177-1x उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद्बुद्धिपूर्वकम्। आर्तस्य ब्राह्मणस्यैतदनुक्रोशादिदं कृतम्।।1-177-1a 1-177-1b ध्रुवमेष्यति भीमोऽयं निहत्य पुरुषादकम्। सर्वथा ब्राह्मणस्यार्थे यदनुक्रोशवत्यसि।।1-177-2a 1-177-2b

  • हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर बोले— "माताजी! आपने जो यह बुद्धिपूर्वक निर्णय लिया है, वह बिल्कुल उचित है। दुःखी ब्राह्मण के प्रति करुणा (अनुक्रोश) के कारण ही आपने ऐसा किया है। आप ब्राह्मण के प्रति इतनी करुणा रखने वाली हैं, इसलिए यह निश्चित है कि भीमसेन उस नर-भक्षी राक्षस को मारकर अवश्य लौटेंगे।"
  • व्याख्या: युधिष्ठिर अपनी माता कुन्ती के इस निर्णय के पीछे छिपे धर्म और करुणा के भाव को समझ जाते हैं और आश्वस्त होते हैं कि भीम उस राक्षस का अंत कर देंगे।

श्लोक 3:

यथा त्विदं न विन्देयुर्नरा नगरवासिनः। यथाऽयं ब्राह्मणो वाच्यः परिग्राह्यश्च यत्नतः।।1-177-3a 1-177-3b

  • हिन्दी अनुवाद: "किंतु नगरवासी मनुष्य इस बात को न जान पाएँ, इस प्रकार उस ब्राह्मण को अच्छी तरह समझा-बुझा देना चाहिए और यत्नपूर्वक उसकी रक्षा व गोपनीयता का ध्यान रखना चाहिए।"
  • व्याख्या: युधिष्ठिर अज्ञातवास के नियमों का पालन करते हुए यह सावधानी बरतने को कहते हैं कि नगर के लोगों को यह पता न चले कि राक्षस को मारने वाला कोई बाहरी राजकुमार (पांडव) है।

श्लोक 4 से 8 (भीमसेन का ब्राह्मण के घर जाना और अपना निर्णय बताना)

श्लोक 4 और 5:

वैशंपायन उवाच।1-177-4x `युधिष्ठिरेण संमन्त्र्य ब्राह्मणार्थमरिन्दम। कुन्ती प्रविश्य तान्सर्वान्मन्त्रयामास भारत।।1-177-4a 1-177-4b अथ रात्र्यां व्यतीतायां भीमसेनो महाबलः। ब्राह्मणं समुपागम्य वचश्चेदमुवाच ह।।1-177-5a 1-177-5b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भारत! युधिष्ठिर के साथ विचार-विमर्श करके कुन्ती ने अंदर जाकर उन सभी (ब्राह्मण परिवार) से मंत्रणा की। इसके बाद रात बीत जाने पर महाबली भीमसेन उस ब्राह्मण के पास गए और उनसे यह वचन कहा—
  • व्याख्या: योजना तय होने के बाद अगले दिन प्रातकाल भीमसेन सीधे उस ब्राह्मण के पास पहुँचे और उन्हें भरोसा दिलाया।

श्लोक 6, 7 और 8:

आपदस्त्वां विमोक्ष्येऽहं सपुत्रं ब्राह्मण प्रियम्। मा भैषी राक्षसात्तस्मान्मां ददातु बलिं भवान्।।1-177-6a 1-177-6b इद मामशितं कर्तुं प्रयतस्व सकृद्गृहे। आथात्मानं प्रादास्यामि तस्मै घोराय रक्षसे।।1-177-7a 1-177-7b त्वरध्वं किं विलम्बध्वे मा चिरं कुरुतानघाः। व्यवस्येयं मनः प्राणैर्युष्मान्रक्षितुमद्य वै।।1-177-8a 1-177-8b

  • हिन्दी अनुवाद: "हे प्रिय ब्राह्मण! पुत्र सहित आपको मैं इस आपदा से मुक्त कर दूँगा। आप उस राक्षस से बिल्कुल मत डरिए, बल्कि आप मुझे ही उसके लिए बलि के रूप में दे दीजिए। आप अपने घर में एक बार मेरे लिए भरपेट भोजन तैयार करने का प्रयत्न कीजिए, उसके बाद मैं स्वयं को उस घोर राक्षस को सौंप दूँगा। हे अनघो! अब आप लोग जल्दी कीजिए, विलंब मत कीजिए और अधिक देर न लगाइए। आज मैं अपने मन और प्राणों से आप सबकी रक्षा करने का दृढ़ निश्चय कर चुका हूँ।"
  • व्याख्या: भीम अत्यंत आत्मीयता से ब्राह्मण परिवार को ढांढस बंधाते हैं और कहते हैं कि वे बेझिझक उन्हें राक्षस के कोटे का भोजन और बलि के रूप में प्रस्तुत कर दें।

श्लोक 9 से 17 (भोजन की तैयारी और भीमसेन का रथ पर सवार होकर राक्षस की ओर प्रस्थान)

श्लोक 9 और 10:

वैशंपायन उवाच।1-177-9x एवंमुक्तः स भीमेन ब्राह्मणो भरतर्षभ। सुहृदां तत्समाख्याय ददावन्नं सुसंस्कृतम्।।1-177-9a 1-177-9b पिशितोदनमाजह्रुरथास्मै पुरवासिनः। सघृतं सोपदंशं च सूपैर्नानाविधैः सह।।1-177-10a 1-177-10b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! भीम द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस ब्राह्मण ने अपने सगे-सम्बन्धियों को यह बात बताई और भीम को बहुत अच्छी प्रकार से संस्कारित (तैयार किया हुआ) भोजन दिया। इसके बाद नगरवासियों ने भी उनके लिए मांसयुक्त भात (पिशितोदन), घी, उपदंश (अचार/सलाद) और अनेक प्रकार की दालें लाकर प्रस्तुत कीं।
  • व्याख्या: बकासुर के समझौते के अनुसार जो भारी भोजन और मांस-भात आदि देना होता था, वह नगरवासियों और ब्राह्मण परिवार ने मिलकर भीम के लिए तैयार किया।

श्लोक 11, 12 और 13:

तदाऽशित्वा भीमसेनो मांसानि विविधानि च। मोदकानि च मुख्यानि चित्रोदनचयान्बहून्।।1-177-11a 1-177-11b ततोऽपिबद्दधिघटान्सुबहून्द्रोणसंमितान्। तस्य भुक्तवतः पौरा यथावत्समुपार्जितान्।।1-177-12a 1-177-12b उपजह्रुर्भृतं भागं समृद्धमनसस्तदा। ततो रात्र्यां व्यतीतायां सव्यञ्जनदधिप्लुतम्।।1-177-13a 1-177-13b

  • हिन्दी अनुवाद: तब भीमसेन ने उन विभिन्न प्रकार के मांसों, मुख्य-मुख्य मोदकों (लड्डुओं) और चावलों के ढेरों को बड़े चाव से खाया। इसके बाद उन्होंने द्रोण (माप विशेष) के बराबर बड़े-बड़े दही के कई घड़े पी डाले। उनके इस प्रकार भोजन करने पर प्रसन्न मन वाले नगरवासियों ने उनके उस निर्धारित कोटे (भाग) को यथावत लाकर भर दिया। रात बीतने के बाद, व्यंजनों और दही से सराबोर उस भोजन को...

श्लोक 14, 15, 16 और 17:

समारुह्यान्नसंपूर्णं शकटं स वृकोदरः। प्रययौ तूर्यनिर्घोषैः पौरैश्च परिवारितः।।1-177-14a 1-177-14b आत्मानमेषोऽन्नभूतो राक्षसाय प्रदास्यति। तरुणोऽप्रतिरूपश्च दृढ औदरिको युवा।।1-17-15a 1-177-15b वाग्भिरेवंप्रकाराभिः स्तूयमानो वृकोदरः। चुचोद स बलीवर्दौ युक्तौ सर्वाङ्गकालकौ।।1-17-16a 1-177-16b वादित्राणां प्रवादेन ततस्तं पुरुषादकम्। अभ्यगच्छत्सुसंहृष्टः सर्वत्र मनुजैर्वृतः।।1-177-17a 1-177-17b

  • हिन्दी अनुवाद: ...अन्नों से भरे उस शकट (गाड़ी) पर सवार होकर वृकोदर भीमसेन बाजे-गाजे (तूर्य की ध्वनि) के साथ और नगरवासियों से घिरे हुए चल पड़े। नगरवासी आपस में कह रहे थे— "यह तरुण, सुंदर और सुदृढ़ युवा स्वयं को अन्न रूप बनाकर उस राक्षस को समर्पित करने जा रहा है।" इस प्रकार की बातों से प्रशंसा किए जाते हुए वृकोदर भीम ने सर्वांग काले रंग के जुते हुए दोनों बैलों को हाँका (प्रेरित किया)। बाजों की गूँज के बीच, चारों तरफ मनुष्यों से घिरे हुए वे अत्यधिक प्रसन्नचित्त होकर उस नर-भक्षी राक्षस की ओर चल पड़े।
  • व्याख्या: भीम भोजन से भरी बैलगाड़ी पर खुद बैठकर, उसे मजे से खाते हुए और बाजे-गाजे के साथ ऐसे जा रहे थे मानो वे किसी उत्सव में जा रहे हों, जिसे देखकर नगरवासी हैरान थे।

श्लोक 18 से 26 (बकासुर की गुफा और श्मशानतुल्य वन में भीम का पहुँचना)

श्लोक 18, 19 और 20:

संप्राप्य स च तं देशमेकाकी समुपाययौ। पुरुषादभयाद्भीतस्तत्रैवासीज्जनव्रजः।।1-177-18a 1-177-18b स गत्वा दूरमध्वानं दक्षिणामभितो दिशम्। यतोपदिष्टमुद्देशे ददर्श विपुलं द्रुमम्।।1-177-19a 1-177-19b केशवमज्जास्थिमेदोभिर्बाहूरुचरणैरपि। आर्द्रैः शुष्कैश्च संकीर्णमभितोऽथ वनस्पतिम्।।1-177-20a 1-177-20b

  • हिन्दी अनुवाद: जब वे उस देश (निश्चित स्थान) के समीप पहुँचे, तो नर-भक्षी के भय से सहमे हुए बाकी लोग (नगरवासी) एक निश्चित दूरी पर ही रुक गए और भीम अकेले ही आगे बढ़े। दक्षिण दिशा की ओर लंबी यात्रा करके, बताए गए संकेत के अनुसार उन्होंने वहाँ एक विशाल वृक्ष देखा। उस बड़े वृक्ष के चारों ओर बाल, मज्जा, अस्थि, चर्बी तथा ताजे और सूखे हुए हाथ, जंघा और पैरों के अंगों के अवशेष बिखरे हुए थे।
  • व्याख्या: बकासुर के वध स्थल (शमशान जैसे भयानक वन) के पास पहुँचकर डर के मारे नगरवासी पीछे छूट गए और भीम अकेले ही आगे बढ़े, जहाँ चारों तरफ मरे हुए इंसानों के अवशेष बिखरे थे।

श्लोक 21, 22, 23 और 24:

गृध्रकङ्कबलच्छन्नं गोमायुगणसेवितम्। उग्रगन्धमचक्षुष्यं श्मशानमिव दारुणम्।।1-177-21a 1-177-21b तं प्रविश्य महावृक्षं चिन्तयामास वीर्यवान्। यावन्न पश्यते रक्षो बकाभिख्यं बलोत्तरम्।।1-177-22a 1-177-22b आचितं विविधैर्भोज्यैरन्नैरुच्चावचैरिदम्। शकटं सूपसंपूर्णं यावद्द्रक्ष्यति राक्षसः।।1-177-23a 1-177-23b तावदेह भोक्ष्येऽहं दुर्लभं हि पुनर्भवेत्। विप्रकीर्येत सर्वं हि प्रयुद्धे मयि रक्षसा।।1-177-24a 1-177-24b

  • हिन्दी अनुवाद: वह स्थान गिद्धों और कंक (गिद्ध प्रजाति) पक्षियों से ढका हुआ था, गीदड़ों के समूहों से सेवित था, उसकी गंध उग्र (तीव्र और दुर्गंधयुक्त) थी, जो आँखों को न सुहाने वाली तथा किसी भयानक श्मशान के समान थी। उस महावृक्ष के पास प्रवेश करके वीर भीमसेन ने विचार किया— "जब तक बक नामक वह बलोत्तर (शक्तिशाली) राक्षस यहाँ नहीं आता, और जब तक वह दालों और विविध भोजनों से भरी इस गाड़ी को देखता है, तब तक मैं स्वयं ही इस भोजन का आनंद ले लूँ, क्योंकि इसके बाद यह मिलना दुर्लभ हो जाएगा। राक्षस के साथ युद्ध शुरू होने पर यह सारा भोजन बिखर जाएगा..."
  • व्याख्या: भीम उस डरावनी जगह पर पहुँचकर भी जरा भी भयभीत नहीं हुए, बल्कि उन्होंने सोचा कि राक्षस के आने से पहले वे खुद ही उस स्वादिष्ट भोजन का मज़ा ले लें।

श्लोक 25 और 26:

अभोज्यं हि शवस्पर्शे निगृहीते बके भवेत्। स त्वेवं भीमकर्मा तु भीमसेनोऽभिलक्ष्य च।।1-177-25a 1-177-25b उपविश्य विविक्तेऽन्नं भुङ्क्ते स्म परमं परः। तं ततः सर्वतोऽपश्यन्द्रुमानारुह्य नागराः।।1-177-26a 1-177-26b

  • हिन्दी अनुवाद: "...क्योंकि बकासुर के साथ युद्ध होने और शवों का स्पर्श हो जाने पर यह अन्न अभोज्य (अशुद्ध) हो जाएगा।" ऐसा विचार करके भीमकर्मा भीमसेन ने वहाँ एक एकांत स्थान पर बैठकर उस उत्तम भोजन को बड़े मजे से खाना शुरू कर दिया। दूर पेड़ों पर चढ़कर नगरवासी चारों तरफ से यह सब देख रहे थे।
  • व्याख्या: भीम ने सोचा कि युद्ध छिड़ने के बाद खाना झूठा या अशुद्ध हो जाएगा, इसलिए उन्होंने राक्षस के आने से पहले ही गाड़ी का सारा भोजन खुद ही चट कर लिया।

श्लोक 27 से 33 (बकासुर का क्रोधित होकर आना और भीम का उपेक्षा करना)

श्लोक 27 और 28:

नारक्षो बलिमश्नीयादेवं बहु च मानवाः। भुङ्क्ते ब्राह्मणरूपेण बकोऽयमिति चाब्रुवन्।।1-177-27a 1-177-27b स तं हसति तेजस्वी तदन्नमुपभुज्य च।' आसाद्य तु वनं तस्य रक्षसः पाण्डवो बली। आजुहाव ततो नाम्ना तदन्नमुपपादयन्।।1-177-28a 1-177-28b 1-177-28c

  • हिन्दी अनुवाद: नगरवासियों ने आपस में कहा— "इस प्रकार तो राक्षस इस बलि (भोजन) को नहीं खा पाएगा, और बहुत से मनुष्य यह भी कहने लगे कि लगता है यह कोई दूसरा बक राक्षस है जो ब्राह्मण का रूप बदलकर खुद भोजन खा रहा है।" तेजस्वी भीमसेन उस भोजन को खाकर हँस रहे थे। उस राक्षस के वन में पहुँचकर बलवान पाण्डव (भीम) ने उस भोजन को समाप्त करते हुए उसका नाम लेकर उसे ललकारा (पुकारा)।
  • व्याख्या: भीम ने मजे से सारा खाना अकेले खा लिया और ऊपर से बकासुर का नाम लेकर उसे युद्ध के लिए पुकारा, जिसे देखकर पेड़ पर छिपे लोग हैरान रह गए।

श्लोक 29, 30 और 31:

ततः स राक्षसः क्रुद्धो भीमस्य वचनात्तदा। आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थितः।।1-177-29a 1-177-29b महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम्। लोहिताक्षो करालश्च लोहितश्मश्रुमूर्धजः।।1-177-30a 1-177-30b आकर्णाद्भिन्नवक्त्रश्च शङ्कुकर्णो विभीषणः। त्रिशिखां भ्रुकिटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम्।।1-177-31a 1-177-31b

  • हिन्दी अनुवाद: भीम के पुकारने पर वह राक्षस अत्यंत क्रोधित होकर उस स्थान की ओर दौड़ा जहाँ भीमसेन उपस्थित थे। उसका शरीर बहुत विशाल था, गति तीव्र थी जिससे मानो पृथ्वी फटी जा रही थी। उसकी आँखें लाल थीं, मुख विकराल था, उसकी दाढ़ी-मूँछ और सिर के बाल लाल थे। उसका मुँह कान तक फैला हुआ था, कान शंख जैसे बड़े थे तथा वह अत्यंत भयानक था। वह अपनी भौंहों पर तीन रेखाओं वाली (त्रिशिखा) त्यौरियाँ चढ़ाकर और अपने होठों को दाँतों से चबाते हुए आगे बढ़ा।
  • व्याख्या: अपनी दावत और कोटे का भोजन खुद खाए जाने की बात सुनकर बकासुर आग-बबूला होकर भयानक रूप में प्रकट हुआ।

श्लोक 32 और 33:

भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः। विवृत्य नयने क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत्।।1-177-32a 1-177-32b कोऽयमन्नमिदं भुङ्क्ते मदर्थमुपकल्पितम्। पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्यियासुर्यमसादनम्।।1-177-33a 1-177-33b

  • हिन्दी अनुवाद: भोजन करते हुए उस भीमसेन को देखकर उस राक्षस ने अपनी आँखें फाड़कर क्रोध में भरकर यह वचन कहा— "मेरे लिए कल्पित किए गए इस भोजन को मेरे देखते-देखते यह कौन दुर्बुद्धि खा रहा है जो सीधे यमराज के घर जाने की इच्छा रखता है?"
  • व्याख्या: बकासुर ने गुस्से में भीम को ललकारा कि उसके हिस्से का खाना खाने की हिम्मत किसने की।

श्लोक 34 से 40 (भीम की उदासीनता और दोनों के बीच प्रारंभिक संघर्ष)

श्लोक 34, 35 और 36:

भीमसेनस्ततः श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत। राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एव पराङ्मुखः।।1-177-34a 1-177-34b रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ। अभ्यद्रवद्भीमसेनं जिघांसुः पुरुषादकः।।1-177-35a 1-177-35b तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः। राक्षस भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा।।1-177-36a 1-177-36b

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत! वह बात सुनकर भीमसेन मानो हँसते हुए, उस राक्षस की उपेक्षा करके (उसकी तरफ बिना ध्यान दिए) मुँह फेरकर भोजन ही करते रहे। तब नर-भक्षी उस राक्षस ने एक भयानक आवाज निकाली और अपनी दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर भीमसेन को मारने के लिए उसकी ओर दौड़ा। किंतु शत्रुओं के वीरों का नाश करने वाले पाण्डव वृकोदर भीम ने उसकी उस उपेक्षा करते हुए (उसे नजरअंदाज करके) बड़े आराम से भोजन करना जारी रखा।
  • व्याख्या: भीम का यह दुस्साहस देखकर राक्षस का गुस्सा और बढ़ गया कि कोई उसकी उपस्थिति की परवाह तक नहीं कर रहा है।

श्लोक 37, 38, 39 और 40:

अमर्षेण तु संपूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम्। जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः।।1-177-37a 1-177-37b तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः। नैवावलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः।।1-177-38a 1-177-38b ततः स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः। ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद्बली।।1-177-39a 1-177-39b क्षiptं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान्। सव्येन पाणिना भीमो दक्षिणेनाप्यभुङ्क्त ह।।1-177-40a 1-177-40b

  • हिन्दी अनुवाद: क्रोध से भर कर पीछे खड़े उस राक्षस ने कुन्तीपुत्र वृकोदर की पीठ पर अपने दोनों हाथों से जोरदार प्रहार किया। उस बलवान राक्षस द्वारा हाथों से बहुत जोर से मारे जाने पर भी भीमसेन ने उसकी तरफ पलटकर नहीं देखा और वे लगातार भोजन ही करते रहे। तब वह राक्षस और अधिक क्रोधित होकर एक बड़ा सा वृक्ष उखाड़कर लाया और भीम को उससे पीटने के लिए दौड़ा। गुस्से में फेंके गए उस वृक्ष को वीर भीमसेन ने अपने बाएँ (लह) हाथ से पकड़ लिया, जबकि दाहिने हाथ से वे भोजन कर ही रहे थे!
  • व्याख्या: भीम का गजब का आत्मसमर्पण और निर्भयता देखिए कि राक्षस पीछे से पीट रहा है और पेड़ फेंक रहा है, और भीम एक हाथ से पेड़ रोक रहे हैं और दूसरे हाथ से आराम से खाना खा रहे हैं।

श्लोक 41 से 45 (भीम का भोजन समाप्त करना और युद्ध के लिए ललकारना)

श्लोक 41, 42 और 43:

`शकटान्नं ततो भुक्त्वा रक्षसः पाणिना सह। गृह्णन्नेव तदा वृक्षं निःशेषं पर्वतोपमम्।।1-177-41a 1-177-41b भीमसेनो हसन्नेव भुक्त्वा त्यक्त्वा च राक्षसम्। पीत्वा दधिघटान्पूर्णान्घृतकुम्भाञ्शतं शतम्।।1-177-42a 1-177-42b वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ गिरिरिवापरः। भ्रामयन्तं महावृक्षमायान्तं भीमदर्शनम्।।1-177-43a 1-177-43b

  • हिन्दी अनुवाद: गाड़ी का सारा अन्न और राक्षस के हाथ का वह प्रहार सहते हुए भी, पर्वत के समान उस विशाल वृक्ष को उन्होंने पकड़ लिया। भीमसेन हँसते हुए भोजन समाप्त कर, राक्षस को छोड़कर, सैकड़ों पूर्ण दही और घी के घड़ों को पीकर, हाथ-मुँह धोकर (आचमन करके) अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर दूसरे पर्वत की भाँति खड़े हो गए। महावृक्ष को घुमाते हुए भयानक रूप से आते हुए उस राक्षस को...

श्लोक 44 और 45:

दृष्टोत्थायाहवे वीरः सिंहनादं व्यनादयत्। भुजवेगं तथाऽऽस्फोटं क्ष्वेलितं च महास्वनम्।।1-177-44a 1-177-44b कृत्वाऽऽह्वयत संक्रुद्धो भीमसेनोऽथ राक्षसम्। उवाचाशनिशब्देन ध्वनिना भीषयन्निव।।1-177-45a 1-177-45b

  • हिन्दी अनुवाद: ...देखकर वह वीर (भीम) युद्ध के लिए उठ खड़े हुए और उन्होंने एक भयंकर सिंहनाद किया। अपनी भुजाओं के वेग का प्रदर्शन करते हुए, ताल ठोंककर (आस्फोट) और एक महान गर्जना करते हुए, क्रोध में भरे भीमसेन ने उस राक्षस को युद्ध के लिए ललकारा। बिजली की गर्जना के समान अपनी आवाज से उन्होंने उस राक्षस को भयभीत करते हुए यह कहा—
  • व्याख्या: भोजन पूरा करने के बाद भीम ने अपनी असली ताकत दिखाई और जोरदार सिंहनाद करके बकासुर को आमने-सामने की लड़ाई के लिए ललकारा।

श्लोक 46 से 56 (भीम की चेतावनी और दोनों के बीच वृक्षों का भयंकर युद्ध)

श्लोक 46, 47, 48 और 49:

भीम उवाच।1-177-46x बहुकालं सुपुष्टं ते शरीरं राक्षसाधम। द्विपच्चतुष्पन्मांसैश्च बहुभिश्चौदनैरपि।।1-177-46a 1-177-46b मद्बाहुबलमाश्रित्य न त्वं भूयस्त्वशिष्यसि। अद्य मद्बाहुनिष्पिष्टो गमिष्यसि यमालयम्।।1-177-47a 1-177-47b अद्यप्रभृति स्वप्स्यन्ति वेत्रकीयनिवासिनः। निरुद्विग्नाः पुरस्यास्य कण्टके सूद्धृते मया।।1-177-48a 1-177-48b अद्य युद्धे शरीरं ते कङ्कगोमायुवायसाः। मया हतस्य खादन्तु विकर्षन्तु च भूतले।।1-177-49a 1-177-49b

  • हिन्दी अनुवाद: भीम बोले— "हे राक्षसाधम! दो पैर और चार पैर वाले प्राणियों के मांस तथा बहुत सारे अन्नों को खाकर तुम्हारा यह शरीर लंबे समय से अच्छी तरह पुष्ट हुआ है। किंतु अब मेरे बाहुबल का आश्रय पाकर तुम दोबारा कभी भोजन नहीं कर पाओगे। आज मेरे हाथों से कुचले जाकर तुम यमराज के घर जाओगे। आज से वेत्रकी (एकचक्र) नगर के निवासी पूरी तरह निर्द्वंद होकर सोएँगे, क्योंकि आज मैंने इस नगर के इस काँटे (तुम्हें) को उखाड़ फेंका है। आज युद्ध में मेरे द्वारा मारे जाने के बाद तुम्हारे इस शरीर को गिद्ध, गीदड़ और कौए खाएँगे और पृथ्वी पर घसीटेंगे।"
  • व्याख्या: भीम राक्षस को उसकी क्रूरता का अंत करने और नगरवासियों को हमेशा के लिए भयमुक्त करने की चेतावनी देते हैं।

श्लोक 50, 51, 52 और 53:

वैशंपायन उवाच।1-177-50x एवंमुक्त्वा सुसंक्रुद्धः पार्थो बकजिघांसया। उपाधावद्बकश्चापि पार्थं पार्थिवसत्तम।।1-177-50a 1-177-50b महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम्। पिशङ्गरूपः पिङ्गाक्षो भीमसेनमभिद्रवत्।।1-177-51a 1-177-51b त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम्। भृशं स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः।।1-177-52a 1-177-52b ताडयिष्यंस्तदा भीमं तरसाऽभ्यद्रवद्बली। क्रुद्धेनाभिहतं वृक्षं प्रतिजग्राह लीलया।।1-177-53a 1-177-53b

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— ऐसा कहकर बकासुर का वध करने की इच्छा से अत्यंत क्रोधित हुए पाण्डुपुत्र (भीम) उसकी ओर दौड़े, और बक राक्षस भी राजाओं में श्रेष्ठ पार्थ की ओर झपटा। विशाल शरीर और तीव्र गति वाला, पृथ्वी को फाड़ते हुए प्रतीत होने वाला, पीले-भूरे रंग का और पिंगल नेत्रों वाला वह राक्षस भीमसेन की ओर दौड़ा। भौंहों पर त्यौरियाँ चढ़ाकर और होठों को चबाते हुए, भयंकर रूप से क्रोधित उस बलवान राक्षस ने एक वृक्ष लेकर भीम पर प्रहार करने के लिए वेग से आक्रमण किया। उस गुस्से में चलाए गए वृक्ष को भीम ने खेल-ही-खेल में (बड़ी सहजता से) पकड़ लिया।
  • व्याख्या: दोनों महाबलियों के बीच सीधी टक्कर शुरू हो गई और राक्षस द्वारा फेंके गए पेड़ों को भीम सहज ही रोक रहे थे।

श्लोक 54, 55 और 56:

सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत। ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान्बहुविधान्बली।।1-177-54a 1-177-54b प्राहिणोद्भीमसेनाय बकोऽपि बलवान्रणे। सर्वानपोहयद्वृक्षान्स्वस्य हस्तस्य शाखया।।1-177-55a 1-177-55b तद्वृक्षयुद्धमभवद्वृक्षषण्डविनाशनम्।। महत्सुघोरं राजेन्द्र बकपाण्डवयोस्तदा।।1-177-56a 1-177-56b

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत! भीम ने हँसते हुए अपने बाएँ हाथ से उस वृक्ष को रोक लिया। तब युद्ध में बलवान बक राक्षस ने फिर से कई प्रकार के बड़े-बड़े वृक्षों को उठाकर भीमसेन पर फेंका। किंतु भीम ने अपने हाथ की शाखाओं (या एक पेड़ की डाल) से उन सभी वृक्षों को रास्ते में ही हटा दिया। हे राजेन्द्र! बक और पाण्डव का वह वृक्षों का युद्ध वनों के समूहों को नष्ट कर देने वाला अत्यंत भीषण और महान युद्ध बन गया।
  • व्याख्या: दोनों ने हथियारों की जगह बड़े-बड़े जंगलों के पेड़ों को उखाड़कर एक-दूसरे पर बरसाना शुरू कर दिया, जिससे पूरा इलाका साफ होने लगा।

श्लोक 57 से 65 (गिरे-पड़े संघर्ष और दोनों के बीच मल्लविद्या)

श्लोक 57, 58 और 59:

नाम विश्राव्य स बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम्। समयुध्यत तीव्रेण वेगेन पुरुषादकः।।1-177-57a 1-177-57b तयोर्वेगेन महता पृथिवी समकम्पत। पापादपांश्च महामात्रांश्चूर्णयामासतुः क्षणात्।।1-177-58a 1-177-58b द्रुतमागत्य पाणिभ्यां गृहीत्वा चैनमाक्षिपत्। आक्षिप्तो भीमसेनश्च पुनरेवोत्थितो हसन्।।1-177-59a 1-177-59b

  • हिन्दी अनुवाद: अपना नाम पुकारकर उस नर-भक्षी बक ने पाण्डव पर तेजी से आक्रमण किया और तीव्र वेग से युद्ध करने लगा। उन दोनों के उस महान वेग से पृथ्वी काँप उठी और उन्होंने क्षण भर में ही बड़े-बड़े पेड़ों को चूर्ण कर डाला। तेजी से आगे बढ़कर राक्षस ने अपने हाथों से भीम को पकड़कर पटक दिया, किंतु आक्षिप्त (गिराए जाने) होने पर भी भीमसेन हँसते हुए तुरंत फिर से खड़े हो गए।
  • व्याख्या: राक्षस के पटकने पर भी भीम को कोई अंतर नहीं पड़ा और वे मुस्कुराते हुए फिर से उठ खड़े हुए, जिससे राक्षस की चिंता बढ़ गई।

श्लोक 60, 61, 62 और 63:

आलिङ्ग्यापि बकं भीमो न्यहनद्वसुधातले। भीमो विसर्जयित्वैनं समाश्वसिहि राक्षस।।1-177-60a 1-177-60b इत्युक्त्वा पुनरास्फोट्य उत्तिष्ठेति च सोऽब्रवीत्। समुत्पत्य ततः क्रुद्धो रूपं कृत्वा महत्तरम्।।1-177-61a 1-177-61b विरूपः सहसा तस्थौ2 तर्जयित्वा वृकोदरम्। अहसद्भीमसेनोऽपि राक्षसं भीमदर्शनम्।।1-177-62a 1-177-62b असौ गृहीत्वा पाणिभ्यां पृष्ठतश्च व्यवस्थितः। जानुभ्यां पीडयित्वाथ पातयामास भूतले।।1-177-63a 1-177-63b

  • हिन्दी अनुवाद: भीम ने भी बक को अपनी बाहों में जकड़कर पृथ्वी पर पटक दिया। फिर भीम ने उसे छोड़कर कहा— "हे राक्षस! अब ज़रा संभल जाओ (साँस ले लो)!" ऐसा कहकर और अपनी भुजाओं की थाप (आस्फोट) मारकर उन्होंने कहा— "अब उठो!" तब क्रोधित होकर वह राक्षस और भी बड़ा भयंकर रूप बनाकर अचानक एक विकृत रूप में वृकोदर को धमकाते हुए खड़ा हो गया। किंतु भीमसेन भी उस भयानक दिखने वाले राक्षस को देखकर हँस पड़े। तब राक्षस ने पीछे से आकर अपने दोनों हाथों से भीम को पकड़ लिया, घुटनों से उनकी पीठ पर प्रहार करके उन्हें भूमि पर गिरा दिया।
  • व्याख्या: दोनों के बीच दाँवपेंच और मल्लविद्या का जबरदस्त मुकाबला चल रहा था, जहाँ एक-दूसरे को गिराने और उठाने का क्रम जारी था।

श्लोक 64 से 76 (भीम द्वारा राक्षस की कमर पकड़ना और दोनों का भीषण संघर्ष)

श्लोक 64, 65 और 66:

पुनः क्रुद्धो विसृज्यैनं राक्षसं क्रोधजीवितम्। स्वां कटीमीषदुन्नम्य बाहू तस्य परामृशत्।।1-177-64a 1-177-64b तस्य बाहू समादाय त्वरमाणो वृकोदरः। उत्क्षिप्य चावधूयैनं पातयन्बलवान्भुवि।।1-177-65a 1-177-65b तं तु वामेन पादेन क्रुद्धो भीमपराक्रमः। उरस्येनं समाजघ्ने भीमस्तु पतितं भुवि।।1-177-66a 1-177-66b

  • हिन्दी अनुवाद: क्रोध से जीवित रहने वाले उस राक्षस को भीम ने फिर से छोड़ दिया और अपनी कमर को थोड़ा ऊँचा करके उसकी भुजाओं को पकड़ लिया। तत्परता दिखाते हुए वृकोदर ने उसकी दोनों भुजाओं को पकड़ा, उसे हवा में उठाया, जोर से झटका देकर पृथ्वी पर पटक दिया। भूमि पर गिरे हुए उस राक्षस के सीने पर क्रोधित भीमपराक्रमी भीम ने अपने बाएँ पैर से जोरदार प्रहार किया।
  • व्याख्या: भीम ने अपनी मल्लविद्या के कौशल से राक्षस को नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया और उसे जमीन पर गिराकर छाती पर पैर रख दिया।

श्लोक 67, 68, 69 और 70:

व्यात्ताननेन घोरेण लम्बजिह्वेन रक्षसा। तेनाभिद्रुत्य भीमेन भीमो मूर्ध्नि समाहतः।।1-177-67a 1-177-67b एवं निहन्यमानः स राक्षसेन बलीयसा। रषेण महताऽऽविष्टो भीमो भीमपराक्रमः।।1-177-68a 1-177-68b गृहीत्वा मध्यमुत्क्षिप्य बली जग्राह राक्षसम्। तावन्योन्यं पीडयन्तौ पुरुषादवृकोदरौ।।1-177-69a 1-177-69b मत्ताविव महानागावन्योन्यं विच각형तुः।।1-177-70a

  • हिन्दी अनुवाद: अपने भयानक खुले हुए मुँह और लटकी हुई जीभ वाले उस राक्षस द्वारा दौड़कर प्रहार किए जाने पर भीम ने भी उसके सिर पर प्रहार किया। उस बलवान राक्षस द्वारा इस प्रकार प्रहार किए जाने पर महापराक्रमी भीम महान क्रोध से भर गए। बलवान भीम ने बीच से (कमर से) पकड़कर उस राक्षस को ऊपर उठाया और जकड़ लिया। नर-भक्षी और वृकोदर (भीम) दोनों एक-दूसरे को कष्ट देते हुए, मतवाले दो विशाल हाथियों की तरह एक-दूसरे को खींचने लगे।
  • व्याख्या: दोनों के बीच संघर्ष अब अपने चरम पर था, जहाँ दोनों एक-दूसरे को मात देने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहे थे।

श्लोक 71, 72, 73, 74 और 75:

बाहुविक्षेपशब्दैश्च भीमराक्षसयोस्तदा। वेत्रकीयपुरी सर्वा वित्रस्ता समपद्यत।।1-177-71a 1-177-71b तयोर्वेगेन महता तत्र भूमिरकम्पत। पापादपान्वीरुधश्चैव चूर्णयामासतू रयात्।।1-177-72a 1-177-72b समागतौ च तौ वीरावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ। गिरिभिर्गिरिशृह्गैश्च पाषाणैः पर्वतच्युतैः।।1-177-73a 1-177-73b अन्योन्यं ताडयन्तौ तौ चूर्णयामासतुस्तदा। आयामविस्तराभ्यां च परितो योजनद्वयम्।।1-177-74a 1-177-74b निर्महीरुहपाषाणतृणकुञ्जलतावलिम्। चक्रतुर्युद्धदुर्मत्तौ कूर्मपृष्ठोपमां महीम्।।1-177-75a 1-177-75b

  • हिन्दी अनुवाद: भीम और राक्षस की भुजाओं के फटकने (विक्षेप) की आवाज़ों से वेत्रकी (एकचक्र) पूरी नगरी सहम उठी। उनके महान वेग से वहाँ की भूमि काँपने लगी और उन्होंने वेग से पेड़ों तथा लताओं को चूर्ण कर डाला। एक-दूसरे का वध करने की इच्छा रखने वाले वे दोनों वीर पहाड़ों के शिखरों, पर्वतों से टूटे हुए पत्थरों से एक-दूसरे को पीटते हुए उन्हें चूर्ण कर रहे थे। युद्ध के नशे में मस्त उन दोनों ने चारों तरफ दो योजन के दायरे को— जिसमें पेड़, पत्थर, घास, झाड़ियाँ और लताएँ थीं— पूरी तरह साफ करके उस भूमि को कछुए की पीठ के समान समतल (चिकना) बना दिया।
  • व्याख्या: दोनों के युद्ध का दायरा दो योजन तक फैल गया और उनके प्रहारों से पूरा इलाका उजड़कर एक समतल मैदान बन गया।

श्लोक 76 से 86 (बकासुर का वध और उसकी अंतिम दशा)

श्लोक 76, 77 और 78:

मुहूर्तमेवं संयुध्य समं रक्षःकुरूद्वहौ। ततो रक्षोविनाशाय मतिं कृत्वा कुरूत्तमः।।1-177-76a 1-177-76b दन्तान्कटकटीकृत्य दष्ट्वा च दशनच्छदम्। नेत्रे संवृत्य विकटं तिर्यक्प्रैक्षत राक्षसम्।।1-177-77a 1-177-77b अथ तं लोलयित्वा तु भीमसेनो महाबलः। अगृह्णात्परिरभ्यैनं बाहुभ्यां परिरभ्य च।।1-177-78a 1-177-78b

  • हिन्दी अनुवाद: इस प्रकार एक मुहूर्त तक उन दोनों (राक्षस और कुरुवंश श्रेष्ठ भीम) का समान रूप से युद्ध हुआ। तब कुरुश्रेष्ठ भीम ने उस राक्षस के विनाश के लिए पक्का मन बना लिया। उन्होंने अपने दाँतों को 'कटकटी' (किटकटाकर) किया, अपने होठों को चबाया, अपनी विकट आँखों को सिकोड़कर तिरछी दृष्टि से उस राक्षस की ओर देखा। इसके बाद महाबली भीमसेन ने उसे चारों तरफ से झकझोर कर अपनी दोनों भुजाओं से उसे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया (गले लगा लिया)।
  • व्याख्या: अब भीम ने इस युद्ध को समाप्त करने का निर्णय ले लिया और राक्षस को पूरी ताकत से जकड़ लिया।

श्लोक 79, 80 और 81:

जानुभ्यां पार्श्वयोः कुक्षौ पृष्ठे वक्षसि जघ्निवान्। भग्नोरुबाहुहृच्चैव विस्रंसद्देहबन्धनः।।1-177-79a 1-177-79b प्रस्वेददीर्घनिश्वासो निर्यञ्जीवाक्षितारकः। अजाण्डास्फोटनं कुर्वन्नाक्रोशंश्च श्वसञ्छनैः।।1-177-80a 1-177-80b भूमौ निपत्य विलुठन्दण्डाहत इवोरगः। विस्फुरन्तं महाकायं परितो विचclearRect ह।।1-177-81a 1-177-81b

  • हिन्दी अनुवाद: भीम ने अपने घुटनों से उसकी पसलियों, कोख, पीठ और छाती पर प्रहार किया। इससे उसकी जाँघें, भुजाएँ और हृदय टूट गए तथा उसके शरीर के बंधन (जोड़) ढीले पड़ने लगे। उसके शरीर से पसीना छूटने लगा, लंबी साँसें चलने लगीं, आँखें बाहर निकलने लगीं (प्राण पखेरू उड़ने की स्थिति आ गई)। वह लाठी से पीटे गए साँप की तरह छटपटाता हुआ और अण्डकोषों के फटने जैसी आवाज करता हुआ, धीमी साँसें लेते हुए चिल्ला रहा था। भूमि पर गिरकर तड़पते हुए उस महाकाय राक्षस को भीम ने चारों तरफ घसीटा।
  • व्याख्या: भीम के प्रहारों से बकासुर की हड्डियाँ और शरीर के जोड़ टूट गए और वह मौत के मुँह में जाने लगा।

श्लोक 82, 83, 84, 85 और 86:

विकृष्यमाणो वेगेन पाण्डवेन बलीयसा। समयुज्यत तीव्रेण श्रमेण पुरुषादकः।।1-177-82a 1-177-82b हीयमानबलं रक्षः समीक्ष्य पुरुषर्षभः। निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः।।1-177-83a 1-177-83b ततो।ञस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य बलादिव। बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम्।।1-177-84a 1-177-84b सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवः। जानुन्यारोप्य तत्पृष्ठं महाशब्दं बभञ्ज ह।।1-177-85a 1-177-85b ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात्प्रादुरासीद्विशांपते। भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः।।1-177-86a 1-177-86b

  • हिन्दी अनुवाद: बलवान पाण्डव द्वारा तेजी से खींचे जाने पर वह नर-भक्षी राक्षस तीव्र थकान से ग्रस्त हो गया। उस पुरुषश्रेष्ठ (भीम) ने जब देखा कि राक्षस का बल क्षीण हो रहा है, तब वृकोदर ने उसे भूमि पर पटककर अपने घुटनों से कुचल दिया। इसके बाद अपने घुटने से उसकी पीठ को बलपूर्वक दबाकर, अपनी दाहिनी भुजा से उसकी गर्दन को पकड़ लिया। और बाएँ हाथ से उसकी कमर के वस्त्र को पकड़कर, उसकी पीठ को अपने घुटने पर रखकर एक महान (भयानक) आवाज के साथ उसकी रीढ़ की हड्डी (कमर/पीठ) तोड़ डाली। हे राजन्! भीम द्वारा इस प्रकार तोड़े जाने पर उस घोर राक्षस के मुख से खून की धारा बह निकली।
  • व्याख्या: अंततः भीम ने अपनी घुटने पर बकासुर की पीठ रखकर उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ दी, जिससे उसके मुँह से खून निकल आया और उस क्रूर राक्षस का अंत हो गया।
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